व्यंग्य पर बेला
व्यंग्य अभिव्यक्ति की
एक प्रमुख शैली है, जो अपने महीन आघात के साथ विषय के व्यापक विस्तार की क्षमता रखती है। काव्य ने भी इस शैली का बेहद सफल इस्तेमाल करते हुए समकालीन संवादों में महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। इस चयन में व्यंग्य में व्यक्त कविताओं को शामिल किया गया है।
28 अप्रैल 2026
दो ग्रह, दो भाषाएँ : पृथ्वी और मंगल के साहित्य का अनुवाद-विमर्श
पिछले दिनों गाँव में परफैरा हुआ, कुछ लोग मच्छी मार्केट लगाए बतिया रहे थे। वे क्या बात कर रहे थे और उसका अर्थ क्या था? कुछ नहीं सूझ रहा था! वे या तो गाली-गलौज कर रहे थे या फिर अर्थ पर ध्यान दिए बग़ैर
शपथ पर ग्रहण
वह श्वेतवस्त्रधारिणी अचानक मेरे सामने उपस्थित हो गई। उस म्लानमुख, नतशीश नायिका ने आते ही आग्रह किया—“मुझे ग्रहण करें कवि!” मैंने अपरिचय की दीवार को ढाहने के उद्देश्य से प्रश्न किया—“पहले अपना नाम
विराम-चिह्नों की क्रांति और एम डैश की सत्ता का अंत
हाल ही में मेरी मुलाक़ात एम डैश से हुई। बेहद परेशान, दुखी, चिंतित और बेचैन अवस्था में बैठा था। चेहरा भावप्रवण, अश्रु-भरे नयन, जगत के उलाहनों से क्षुब्ध। ख़ुद को भाषा और लेखन के प्रिय साथी से सिर्फ़ स
सौरभ द्विवेदी की रिकमेंडेशन को श्रद्धा से नहीं, संदेह से पढ़ा जाना चाहिए
रतन राजपुरोहित मेरा सहकर्मी है—युवा, उत्साही, पढ़ाकू और ज़बरदस्त लिक्खाड़। अगर लिखने से कैलोरी बर्न होती, तो वह देश का सबसे फिट आदमी होता। पिछले बुधवार की शाम को, शिफ़्ट ख़त्म होने के बाद उसने मुझसे स
रविवासरीय 4.0 : पहला सीताराम सूर्यवंशी संस्कृति सम्मान
I said to one of my friends, “The reason I have chosen not to speak is that most of the time when one is talking, both good and bad things are said, and the eyes of one’s enemies fall only upon the b
मिलन टॉकीज : एक झलक का इंतज़ार
पूर्वी उत्तर प्रदेश में गौना उर्फ़ द्विरागमन प्रथा तब तक विद्यमान थी, जिसके तहत शादी के बाद वर अकेले कुछ स्मृतियों और तमाम ‘अनजाने’ स्पर्शों कंपकंपाहटों, कपड़ों की सरसराहटों, हाथों के मेहंदी की गहन गंध
रविवासरीय 4.0 : सेवासूक्त
• ‘महर्षि’ पूर्व में अपने कार्यालय को महर्षि-आवास कहते थे। इधर वह कुछ रोज़ से उसे ‘सेवा तीर्थ’ कहने लगे हैं। महर्षि को नाम बदलने की व्याधि है। पर नाम अगर बदल दिया जाए तब भी युगों तक बदले हुए नाम क
शंखनाद : ...और कोई विवाद न हुआ
वह वरिष्ठ कवि हैं। कवि होने के बाद, वरिष्ठ होने के लिए कुछ ख़ास नहीं करना पड़ता। सिर्फ़ जीते रहना ही काफ़ी होता है। वैसे भी राजनीति की तरह ही साहित्य का उम्र बोध अलग है, जैसे साहित्य का सच अलग होता है
रविवासरीय 4.0 : साहित्य अकादेमी एक ऐसा पुरस्कार है
• “बताइए न बाबा कि साहित्य अकादेमी कैसा पुरस्कार है?” बाबा उस उम्र में थे कि किसी भी दिन साहित्य अकादेमी अवार्डी हो सकते थे। बशर्ते उस दिन साहित्य अकादेमी अवार्ड की घोषणा करने वाली प्रेस-कॉन्फ़्रे
भारतीय सड़कें जादूगर का मंच हैं!
आजकल मैं ड्राइविंग सीख रहा हूँ। मेरे घरवाले बड़े समय से मुझसे कहते घूम रहे थे कि उन्हें घर में एक ड्राइवर की कमी खलती है। “पैसा देकर ड्राइवर रखना हम अफ़्फोर्ड नहीं कर सकते। फिर ये स्साले ड्राइवर च
15 मार्च 2026
रविवासरीय 4.0 : सुरेन्द्र मोहन पाठक के ख़िलाफ़
• एक ख़ाकसार मनुष्य के एक ख़ाकसार पुल पर एक ख़ाकसार उपन्यासकार से गए सोमवार टकराना हुआ। ख़ाकसार उपन्यासकार काफ़ी लोकप्रिय पुकारे जाते हैं। वह इतने ज़्यादा ख़ाकसार और लोकप्रिय हैं कि चेतन भगत और अमीश त्
कहानी : ऊँघ
उस दुपहर भी भृत्य शामलाल अपने निर्धारित स्थान—जो कि राज्य संचालनालय की पुरानी इमारत संख्या : ग, इकाई-7, छठवीं मंज़िल के कक्ष क्रमांक 337 में क़तारबद्ध अलमारियों के मकड़जालों के बीच ज़रा किनारे की ओर हट
रविवासरीय 4.0 : एक बीस हज़ारिया बँधुए की दिल्ली-यात्रा
• दिल्ली के विषय में सोचकर ही वह काफ़ी उत्तेजित हो जाया करता था। दिल्ली उसका स्खलन थी। इसलिए जब रज़ा फ़ाउंडेशन की श्रोता-बँधुओं को आमंत्रित करती विज्ञप्ति नज़र आई, तब वह स्वयं को नियंत्रित न कर सका और तत
रविवासरीय 4.0 : ‘अब तुम भी जाने वाले हो सामान तो गया’
• रविवासरीय की तीसरी ऋतु की समाप्ति [27 अप्रैल 2025] और चौथी ऋतु की शुरुआत [1 मार्च 2026] के बीच की सारी सूचियाँ आ चुकी हैं। सारे मेले निपट चुके हैं। मेले की सारी किताबें आ चुकी हैं। नामचीन-प्राचीन-प
आख़िर कितना चक दे इंडिया!
पिछले कुछ वर्षों से क्रिकेट नित्यकर्म की तरह हो चला है। हर रोज़ क्रिकेट खेला जा रहा है। हर रोज़ फेंकी जा रही है बॉल, हर रोज़ घुमाया जा रहा है बल्ला और हर रोज़ ही छूट रही हैं कैचें! इस रोज़मर्रा की क्
साहित्योत्सव : साहित्य कम, टाइमपास ज़्यादा
आजकल साहित्य-उत्सवों, सम्मेलनों और पुस्तक मेलों की धूम है। वैसे उत्सव और सम्मेलन हमेशा से समाज के बहुमूल्य अंग रहे हैं। हर जाति, धर्म और समुदाय अपने-अपने स्तर पर युवक-युवती परिचय सम्मेलन करवाते हैं,
शंखनाद : जिसे फ़रवरी मयस्सर नहीं
हर आदमी को फ़रवरी मयस्सर नहीं होती। कितना भी झींख लो, रो लो, कलप लो—एहसास-ए-फ़रवरी नहीं बदा तो कहाँ से मिलेगा। टापते रहिए इधर से उधर, फ़रवरी नहीं आएगी, बदनामी ज़रूर हो जाएगी। फ़रवरी महीना नहीं, मनोदश
खुजली देसी बीमारी है
एक साहित्यिक आदमी खुजली को डॉक्टर के नज़रिये से नहीं देख सकता है। उसे केवल संक्रामक बीमारी कहकर संतुष्ट नहीं हो सकता। इसके पूर्व कि मैं खुजली पर बात करूँ, मुझे मौजूदा समय के हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ कथा
19 जनवरी 2026
शंखनाद : बुक फ़ेयर की रपटीली रपट और कवि का मेलोत्तर काल
दिल्ली के भारत मंडपम में किताबों का सालाना जलसा—विश्व पुस्तक मेला गुलज़ार रहा। भाँति-भाँति के लोग भाँति-भाँति की हरकतें करते हुए भाँति-भाँति के लोगों के साथ भाँति-भाँति की घोषणाएँ कार्यान्वित करते/स्
‘घंटा’ फ़र्क़ नहीं पड़ता किसी कहानीकार के रहने या जाने से!
कल के दिन की शुरुआत हुई कथाकार एवं ‘पहल’ पत्रिका के संपादक के रूप में समादृत ज्ञानरंजन के जाने की ख़बर से। 7 जनवरी की रात, जबलपुर में उनका निधन हो गया था। फिर पता चला कि गुरु घासीदास विश्वविद्यालय और
05 जनवरी 2026
शंखनाद : बुक फ़ेयर के लिए मुखौटे...
जनवरी में होने वाली बुक फ़ेयर की आहट के बीच कई-कई यूनीसेक्स सैलूनों, ब्यूटीपार्लरों और स्पाओं में बुक फ़ेयर के लिए स्पेशल ऑफ़र देख, पढ़ और सुनकर चकित रह गया। साथ ही अपने मानसिक पिछड़ेपन पर रोना आया।
लाख काम छोड़कर बिहार जाना चाहिए
(डिसक्लेमर : मैं जन्मना बिहारी, कर्म से झारखंडी, मन से भारतीय और असंभव विश्व नागरिकता प्राप्त करने का आकांक्षी हूँ। इतने पर भी कोई शंका करे तो तुलसीदास के शब्दों में वह मुझसे भी अधिक जड़मति रंका है।)
हम ‘प्यार’ को काम समझे, वह ‘काम’ को प्यार!
नब्बे का दशक मेरे लिए रूमानी-दौर रहा। कठोर हिदायतों और ताक़ीदों के बाद भी मैं नज़र बचाकर इश्क़िया किताबों में सिर दिए रहती। पढ़ाई की किताबों में छिपाकर दम-ब-दम ‘मिल्स एंड बून’ (Mills & Boon) के रूमानी उप
प्यार के बाज़ार में
मित्र को प्यार हो गया है—सच्चा प्यार। पाकीज़ा मुहब्बत। ट्रू लव टाइप मामला लग रहा है। जबसे वह प्रेम की गिरफ़्त में आए हैं, तभी से खोये-खोये से रहते हैं। उनकी रातें भी अब आँखों में गुज़रती हैं। इस चक्क
02 नवम्बर 2025
कवियों के क़िस्से वाया AI
भरतपुर की वह दुपहर साहित्य की ऊष्मा से भरी हुई थी। हवा में हल्की गर्मी थी, लेकिन सभा-गृह के भीतर विचारों की शीतल छाया पसरी हुई थी। देश का स्वतंत्रता-संग्राम अपने चरम पर था और साहित्यकार इस संघर्ष के
झाड़ियों का शाप
यह घटना नवंबर के आस-पास की है, जब सेमेस्टर का ख़ौफ़ हर विद्यार्थी पर तारी होता है। इन दिनों में हर अच्छा और गदहा विद्यार्थी आपको रट्टा मारते मिलेगा और बात अगर हॉस्टल में रहने वाले लड़कों की हो तो कहन
न भेंट, न वार्ता... सिर्फ़ रायता
यह उस समय की बात है; जब मेरा स्नातक हो चुका था, लेकिन डिग्री अभी हाथ न लगी थी। मैं तब तक उदय प्रकाश की कहानियों का दीवाना हो चुका था। उनसे मिलने से बहुत पहले, मैं उनकी किताबों से मिल चुका था। मैं उनस
क्या आप भी रील-रोग से ग्रस्त हैं?
रील-रोग से ग्रस्त और कुछ-कुछ कुपित एक रीलर-इन्फ़्लुएंसरों मित्र ने बेहद ऊबकर मुझसे पिछले दिनों कोई किताब पढ़ने की जिज्ञासा व्यक्त की। उन्हें शुरुआत करने में मुश्किल आ रही थी। मित्र पूरब के निवासी हैं,
विश्वविद्यालय के प्रेत
सन् सत्रह के जुलाई महीने की चौथी तारीख़ थी। मैं अच्छे बच्चे की तरह बारहवीं के आगे की पढ़ाई करने के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में दाख़िला लेने के लिए बनारस जा पहुँचा था। कॉलेजों की, यूनिवर्सिटियों क
व्यंग्य : कुत्ते और कुत्ते
बाज़ार में आजकल हिंदुस्तानी-अँग्रेज़ी में लिखी हुई बहुत-सी किताबें आ गई हैं जो कुत्तों के—असली कुत्तों के—बारे में हैं। ‘डॉग केयर बाई ए डाग-लवर’, ‘शेफ़र्ड डाग्स ऑफ़ जर्मनी, बाई ए डॉग-लवर’, ‘ऑफ़ डाग्स
हम चुटकुलों से ख़फ़ा हैं
आमतौर पर तो भारतीय प्रथा यह है कि ज़रूरी मुद्दों को चुटकुला बना दिया जाए। लेकिन कभी-कभी जब किसी सुहाने दिन मंद-मंद-सी बयार बह रही हो, फ़िज़ा तनिक महकी-महकी-सी होने लगे, तो सोने पर सुहागा यह कि संडे ट
जिम जाने वाला लेखक
यह एक भटका हुआ निबंध है, इसको अपने रिस्क पर गंभीरता से लें, मुझे भी गंभीरता से अपने रिस्क पर लें। मैं बहुत दोग़ला हूँ! कुछ वक़्त पहले एक विकृत विचार दिमाग़ में आया; क्या एक लेखक जिम प्रेमी हो सकता
कवियों के क़िस्से वाया AI
साहित्य सम्मेलन का छोटा-सा हॉल खचाखच भरा हुआ था। मंच पर हिंदी साहित्य के दो दिग्गज विराजमान थे—सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और तत्कालीन नई पीढ़ी के लेखक निर्मल वर्मा। सामने बैठे श्रोताओं की आँखों में चमक
नाम में जो रखा है
मैं इस पर बिल्कुल विश्वास नहीं करता हूँ कि नाम में क्या रखा है? मेरे पूर्वजों ने बतलाया है कि अपने माँ-बाप का नाम रोशन करना। इसलिए नाम के प्रति मैं बहुत संजीदगी रखता हूँ। मेरे गाँव में भी लोग नाम के
क्राइम मास्टर गोगो, श्री निर्मल वर्मा और मैं
हिंदी में एक ऐसे लेखक हुए, जिन्होंने लाखों भूले-भटके किशोरों-युवाओं का जीवन तबाह किया। इंटरनेट पर फैले इनके कोट्स नशीली उदासी का व्यापार करते हैं। हिंदी के ‘क्राइम मास्टर गोगो’—प्रचंड अवसाद और निराशा
कथ्य-शिल्प : दो बिछड़े भाइयों की दास्तान
शिल्प और कथ्य जुड़वाँ भाई थे! शिल्प और कथ्य के माता-पिता कोरोना के क्रूर काल के ग्रास बन चुके थे। दोनों भाई बहुत प्रेम से रहते थे। एक झाड़ू लगाता था एक पोंछा। एक दाल बनाता था तो दूसरा रोटी। इसी तर
रविवासरीय : 3.0 : एक सुझाववादी का चाहिएवाद
• ‘नये शेखर की जीवनी’ शीर्षक कथा-कृति के प्रथम खंड में इन पंक्तियों के लेखक ने एक ऐसे समीक्षक का वर्णन किया है; जिसके कमरे में केवल वे ही किताबें थीं, जिनकी उसने समीक्षाएँ की थीं। यह कुछ-कुछ वैसा ही
रविवासरीय : 3.0 : इस पर ध्यान दें, भले ही आप अनुभवी शराबी हैं
• प्रश्न यह था कि क्या शराब पीने वालों को उन्हें अपने साथ बैठाना चाहिए, जो शराब नहीं पीते? बैठक में चार पीढ़ियों के चार व्यक्ति थे और वे शराब नहीं पी रहे थे; जबकि उनमें से तीन पी सकते थे, क्योंकि वे प
व्यंग्य : अश्लील है समय! समय है अश्लील!
कुछ रोज़ पूर्व एक सज्जन व्यक्ति को मैंने कहते सुना, “रणवीर अल्लाहबादिया और समय रैना अश्लील हैं, क्योंकि वे दोनों अगम्यगमन (इन्सेस्ट) अथवा कौटुंबिक व्यभिचार पर मज़ाक़ करते हैं।” यह कहने वाले व्यक्ति का
रविवासरीय : 3.0 : कभी-कभी लगता है कि गोविंदा भी कवि है
• यहाँ प्रस्तुत मज़मून लगभग चार वर्ष पुराना है, लेकिन इसके नायक से संबंधित समाचार रोज़-रोज़ कुछ इस क़दर आते हैं कि यह रोज़-रोज़ नया होता जाता है! • गत वर्ष के एक अक्टूबर की सुबह पाँच बजे के आस-पास छह गो
रविवासरीय : 3.0 : आधा सुचिंतित, आधा सुगठित, बाक़ी तार्किक
• गत रविवासरीय पढ़कर हिंदी-जगत में संभव हुए भगदड़रत व्यवहार के बाद, इस बार इस स्तंभ [रविवासरीय] की संरचना पर कुछ बातें दर्ज करने का दिल कर रहा है और कुछ उत्तर-प्रतिउत्तर प्रस्तुत करने का भी... इस स्
01 मार्च 2025
ई-रिक्शा : कहाँ जाओगे भाई सा’ब!
तीन का आँकड़ा क्या है? तीन लोग हों, तो भी अर्थी ले जाई जा सकती है, बस एक तरफ़ थोड़ा झुकाव रहेगा। लोक-विश्वास देखें, तो तीन तिगाड़ा-काम बिगाड़ा। सुखी परिवार को भाषा को बिन परखे कहा जाए तो दो मिय
आजकल पत्नी को निहार रहा हूँ
आजकल पत्नी को निहार रहा हूँ, सच पूछिए तो अपनी किस्मत सँवार रहा हूँ। हुआ यूँ कि रिटायरमेंट के कुछ माह पहले से ही सहकर्मीगण आकर पूछने लगे—“रिटायरमेंट के बाद क्या प्लान है चतुर्वेदी जी?” “अभी तक
रविवासरीय : 3.0 : ‘जो पेड़ सड़कों पर हैं, वे कभी भी कट सकते हैं’
• मैंने Meta AI से पूछा : भगदड़ क्या है? मुझे उत्तर प्राप्त हुआ : भगदड़ एक ऐसी स्थिति है, जब एक समूह में लोग अचानक और अनियंत्रित तरीक़े से भागने लगते हैं—अक्सर किसी ख़तरे या डर के कारण। यह अक्सर
रविवासरीय : 3.0 : ‘मेरा दुश्मन बनने में अब वह कितना वक़्त लेगा’
• प्रशंसा का पहला वाक्य आत्मीय लगता है, लेकिन प्रशंसा के तीसरे वाक्य में प्रशंसा का तर्क भी हो; तब भी उससे बचने का मन करता है, क्योंकि प्रशंसा के दूसरे वाक्य से ही ऊब होने लगती है। • विष्णु खरे की
02 फरवरी 2025
रविवासरीय : 3.0 : हम आपके डिजिटल डिटॉक्स की कामना करते हैं
• 1 फ़रवरी से 9 फ़रवरी के बीच नई दिल्ली के प्रगति मैदान [भारत मंडपम] में आयोजित विश्व पुस्तक मेले की स्थिति जानने की उत्कंठा जैसे आप सबको है, वैसे ही धृतराष्ट्र को भी है। वह अपनी इस आकांक्षा की पूर्ति
रविवासरीय : 3.0 : वसंत उर्फ़ दाँत की दवा कान में डाली जाती है
• आगामी रविवार को वसंत पंचमी है। हिंदी में तीस-पैंतीस वर्ष की आयु के बीच जी रहे लेखकों के लिए एक विशेष दिन है। वे इस बार न चूकें। ऐसा मुझे स्वयं वसंत ने बताया है। • गए रविवार से लेकर इस रविवार के
19 जनवरी 2025
रविवासरीय : 3.0 : पुष्पा-समय में एक अन्य पुष्पा की याद
• कार्ल मार्क्स अगर आज जीवित होते तो पुष्पा से संवाद छीन लेते, प्रधानसेवकों से आवाज़, रवीश कुमार से साहित्यिक समझ, हिंदी के सारे साहित्यकारों से फ़ेसबुक और मार्क ज़ुकरबर्ग से मस्तिष्क... • मुझे याद आ
महान् दार्शनिक दीपक कलाल का 'मुआ' फ़िनोमिनन
प्रत्येक देश-काल में कोई न कोई प्रसिद्ध दार्शनिक ज़रूर होता है, जो उस समय को चिह्नित करता है और साथ ही उस समय की युग-चेतना को दर्शाने वाला दर्शन प्रस्तुत करता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि महान् दार
01 जनवरी 2025
मुझे नए वर्ष की शुभकामना देने में इसीलिए डर लगता है!
साधो, बीता साल गुज़र गया और नया साल शुरू हो गया। नए साल के शुरू में शुभकामना देने की परंपरा है। मैं तुम्हें शुभकामना देने में हिचकता हूँ। बात यह है साधो कि कोई शुभकामना अब कारगर नहीं होती। मान लो कि