नियम साधना का लोभ भी कष्ट की मात्रा का हिसाब लगाकर आनंद पाता है। अगर कड़े बिछौने पर सोने से शुरू किया जाए; तो आगे चलकर मिट्टी पर बिछौना बिछाकर, फिर सिर्फ़ एक कंबल बिछाकर, फिर कंबल को भी छोड़कर निखहरी ज़मीन पर सोने का लोभ क्रमशः बढ़ता ही रहता है।
परित्राण का अर्थ यह है कि व्यर्थता और असफलता से अपनी रक्षा करना, अपने भीतर सत्यरूपी जो रत्न छिपा हुआ है, उसका उद्धार करना।
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अस्पर्श में प्रतिष्ठित हो जाने का नाम ही संयम है। और, संयम सत्य का द्वार है।
गढ़ने में संयम की ज़रूरत होती है, नष्ट करने में असंयम की।
धारणा करने के लिए संयम चाहिए और मिथ्याचार के लिए असंयम।
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भीतर इतनी गहराई हो कि कोई तुम्हारी थाह न ले सके। अथाह जिनकी गहराई है, अगोचर उनकी ऊँचाई हो जाती है।
मन—जिसमें मस्तिष्क और हृदय समाविष्ट हैं—को पूर्ण संगति में होना चाहिए।
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अपने लक्ष्यों के प्रति हार्दिक स्नेह के बिना, जिज्ञासा, आत्म-संस्कार, आत्म-निरीक्षण तथा आत्म-संघर्ष—सब व्यर्थ है।
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विकारी मन अनेक प्रकार के स्वादों और भोगों की तलाश में रहता है और बाद में उन आहारों तथा भोगों का प्रभाव मन पर पड़ता है।
जिस प्रकार कला अपने आभ्यंतर नियमों के कठोर अनुशासन के बिना अपंग या विकृत होती है; अथवा अभाव बनकर रहती है, उसी प्रकार व्यक्ति-स्वातंत्र्य अपनी अंतरात्मा के कठोर नियमों के अनुशासन के बिना—निरर्थक और विकृत हो जाता है, खोखला हो जाता है।
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आत्म-संयम अर्थात् आत्मानुशासन ही कलात्मक सौंदर्य को सुंदर एवं व्यवस्था को सुव्यवस्थित और आनंददायक बनाता है।
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जो मनुष्य निश्चय करके कार्य प्रारंभ करता है, कार्य के मध्य में रुकता नहीं, समय को नष्ट नहीं करता और स्वयं को वश में रखता है, उसी को पंडित कहा जाता है।
ध्यान के लिए वस्तुतः सर्वोच्च ढंग की संवेदनशीलता चाहिए तथा प्रचण्ड मौन की एक गुणवत्ता चाहिए—ऐसा मौन जो प्रेरित, अनुशासित या साधा हुआ नहीं हो।
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स्वयं को खोकर कुछ करो, तो उससे ही स्वयं को पाने का मार्ग मिल जाता है।
हम अपने ऊपर राज करें वही स्वराज्य है और वह स्वराज्य हमारी हथेली में है।
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बुद्धत्व का आगमन किसी नेता या गुरु द्वारा नहीं होता, आपके भीतर जो कुछ है उसकी समझ द्वारा ही इसका आगमन होता है।
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कर्म—विशेषतः मंगल-कर्म—तभी सहज और सुख-साध्य होता है; जब प्रवृत्ति को संयम के साथ चलाने की शिक्षा हो, साधना हो।
प्रकृतिदत्त सुडौल शरीर पर, चर्बी की पर्तें चढ़ाकर हम लोग ही उसे बेढब बना देते हैं। चर्बी के ये भंडार बच्चों के नाम कर जाते हैं, और इस प्रकार चर्बी की यात्रा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चल पड़ती है।
दूसरों से गाली सुनकर भी स्वयं उन्हें गाली न दे। गाली सहन करने वाले का रोका हुआ क्रोध ही गाली देने वाले को जला डालता है और उसके पुण्य भी ले लेता है।
विचार-मात्र विकार हैं, उन्हें वश में करने का मतलब है, मनको वश में करना और मनको वश में करना तो वायु को वश में करने से भी कठिन है।
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वे महान् पुरुष धन्य हैं जो अपने उठे हुए क्रोध को अपनी बुद्धि के द्वारा उसी प्रकार रोक देते हैं, जैसे दीप्त अग्नि को जल से रोक दिया जाता है।
जब आज़ादी को ज़िम्मेदारी के साथ नहीं निभाया जाता, तो उसके अनियंत्रित होने की संभावना बढ़ जाती है।
यह हमारा परम धर्म है कि हम किसी हिंदू को पागल न बनने दें, किसी सिखको पागल न बनने दें।
ख़ुद से झूठ बोलना बंद कर दीजिए तो आपके सामने सच का अगाध सागर होगा और आपके लिए मुक्ति के द्वार खुल जाएँगे।
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ब्रह्मचर्य का प्रयत्न करने वाले बहुतेरे लोग विफल होते है, क्योंकि वे खाने-पीने, देखने-सुनने इत्यादि में अब्रह्मचारी की तरह रहना चाहते हुए भी,ब्रह्मचर्य-पालन की इच्छा रखते हैं।
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इंद्रियाँ इतनी बलवान हैं कि उन्हें चारों तरफ से—ऊपर से और नीचे से, यों दसों दिशाओं से—घेरा जाए तो ही वे अंकुश में रहती हैं।
अधिकांश ग़ुस्सैल लोग दो श्रेणियों में आते हैं–वे जो अपने ग़ुस्से पर कोई नियंत्रण नहीं रखते और इसे अपने ऊपर हावी होने देते हैं, और दूसरे वे, जो अपने ग़ुस्से में फट पड़ते हैं।
ब्रह्मचर्य का अर्थ है, मन-वचन-काया से समस्त इंद्रियों का संयम।
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जो मायने रखता है, वह यह है कि आप अपनी आत्मा के निर्देशानुसार कितनी जल्दी करते हैं।
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अगर लगातार हम व्यसन-व्यभिचार में पड़े रहे तो हिंद आज़ाद होकर भी उसकी आज़ादी व्यर्थ जाने वाली है।
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जिस पर अपना वश न हो ऐसे कारण से पहुँचने वाले भावी अनिष्ट के निश्चय से जो दुःख होता है, वह भय कहलाता है।
अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखें : कम प्रतिक्रिया करना सीखें और इसके बजाय जवाब देना सीखें।
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ध्यान में हमें पहला बोध जिस बात का होता है वह यह है कि खोजने का कोई मूल्य नहीं है; क्योंकि प्रायः वही चीज़ आपकी खोज का विषय बन जाती है जिसकी आप इच्छा ओर कामना करते हैं।
दूरंगम विचरण के योग्य बनने के लिए मन को सर्वप्रथम अपना ही संस्कार करने की आवश्यकता होती है।
आपको अपनी एक हद तय करनी ही चाहिए।
तुम यहाँ किसी को ठीक करने, बचाने या ख़ुद को साबित करने नहीं आए हो।
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