मेरे एकांत के प्रवेश द्वार
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शाम हम सब ‘मेरे एकांत के प्रवेश द्वार’ के माध्यम से एक ऐसे साझा स्पेस में एकत्र हुए, जहाँ लोग अपने-अपने जीवन की व्यस्तताओं और बहुत कम मिलने वाले अवकाश से थोड़ा समय निकालकर
03 मार्च 2026
दैनिक भास्कर लेकर आया है कविता-प्रतियोगिता
आगामी 21 मार्च को विश्व कविता दिवस के उपलक्ष्य में ‘दैनिक भास्कर’ एक विशेष पहल के रूप में ‘कविता उत्सव’ का आयोजन कर रहा है। यह काव्य-प्रतियोगिता देश भर के रचनात्मक मनों को एक मंच प्रदान करने का प्रया
‘अर्थात्’ की तीसरी गोष्ठी में खुले छायावाद के बंध
प्रसाद-निराला-महादेवी-पंत के चतुष्टय पर आधारित छायावाद की कविताओं, उसकी भाषा, प्रवृत्तियों, संवेदना और सहमतियों-असहमतियों पर संवाद के उद्देश्य से 22 फ़रवरी की बीती दुपहर ‘छायावाद : खुल गए छंद के बंध’
अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-10
नवीं कड़ी से आगे... दस अरुण कमल सत्तर साल से अधिक का जीवन देख चुके हैं और वरिष्ठ कवियों की सूची में भी आ चुके हैं। अरुण कमल हिंदी में प्रसिद्ध और लोकप्रिय कवि भी हैं। कभी रामचंद्र शुक्ल ने लिखा
साहित्योत्सव : साहित्य कम, टाइमपास ज़्यादा
आजकल साहित्य-उत्सवों, सम्मेलनों और पुस्तक मेलों की धूम है। वैसे उत्सव और सम्मेलन हमेशा से समाज के बहुमूल्य अंग रहे हैं। हर जाति, धर्म और समुदाय अपने-अपने स्तर पर युवक-युवती परिचय सम्मेलन करवाते हैं,
अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-9
आठवीं कड़ी से आगे... नौ ‘अपनी केवल धार’ जो देखने में छोटी पर अरुण कमल की कीर्ति का आधार-स्तंभ है कि तरह मेरी एक और प्रिय छोटी-सी कविता है जिसका शीर्षक है—‘थूक’ : “जब वह ग़ुंडा प्राचार्य मान बहाद
19 फरवरी 2026
अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-5
चौथी कड़ी से आगे... पाँच अरुण कमल क़स्बे की मानसिकता वाले पटने के कवि हैं। एक ख़ास पटनिया आग्रह है उनकी कविता में। अरुण कमल की कविता में एक पटना-टोन लगातार उपस्थित है, जैसे राजेश जोशी में भोपाल
18 फरवरी 2026
अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-4
तीसरी कड़ी से आगे... चार 2019 में प्रकाशित अरुण कमल की एक कविता है—‘एक वृद्ध की रात’। एक बूढ़ा है जो जानता है कि ‘कुछ तो है जो मुझे खड़ा कर रहा इस उम्र में’। जिस उम्र में लोग तीर्थ पर निकल जाते ह
17 फरवरी 2026
अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-3
दूसरी कड़ी से आगे... तीन मेरे लिए वे कविता का ककहरा सीखने के दिन थे। कवि-मित्र प्रकाश के सहारे यह संग्रह ‘अपनी केवल धार’ पढ़ गया। यह ‘धार’ कविता दिमाग़ में बैठ गई थी। मैंने उन दिनों अपने मित्रों
16 फरवरी 2026
अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-2
पहली कड़ी से आगे... दो कभी-कभी एक कहानी, एक उपन्यास और एक कविता भी आपको अमर कर सकती है। अरुण कमल की यह रोमांटिक, उधार वाली कविता इस श्रेणी की कविता है। कभी तुलसीदास ने लिखा था, “नहिं दरिद्र सम
15 फरवरी 2026
अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’
एक मुक्तिबोध मेरे प्रिय कवि हैं। उनकी कविता-पंक्तियाँ मुझे बूस्ट करती हैं, मतलब प्रेरणा प्रदान करती हैं। यहाँ प्रस्तुत आलेख का शीर्षक उनकी एक कविता का शीर्षक है। मुक्तिबोध की ‘अँधेरे में’ शीर्षक स
डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय [सागर] में अगला ‘हिन्दवी कैंपस कविता’ आयोजन, कविता भेजने की अंतिम तिथि आज
हिन्दवी कैंपस कविता—‘हिन्दवी’ का एक विशेष आयोजन है। इस आयोजन के माध्यम से देश के विभिन्न शैक्षिक संस्थानों के साथ मिलकर वहाँ के छात्रों को साहित्य-सृजन के लिए प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जाता है।
30 जनवरी 2026
जगह-जगह 2.0 : मोबी-डिक : सनक, साहस और समुद्र की कथा
पानी ये पानी ख़ामुशी से बह रहा है इसे देखें कि इसमें डूब जाएँ —अहमद मुश्ताक़ समुद्र-साहित्य केवल साहसिक कथाओं से नहीं बना है। उसमें एक आदिम पुकार है कि पानी अपनी ओर खींचता है। उसमें मृत्यु औ
अंचित से दस सवाल : मुझे दिल्ली बिल्कुल पसंद नहीं है
अंचित (जन्म: 1990) नई पीढ़ी के चर्चित कवि, अनुवादक और संपादक हैं। वर्ष 2021 में उन्हें ‘कवि केदारनाथ सिंह कविता सम्मान’ से सम्मानित किया गया। वे इसक-2023 के कवि भी हैं। हाल ही में उनका नया कविता-संग्
बिछिया, बिछोह और वह आख़िरी ख़ाली पन्ना
ठहरे हुए हैं, याद आ रही है यात्राओं की। अलग-अलग जगहों की, अलग-अलग समय पर की गई यात्रा की। अलग-अलग सामान पर लटके विभिन्न देशों के स्टीकर दृश्य में हैं, कि अचानक इन दृश्यों को परे धकेलता हुए सामने आ जा
सुधांशु फ़िरदौस से दस सवाल : जीवन एक घर है, जिसमें बेघर हूँ मैं
सुधांशु फ़िरदौस (जन्म : 1985) इस सदी में सामने आई हिंदी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। वर्ष 2020 में उनकी कविताओं की पहली किताब ‘अधूरे स्वाँगों के दरमियान’ शीर्षक से प्रकाशित हुई। इस पुस्तक के लिए उन
31 दिसम्बर 2025
आज वर्षांत और कल होने वाले वर्षारंभ के बीच कोई विच्छेद नहीं है
आने-जाने से ही मिलकर यह संसार बना है। इन दोनों के बीच कोई विच्छेद नहीं है। विच्छेद की कल्पना हम अपने मन में ही करते रहते हैं। सृष्टि, स्थिति और प्रलय ये तीनों एकमेव होकर रह रहे हैं। सदा एक साथ बने हु
‘नहीं होने’ में क्या देखते हैं
विनोद कुमार शुक्ल की एक कविता है—‘आदिम रंग’। पहली पंक्ति प्रश्नवाचक है—आदिम रंग आदिम मनुष्य ने क्या देखा था? (प्रश्नवाचक चिह्न कवि की पंक्ति में नहीं है) फिर वह अनुमान या कल्पना करते हैं—सूर्यादय या
पटना पुस्तक मेला : भर्त्सना के शिल्प में
मूर्खताओं के उदाहरण से हमारी सदी पटी हुई है और अब मूर्खताएँ हिंसा में बदल गई हैं। यह कहते हुए कोई सुख नहीं होता और न ही कोई चुटकुला सूझता है। व्यंग्यों के आधिक्य के बीच कभी-कभी क्रूर अभिधात्मकता की ओ
भाभी कॉम्प्लेक्स और कार्ल मार्क्स
हिंदी साहित्य में भाभी जिस रूप में उतरी है, उसमें सत्य से अधिक सुहावनापन है। आज भी पुरुष की बहुपत्नीक और स्त्री की बहुपति प्रवृत्तियाँ, जो तहज़ीब के नीचे से अब भी रिसती रहती हैं और साहित्यदानों में द
दृष्टि का निर्माण : लोक से हाइपर-रियलिटी तक
“हर शाम हम सूर्य को धीरे-धीरे क्षितिज के पीछे डूबते हुए देखते हैं। हम जानते हैं कि हमारी पृथ्वी सूर्य से दूर जा रही है। फिर भी हमारा यह ज्ञान और यह वैज्ञानिक व्याख्या, डूबते हुए सूरज को देखने के हमार
ऑक्सफ़ोर्ड, इलाहाबाद विश्वविद्यालय : कैंपस की कहानियाँ, अँग्रेज़ी संस्कृति और सिनेमा
“मैं हॉस्पिटल में वेंटिलेटर पर ऑक्सीजन मास्क पहने हुए नहीं मरना चाहता, बल्कि नेचुरल डेथ चाहता हूँ, अपनों के साथ रहते हुए। हॉस्पिटल में मरने से पहले जो थोड़ी-सी जीने की ख़्वाहिश बची है, वह भी मर जाती
11 दिसम्बर 2025
लिखने ने मुझे मेरी याददाशत दी
मेरे नाना लेखक बनना चाहते थे। वह दसवीं तक पढ़े और फिर बैलों की पूँछ उमेठने लगे। उन्होंने एक उपन्यास लिखा, जिसकी कहानी अब उन्हें भी याद नहीं। हमने मिलकर उसे खोजना चाहा, वह नहीं मिला। पता नहीं वह किसी
अनुवाद का द्वंद्व : भक्ति-काव्य की सार्वभौमिक अनुगूँजें
दिलीप पुरुषोत्तम चित्रे (1938–2009) आधुनिक मराठी साहित्य के प्रमुख कवि, आलोचक, अनुवादक, चित्रकार और फ़िल्मकार थे; जिन्होंने मराठी और अँग्रेज़ी—दोनों भाषाओं में अपनी रचनात्मकता का विस्तार किया। बड़ौदा
उद्भ्रांत की आत्मकथा : हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर
उद्भ्रांत हिंदी साहित्य की उस पीढ़ी के प्रतिनिधि कवि हैं, जिन्होंने ‘नई कविता’ के बाद सातवें दशक में छंद में हाथ आज़माते हुए, कविता के अन्य आंदोलनों के बीच अपनी जगह बनाई—यद्यपि बाद में उन्होंने अपने स
कविता के शब्द सत्य का पीछा करते रहते हैं
[एक] कवि हृदय का वकील होता है। उसकी वकालत तर्क की झूठी बैसाखियों के सहारे नहीं वरन् सच्चे मनुष्यत्व की नैतिकता और निष्ठा की अदृश्य बहनेवाली अंत:सलिला पर चलती है जिसके होंठों पर सदा इंसानपरस्ती का
लाख काम छोड़कर बिहार जाना चाहिए
(डिसक्लेमर : मैं जन्मना बिहारी, कर्म से झारखंडी, मन से भारतीय और असंभव विश्व नागरिकता प्राप्त करने का आकांक्षी हूँ। इतने पर भी कोई शंका करे तो तुलसीदास के शब्दों में वह मुझसे भी अधिक जड़मति रंका है।)
मार्गरेट एटवुड : मर्द डरते हैं कि औरतें उनका मज़ाक़ उड़ाएँगीं
Men are afraid that women will laugh at them. Women are afraid that men will kill them. मार्गरेट एटवुड का मशहूर जुमला—मर्द डरते हैं कि औरतें उनका मज़ाक़ उड़ाएँगीं; औरतें डरती हैं कि मर्द उन्हें क़त्ल
दिसंबर में होगा कोच्चि–मुज़िरिस बिएनाले का छठा संस्करण
भारत की सर्वाधिक प्रतिष्ठित और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त समकालीन कला प्रदर्शनी कोच्चि–मुज़िरिस बिएनाले (Kochi-Muziris Biennale) का छठा संस्करण 12 दिसंबर, 2025 से केरल के ऐतिहासिक समुद्री
13 नवम्बर 2025
इस बार शांतिनिकेतन में होगा ‘संगमन’
वर्ष 1993 में कानपुर से शुरू हुआ रचनात्मक व बौद्धिक हस्तक्षेप के सहकारी उपक्रम ‘संगमन’ का 26वाँ आयोजन देश के विभिन्न राज्यों से गुज़रता हुआ इस बार शांतिनिकेतन (पश्चिम बंगाल) में हो रहा है। तारीख़ें हैं
फ़ादर वालेस : साधु तो चलता भला
वर्ष 2025 गुजराती साहित्य के इतिहास में एक विशेष वर्ष है—इस वर्ष गुजराती भाषा और संस्कृति के एक विलक्षण साधक, फ़ादर वालेस (Father Carlos González Vallés) की जन्मशती मनाई जा रही है। फ़ादर वालेस का जन्
साहित्यिक लेखन : जुनून या तिजारत
कहा गया है कि इंसान दो दुनियाओं में जीता है-अंदरूनी और बाहरी। अंदरूनी दुनिया अध्यात्म की दुनिया होती है जिसे वो किसी तरह की कला जैसे कि साहित्यिक लेखन, नृत्य, संगीत, चित्रकारी, स्थापत्य या मुजस्समे आ
लिखने का सही समय
लिखने का सही समय क्या होता है? शायद वही समय—जब भीतर कुछ बेचैन करता है, चुपचाप करवटें बदलता है और शब्द बनकर बाहर आना चाहता है। बचपन में जब पहली बार पेंसिल उठाई थी तो यह नहीं पता था कि उससे करना क्य
25 अक्तूबर 2025
लोलिता के लेखक नाबोकोव साहित्य-शिक्षक के रूप में
हमारे यहाँ अनेक लेखक हैं, जो अध्यापन करते हैं। अनेक ऐसे छात्र होंगे, जिन्होंने क्लास में बैठकर उनके लेक्चरों के नोट्स लिए होंगे। परीक्षोपयोगी महत्त्व तो उनका अवश्य होगा—किंतु वह तो उन शिक्षकों का भी
रपट : ‘अर्थात्’ की शुरुआत
देश की राजधानी दिल्ली की हवा अपने पुराने ढर्रे पर लौट चुकी है। अब खाँसते-छींकते लोग अगर सड़क पर अधिक दिखें तो हैरान मत होइये। हैरान इस बात पर भी नहीं होइये कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में (अक्टूबर 202
15 अक्तूबर 2025
लास्ज़लो क्रास्ज़्नाहोरकाई : प्रलय के प्रतिरोध में खड़ा एक लेखक
साहित्य के क्षेत्र में 2025 का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले लास्ज़लो क्रास्ज़्नाहोरकाई को पिछले एक दशक में पढ़ते हुए बार-बार यह महसूस होता है कि मैं ऐसे लेखक की संगत में हूँ, जो अपनी भाषा की ज़मी
09 अक्तूबर 2025
इस बार के नोबेल विजेता लास्ज़लो क्रास्ज़्नाहोरकाई के 10 नीतिवचन
यह बात अपने दिमाग़ में घुसा लो—चुटकुले ज़िंदगी की तरह होते हैं। ~ जब मैं काफ़्का को नहीं पढ़ रहा होता हूँ, तब मैं काफ़्का के बारे में सोच रहा होता हूँ। जब मैं काफ़्का को नहीं सोच रहा होता हूँ,
शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी और ‘फ़ानी बाक़ी’
आज का दिन मेरे महबूब शहर इलाहाबाद के महबूब साहित्यकार और आलोचक शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी की जन्मतिथि है। वह आसमां में चमकते हुए तारों में से एक हैं, जिसे मैं आज के दिन देखना चाहता हूँ। इलाहाबाद के साहित्
बिंदुघाटी : चेख़व, कहानी और सत्रावसान
• किसी वाक्य में क्रिया है तो विराम भी है। यह न हो तो एक और वाक्य कैसे शुरू हो! क्रियाओं और उनके विरामों के बीच ही तो संसार कितने रूप-जाल रच रहा है! मलयज याद आते हैं : ‘‘डूबने से पहले अंतिम बा
बीमार मन स्मृतियों से भरा होता है
गए दिन जैसे गुज़रे हैं उन्हें भयानक कहूँ या उस भयावहता का साक्षात्कार, जिसका एक अंश मुझ-से मुझ-तक होकर गुज़रा है। चोर घात लगाए बैठा था और हम शिकार होने को अभिशप्त थे। जैसे धीरे-धीरे हम उसकी ज़द में स
बिल्लियों के नौ जीवन पाप से भरे हैं
पश्चिमी लेखकों, कलाकारों, विचारकों के कारण बिल्लियों पर मेरा विशेष ध्यान गया। डॉग फ़ॉर सोल्ज़र्स, कैट्स फॉर आर्टिस्ट्स। कुत्ता गद्य है, बिल्लियाँ कविता। एक लेखक जिन कारणों से एक बिल्ली का साथ पसंद करता
दुख की नई भाषा
दुख के अथाह सागर में डूबा हुआ हूँ। जब भी पीड़ा में होता हूँ, अपनी व्यथा को व्यक्त करने के लिए नए बिंब तलाशने की बजाय परिचित भाषा में कहता हूँ। अभी मैं इस उद्देश्य से लिख रहा हूँ कि मुझे दुखों की अभिव्
21 सितम्बर 2025
माइथोलॉजी : देवदत्त पटनायक और उनका रचना संसार
पटनायक ग्रीक मिथकों को भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखना जानते हैं, और उनकी सबसे बड़ी ख़ूबसूरती यह है कि वह बहुत सरल ढंग से कहते हैं। तब यह बात और दिलचस्प हो जाती है, जब ये सब कहते हुए वह अपना भारतीय होन
20-21 सितंबर को रायपुर में होगा हिंद युग्म उत्सव 2025
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में साहित्य प्रेमियों के लिए 2 दिवसीय ‘हिंद युग्म उत्सव 2025’ आयोजित होने जा रहा है। इस आयोजन के माध्यम से छत्तीसगढ़ पहली बार इस अनोखे उत्सव का साक्षी बनेगा। आगामी 20 और 2
सोबती-वैद संवाद : सहमति और असहमति के बीच का आकाश
कृष्णा सोबती और कृष्ण बलदेव वैद के बीच भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में एक सघन वार्ता और विचार-विमर्श हुआ। यह बातचीत राजकमल प्रकाशन से पुस्तक रूप में प्रकाशित हुई। यह संवाद साहित्य, समाज और राजन
12 सितम्बर 2025
विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय : एक अद्वितीय साहित्यकार
बांग्ला साहित्य में प्रकृति, सौंदर्य, निसर्ग और ग्रामीण जीवन को यदि किसी ने सबसे पूर्ण रूप से उभारा है, तो वह विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय (1894-1950) हैं। चरित्र-चित्रण, अतुलनीय गद्य-शैली, दैनिक जीवन को
07 सितम्बर 2025
बिंदुघाटी : गुदरिया गले में डारे भरथरी
• किंवदंतियों, जनश्रुतियों और विद्वानों के विवरणों में विशद उपस्थिति रखने वाले भर्तृहरि राजा थे या ऋषि! कवि थे या वैयाकरण! योगी थे या भोगजीवी सांसारिक... या फिर इन सबको समाहित किए पूरी भारतीय मनीषा म
समीक्षा : त'आरुफ़-ए-मंटो
पिछले हफ़्ते विभाजन पर आधारित एक नाटक देखने गया था। नाटक दिल्ली के एक प्रतिष्ठित सरकारी संस्थान में था। विभाजन भारतीय उपमहाद्वीप और उसके लोगों पर घटी एक त्रासदी है—उसे याद किया जा सकता है, उससे सीखा
समीक्षा : सूर्यबाला के पहले उपन्यास का पुनर्पाठ
हिंदी साहित्य में जिसे साठोत्तरी रचना पीढ़ी के नाम से जाना जाता है, सूर्यबाला उसकी एक प्रमुख हस्ताक्षर हैं। उनकी साहित्यिक पहचान की नींव उनके पहले ही उपन्यास ‘मेरे संधि-पत्र’ से जुड़ी है। मैं इस किता
28 अगस्त को अजमेर में होगा ‘लहर’-संपादक प्रकाश जैन का जन्मशती-आयोजन
अजमेर की साहित्यिक धरती ने अनेक नामचीन हस्तियों को जन्म दिया है। इन्हीं में से एक हैं साहित्यकार और लघु पत्रिका लहर के संपादक प्रकाश जैन—जिन्होंने न केवल कविता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई, बल्कि ह