डर

मेरा डर मेरा सच एक आश्चर्य है।

रघुवीर सहाय

लोग भूल गए हैं एक तरह के डर को जिसका कुछ उपाय था। एक और तरह का डर अब वे जानते हैं जिसका कारण भी नहीं पता।

रघुवीर सहाय

मुझे अपनी कविताओं से भय होता है, जैसे मुझे घर जाते हुए भय होता है।

मंगलेश डबराल

लोग भूल जाते हैं दहशत जो लिख गया कोई किताब में।

रघुवीर सहाय

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