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आकांक्षा पर उद्धरण

जो किसी चीज़ की इच्छा रखता हो और प्रकृति के साथ विलीन हो, उसके लिए प्रकृति के अनेक परिवर्तन, सौंदर्य और उदात्तता का एक अनुपम दृश्य प्रस्तुत करते हैं।

स्वामी विवेकानन्द

इच्छा का यह जो सहज धर्म है कि वह दूसरे की इच्छा को चाहती है, केवल ज़ोर-ज़बरदस्ती पर ही उसका आनंद निर्भर नहीं है।

रवींद्रनाथ टैगोर

आदर्श आकांक्षा मात्र ही नहीं है। वह संकल्प भी है। क्योंकि जिन आकांक्षाओं के पीछे संकल्प का बल नहीं, उनका होना या होना बराबर ही है।

ओशो

आदिम मानव की यह एक स्वाभाविक वृत्ति है कि वह बाह्य-वस्तु जगत को अपनी कल्पना के द्वारा, अपनी आकांक्षाओं के अनुरूप चित्रित करता है।

विजयदान देथा

इस संसार में बिना प्रतिरोध, बिना हिंसा और बिना इच्छा के कोई रह ही नहीं सकता। अभी संसार उस अवस्था में नहीं पहुँचा कि ये आदर्श, समाज में प्राप्त किए जा सकें।

स्वामी विवेकानन्द

किसी भी इंसान की ख़ुशी के लिए यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि उसे अपनी स्वाभाविक इच्छाओं और आकांक्षाओं को पूरा करने की स्वतंत्रता हो।

जॉन स्टुअर्ट मिल

विचारों की असीमित आपूर्ति आपके लिए उपलब्ध है। समूचा ज्ञान, आविष्कार और खोजें, ब्रह्मांडीय मस्तिष्क में संभावनाओं के रूप में मौजूद हैं और मानवीय मस्तिष्क द्वारा उन्हें बाहर निकालने का इंतज़ार कर रहीं हैं। हर चीज़ आपकी चेतना में है।

रॉन्डा बर्न

चीज़ों को देर तक देखना तुम्हें परिपक्व बनाता है और उनके गहरे अर्थ समझाता है।

विन्सेंट वॉन गॉग

सवेरे से ही मैं अपने संसार के बारे में सोचना प्रांरभ कर देता हूँ, क्योंकि यह मेरा संसार जो है—मेरी इच्छा ही इस संसार का केंद्र है। मैं क्या चाहता हूँ, क्या नहीं चाहता, मैं किसे रखूँगा, किसे छोड़ दूँगा—इन्हीं सब बातों को बीच में रखकर मेरा संसार है।

रवींद्रनाथ टैगोर

स्वेच्छापूर्ति साधना ही जिसका स्वभाव है; ऐसा मनुष्य व्यवस्था की ओर झुके भी तो केवल इसलिए झुक सकता है, क्योंकि उसकी इच्छा अन्य को भी अपनी इच्छापूर्ति का साधन बनाना चाहती है—ऐसे में दंड का ही साम्राज्य हो सकता है, व्यवस्था उभरे भी तो दास-व्यवस्था ही उभरेगी, कोई परस्पर-भाव-जन्य ‘समझौता’ कैसे बनेगा?

मुकुंद लाठ

हमें जो चाहिए सो मिलता है, यह पुराना नियम है। जो खोजे सो पावे। धर्म की आकांक्षा होना बड़ी कठिन बात है। इसे हम साधारणतः जितना सरल समझते हैं, वह उतनी सरल नहीं है। फिर हम यह तो भूल ही जाते हैं कि कथाएँ सुनना या पुस्तकें पढ़ना धर्म नहीं है। धर्म तो एक सतत युद्ध है। स्वयं अपनी प्रकृति का दमन करते रहना, जब तक उस पर विजय प्राप्त हो जाए, तब तक निरंतर लड़ते रहना—इसी का नाम धर्म है।

स्वामी विवेकानन्द

एक पूर्ण एवं मुक्त प्राणी, कभी किसी चीज़ की आकांक्षा नहीं करता।

स्वामी विवेकानन्द

मेरी परिकल्पना और मेरी रूझान के अनुकूल, आकर्षण के केन्द्र हैं आरंभ से ही—त्यागी की वृत्ति, सादा जीवन और उच्च विचार, तथा देश-सेवा के लिए हार्दिक अनुरक्ति।

सुभाष चंद्र बोस

अगर हम ख़ुद में ऐसी इच्छा पाते हैं जिसे इस दुनिया में कुछ भी संतुष्ट नहीं कर सकता है, तो सबसे संभावित स्पष्टीकरण यह है कि हम दूसरी दुनिया के लिए बने हैं।

सी. एस. लुईस

ब्रह्मांड से अपनी मनचाही चीज़ माँगने का मतलब, इस बारे में स्पष्ट होना है कि आप क्या चाहते हैं। अगर आपके दिमाग़ में स्पष्ट तस्वीर है, तो आपने माँग लिया है।

रॉन्डा बर्न

रचनात्मक प्रक्रिया आपकी मनचाही चीज़ को पाने में आपकी मदद करती है। इसके तीन आसान क़दम है : माँगें, यक़ीन करें और पाएँ।

रॉन्डा बर्न

इच्छा, अज्ञान और आसमान—यही बंधन के त्रिविध द्वार हैं।

स्वामी विवेकानन्द

संसार में अधिकांश दुष्कर्म, व्यक्तिगत आसाक्ति के कारण ही किए गए हैं।

स्वामी विवेकानन्द

हमारी आवश्यकताएँ जब तक इस भौतिक सृष्टि की संकुचित सीमा के भीतर की वस्तुओं तक ही परिमित रहती हैं, तब तक हमें ईश्वर की कोई ज़रूरत नहीं पड़ती।

स्वामी विवेकानन्द

अल्पवित्त वाला व्यक्ति अगर एक दिन के लिए अपना राजा का शौक पूरा करने जाए; तो वह दस दिन के लिए अपने को दीवालिया बना डालता है, उसके अलावा उसके पास और कोई उपाय नहीं रहता है।

रवींद्रनाथ टैगोर

आत्मा के सम्मुख तो अनंत जीवन पड़ा हुआ है। अध्यवसाय के साथ लगे रहने पर तुम्हारी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी।

स्वामी विवेकानन्द

अपनी इच्छाओं को प्रकट करने का शॉर्टकट, अपनी मनचाही चीज़ को पूर्ण सच्चाई के रूप में देखना है।

रॉन्डा बर्न

कर्म में मेरी आकांक्षा नहीं है, विश्राम एवं शांति के लिए मैं लालायित हूँ। स्थान और काल का तत्त्व मुझसे यद्यपि छिपा हुआ नहीं है, फिर भी मेरा भाग्य तथा कर्मफल मुझे निरंतर कर्म की ही ओर ले जा रहा है।

स्वामी विवेकानन्द

हम अपने चारों ओर जाने कितना व्यर्थ कूड़े का ढेर लगाते हैं। इससे हमारा कोई लाभ नहीं होता; किंतु जिस वस्तु को हम त्यागना चाहते हैं, उसकी ओर, उस दुःख की ओर ही वह हमें ले जाता है।

स्वामी विवेकानन्द

यदि इच्छा रहे, तो दुःख भी नहीं होगा। यहाँ भी मुझे ग़लत समझ लेने की आशंका है, अतः यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि वासनाओं, इच्छाओं के त्याग तथा समस्त दुःख से मुक्त हो जाने से मेरा आशय क्या है। दीवार में कोई वासना नहीं है, वह कभी दुःख नहीं भोगती। ठीक है, पर वह कभी उन्नति भी तो नहीं करती।

स्वामी विवेकानन्द

इच्छा को जहाँ अन्य इच्छा की चाह होती है, वहाँ इच्छा फिर स्वाधीन नहीं रह जाती।

रवींद्रनाथ टैगोर

‘निष्काम’ का अर्थ है, इच्छा शक्तिरूप निम्न परिणाम का त्याग और उच्च परिणाम का आविर्भाव।

स्वामी विवेकानन्द

दुनिया में मौजूद अच्छी चीज़े कभी ख़त्म नहीं होंगी, क्योंकि यहाँ सबके लिए पर्याप्त से ज़्यादा है। जीवन प्रचुर और समृद्ध होना चाहिए।

रॉन्डा बर्न

हम जो कुछ दुःख-भोग करते हैं, वह वासना से ही उत्पन्न होता है।

स्वामी विवेकानन्द

हमारी जिस इच्छा में स्वाधीनता का सबसे विशुद्ध रूप होता है, उसी में अधीनता का भी विशुद्ध रूप होता है।

रवींद्रनाथ टैगोर

संसार में इच्छा का एक निदर्शन, हमें सौंदर्य में मिलता है।

रवींद्रनाथ टैगोर

अपनी मनचाही चीज़ों के लिए, पहले से ही धन्यवाद देने से आपकी इच्छाओं को भावनात्मक बल मिलता है और आप ब्रह्मांड में ज़्यादा सशक्त संकेत भेजते हैं।

रॉन्डा बर्न

पाने का मतलब उस तरह महसूस करना है, जैसा आप इच्छा पूरी होने के बाद महसूस करेंगे।

रॉन्डा बर्न

इच्छा और इच्छा के बीच, दूत का काम करती है प्रार्थना।

रवींद्रनाथ टैगोर

कर्म की समस्या ही यह है कि हमारी अलग-अलग इच्छाएँ में आपस में जूझती रहती हैं।

मुकुंद लाठ

विज्ञापन किसी सेवा या वस्तु को बेचने के लिए सेक्सुअलिटी का उग्र इस्तेमाल करते हैं। लेकिन यह सेक्सुअलिटी अपने आप में आज़ाद नहीं है, बल्कि यह अपने से बड़ी किसी चीज़ का प्रतीक है—वह जीवन जिसमें आप वह सब ख़रीद सकते हैं, जो आप चाहते हों।

जॉन बर्जर

वासना जिस तरह बाहर के अँधेरे में घुमाती है, इच्छा भी वैसे ही भीतर के अँधेरे में घुमाकर मारती है और अंत में मजूरी के समय धोखा देती है।

रवींद्रनाथ टैगोर

‘आत्मवान्’ होने का अर्थ स्पष्ट ही इच्छा-तंत्र से मुक्ति है।

मुकुंद लाठ

अगर मैं कहूँ; मनुष्य मुक्ति चाहता है, तो यह मिथ्या बात होगी। मनुष्य मुक्ति की अपेक्षा बहुत सारी चीज़ें चाहता है। मनुष्य अधीन होना चाहता है।

रवींद्रनाथ टैगोर

जो कर्म के फल का विचार कर केवल कर्म की ओर दौड़ता हैं, वह उसका फल मिलने के समय उसी प्रकार शोक करता है जैसे ढाक का वृक्ष सींचने वाला करता है।

वाल्मीकि

पराई स्त्री और पराया धन जिसके मन को अपवित्र नहीं करते, गंगादि तीर्थ उसके चरण-स्पर्श करने की अभिलाषा करते हैं।

संत एकनाथ

साहित्य और कला की हमारी पूरी परंपरा में, जीव की प्रधान कामना आनंद की अनुभूति है।

लक्ष्मीनारायण मिश्र

निंदा, प्रशंसा, इच्छा, आख्यान, अर्चना, प्रत्याख्यान, उपालंभ, प्रतिषेध, प्रेरणा, सांत्वना, अभ्यवपत्ति, भर्त्सना और अनुनय इन तेरह बातों में ही पत्र से ही प्रकट होने वाले अर्थ प्रवृत्त होते हैं।

चाणक्य

हम अनंत जल से भरी हुई नदी के तट पर बैठकर भी प्यासे मर रहे हैं।

स्वामी विवेकानन्द

धर्म, धर्म के लिए किया जाना चाहिए—कुछ पाने के लिए या किसी इच्छा की पूर्ति के लिए नहीं।

मुकुंद लाठ

हे जगत्पति! मुझे धन की कामना है, जन की,न सुंदरी की और कविता की। हे प्रभु! मेरी कामना तो यह है कि जन्म-जन्म में आपकी अहैतुकी भक्ति करता रहूँ।

चैतन्य महाप्रभु

मनुष्य का सामाजिक जीवन ही साहित्य कला का एकमात्र स्रोत होता है तथा उसकी विषय-वस्तु; कला-साहित्य के मुक़ाबले अतुलनीय रूप से अधिक सजीव और समृद्ध होती है, फिर भी लोग केवल जीवन को देखकर ही संतुष्ट नहीं हो सकते बल्कि साहित्य और कला की माँग भी करते हैं।

माओ ज़ेडॉन्ग

निःस्वार्थ सेवा ही धर्म है और बाह्य विधि, अनुष्ठान आदि केवल पागलपन है, यहाँ तक कि अपनी मुक्ति की अभिलाषा करना भी अनुचित है।

स्वामी विवेकानन्द

मानव के सभी कार्यों के कारणों में इन सात में से एक या अनेक होते हैं—संयोग, प्रकृति, विवशताएँ, आदत, तर्क, मनोभाव, इच्छा।

अरस्तु

बिना पढ़े ही गर्व करने वाले, दरिद्र होकर भी बड़े-बड़े मनोरथ करने वाले और बिना कर्म किए ही धन पाने की इच्छा रखने वाले मनुष्य को पंडित लोग मूर्ख कहते हैं।

वेदव्यास