घर

हम घर जाल्या आपणाँ, लिया मुराड़ा हाथि।

अब घर जालौं तासका, जे चले हमारे साथि॥

मैंने ज्ञान-भक्ति की जलती हुई लकड़ी हाथ में लेकर अपना विषय वासनाओं का घर जला डाला। अब मैं उसका भी विषय-वासनाओं का घर जला सकता हूँ जो मेरा साथ देने के लिए तैयार हो।

कबीर

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