आत्मा की सब अनुभूतियाँ ऐस्थेटिक नहीं होतीं, इसलिए वे काव्य-रूप में व्यक्त नहीं होतीं।
यदि लेखक के पास संवेदनात्मक महत्व-बोध नहीं है, या क्षीण है, तो विशिष्ट अनुभवों की अभिव्यक्ति क्षीण होगी।
आँख वाले प्रायः इस तरह सोचते हैं कि अंधों की, विशेषतः बहरे-अंधों की दुनिया, उनके सूर्य प्रकाश से चमचमाते और हँसते-खेलते संसार से बिलकुल अलग हैं और उनकी भावनाएँ और संवेदनाएँ भी बिलकुल अलग हैं और उनकी चेतना पर उनकी इस अशक्ति और अभाव का मूलभूत प्रभाव है।
मानवीय संवेदना के मूल स्वभाव को ठीक से समझे बिना सब कुछ को ख़ारिज कर देने का औद्धत्य कभी फलप्रसू नहीं होता।
उपन्यास भावनाओं को साँचा देते हैं, समय का ऐसा अनुमान देते हैं जिसे औपचारिक इतिहास नहीं दे सकता।
मौन निकटता की भावना लाता है। जैसे ही बात खुलती है, तीसरी उपस्थिति की मानो चेतावनी आती है।
लेखक के साथ आप तब रह सकेंगे; जब आप में इतनी मानव-श्रद्धा हो कि लेखक-वर्ग में हृदय-समृद्धि, प्रतिभा-शक्ति और विकास तथा उन्नति की संभावनाएँ हैं—यह मानकर चलें। इसका अर्थ यह है कि आप लेखक की विरोधी और युक्तियुक्त आलोचना न करें। इसका अर्थ यह है कि आप उस मनोवैज्ञानिक स्थिति-परिस्थिति को, उस साइकोलॉजिकल सिच्युएशन को समझें कि जो लेखक के साहित्य-सृजन का प्रारंभ-बिंदु बनती है।
जो भावुक या सहृदय होते हैं, अथवा काव्य के अनुशीलन से जिनके भावप्रसार का क्षेत्र विस्तृत हो जाता है—उनकी वृत्तियाँ उतनी स्वार्थबद्ध नहीं रह सकतीं।
वासनात्मक अवस्था से भावात्मक अवस्था में आया हुआ राग ही अनुराग या प्रेम है।
जल्दी-जल्दी में लिखी गईं गोपनीय नोटबुक्स और तीव्र भावनाओं में टाइप किए गए पन्ने, जो ख़ुद की ख़ुशी के लिए हों।
संभवतः मेरे जीवन का अस्ल मक़सद मेरे शरीर, मेरी संवेदनाओं और मेरे विचारों को लेखन बनाने के लिए हो, दूसरे शब्दों में : कुछ समझ में आने लायक़ और सार्वभौमिक हो, जिससे मेरा अस्तित्व अन्य लोगों के जीवन और मस्तिष्क में विलीन हो जाए।
जब बुराई को अच्छाई के साथ प्रतिस्पर्धा करने दी जाती है, तो बुराई में भावात्मक जनवादी गुहार होती है जो तब तक जीतती रहती है जब तक कि अच्छे पुरुष और स्त्रियाँ दुर्व्यवहार के ख़िलाफ़ एक अग्र-दल के रूप में खड़े न हो जाएँ।
‘प्रेम’ को बीजभाव माननेवालों की दृष्टि; उसके मूल वासनात्मक रूप ‘राग’ की ओर रहती है, जो मनुष्य की अंतःप्रकृति में निहित रहकर संपूर्ण सजीव सृष्टि के साथ, किसी गूढ़ संबंध की अनुभूति के रूप में समय-समय पर जगा करता है।
किसी प्रसंग के अंतर्गत कैसा ही विचित्र मुर्तिविधान हो, पर यदि उसमें उपयुक्त भावसंचार की क्षमता नहीं है, तो वह काव्य के अंतर्गत न होगा।
मैंने उसे अपना दिल दिया, और उसने लेकर उसे कुचलकर मार डाला : और मेरी ओर वापस उछाल दिया। …और चूँकि उसने मेरा दिल नष्ट कर दिया, मेरे पास उसके लिए कोई भावनाएँ नहीं हैं।
कविता ही हृदय को प्रकृत दशा में लाती है; और जगत् के बीच क्रमशः उसका अधिकाधिक प्रसार करती हुई, उसे मनुष्यत्व की उच्च भूमि पर ले जाती है।
भावप्रसूत वचनरचना में ही भाव या भावना तीव्र करने की क्षमता पाई जाती है।
जब मैं लिखती हूँ, तो मेरे मन में कहीं वह विलक्षण और बहुत सुखद भावना सिर उठाती है जो कि मेरा अपना दृष्टिकोण है…
जो एक भाव लेकर उसी में मत्त रह सकते हैं, उन्ही के हृदय में सत्य-त्तत्त्व का उन्मेष होता हैं।
पुराने दोस्त की तरह जब कोई आपको बहुत अच्छी तरह से जान जाता है तो वह आपसे मिलना नहीं चाहता।
कोई भी विचार जो भावनाओं की ज़मीन में गड़ा होता है, वह अपने ख़िलाफ़ दिए जाने वाले तर्कों से और ज़्यादा मज़बूत होता है।
ज्ञान ही भावों के संचार के लिए मार्ग खोलता है। ज्ञानप्रसार के भीतर ही भावप्रसार होता है।
वेदना का परिष्कार ही रुचि है; किंतु संवेदना में ‘क्रिया’ नहीं होती, वह तो केवल ग्रहण ही करती है।
सान्निध्य और संपर्क की प्रबल प्रवृत्ति जगानेवाली दशा, जिसे आसक्ति कहते हैं—माधुर्य भावना के संचार से ही प्राप्त होती है।
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वे भावनाएँ कितनी उबाऊ हैं कि जिनमें हम फँस जाते हैं और उनसे मुक्त नहीं हो सकते, चाहे हम कितना भी चाहें…
कोई कभी भी किसी को उसकी भावना को बदलने के लिए नहीं कह सकता है।
अजनबी लोगों से मिली सहानुभूति बर्बाद कर सकती है।
कुछ भावनाएँ वर्षों की दूरी ख़त्म कर देती हैं और असंभव स्थानों को जोड़ देती हैं।
बुद्धि की क्रिया से हमारा ज्ञान जिस अद्वैत भूमि पर पहुँचता है, उसी भूमि तक हमारा भावात्मक हृदय भी इस सत्वरस के प्रभाव से पहुँचता है। इस प्रकार अंत में जाकर दोनों पक्षों की वृत्तियों का समंवय हो जाता है। इस समंवय के बिना मनुष्यत्व की साधना पूरी नहीं हो सकती।
जीवन केवल इच्छाओं या भावनाओं से उत्पन्न आचरणों को सेना के समान कवायद सिखा देने में ही सफल नहीं हो जाता, वरन् उन इच्छाओं के उद्गमों को खोजकर, उनसे मनुष्यता की मरुस्थली को आर्द्र करके पूर्णता को प्राप्त होता है।
अंतःकरण की जितनी वृत्तियाँ हैं, उनमें से कोई निरर्थक नहीं—सबका उपयोग है। इनमें से किसी की शक्ति फ़ालतू नहीं। यदि मनुष्य इनमें से किसी को निष्क्रिय करने का अभ्यास डालेगा, तो अपनी पूर्णता को खोएगा और अपनी स्थिति को जोखिम में डालेगा।
अनुभूति एक प्रक्रिया है, जिसका निश्चित विधान होता है। यह विधान संगति के बिना नहीं निर्मित होता। इस प्रक्रिया में कहीं कुछ छूट जाता है, तो वह सहृदय के चित्त में जुड़ जाता है।
सहानुभूति मानवीय भावनाओं में सबसे अधिक विलक्षण है।
अभावग्रस्त बचपन, मेहनत और चिंताओं से भरा विद्यार्थी-जीवन, बाद में मँझोली हैसियत की एक सरकारी नौकरी—अपने इन अनुभवों की कहानी सुनाना बेकार है क्योंकि इस तरह की कहानियाँ बहुत बासी हैं और बहुत दोहराई जा चुकी हैं।
तर्कशास्त्र की विविध प्रणालियाँ और प्रक्रियाएँ, कला की श्रेणी में नहीं आ सकतीं। कला का संबंध नियमों से नहीं है, वह तो रूप की अभिव्यक्ति मात्र है।
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श्रेष्ठता की कसौटी को लेकर हमारे साहित्य में रचनाकारों और आलोचकों के दो-तीन बड़े मज़बूत और सुपरिचित खेमे हैं; इनकी मान्यताएँ और दृष्टियाँ अत्यंत सुपरिभाषित हैं और अपने को एक-दूसरे से भिन्न मानने में ही उनकी सैद्धांतिक सार्थकता समझी जाती है, पर एक मामले में दोनों खेमों के सदस्य एक जैसे हैं। वे एक ओर भावुकता-विरोध को एक स्वतः सिद्ध मूल्य मानते हैं और दूसरी ओर अकेले में वे सभी भावुक होने की अपार क्षमता दिखा सकते हैं—सब नहीं तो अधिकांश। उन्हीं अधिकांश में एक मैं भी हूँ।
कवि हमारे सामने असौंदर्य, अमंगल, अत्याचार, क्लेश इत्यादि भी रखता है, रोष, हाहाकार, और ध्वंस का दृश्य भी लाता है। पर सारे भाव, सारे रूप और सारे व्यापार भीतर-भीतर आनंद-कला के विकास में ही योग देते पाए जाते हैं।
मनोवैज्ञानिक वस्तुवादी कवि; जब सामाजिक भावनाओं तथा विश्व-मैत्री की संवेदानाओं से आच्छन्न होकर मानचित्र प्रस्तुत करता है, तब वह उसी प्रकार अनूठा और अद्वितीय हो उठता है जैसे कि किसी क्षेत्र में भिन्न तथा अन्य कवि कदापि नहीं।
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कुव्यवस्था से चिपके रहने के कारण उसे व्यवस्था का सहज अंग मानने की आदत पड़ जाती है और संवेदना—जो सृजन की बुनियादी शर्त है—भोथरी पड़ने लगती है।
हमारी भाव-संपदा, ज्ञान-संपदा और अनुभव-समृद्धि तो उस अंतर्तत्व-व्यवस्था ही का अभिन्न अंग है कि जो अंतर्तव्य-व्यवस्था, हमने बाह्य जीवन-जगत के आभ्यंतरीकरण से प्राप्त की है।
मैं चाहता हूँ ज्ञान-परंपरा, भाव-परंपरा और उसको धारण करने वाला यह जो जगत् है, वह।
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कला और काव्य दोनों ही का उपजीव्य भावलोक है। भाव-सृष्टि से ही आरंभ में गुण सृष्टि का जन्म होता है और फिर भाव और गुण दोनों की समुदित समृद्धि भूतसृष्टि में अवतीर्ण होती है। भाव-सृष्टि का संबंध मन से, गुण-सृष्टि का प्राण से और भूत-सृष्टि का स्थूल भौतिक रूप से है। इन तीनों की एकसूत्रता से ही लौकिक सृष्टि संभव होती है। इन तीनों के ही नामांतर ज्ञान, क्रिया और अर्थ है।
भारतीय साहित्य और कलाओं के मूल में जो स्थायी भाव माने गए हैं, वे केवल विक्षिप्तों की विवेक भावनाएँ नहीं हैं—उनके साथ ज्ञान-शक्ति का भी समन्वय है।
जिस लेखक के काव्य में जितनी ही अधिक दुःखात्मक अनवस्था व्यक्त होती है, उसे मानवीय सहानुभूति और प्रेम की उतनी ही अधिक आवश्यकता होती है।
यदि कवि का ज्ञान-पक्ष दुर्बल है, यदि उसका ज्ञान; आत्म-पक्ष, बाह्य-पक्ष और तनाव के संबंध में अधूरा अथवा धुँधला है, अथवा यदि वह तरह-तरह के कुसंस्कारों और पूर्वग्रहों तथा व्यक्तिबद्ध अनुरोधों से दूषित है, तो ऐसे ज्ञान की मूलभूत पीठिका पर विचरण करनेवाली भावना या संवेदना निस्संदेह विकारग्रस्त होगी।
कला के स्वायत्त क्षेत्र का स्वातंत्र्य तभी सार्थक है, जब कलाकार में आंतरिक सम्पन्नता हो। ऐसी आंतरिक सम्पन्नता, जो वास्तविक जीवन-जगत् के संवेदनात्मक आभ्यंतरीकरण से उत्पन्न हुई है।
कविता की तरह चित्रकला भी मनुष्य की कोमल भावनाओं का परिणाम है। जो काम कवि करता है, वही चित्रकार करता है, कवि भाषा से, चित्रकार पेंसिल या कलम से। सच्ची कविता की परिभाषा यह है कि तस्वीर खींच दे। उसी तरह सच्ची तस्वीर का यह गुण है कि उसमें कविता का आनंद आए। कवि कान के माध्यम से आत्मा को सुख पहुँचाता है और चित्रकार आँख के द्वारा और चूँकि देखने की शक्ति सुनने की अपेक्षा अधिक कोमल और संवेदनशील होती है, इसीलिए जो बात चित्रकार एक चिन्ह, एक रेखा, या ज़रा से रंग से पूरा कर देगा, वह कवि की सैकड़ों पंक्तियों से न अदा हो सकेगी।
मानव के सभी कार्यों के कारणों में इन सात में से एक या अनेक होते हैं—संयोग, प्रकृति, विवशताएँ, आदत, तर्क, मनोभाव, इच्छा।
ध्यान के लिए वस्तुतः सर्वोच्च ढंग की संवेदनशीलता चाहिए तथा प्रचण्ड मौन की एक गुणवत्ता चाहिए—ऐसा मौन जो प्रेरित, अनुशासित या साधा हुआ नहीं हो।
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जिस प्रकार हम संवेदनात्मक ज्ञान तथा ज्ञानात्मक संवेदन द्वारा; बचपन से ही बाह्य जीवन-जगत् को आत्मसात् कर उसे मनोवैज्ञानिक रूप देते आए हैं, उसी तरह हम इस आत्मसात्कृत, अर्थात् मन द्वारा संशोधित-संपादित-संस्कारित-गणित-पुनर्गठित, जीवन-जगत् को बाह्म रूप भी देते हैं।
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