Font by Mehr Nastaliq Web

कहानी : ऊँघ

उस दुपहर भी भृत्य शामलाल अपने निर्धारित स्थान—जो कि राज्य संचालनालय की पुरानी इमारत संख्या : ग, इकाई-7, छठवीं मंज़िल के कक्ष क्रमांक 337 में क़तारबद्ध अलमारियों के मकड़जालों के बीच ज़रा किनारे की ओर हटकर, अपनी चरमराती हुई तिपाई पर बैठा—ऊँघ रहा था।

ऊँघ—एक अजगरी क्रिया, जिसे जागृतावस्था अथवा सुसुप्तावस्था, इनमें से किसी भी जैवीय स्थिति की शब्दावली के द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता। इस दफ़्तर का—और इसका ही क्यों इस देश का—हरेक सरकारी व्यक्ति, यानि अधिकारी, कर्मचारी, प्यून, स्वीपर, गार्ड ऊँघता है। अनवरत रूप से... ऊँघते-ऊँघते ये लोग समाज, प्रांत, राष्ट्र का हर काम करते जाते हैं। ऊँघ ही ऊँघ में बड़े-बड़े सौदे पट जाते हैं, कार्य योजनाएँ बनकर पारित हो जाती हैं, पारित होकर कार्यान्वित भी हो जाती हैं, कार्यान्वित होकर विफल भी हो जाती हैं, विफल होकर उन पर जाँच समितियाँ बैठ जाती हैं, जाँच समितियाँ बैठकर जाँच रिपोर्टें भी पेश कर देती हैं, जो संचालनालय के कई सतहों पर ऊँघती हुई चक्कर पर चक्कर खाती रहती हैं। ऊँघ ही ऊँघ में ठेके-कट-कमीशन की बेहद ज़रूरी सार्वभौम बातें तय-तमन्ना हो जाती हैं। ऊँघ ही ऊँघ में करोड़ों-अरबों के वारे-न्यारे हो जाते हैं। ऊँघ ही ऊँघ में हज़ारों तक़दीरें बन-बिगड़ जाती हैं। ये वो बातें हैं जिन्हें कौन नहीं जानता?

दरअस्ल इतना भारी, एकरस और ऊब भरा होता है राज-काज का काम कि मन थक जाता है। रोज़-रोज़ वही चाँदमारी, वही चोरी-चकारी! कुछ भी नया नहीं इसमें। कहते हैं ना, कि हर रास्ता दिल्ली को जाता है—बस वही जान लीजिए। तो शामलाल इसी दफ़्तर का एक अदना-सा प्यून, चपरासी, भृत्य-शतरंज का प्यादा—प्यादा भी नहीं, पिटा हुआ मोहरा; उस विशाल कक्ष में जो कुछ-कुछ शतरंज की बिछी हुई बिसात जैसा है, वहीं प्लाइवुड तथा अलमारियों के मिले-जुले पार्टीशननुमा मकड़जाले में, अपने बैठने की स्वयं निर्धारित जगह पर, अपनी ही हथियाई हुई तिपाई पर बैठा—ऊँघ रहा था।

ऊँघ रहा था?

हाँ, सही कहा—ऊँघ ही रहा था, मगर सिर्फ़ ऊपरी-सरसरी नज़र वालों के लिए। वह तो दरअस्ल संचनालय की एक आवश्यक और अविभाज्य परंपरा के अंग के रूप में स्वयं को देखते हुए, राज्य की ख़ुशहाली और तरक़्क़ी में एक हद तक अपना योगदान दे रहा था। उस हद तक, जहाँ तक एक ज़िम्मेदार और गंभीर प्यून सोच सकता है कि वह अपने दफ़्तर की गतिविधियों को संचालित कर रहा है।

जी हाँ, हम और आप शायद नहीं जानते—और यदि जानते हैं तो भी साज़िश करते हुए, नज़रअंदाज़ करते हैं कि एक प्यून की निजी, एकांतिक दुनिया में उसके स्वरचित महत्त्व के मायालोक में, इसकी कोई सीमा नहीं है।

प्यूनों के इस आत्मीय संसार में, जहाँ संयोगवश तंबाकू, भंग-गोला, गुटखा, गुड़ाखू और अफ़ीम-गांजा की आमद-रफ़्त बाहरी कठोर दुनिया की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक व्यापक है; एक आम, औसत रूप से समझदार भृत्य इस बात को भली-भाँति जानता-बूझता है कि दरअस्ल वही अपने अधिकारियों—और बाबुओं से उसकी तो कोई तुलना ही नहीं—से कई गुना अधिक अनुभवी और समझदार, अनेक संवेदनशील मामलों में अपनी सूझ से दफ़्तर का बेड़ा गर्क होने से बचाए हुए है। और यदि ऐसा किसी कारणवश नहीं भी हो तो, कम से कम उसके ही पुण्य प्रताप से सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा है। और यदि ऐसा भी नहीं है तो कम से कम इस बाबत वह सबसे पहले ही—यानी सबसे पहले से ही—जानता तो था ही, है कि नहीं?

अभी शामलाल उक्त पेशाजन्य मनःस्थिति में ऊँघता हुआ एक उच्चतर अवस्था को प्राप्त हो चुका था, जहाँ वह स्वयं मुख्य सचिव महोदय को उनके मुँह लगे भृत्य के रूप में, कोई ज़रूरी सलाह दे रहा था और साहब, एक प्रशिक्षु जैसा आदर भाव लिए सुन रहे हैं। उसकी आँखें खुली भी थीं और बंद भी। वह सुन भी रहा था और नहीं भी सुन रहा था। मतलब, बाबू और अफ़सर नामधारी उन तरह-तरह के बीसियों आकाओं के प्रति पूरी तरह सजग, इनके अलावा बाक़ी किसी भी घटना तथा ध्वनि के प्रति पूरी तरह निष्क्रिय और निर्जीव। अभी-अभी एक बाबू द्वारा सुरती माँगे जाने पर उसने सुसुप्तावस्था में ही मल कर उसे उक्त आशय तक पहुँचाया था। और फिर ऊँघता हुआ अपने स्टूल पर आकर पूर्ववत ध्यानस्थ हो गया था। बकोध्यानम की इस श्रेष्ठावस्था को प्राप्त हुए चंद पल ही गुज़रे थे कि आलमारियों के मकड़जाल से छनकर घंटी की महीन नागवार आवाज़ उसके कानों तक पहुँची।

100 प्रतिशत यह एक दफ़्तरी घंटी थी, जिसका सीधा-सा दफ़्तरिया मतलब था—यानी यह एक प्यून को बुलाने के लिए लगाई गई दफ़्तरी हाँक थी, लेकिन दफ़्तरिया माहौल में बिल्कुल सवा सौ प्रतिशत जज़्ब होने के बावजूद शामलाल को उस ध्वनि को सुनकर एक झल्लाहट पैदा हुई। शामलाल को दरअस्ल घंटियों की आवाज़ों से एक अंदरूनी चिढ़ है। यह एक प्रकार की एलर्जी जैसी प्रतिक्रिया है। कैसी भी घंटी की आवाज़ हो, उसे सुनते ही शामलाल को चमड़ी की भीतरी सतह पर एक गिजगिजाहट जैसी महसूस होती है। ऊपर से यह विचित्र, मगर तनिक ध्यान देते ही बिल्कुल ही समझ में आने लायक़ बात है। शामलाल एक प्यून है और दफ़्तर के इस ख़ास कक्ष से, जो कक्ष बतौर पियून उसे अलॉट है या बेहतर कहें कि जिस कक्ष को बतौर प्यून शामलाल अलॉट है, गहरा अंदरूनी लगाव है। उसके जीवन का सबसे ख़ुशहाल, बेहतरीन समय, इसी कक्ष में व्यतीत हुआ है। सुहागरात से भी बेहतरीन। इस कक्ष के ज़र्रे-ज़र्रे से उसकी आत्मीय जान-पहचान है। जहाँ तक घंटियों का प्रश्न है, तो यहाँ बजने वाली प्रत्येक घंटी को वह सूक्ष्मतर तरीक़े से जानता-पहचानता है।

यही नहीं, वर्षों के अभ्यास ने उसे अलमारियों के खुलने व बंद होने की व्यक्तिगत आवाज़ों, बाबुओं-अफ़सरों के कपड़ों की सरसराहटों, जूतों-चप्पलों की लसर-फसर, कंप्यूटरों की घरघराहटों और यहाँ तक कि गलियारों में इधर-उधर होने वाली अपान वायु की अलग-अलग स्नायविक अनुभूतियों को, उनकी अपनी अपनी विशिष्टताओं में, निजी तौर पर पहचान में माहिर बना दिया है। सच पूछा जाए तो किसी सचिवालयीन भृत्य के लिए यह सब कोई ख़ास महारथ की बातें हैं भी नहीं, एक आम भृत्य यह सब सहज ही जानता बूझता है और शामलाल भी एक बेहद आम भृत्य है। अपनी भृत्येंद्रिय की जागृत कुंडलिनी के द्वारा वह सहज जान जाता है कि कौन-सा अफ़सर किधर दाना चर रहा है, किस बाबू का पेट ख़राब है, कौन-सी मैडम मंथ में चल रही हैं, आदि-आदि, वगैरा-वगैरा। अलमारियों की ढनढनाहटों, पेन की निबों की खरखराहटों, फ़ाइलों की सरसराहटों—ऐसी सामान्य दफ़्तरी ध्वनियों से उसे तुरंत पता चल जाता है कि कौन-सी फ़ाइल खुली-बंद हुई, आगे बढ़ी-रुकी-पीछे गई—फ़लाँ-फ़लाँ की चिड़िया बैठ गई, फ़लाँ-फ़लाँ टिप लग गई, ऐसे-ऐसे आकार-प्रकार के इतने और इतने हरे करारे पत्ते इधर-उधर गए। यही नहीं, आपको यह जानकर हैरत हो सकती है कि वह पैंटों की जिपों और ब्रेसियरों के हुकों के खुलने-बंद होने की ध्वनियों को भी अलग-अलग पहचानता है। शामलाल एक बेहद मंझा हुआ भृत्य है—निरीह, उदासीन, ख़तरनाक, अपने काम में माहिर, पता लगाने और सूचना इधर-उधर करने में कुशल तथा विश्वसनीय। ऊब और ऊँघ का विशेषज्ञ और प्रकारांतर में शिकार, हाँ शिकार...

मगर फिर—इन अटकलबाज़ियों में क्या धरा है? छोड़िए, इन बातों को। अभी तो यही शामलाल अपने कक्ष के पार्टिशनों के बीच एक गलियारे में अपनी मनपसंद जगह पर, अपनी टूल पर झूलता हुआ ऊँघ रहा था कि हठात—यह कर्कश आवाज़ उसके कानों में पिघले हुए शीशे की तरह जलन पैदा करती हुई उतरी। घंटियों की चीख़-पुकार से एक तो उसे वैसे ही एक अंदरूनी चिढ़, उस पर से अपनी छठी भृत्येंद्रिय की सहायता से उसे तत्क्षण मालूम हो गया है कि उसे बजाने वाला एक बेहद अड़ियल क़िस्म का सनकी लेखपाल, वह एक यांत्रिक दानव किंबा फ़्रैंकिन्स्टाइन, फ़ाइलों के रहस्यलोक का एक मायावी प्राणी, एक भयानक अय्यार। घंटी बजा-बजा कर प्यून लोगों की ऊँघ को तोड़ना, उन्हें बेवजह दौड़ा-दौड़ा कर हलकान करना और तरह-तरह की नारकीय स्थितियों में डालना, उसका परम जीवन-लक्ष्य। वह एक माहिर तिकड़मी और यूनियनबाज़। झूठे मामलों में फँसा-वँसाकर कर्मचारियों को जाँच के घेरे में लाना, उन्हें सस्पेंड आदि करा देना उसके लिए बाएँ हाथ का खेल; खासकर प्यून लोगों का तो वह भीषणतम शत्रु क्योंकि उसके बारे में सुना गया था कि एक प्यून—जिसे वह छोटे-मोटे काम के लिए घर बुलाता था—ने उसकी लड़की से संबंध बनाने की कोशिश की थी, जिसके चलते उसे भृत्यों से नफ़रत हो गई थी; हालाँकि कई भृत्यों का ख़याल था कि ऐसी बात नहीं थी क्योंकि वह तो बाबू लोगों का भी उतना ही बड़ा शत्रु था, जिसका मतलब यह था कि ऐसा आचरण वह साहब लोगों की नज़र में चढ़कर, गोपनीय चरित्रावली में ‘उत्कृष्ट’ लिखवा कर, प्रोमोशन पाने के लिए किया करता था। मगर अपने अभियान में असफल होते-होते, एक क्रूर खलनायक बन चुका था जो किसी का दोस्त नहीं था... इसलिए शामलाल को उससे बेहद चिढ़ या नफ़रत थी। और वही आदमी इस समय कुछ अधिक ही व्यग्रता से घंटी टीपता हुआ उसे बुला रहा था...

यह नागवार आवाज़ जैसे ही उसके कानों में पड़ी, शामलाल एक यंत्र या रोबोट की तरह उठ खड़ा हुआ और जम्हाई लेता हुआ चल पड़ा। प्लाईवुड के टुकड़ों और अलमारियों के छोटे-बड़े तहख़ानों से गुज़रता हुआ, जब वह उस टेबल के पास पहुँचा तो एक हद तक जागृत हो चुका था और हम मान सकते हैं कि उसके किसी प्रकार की हवाई उड़ान पर होने की संभावना नगण्य थी। तभी—उसे यह देखकर हैरत हुई कि वह नर पिशाच हमेशा की तरह फ़ाइल निपटाता हुआ फटकारने की मुद्रा में न होकर, एक अलग ही विचित्र प्रकार की मुद्रा में ऊँघ रहा था—जो कि ठीक उसी की अपनी, शामलाल की मुद्रा से हूबहू मेल खा रही थी। बिल्कुल उसी की तरह एक ओर झुका हुआ... और वह घंटी जिसके बजने की आवाज़ अभी भी सुनाई पड़ रही थी... कहीं नहीं थी... वह ग़ायब थी! क्या वह फ़ाइलों के बीच दबी हुई बजती चली जा रही थी? नहीं, शायद अब वहाँ कोई घंटी नहीं थी क्योंकि अगर वह थी और अगर वह बज रही थी तो फिर अब उसकी आवाज़ सुनाई क्यों नहीं दे रही थी? या तो वह कभी बजी ही नहीं, या बजी तो बज कर जाने कब की ख़ामोश हो चुकी और उसे बजाने वाला भी जाने कब से ऊँघ की आगोश में था...

अपने आप में यह कुछ बहुत ही हैरतअंगेज बातें थीं। अपने इतने लंबे भृत्य-जीवन में उसे ना तो कभी घंटी को लेकर किसी प्रकार का भ्रम हुआ था, ना तो उस बाबू ने—जब से वह उसे जानता था—कभी ऐसी कोई हरकत की थी। वह एक बहुत चाक़-चौबंद बाबू था। सुबह सबसे पहले आकर अपने टेबल पर जम जाने वाला और अपनी कतरनी जैसी ज़ुबान से दिनभर भृत्यों को फटकार-फटकार कर काम कराने वाला, पूरे दफ़्तर में वही एक इंसान था जो ऊँघ की कशिश से कोसों दूर था। पागलपन भरे इस नज़ारे को शामलाल ने टेबल से काफ़ी दूरी से ही जज़्ब कर लिया था और अब आश्चर्य के समुद्र में गोते लगाता हुआ, यंत्र-चालित अंदाज़ में आगे बढ़ रहा था। टेबल के पास पहुँचते-पहुँचते घंटी को लेकर असमंजस में पड़ने की कोई ज़रूरत नहीं रह गई—परेशानी का एक और उससे भी बहुत बड़ा सबब वहाँ मौजूद था उस लेखपाल बाबू की शक्ल में, जो वहाँ झुका-झुका ख़र्राटे मार रहा था; वह टेबल पर झुका हुआ शख़्स लेखपाल नहीं, न ही कोई अन्य—वह तो ख़ुद शामलाल था!

‘‘अरे! वह जड़ खड़ा रह गया। फिर धत! उसने ग़ौर से आँख मिचमिचा कर सामने सोए बाबू को घूरा—यक़ीनन, हूबहू—मानो वह आईने के सामने खड़ा हो। आमने-सामने खड़े दो शामलाल! शामलाल जो लेखपाल बन गया था, या लेखपाल जो शामलाल बन गया था! बेहद अजीब हादसा था वह, कुछ-कुछ दिन में भूत देखने जैसा भी और नहीं भी, क्योंकि ख़ुद अपने चेहरे को भूत मानना इतना आसान नहीं होता। किसी भूत के लिए भी नहीं, क्योंकि भूतों को—सुना है—यह पता नहीं होता कि वे भूत हैं। यह भी कि एक भूत जब भूत को देखता है, तो उसको पता नहीं चलता कि वह भूत को देख रहा है। पहले झटके में शामलाल को यही लगा कि हो न हो वह अपनी जगह पर ही स्टूल पर ऊँघते-ऊँघते कोई दिवास्वप्न देखने लगा हो। या नहीं तो अभी-अभी साथी प्यून के साथ ‘हर-हर महादेव’ कहकर तीन कश जो लगाया था—हो सकता है उसी का असर हो! मगर फिर, चाहे कैसा भी ‘माल’ हो, तीन कश तक तो उसका बाल भी बांका नहीं होता। और फिर अब याद आया, वह तो परसों-नरसों की बात थी। आज तो उसने दो-तीन बार गुड़ाखू भर किया है और गुड़ाखू क्या है, बच्चों का खेल। मगर नहीं, लगता है पिनक में उसने तीन से ज़्यादा सोंटा लगा लिया है और अब नशे में ख़ुद नशे की बात को भूलता जा रहा है, हाँ-हाँ, यही बात होगी! वह भीतर ही भीतर ठठाकर हँसने लगा—अपनी ही बेवक़ूफ़ी पर। उसने मन ही मन याद किया कि कैसे एक बार उसने सोचा था कि अगर कभी काले जादू से वह लेखपाल बन गया और लेखपाल प्यून, तो किस-किस तरह से अपने मन की भड़ास उस प्राणी पर उतरेगा। कैसे-कैसे उसके पापों की सजा उसे दिलाएगा। यातना की एक से एक तरकीबें उसके ज़ेहन में ठुँसी हुई थीं...

इस प्रकार, उस समय एक रोचक स्थिति निर्मित हुई। शामलाल, उक्त बाबू के टेबल के आगे खड़ा तरह-तरह के चेहरे बना रहा है। कभी लगता है कि अपने आप में खोया हुआ मौन हँसी हँस रहा है, कभी मूक अट्टहास, कभी जैसे किसी को चिढ़ा रहा हो, तो कभी जैसे अचानक तमतमा उठा हो। उसके चेहरे पर तरह-तरह के भाव आ जा रहे थे। तभी जैसे एक सख़्त आवाज़ उसके कानों में विस्फोट करती हुई घुसी, ‘‘क्या है?’’ यह एकदम... बिल्कुल ही—उसकी अपनी आवाज़ थी। इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं थी। मगर हैरत कि वह सामने बैठे बाबू के मुँह से निकल रही थी—साथ ही इस आवाज़ में जो कठोरता थी—उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि उसकी अपनी एक प्यून की आवाज़, एक मामूली से इंसान की आवाज़ भी, इतनी सख़्त हो सकती है। इतनी सख़्त कि वह अपनी ही आवाज़ से डर गया।

“क... कुछ... कुछ नहीं... कुछ नहीं स... सर...”, वह हकलाया और लड़खड़ाती हुई चाल में वापस लौट पड़ा, वापस प्यून वाले अपने स्टूल पर। जाने कितनी देर तक वह वहाँ उसी प्रकार बैठा रहा, पाँच-दस मिनट या घंटा पौन-घंटा। इसी बीच क्या घंटी कोई बुलाहट आई, या किसी ने पूछा-टोका—पता नहीं। बस वह यूँ ही जड़ होकर सनसनाया हुआ बैठा रहा; यूँ ही आँखें बंद किए, मानो ध्यानमग्न हो गया हो। मगर ध्यान जैसी एकाग्रता वहाँ नहीं थी। नहीं, उसका नाचता हुआ दिमाग़ एक बिगड़ी हुई घड़ी जैसी हरकतें कर रहा था, जिसके पुर्जे उटपटांग चल रहे हों और सुइयाँ तेज़ी से आगे-पीछे थिरक रही हों। साथ ही एक बेतरतीब चलचित्र भी चालू था—कोई अधिकारी किसी प्यून को झिड़क रहा था, कहीं कोई जीपीएफ़ पार्ट फ़ाइनल की फ़ाइल आगे बढ़ाने की पैरवी कर रहा था, कहीं किसी की जगह किसी अन्य को प्रमोशन मिल गया था, किसी की ग़लती के लिए किसी अन्य की वेतन वृद्धि रोक दी गई थी, किसी की जगह पर कोई और सस्पेंड कर दिया गया था...

संचनालय में वैसे बाक़ी सबकुछ सामान्य था। अन्य दिनों की तरह ही आज भी यहाँ काफ़ी भीड़भाड़ थी। हमेशा की तरह अंदर बाहर एक हाहाकार था। पदाधिकारी इधर-उधर आ-जा रहे थे। ऊँघते, जम्हाई लेते, हवा ख़ारिज करते, शरीर के खुजलीदार हिस्सों को नोचते-खुजलाते—लोग कुछ न कुछ कर चुके थे, या कर रहे थे, या करने वाले थे। ऐसे में शामलाल भी अपनी इस हास्यास्पद स्थिति में, जबकि उसे ख़ुद के शामलाल होने पर ही कुछ-कुछ शक-सा होता जा रहा था, किसी प्रकार अपने आप को सँभाले, तेज़ी से इधर-उधर जाता हुआ कई प्रकार के कार्य संपादित कर रहा था।

जी हाँ, क्योंकि उसे अबतक साफ़-साफ़ लगने लगा था कि वह बाबू ही नक़ली शामलाल हो यह ज़रूरी नहीं, यह भी हो सकता था कि ख़ुद वही कोई अन्य व्यक्ति हो जो किसी ग़लत-फ़हमी का शिकार हो गया हो और बस उस ग़लत-फ़हमी के दूर होते ही सब कुछ ठीक-ठाक हो जाने वाला हो।

हाँ, सो तो ठीक, मगर कैसे?

किसी से पूछ कर?

ऊहूँ, बिल्कुल नहीं, कदापि नहीं। दफ़्तर में कोई भी भरोसे के क़ाबिल नहीं होता। सरकारी नौकरी में आदमी को किसी पर भरोसा नहीं करना चाहिए, हर कोई किसी भी समय किसी की भी टांग खींचने, शास्ती दिलवाने, पदोन्नति रुकवाने, डिमोट करवाने में अनवरत रूप से तत्पर और सक्षम है। हर कोई कहीं न कहीं, किसी न किसी तरह फँसा हुआ है और चाहता है कि उसके पाप का ठीकरा किसी और के सर फूटे... इसलिए एकदम चुपचाप, बिना किसी को कानों-कान ख़बर हुए। क्योंकि इसमें बड़ा ख़तरा है, अगर वह शामलाल नहीं कोई अन्य है—तो ज़ाहिर है यह नौकरी—जो निश्चित तौर पर—शामलाल वल्द मोहरलाल, इंटर, तृतीय श्रेणी की है; वह जा चुकी, वह छिन चुकी, ख़त्म हो चुकी और साथ ही सबकुछ।

बिल्कुल।

तो फिर, जल्द से जल्द अब यह तय कर लेना है कि वह सचमुच में शामलाल है भी या नहीं। अगर वह शामलाल नहीं, तो फिर असल में वह है कौन? उसके बाद किसी तरह यह भी पता लगाना होगा कि जो आदमी, यानी जिस आदमी के नाम का आदमी वह सचमुच है, राज्य सचिवालय के इस कक्ष क्रमांक 337 को अलाट प्यून की नौकरी भी उसी के नाम दर्ज है कि नहीं? यदि नहीं, तो फिर से पता लगाना पड़ जाएगा कि वह यहाँ क्यों आया और अबतक क्या करता रहा? हाँ, अगर यह सब सही-सही पता लग जाए... शामलाल आगे सोचता चला गया कि अगर उसका नाम असल में केशव या बाबूराव आदि कुछ हो और यह कि यह नौकरी भी उसी केशवलाल या बाबूराव की हो, तो वह तो बिना किसी हूल हुज्जत के वही आदमी बन लेगा। कोई चूँ-चपड़ नहीं। वैसे तब उसे यह भी पता लगाना पड़ेगा कि उसका घर कहाँ है, उसकी बीवी बच्चे कौन हैं, यह सब। मगर यह सब तो कैसे भी हो जाएगा। असली चीज़ नौकरी है—पहले उसको बचाना है... उहपुह की इसी दशा में वह आगे सोचता चला गया कि यह जो टेबल नंबर 603 वाला बाबू—अगर यह सचमुच में शामलाल है, तो भी कम से कम यह वह शामलाल तो नहीं ही हो सकता है, जो इसी दफ़्तर में प्यून था... और उसके जीने का हक़ इस शामलाल के जीने का हक़ तो हो ही नहीं सकता, क़तई नहीं... “और यह भी हो सकता है कि कहीं शामलाल नाम का कोई आदमी हो ही नहीं—ना बाबू, ना प्यून। जैसे वह एक चेहरे को लेकर गड़बड़ा गया है, वैसे ही यह भी हो सकता है कि एक ग़लत नाम भी उसके भेजे में घुस गया हो—ग़लत चेहरा, ग़लत आवाज़, ग़लत नाम; बाप रे, लगता है आज सचमुच बहुत गड़बड़ा गया है वह भी!

उधर उसके साथ इतना बड़ा हादसा पेश आने के बावजूद अभी तक दफ़्तर ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की थी। सब कुछ पूर्ववत् था—फ़ाइलें इधर-उधर हो रही थीं, पर कतरे जा रहे थे, घंटियाँ घनघना रही थीं, टीपें दर्ज की जा रही थीं, चिड़ियाँ बैठाई जा रही थीं, प्रस्ताव उठ रहे थे गिर रहे थे, साज़िशें कामयाब हो रही थीं। इन सब के बीच आफ़्टर-शेव व सड़े अंडे की मिली-जुली गंध, गिजगिजाहट-बिजबिजाहट, कपड़ों की सरसराहट, जूतों की चरमराहट, चपर-चूँ, आह-अह—एक वास्तविक दफ़्तरमय वातावरण बना हुआ था। इन सब को अभ्यस्त आँख-नाक-कान से जज़्ब करता हुआ वह जान-बूझ रहा था कि हाँ, शामलाल या नहीं शामलाल—वह था इसी जगह का।

परेशानी का सबब मगर यह कि यदि वह बदल गया था, तो फिर कोई इस बात की नोटिस क्यों नहीं ले रहा था? एक बात और, वह जो दूसरा शामलाल, वह कोई न कोई फ़ाइल वगैरह लेकर कई बार अफ़सरों के पास जा रहा था और टिप इत्यादि करा ला रहा था। यही नहीं, वह कई बार अन्य बाबुओं से मिल-बतिया भी आया था। इसका मतलब, किसी को उससे ऐसी कोई परेशानी भी नहीं हो रही थी, जैसी होनी चाहिए थी! “मगर इससे क्या? अफ़सर लोग तो होते ही ऐसे हैं!” उसने अपने आप को समझाया। चाहे कोई पचास हज़ार बार उनके सामने आता रहे, वे उसे सचमुच में उसे जानते-पहचानते थोड़ी हैं! लोग-नाम-चेहरे... ये अफ़सरों के काम की चीज़ें नहीं होतीं; एक अफ़सर वहीं से अफ़सर होना शुरू होता है—जहाँ से वह इंसान होना ख़त्म करता है। अरे, कमाल है! आज तो सचमुच बड़ी अजीब-अजीब बातें भी दिमाग़ में आ रही हैं! पता नहीं, सुनेगी तो क्या कहेगी? उसने अपनी पत्नी का नाम लेना चाहा, मगर वह उसे याद नहीं आया। पर उसने इस बात पर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि वह अभी दफ़्तर में था, और दफ़्तर के बारे में सोच रहा था।

“हाँ, तो चूँकि दफ़्तरों के सारे लोग साहबों की जी-हजूरी करते-करते उन जैसे ही हो जाते हैं, इसीलिए किसी बाबू ने भी मेरी तरफ़ ध्यान नहीं दिया है”, वह आगे और सोचता चला गया, “इसका मतलब तो यह हुआ कि सारे प्यून, स्वीपर, गार्ड, वग़ैरह—ये लोग भी बाबुओं की देखा-देखी उन जैसे हो गए होंगे। और मैं? अगर मैं उन जैसा नहीं हूँ, तो क्या मैं इस जगह का नहीं हूँ?”

वह एक पल को सकपकाया, मगर तभी उधर से गुज़रती सस्ती लिपस्टिक की हल्की गंध ने उसे आश्वस्त किया, क्योंकि इस लिपस्टिक की औरत को वह पहचानता था और उस झाड़ू वाले लिपस्टिक को एक बार उसने चखा था। इन ख़यालों से उसे कुछ राहत-सी मिली और उसका भय भी एक हद तक कम होने लगा।

एक सस्ती लिपिस्टिक की गंध—उसकी कोई हैसियत है भला। मगर देखिए कि वह कैसी कार-आमद शै होती है! उसी ने शामलाल को भरोसा दिया कि कुछ नहीं हुआ है। वह जहाँ का था, वहीं है। वह जो कुछ था, वही है। कि सिर्फ़ वही नहीं सारा दफ़्तर ही पहचान के संकट में है। चाहे उसका नाम शामलाल हो या और कुछ, चाहे उसका चेहरा अपने जैसा हो, या किसी और के जैसा। इन बातों से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है। असली चीज़ है लिपिस्टिक, चाहे सस्ती या महँगी। शामलाल यह समझते ही, वापस जाकर अपने स्टूल पर बैठ गया।

दरअस्ल उसे इस बात का इल्हाम नहीं है कि अपने ऑफ़िस का सबसे समझदार प्यून होने के नाते वही ऑफ़िस का ऊँघ-मास्टर भी है। वह ऊँघता है तो सारा ऑफ़िस ऊँघता है, यह ऑफ़िस चूँकि राज्य सचिवालय का केंद्रीय ऑफ़िस है इसलिए वह ऑफ़िस ऊँघता है तो सारा राज्य ऊँघता है। उसके बाद क्या सारा देश और सारी दुनिया... नहीं भई, उतनी दूर तक जाने की हिम्मत हमारी नहीं है, इसलिए यह फैसला आपके हाथ छोड़ देते हैं। अभी कुछ देर पहले उसे जो ग़लत-फ़हमी हुई थी, उसका कारण यह था कि अधिक सुट्टा मार लेने के चलते, या भाग्य की विडंबना के बायस जिस पर किसी का वश नहीं चलता, उसकी ऊँघ टूट गई थी, भंग हो गई थी, जैसे शिव जी की तपस्या भंग हो जाती है। और ऐसा होते ही वह गड़बड़झाला हुआ जिसका वर्णन आगे किया गया है। मगर एक बार जब सारे मकड़जाले से गुज़रता हुआ वह वापस जाकर अपने ‘टूल’ पर बैठ जाएगा तो ज़ाहिर है—आप किसी भी दफ़्तर में जाइए, आप पाएँगे कि हर कोई अपनी निर्धरित ‘जगह’ पर ही ऊँघता है, (जैसे शतरंज की बिसात पर प्यादे रक्खे-रक्खे ऊँघते रहते हैं) उसे उसकी जगह से हटा दीजिए, उसकी ऊँघ ग़ायब हो जाएगी, वापस उसकी जगह पर रख दीजिए, वह ऊँघता हुआ वज़ीर, या फ़ील या घोड़ा या प्यादा बन जाएगा, ज़ाहिर है अपनी जगह पर वापस आते ही शामलाल की ऊँघ उसे वापस मिल जाएगी... स्टूल पर बैठते ही वह ऊँघने लगेगा। जैसे ही वह ऊँघने लगेगा कि सबकुछ ठीक-ठाक हो जाएगा... और हक़ीक़त में ऐसा ही हुआ।

ऊँघ ऊँघ ऊँघ... शामलाल अपने दफ़्तर में अपने निर्धारित टूल पर बैठा फिर से ऊँघ रहा है। उसकी ऊँघ में सारा दफ़्तर ऊँघ रहा है, दफ़्तर की ऊँघ में सारा देश ऊँघ रहा है। देश की ऊँघ में हम सब ऊँघ रहे हैं, मैं ऊँघ रहा हूँ, आप ऊँघ रहे हैं, घोड़े ऊँघ रहे हैं, गधे ऊँघ रहे हैं...

•••

आनंद बहादुर को और पढ़िए : कहानी : पिस्तौल

'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए

Incorrect email address

कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें

आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद

हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे

बेला लेटेस्ट