19 अगस्त 2026
‘बेला’ की 1000वीं पोस्ट : कुछ बात, कुछ बकवास
यह ‘बेला’ की 1000वीं पोस्ट है। हमने गत वर्ष ‘हिन्दवी उत्सव’ से पूर्व संगत-शतक पूर्ण किया था। इस वर्ष ‘हिन्दवी उत्सव’ से पूर्व हमने बेला-सहस्र पूर्ण किया है। यह संख्या हमारे लिए केवल एक आँकड़ा न
13 अगस्त 2026
नयी चाल की हिन्दी
28, 29 और 30 जुलाई 2026 को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में एक अलहदा संगोष्ठी हुई—‘नयी चाल की हिन्दी’। यह संगोष्ठी हिन्दी विभाग की जानी-पहचानी और अधिकांशतः उबाऊ संगोष्ठियों से अलग और काफ़
11 अगस्त 2026
‘ऑल इंडिया कैंपस कविता’-2026 के निर्णायक
‘हिन्दवी उत्सव’ के अंतर्गत रविवार, 23 अगस्त 2026 को उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र [NCZCC], प्रयागराज, उत्तर प्रदेश में आयोजित होने जा रही ‘ऑल इंडिया कैंपस कविता’ प्रतियोगिता अब अपने निर्णायक प
11 अगस्त 2026
धारावाहिक उपन्यास : जंकामंका गैंग : आधुनिक हिंदी साहित्य का प्राइवेट इतिहास
गताध्याय से आगे... सात भावुकता दुर्गण नहीं है, मनुष्य होने की उच्च अवस्था है। भावुक व्यक्तियों ने ही सच्चा प्रेम किया है। समाज में करुणा का प्रसार किया है। मनुष्यता की रक्षा की है। देश के लिए
10 अगस्त 2026
‘ऑल इंडिया कैंपस कविता’-2026 के टॉप 20
‘हिन्दवी उत्सव’-2026 के अंतर्गत रविवार, 23 अगस्त 2026 को उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र [NCZCC], प्रयागराज, उत्तर प्रदेश में अन्य साहित्यिक सत्रों के साथ ‘ऑल इंडिया कैंपस कविता’ के दूसरे संस्कर
10 अगस्त 2026
‘ऑल इंडिया कैंपस कविता’-2026 के टॉप 10 : ‘इलाहाबाद के पथ पर...’
हिंदी साहित्य की परंपरा में इलाहाबाद—अब प्रयागराज—का उल्लेख केवल एक शहर के रूप में करना उसके सांस्कृतिक महत्त्व को कम करना होगा। इलाहाबाद आधुनिक हिंदी साहित्य की उन निर्णायक जगहों में रहा है; जहाँ सा
09 अगस्त 2026
‘ऑल इंडिया कैंपस कविता’-2026 के टॉप 40
हिन्दवी उत्सव-2026 के अंतर्गत होने वाले ऑल इंडिया कैंपस कविता के दूसरे संस्करण के लिए हमें 1739 प्रविष्टियाँ प्राप्त हुईं। इनमें ख़ाली, नमूना और दोहरी प्रविष्टियाँ हटाकर शेष 1681 प्रविष्टियों को भेजन
08 अगस्त 2026
‘ऑल इंडिया कैंपस कविता’-2026 के टॉप 100
मनुष्य ने अनिर्वचनीय प्रकृति से मिलते तमाम उद्दीपनों के प्रभाव में अपने चारों ओर जो और जितनी दुनिया बनाई है, वह बहुत जटिल होती चली गई है। काम-आराम, बाज़ार-तकनीक, उत्पादन-उपभोग, सूचनाएँ-व्यवस्थाएँ—मनु
07 अगस्त 2026
अंतिम शय्या पर रवींद्रनाथ
श्रावण-मास! बारिश की झरझर में मानो मन का रुदन मिला हो। शाल-पत्तों के बीच से टपक रही हैं—आकाश-अश्रुओं की बूँदें। उनका मन उदास है। शरीर धीरे-धीरे कमज़ोर होता जा रहा है। शांतिनिकेतन का शांत वातावरण अशांत
31 जुलाई 2026
मास्टर की अरथी नहीं थी, आशिक़ का जनाज़ा था
जीवन मुश्किल चीज़ है—तिस पर हिंदी-लेखक की ज़िंदगी—जिसके माथे पर रचना की राह चलकर शहीद हुए पुरखे लेखक की चिता की राख लगी हुई है। यों, आने वाले लेखक का मस्तक राख से साँवला है। पानी, पसीने या ख़ून से धुलकर
मारांग दाई महाश्वेता
“यक़ीनन आप यही जानना चाहेंगे कि मैंने कितनी बार विवाह किया है? या फिर मैं दिन में कितनी बीड़ियाँ पीती हूँ? क्या मैं व्हिस्की के एक गिलास के बिना रह सकती हूँ?” जब जीवन के उत्तरार्ध में किसी बड़ी ले
24 जुलाई 2026
इस बार ऑल इंडिया कैंपस कविता ‘इलाहाबाद के पथ पर’
‘हिन्दवी’ ने अपने प्रयोगधर्मी साहित्यिक प्रयासों के अंतर्गत वर्ष 2022 के सितंबर में ‘हिन्दवी कैंपस कविता’ की शुरुआत की थी। इस पहल का पहला आयोजन इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा
रज़ा स्मृति : सतपुड़ा, नर्मदा, बेमज़ा वक्ता
नर्मदा के किनारे, सतपुड़ा की तलहटी में बसे मंडला में हमारे पहुँचने के दिन से शायद ही कोई ऐसा दिन गुज़रा हो जब बारिश न हुई हो। लौटते-लौटते मुख्य पुल के बग़ल का ‘रपटा’, जिस पर कुछ दिन पहले तक स्थानीय लो
लोकदूत देवेंद्र सत्यार्थी : बेला फूले आधी रात
न थका न रुका न हटा न झुका किसी फक्कड़ बाबा का मैं चेला हुआ हजारीप्रसाद द्विवेदी की उपर्युक्त काव्य-पंक्ति के प्रेरणा पुंजों में कबीर, बनारसीदास चतुर्वेदी आदि का नाम आता है, पर ‘एक युग : एक प्रतीक’
ये कोई अच्छी बातें हैं भला... ज़बान के हवाले से
कुछ-एक रोज़ पहले एक लौंडे को फ़ेसबुक पर ज़बान के हवाले से एक तहरीर लिखकर लोगों को लताड़ते हुए देखा। जी बेचैन हो गया देखकर। सोचने लगा कि ऐसी फ़िक्र तो ज़बान की शायद उन्हें भी न हुई होगी जो संस्कृत के
मैं शहरों को देखकर कभी मुस्कुरा नहीं सका!
आज से क़रीब दस महीने पहले मैं दूसरी बार दिल्ली की ओर आया। दिल्ली के किनारे, नोएडा को ठिकाना बनाया। जब मैं आया तब मेरे पास शब्दों का एक बड़ा-सा गोदाम था। इस गोदाम से मैं शब्द निकालता, उसे वाक्य बनाता
‘चींटी की अर्थी’ पर कुछ बातें
इस पुस्तक का शीर्षक उसकी अंतर्वस्तु का कोई सिरा हाथ नहीं लगने देता, लेकिन उसके प्रति जिज्ञासा को लाकर एक जगह संकेंद्रित ज़रूर कर देता है। इस कहानी में प्रेम है, बंद कमरों की सुराख़ों से नज़र रखने
जीते चले जाने को पीछे मुड़कर देखना
पेड़ों को अपने पुराने वसंत और पतझड़ याद नहीं रहते। हम अपने मौसम जीने से ज़्यादा याद रखते हैं। मौसम बाहर से ज़्यादा भीतर बीतते हैं। पतझड़ एक लेखक का आदिम आवास है। जहाँ निर्विकार रूप से पत्ते झड़ रहे ह
कहानी : बेबल की लाइब्रेरी
पिछली सदी के अर्जेंटीना के सुविख्यात लेखक-कवि बोर्खेस हिंदी पाठकों के लिए अनजान नहीं हैं। उनकी कहानियों में ‘कल्पना’, ‘अनंत’, समय, स्मृति, भूलभुलैया और ‘किताबों की दुनिया’ जैसी अवधारणाएँ मिलती हैं। व
रविवासरीय 4.0 : यात्रा जितनी रही, वृत्तांत उतना कहाँ!
• यात्रा जितनी रही, वृत्तांत उतना कहाँ!—इस शीर्षक के साथ—‘रविवासरीय’ की यह चौथी ऋतु ‘बेला’ पर आज समाप्त हो रही है। गई तीन ऋतुओं की भाँति ही इस स्तंभ को इस ऋतु में भी पर्याप्त प्रेम प्राप्त हुआ। इस स्
14 जून 2026
होर्खे लुइस बोर्खेस का साक्षात्कार : ‘मैं दूसरी दुनिया में रहूँगा’
होर्खे लुइस बोर्खेस (Jorge Luis Borges) बीसवीं शताब्दी के उन विरल साहित्यकारों में हैं जिन्होंने कविता, कहानी, निबंध और दर्शन के बीच की सीमाओं को लगभग समाप्त कर दिया। वह केवल अर्जेंटीना के लेखक नहीं
फ़िक्शन एक ज़्यादा बड़ा सच है : ख़ालिद जावेद से पूजा भाटिया की बातचीत
तक़रीबन पाँच साल पहले मैंने पहली बार ख़ालिद जावेद का उपन्यास ‘मौत की किताब’ पढ़ा था। पाँच बरस बाद जब उसे दुबारा पढ़ा तो साथ में उनका उपन्यास ‘नेमतख़ाना’ और ‘आख़िरी दावत और अन्य कहानियाँ’ भी पढ़ीं। इस
रविवासरीय 4.0 : कृष्णबलदेववैदविषयक
• नये काम करना मुश्किल नहीं, मुश्किल है पुराने काम नये ढंग से करना। • काम करने के लिए, काम न कर सकने वाली परिस्थितियाँ चाहिए। • रोना अकेले की चीज़ है। • वे जिनकी रचनाएँ ‘राजनीतिक’ नहीं, ऐसे अ
जगह-जगह 2.0 : न मैं हिंदी शहर नगौरी
भाषा-विज्ञान में व्युत्पत्ति-भ्रांति का अर्थ है कि किसी शब्द के प्राचीनतम अर्थ को ही उसका ‘सही’ अर्थ मानने पर ज़ोर दिया जाए और उसके वर्तमान इस्तेमाल को रद्द करके उसे उसके मूल प्रयोग, प्राचीन अर्थ और स
निर्मल वर्मा : चिंतन के स्वर
सुख्यात लेखक निर्मल वर्मा के लेखन को पढ़ना अक्सर किसी शांत, धुँधले पहाड़ी रास्ते पर चलने जैसा अनुभव देता है, जहाँ दृश्य जितना सामने होते हैं, उससे कहीं अधिक ओझल भी। उनके यहाँ कथ्य से अधिक महत्त्व
रविवासरीय 4.0 : दस सवालों के जवाब
• इस तारीख़ पर अभी सवेरा नहीं उतरा है। पक्षियों के स्वर अभी दूर हैं। कुछ देर में दूर बीतेगा और वे चहचहाएँगे—अपने-अपने साथियों के साथ। इस प्रकार समूह में समूह के साथ न रहकर भी समूह के साथ होने की सचाई
रविवासरीय 4.0 : कविता और उसके संपादक
• एक बार की बात है : ‘कथानक’ नामधारी एक पत्रिका ने अपना कविता-विशेषांक घोषित किया। कविता-विशेषांक निकालना संसार की सारी भाषाओं में एक दुष्कर कार्य है, क्योंकि इसके लिए कवियों से संपर्क करना पड़ता
हिंदियाँ : भाषाई विविधता का आयोजन
हिंदी-साहित्य के संवर्धन में सक्रिय ‘रेख़्ता फ़ाउंडेशन’ के उपक्रम ‘हिन्दवी’ ने बीते शनिवार की शाम एक विशेष साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम ‘हिंदियाँ’ का आयोजन किया। यह कार्यक्रम थिएटर, इंडिया हैबिटेट स
03 मई 2026
रविवासरीय 4.0 : नवीन सागर : एक बेसँभाल असमाप्त
• प्रवेश आसान होता है, अगर परिचय प्रगाढ़ हो। इस राह में परिचय की स्मृति और संदर्भ भी सहायक हो सकते हैं। यों भी न हो, तब भूमिकाएँ काम आती हैं। वे बताती हैं कि व्यक्ति जिसमें प्रवेश करने जा रहा है, वह व
हिंदियाँ : लोक-भाषा के विस्तार का आयोजन
‘हिन्दवी’ द्वारा आयोजित यह विशेष कार्यक्रम ‘हिंदियाँ’ साहित्य और सिनेमा में लोक-भाषा की भूमिका और उसके विस्तार को केंद्र में रखेगा। इस आयोजन का आने वाले समय में भाषा, संस्कृति और रचनात्मक अभिव्यक्ति
लंबी कविताओं पर खुलकर हुई बहस : ‘अर्थात्’ की पाँचवीं कड़ी रही ख़ास
‘चेख़व के कथा-साहित्य का सौंदर्यशास्त्र’ पर केंद्रित रही ‘अर्थात्’ की चौथी कड़ी के बाद इस बार विवेचना का विषय रहा—‘हिंदी की लंबी कविताएँ और उनका पुनर्पाठ’। इस पाँचवें आयोजन में बतौर वक्ता कवि-द्वय—देव
विराम-चिह्नों की क्रांति और एम डैश की सत्ता का अंत
हाल ही में मेरी मुलाक़ात एम डैश से हुई। बेहद परेशान, दुखी, चिंतित और बेचैन अवस्था में बैठा था। चेहरा भावप्रवण, अश्रु-भरे नयन, जगत के उलाहनों से क्षुब्ध। ख़ुद को भाषा और लेखन के प्रिय साथी से सिर्फ़ स
नई पदचापों की पहचान : ‘तीन कवि तीन किताबें’
11 अप्रैल को दिल्ली के सुरजीत भवन में आयोजित साहित्यिक संगोष्ठी ‘तीन कवि तीन किताबें’ केवल एक सामान्य पुस्तक-परिचर्चा नहीं थी, बल्कि समकालीन हिंदी कविता की नई आवाज़ों, उनके सरोकारों और समय की बेचैनिय
सौरभ द्विवेदी की रिकमेंडेशन को श्रद्धा से नहीं, संदेह से पढ़ा जाना चाहिए
रतन राजपुरोहित मेरा सहकर्मी है—युवा, उत्साही, पढ़ाकू और ज़बरदस्त लिक्खाड़। अगर लिखने से कैलोरी बर्न होती, तो वह देश का सबसे फिट आदमी होता। पिछले बुधवार की शाम को, शिफ़्ट ख़त्म होने के बाद उसने मुझसे स
रविवासरीय 4.0 : अविनाश मिश्र के ख़िलाफ़
• मैं कैसा था? अलमुस्तफ़ा से अलमित्रा ने पूछा कि अविनाश मिश्र कैसा था, जब दिल्ली आया था? अलमुस्तफ़ा ने कहा कि दिल्ली में अपना क्षरण पता नहीं चलता। दिल्ली में बहुत काम करने के लिए एक स्कॉलर ब
रविवासरीय 4.0 : पहला सीताराम सूर्यवंशी संस्कृति सम्मान
I said to one of my friends, “The reason I have chosen not to speak is that most of the time when one is talking, both good and bad things are said, and the eyes of one’s enemies fall only upon the b
10 अप्रैल 2026
जगह-जगह 2.0 : ईरान में भारत का ख़्वाब : शाहनामा में पंचतंत्र और शतरंज
فیلش یاد هندوستان کرده फ़ीलश याद-ए-हिन्दोस्तान करद : [उसके हाथी को हिंदुस्तान याद आ गया—एक फ़ारसी कहावत, जिसका आशय है किसी प्रिय जगह या अपने अतीत में लौटने की कसक या हूक उठना।] ~ ईरान को सा
आज ‘बेला’ का दूसरा जन्मदिन है
आज से दो वर्ष पूर्व वे देवियों के दिन थे, जब हिन्दी और ‘हिन्दवी’ के व्यापक संसार में ‘बेला’ का प्राकट्य हुआ था। देवियों की उपस्थिति और कला—रूप और कथ्य दोनों ही स्तरों पर—अत्यंत समृद्ध होती है। यह समृ
05 अप्रैल 2026
रचनात्मकता और द्वंद्व
पेड़-पौधों की ही तरह हर रचनाकार अपनी मिट्टी, अपने परिवेश की उत्पत्ति होता है । मेरा यह कहना बेहद सामान्य कथन है । यह तो कहा जाता ही रहा है । फिर मैं नया क्या कह रहा हूँ? मैं नया बिल्कुल नहीं कह रहा।
04 अप्रैल 2026
आधुनिकतावाद से सामना : मेरी सृजनात्मकता और उसके समक्ष चुनौतियाँ
एक ‘सृजनात्मकता’ शब्द से मेरे मन में प्राथमिक तौर पर दो चित्र उभरते हैं—एक, रोपाई के लिए बीज से पौध तैयार करने की अपनी क्यारी को सुबह की धुंध में निरखता हुआ एक अकेला किसान; और दूसरी, लालटेन की रोश
‘अर्थात्’ की चौथी कड़ी में जमकर हुई चेख़व-चर्चा
यौवन भोगते वसंत के बीच जब बोगनवेलिया के फूलों का रंग गाढ़ा हो रहा था और अलसायी हवा धूप के तीखेपन को सरकाकर लास्य बिखराने की कोशिश में थी—जब 29 मार्च को दोपहर दो बजे से शुरू हुई ‘अर्थात्’ की चौथी गोष्
आज है ‘हिन्दवी’ का विशेष आयोजन ‘अनंता’
हिंदी साहित्य की दुनिया में स्त्री-स्वर हमेशा से मौजूद रहा है, बस उसे पहचानने और सुनने की दृष्टि समय-समय पर बदलती रही है। इतिहास के लंबे गलियारों में स्त्रियों की रचनात्मकता अक्सर घर की चौखट, स्मृतिय
रविवासरीय 4.0 : साहित्य अकादेमी एक ऐसा पुरस्कार है
• “बताइए न बाबा कि साहित्य अकादेमी कैसा पुरस्कार है?” बाबा उस उम्र में थे कि किसी भी दिन साहित्य अकादेमी अवार्डी हो सकते थे। बशर्ते उस दिन साहित्य अकादेमी अवार्ड की घोषणा करने वाली प्रेस-कॉन्फ़्रे
रचना का प्रयोजन निर्माण है, नाश नहीं
मैंने साहित्य की किसी भी विधा में जब भी लिखा तब यह सोचकर नहीं लिखा कि मैं उक्त विधा की शर्तों को पूरा करने के लिए लिख रहा हूँ। …मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं कभी गद्य भी लिखना चाहूँगा और आज ऐसा
सही नाम से पुकारने की कला
क्या लिखते हुए हम चीज़ों को उनके सही नाम से पुकारते हैं? चाहे गद्य हो या कविता—यह प्रश्न आत्ममंथन की माँग करता है। साहित्य में शब्द की ‘सत्ता’ और उसकी ‘संज्ञा’ की बराबर भूमिका होती है। जब टॉमस मान ने
मेरे एकांत के प्रवेश द्वार
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शाम हम सब ‘मेरे एकांत के प्रवेश द्वार’ के माध्यम से एक ऐसे साझा स्पेस में एकत्र हुए, जहाँ लोग अपने-अपने जीवन की व्यस्तताओं और बहुत कम मिलने वाले अवकाश से थोड़ा समय निकालकर
03 मार्च 2026
दैनिक भास्कर लेकर आया है कविता-प्रतियोगिता
आगामी 21 मार्च को विश्व कविता दिवस के उपलक्ष्य में ‘दैनिक भास्कर’ एक विशेष पहल के रूप में ‘कविता उत्सव’ का आयोजन कर रहा है। यह काव्य-प्रतियोगिता देश भर के रचनात्मक मनों को एक मंच प्रदान करने का प्रया
‘अर्थात्’ की तीसरी गोष्ठी में खुले छायावाद के बंध
प्रसाद-निराला-महादेवी-पंत के चतुष्टय पर आधारित छायावाद की कविताओं, उसकी भाषा, प्रवृत्तियों, संवेदना और सहमतियों-असहमतियों पर संवाद के उद्देश्य से 22 फ़रवरी की बीती दुपहर ‘छायावाद : खुल गए छंद के बंध’
अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-10
नवीं कड़ी से आगे... दस अरुण कमल सत्तर साल से अधिक का जीवन देख चुके हैं और वरिष्ठ कवियों की सूची में भी आ चुके हैं। अरुण कमल हिंदी में प्रसिद्ध और लोकप्रिय कवि भी हैं। कभी रामचंद्र शुक्ल ने लिखा
अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-9
आठवीं कड़ी से आगे... नौ ‘अपनी केवल धार’ जो देखने में छोटी पर अरुण कमल की कीर्ति का आधार-स्तंभ है कि तरह मेरी एक और प्रिय छोटी-सी कविता है जिसका शीर्षक है—‘थूक’ : “जब वह ग़ुंडा प्राचार्य मान बहाद