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स्मृति पर बेला

स्मृति एक मानसिक क्रिया

है, जो अर्जित अनुभव को आधार बनाती है और आवश्यकतानुसार इसका पुनरुत्पादन करती है। इसे एक आदर्श पुनरावृत्ति कहा गया है। स्मृतियाँ मानव अस्मिता का आधार कही जाती हैं और नैसर्गिक रूप से हमारी अभिव्यक्तियों का अंग बनती हैं। प्रस्तुत चयन में स्मृति को विषय बनाती कविताओं को शामिल किया गया है।

26 अप्रैल 2026

रविवासरीय 4.0 : मेरी बहन की कविताएँ, एक प्लेलिस्ट की याद और थोड़ा-सा कानपुर

रविवासरीय 4.0 : मेरी बहन की कविताएँ, एक प्लेलिस्ट की याद और थोड़ा-सा कानपुर

• एक बंद घर में प्रतीक्षा भरी होती है। एक प्रतीक्षा जिसमें इच्छा नहीं होती। डोरबेल बजती और बजती और बजती ही रहती है। इस पर वस्तुएँ कैसे प्रतिक्रिया करती हैं, इस पर गंध कहाँ तक जा सकती है, इस पर मनुष्य

25 अप्रैल 2026

शनिवारेर चिट्ठी : अनुशोचना और बाक़ी गल्प

शनिवारेर चिट्ठी : अनुशोचना और बाक़ी गल्प

स्फुलिंग कमरा-तर, कमरा-कम या अ-कमरा जैसे शब्द भी कहीं होते हैं, कहो तो! तो फिर बहुत से कमरों के बारे में अंतर की कुछ-कुछ बातें कहने के लिए यो-वो शब्द न हो तो किस कार्य में लगेगा वह कवि के? अंतर की

24 अप्रैल 2026

जगह-जगह 2.0 : पुणे के बहाने

जगह-जगह 2.0 : पुणे के बहाने

जाऊ नका कोणी तिथे जाऊ नका कोणी जे गेले, नाही आले परतोनी तुका पंढरीसी गेला पुन्हा जन्मा नाही आला पंढरीचे भूत मोठे — संत तुकाराम (1608-1650) संत तुकाराम इस अभंग में पंढरपुर के अलौकिक आकर्ष

15 अप्रैल 2026

आशा भोसले : स्वर, छवि और स्वर्णिम दौर की आख़िरी चमक

आशा भोसले : स्वर, छवि और स्वर्णिम दौर की आख़िरी चमक

आशा भोसले में एक चार्म है। वह छवि जो उनको सोचने से बनती है। वह जीवन के उस स्वरूप के अधिक निकट है जो इंसानी सुख-दुख, प्रेम-सौहार्द, ईर्ष्या-द्वेष जैसे मानवीय गुणों से मिलकर बनता है। यह उनकी बड़ी बहन [

08 अप्रैल 2026

राहुल सांकृत्यायन की विरासत और ज्ञान संरक्षण की चुनौतियाँ

राहुल सांकृत्यायन की विरासत और ज्ञान संरक्षण की चुनौतियाँ

ज्ञान केवल पुस्तकों, पांडुलिपियों और अभिलेखों में सीमित नहीं होता, बल्कि वह एक जीवंत परंपरा है। वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी विचार, अनुभव और संवेदनाओं के माध्यम से प्रवाहित होता है। इसी ज्ञान-परंपरा को सहेजने औ

07 अप्रैल 2026

रागदर्पण : वे कैसी मासूमियत के दिन थे...

रागदर्पण : वे कैसी मासूमियत के दिन थे...

वो कौन हैं जिन्हें तौबा की मिल गई फ़ुर्सत हमें  गुनाह भी  करने को  ज़िंदगी  कम  है — आनंद नारायण मुल्ला कल रात यह शेर कहने वाले को दिल से सलाम कहा कि इसे पढ़ते हुए मैं बहुत पीछे तक झाँक आई।

06 अप्रैल 2026

शिवेन्द्र से 10 सवाल : मुंबई मुझे मज़दूरों का शहर लगता है

शिवेन्द्र से 10 सवाल : मुंबई मुझे मज़दूरों का शहर लगता है

शिवेन्द्र हिंदी की नई पीढ़ी के कथाकार हैं। वह मुंबई में रहते हैं। उनका एक उपन्यास (चंचला चोर) और दो कहानी-संग्रह (‘चॉकलेट फ़्रेंड्स और अन्य कहानियाँ’ और ‘सतरूपा’) प्रकाशित हो चुके हैं। आज प्रस्तुत है

31 मार्च 2026

हिंदुस्तानी ज़ुबानों के मरकज़, भारतीय भाषा केंद्र जेएनयू के 50 साल

हिंदुस्तानी ज़ुबानों के मरकज़, भारतीय भाषा केंद्र जेएनयू के 50 साल

जश्न के बाद का सन्नाटा बहुत खलता है... वाऽऽह! किसका है? आपका?... ‘अरे महाराज, आप भी!’ ‘कितना मशहूर है...!!!’ चढ़ते दिन के साथ पछुआ का बढ़ता आवेग, झड़ते पत्ते, झूमते पेड़, डोलती पत्तिया

30 मार्च 2026

हमारे राम कहाँ गए!

हमारे राम कहाँ गए!

ये वे दिन थे जब अँधेरा आकर हमारे आँगन के बीचोबीच बैठ जाता था और हम पाँचों भाई-बहन काँपते हुए संध्या-तारे से धूप की कहानियाँ माँगने लगते थे। लाल बिंदी लगाए हुए दादी एक-एक कर हर कमरे में रोशनी दिखातीं

17 मार्च 2026

कहानी : मैं किसी के लिए कुछ नहीं हूँ

कहानी : मैं किसी के लिए कुछ नहीं हूँ

“अब भी क्या गले न मिलोगी? अभी तक वही हिचक... मिल लो यार, क्या पता अगली मुलाक़ात हो न हो।” उसकी पसीजी हुई हथेलियाँ छूट रही थीं मुझसे। वो गले लगने या लगाने को बेताब था। विदा की बेला में ये बातें मेर

13 मार्च 2026

जो घुला नहीं

जो घुला नहीं

बचपन में जब मेरी माँ दुपहर के वक़्त आराम करते हुए सो जाया करती थी, तब मेरी बड़ी बहन और मैं किचन में जाकर खाना बनाने का खेल खेला करते थे। मैं इतनी छोटी थी कि मुझे चूल्हा जलाना तक नहीं आता था और घर में आ

11 मार्च 2026

रागदर्पण : क़िस्सागो अम्मा

रागदर्पण : क़िस्सागो अम्मा

एक उबाऊ शाम मोबाइल फ़ोन में उलझे हुए मैंने देखा कि फ़ोन इधर-उधर की तस्वीरों, बधाइयों और अनर्गल संदेशों से अटा पड़ा है। उन्हें डिलीट करते हुए मैंने ख़ुद को एक ज़ब्त न होने वाली झल्लाहट की गिरह में पाया।

10 मार्च 2026

पिंजड़े में क़ैद ज़िंदगी

पिंजड़े में क़ैद ज़िंदगी

इस साल सारी आपदाएँ एक साथ आने को व्याकुल हों जैसे। अभी तो मानसून की आहट भी नहीं और बादल हैं कि रोज़ सावन-भादो हुए जाते हैं। सुबह से शुरू हुई बारिश बंद होने का नाम ही नहीं ले रही है। बाबू कहने को दस स

17 फरवरी 2026

पत्र : प्रकाश के साक्षी सेबास्टिओं सालगाडो के नाम

पत्र : प्रकाश के साक्षी सेबास्टिओं सालगाडो के नाम

प्रिय सेबास्टिओं, प्रेरणा के अमिट स्रोत शांति और सामंजस्य के दूत विविधता के उपासक, प्रकृति के अद्भुत सहचर आज से 12 साल पहले मेरे एक फ़ोटोग्राफ़र मित्र अमन ने मुझे तुम्हारे बारे में बताया था।

12 फरवरी 2026

अथ सुचित्रा कथा! जिसे कथाकार पूरा न कह सका...

अथ सुचित्रा कथा! जिसे कथाकार पूरा न कह सका...

‘‘अगर तुम किसी के लिए अच्छा नहीं कह सकते, तो कुछ भी मत कहना...’’ अज्ञात-काया में जाने किस तरह की रोशनी होती है। इन दिनों कथाकार की ज़िंदगी अधलिखी पंक्तियों जैसी है। उसके सपनों की ज़मीन पर अनहोनी क

11 फरवरी 2026

नींद की प्रतीक्षा : निर्मल वर्मा की याद में

नींद की प्रतीक्षा : निर्मल वर्मा की याद में

कई अनुपस्थितियों से अन्य हाज़िरियों का पंचांग मज़बूत हो जाता है, कई रविवासरीय दर्ज करने के सुयोग बनते हैं। यह हाज़िरी किताब पर लगी। पढ़ने के बाद आख़िरी पन्ने पर। ब-तर्ज़ ‘ब्रुक्स वॉज़ हेयर’ पेंसिल से

29 जनवरी 2026

हबीब तनवीर : साधारण में असाधारण की खोज

हबीब तनवीर : साधारण में असाधारण की खोज

नाट्य शास्त्र के पहले ही अध्याय में एक श्लोक है जो एक तरह से नाटक की परिभाषा है— योऽयम स्वभावां लोकस्य सुखदुखसमन्वितः सोंगभिनयोपेतो नाट्यमित्यभिधीयते।। यह जो लोक (फ़ोक का अनुवाद नहीं, बल्कि सम

27 जनवरी 2026

नए साल की रात, 'पहल' की विरासत और अजित पुष्कल की स्मृतियाँ

नए साल की रात, 'पहल' की विरासत और अजित पुष्कल की स्मृतियाँ

शाम के सात बज चुके थे और अब इस समय पर लखनऊ के लिए बस पकड़ने का आशय यह होता कि रात के लगभग बारह बजे के आस-पास या उससे थोड़ा ज़्यादा समय पर ही लखनऊ पहुँच पाता। ऐसे में सिविल लाइंस से वापस लौटना ही सबसे

25 जनवरी 2026

पंडित छन्नूलाल मिश्र : तकलीफ़ में गाने से ही सिद्धि मिलती है

पंडित छन्नूलाल मिश्र : तकलीफ़ में गाने से ही सिद्धि मिलती है

अगर हम गा पाते तो गाकर आपका बखान करते महाराज! लेकिन हमारी ज़िंदगी में लय नहीं है उतनी, इसमें खरज ज़्यादा है, ज़िंदगी का रियाज़ नहीं है, यह बेसुरी हो जाती है—बार-बार। इसलिए हम सिर्फ़ लिख पाएँगे। हम कोशिश क

21 जनवरी 2026

अहमदाबाद : एक प्रवासी स्त्री की आँखों से

अहमदाबाद : एक प्रवासी स्त्री की आँखों से

तीन वर्ष पहले जब मैं अहमदाबाद आई, तो लगा जैसे किसी अपरिचित भूमि पर क़दम रख रही हूँ। पर धीरे-धीरे यह शहर मेरे भीतर उतरने लगा। या शायद यूँ कहूँ कि यह कभी पराया लगा ही नहीं। अहमदाबाद में एक अद्भुत सहजता

16 जनवरी 2026

विष्णु खरे के इर्द-गिर्द

विष्णु खरे के इर्द-गिर्द

समादृत कवि-आलोचक और कला-प्रशासक अशोक वाजपेयी आज 86वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। उन्हें शुभकामनाएँ देते हुए यहाँ प्रस्तुत है—उनके द्वारा समादृत कवि-आलोचक-अनुवादक विष्णु खरे के लिए लिखा गया संस्मरणात

15 जनवरी 2026

रघुवर प्रसाद और सोनसी की दुनिया का रचयिता

रघुवर प्रसाद और सोनसी की दुनिया का रचयिता

1 जनवरी 2026 को विनोद कुमार शुक्ल 89 वर्ष के हो जाते लेकिन उसके नौ दिन पहले ही वह इस दुनिया से चले गए। हिंदी साहित्य में संभवतः अज्ञेय के बाद वह गिनती के ऐसे साहित्यकारों में थे जो गद्य और पद्य दोनों

03 जनवरी 2026

बिछिया, बिछोह और वह आख़िरी ख़ाली पन्ना

बिछिया, बिछोह और वह आख़िरी ख़ाली पन्ना

ठहरे हुए हैं, याद आ रही है यात्राओं की। अलग-अलग जगहों की, अलग-अलग समय पर की गई यात्रा की। अलग-अलग सामान पर लटके विभिन्न देशों के स्टीकर दृश्य में हैं, कि अचानक इन दृश्यों को परे धकेलता हुए सामने आ जा

01 जनवरी 2026

एक साधक रचनाकार

एक साधक रचनाकार

मैं विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ। उनके उपन्यासों ने जीवन को नए ढंग से देखना सिखाया है। यथार्थ को अलग-अलग तरीक़े से कैसे व्यक्त किया जा सकता है, यह बताया है। उनके सारे उपन्य

31 दिसम्बर 2025

आज वर्षांत और कल होने वाले वर्षारंभ के बीच कोई विच्छेद नहीं है

आज वर्षांत और कल होने वाले वर्षारंभ के बीच कोई विच्छेद नहीं है

आने-जाने से ही मिलकर यह संसार बना है। इन दोनों के बीच कोई विच्छेद नहीं है। विच्छेद की कल्पना हम अपने मन में ही करते रहते हैं। सृष्टि, स्थिति और प्रलय ये तीनों एकमेव होकर रह रहे हैं। सदा एक साथ बने हु

31 दिसम्बर 2025

...फिर इस साल का आख़िरी ख़त

...फिर इस साल का आख़िरी ख़त

एमजे, परंपराएँ कवियों को कहीं का नहीं छोड़तीं। ऐसे ही दिनचर्या की आदत। यह चाहते हुए भी कि किसी तरह की आदत बुरी न बने, कई नशे आदमी ज़िंदगी में ओढ़ लेता है। एक बहुत भारी साल के तमाम होते-होते, जिस इ

16 दिसम्बर 2025

इरफ़ान एक नया सूरज था जो बहुत जल्द अस्त हो गया

इरफ़ान एक नया सूरज था जो बहुत जल्द अस्त हो गया

इरफ़ान ख़ान। शिद्दत। उस शिद्दत की ज़िम्मेदारी। इस ज़िम्मेदारी की ख़ामोश अच्छाई। उसकी ख़ामोश अच्छाई की बोलती निगाहें। अगर मुझे किसी ऐसे अभिनेता को पेश करना हो जो अपने होने भर से एक निहायत ही नफ़ीस तरी

15 दिसम्बर 2025

ऑक्सफ़ोर्ड, इलाहाबाद विश्वविद्यालय : कैंपस की कहानियाँ, अँग्रेज़ी संस्कृति और सिनेमा

ऑक्सफ़ोर्ड, इलाहाबाद विश्वविद्यालय : कैंपस की कहानियाँ, अँग्रेज़ी संस्कृति और सिनेमा

“मैं हॉस्पिटल में वेंटिलेटर पर ऑक्सीजन मास्क पहने हुए नहीं मरना चाहता, बल्कि नेचुरल डेथ चाहता हूँ, अपनों के साथ रहते हुए। हॉस्पिटल में मरने से पहले जो थोड़ी-सी जीने की ख़्वाहिश बची है, वह भी मर जाती

13 दिसम्बर 2025

कहानी : आकांक्षा

कहानी : आकांक्षा

मेरे हाथ में संडे का अख़बार है। मेरे बाजू के स्टूल पर सुबह की पहली चाय का कप। स्मिता भी चाय पी रही है। बरसों पहले फ़्रेम करवायी गई रवींद्रनाथ ठाकुर की यह तस्वीर किताबों की रैक के नीचे टंगी है। रवी बा

11 दिसम्बर 2025

लिखने ने मुझे मेरी याददाशत दी

लिखने ने मुझे मेरी याददाशत दी

मेरे नाना लेखक बनना चाहते थे। वह दसवीं तक पढ़े और फिर बैलों की पूँछ उमेठने लगे। उन्होंने एक उपन्यास लिखा, जिसकी कहानी अब उन्हें भी याद नहीं। हमने मिलकर उसे खोजना चाहा, वह नहीं मिला। पता नहीं वह किसी

02 दिसम्बर 2025

धर्मेंद्र : सबसे सरल सिने-अध्याय

धर्मेंद्र : सबसे सरल सिने-अध्याय

धर्मेंद्र के निधन पर एक व्यापक सामूहिक क्षति का एहसास हमें न्यूज़ चैनल्स पर दिखाई गईं ख़बरों और सोशल मीडिया पर दी गईं श्रद्धांजलियों से हुआ। धर्मेंद्र एक बड़े जनसमूह के नायक थे, जिन्होंने लंबे समय तक

24 नवम्बर 2025

स्मरण मुक्तिबोध : एक अंतःकथा

स्मरण मुक्तिबोध : एक अंतःकथा

बीते 13 नवंबर मेरे प्रिय कवियों में से एक गजानन माधव मुक्तिबोध की जन्मतिथि थी। इसके उपलक्ष्य में ‘हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग’, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ‘स्मरण मुक्तिबोध’ नाम से [15 नवंबर, 2

10 नवम्बर 2025

छितवन : स्मृति में बसी गंध

छितवन : स्मृति में बसी गंध

चाहता हूँ कि छितवन को उसके नाम से भूल जाऊँ, कहीं से गुज़रूँ तो उसकी महक नथुनों में घुसे और मैं बेचैन होकर उस महक का पता खोजता फिरूँ। मैं उन दिनों को फिर से जीना चाहता हूँ, महसूस करना चाहता हूँ; और उस

01 नवम्बर 2025

बेगम अख़्तर और लखनऊ का पसंदबाग़

बेगम अख़्तर और लखनऊ का पसंदबाग़

सवेरा कमरे में पसर गया था इसलिए हमें उठना पड़ा। कमरे का दरवाज़ा खुलते ही बालकनी शुरू हो जाती, जहाँ से मंदिर का शिखर दिखता जो गली के उस तरफ़ पार्क के दक्षिणी छोर पर था, जिसमें संघ की शाखा लगती। हम बाल

31 अक्तूबर 2025

सिट्रीज़ीन : ज़िक्र उस परी-वश का और फिर बयाँ अपना

सिट्रीज़ीन : ज़िक्र उस परी-वश का और फिर बयाँ अपना

सिट्रीज़ीन—वह ज्ञान के युग में विचारों की तरह अराजक नहीं है, बल्कि वह विचारों को क्षीण करती है। वह उदास और अनमना कर राह भुला देती है। उसकी अंतर्वस्तु में आदमी को सुस्त और खिन्न करने तत्त्व हैं। उसके स

28 अक्तूबर 2025

भारतेंदु मिश्र : तरफराति पिंजरा है काठ कै चिरइया

भारतेंदु मिश्र : तरफराति पिंजरा है काठ कै चिरइया

कितना दारुण है यह लिखना—स्वर्गीय भारतेंदु मिश्र। मैं उन्हें दद्दा कहता रहा हूँ। अब दद्दा स्मृतियों में रहेंगे, उनकी आत्मीयताओं का बतरस कानों में बजता रहेगा, उनकी कविताओं की पंक्तियाँ वजह-बे-वजह मस्ति

28 अक्तूबर 2025

शारदा सिन्हा स्मृति शेष नहीं, स्मृति अशेष हैं

शारदा सिन्हा स्मृति शेष नहीं, स्मृति अशेष हैं

सो रहो मौत के पहलू में ‘फ़राज़’ नींद किस वक़्त न जाने आए और फिर वह सो गईं—चिर निद्रा में। यह 5 नवंबर 2024 की रात थी। बस एक दिन पहले ही वेंटिलेटर पर आई थीं। पर अब सबको लग ही रहा था कि अब नहीं लौ

22 अक्तूबर 2025

असरानी के लिए दस कविताएँ

असरानी के लिए दस कविताएँ

असरानी एक असरानी के निधन पर हमें कितना ग़मगीन होना चाहिए राजेश खन्ना के निधन से ज़्यादा या राजेश खन्ना के निधन से कम? दो वह कहानी का हिस्सा थे पर कहानी उनके बारे में नहीं थी कभी वह न

21 अक्तूबर 2025

असमाप्य अनुष्ठान : रतन थियम का रंगकर्म

असमाप्य अनुष्ठान : रतन थियम का रंगकर्म

नाटक शुरू होने के पहले की थर्ड बेल बजती है। नाट्यशाला का अँधेरा गाढ़ा होते-होते किसी प्रागैतिहासिक, चंद्रमा विहीन रात्रि के ठोस अँधेरे में बदल जाता है। और तब पृथ्वी के किसी सुदूर कोने से एक वृंदगान क

20 अक्तूबर 2025

मैं अब हर घर को उल्टा देखना चाहती हूँ

मैं अब हर घर को उल्टा देखना चाहती हूँ

थाइलैंड और कम्बोडिया : घासतेल की बूँदों के साथ तैरता हुआ जीवन सब कुछ तैर रहा था वहाँ, बैंकॉक की तैरती सब्ज़ी-मंडी में। केले के पत्ते, प्याज़ के छिलके, आस-पास के पेड़ों के साए, और नहर के दोनों तरफ़ ब

18 अक्तूबर 2025

झाँसी-प्रशस्ति : जब थक जाओ तो आ जाना

झाँसी-प्रशस्ति : जब थक जाओ तो आ जाना

मेरा जन्म झाँसी में हुआ। लोग जन्मभूमि को बहुत मानते हैं। संस्कृति हमें यही सिखाती है। जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से बढ़कर है, इस बात को बचपन से ही रटाया जाता है। पर क्या जन्म होने मात्र से कोई शहर अपना ह

04 अक्तूबर 2025

रामचंद्र शुक्ल, हिंदी शब्दसागर और नागरीप्रचारिणी सभा

रामचंद्र शुक्ल, हिंदी शब्दसागर और नागरीप्रचारिणी सभा

आज हिंदी के शीर्षस्थ आलोचक और साहित्य के इतिहासकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जयंती है। काशी नागरीप्रचारिणी सभा शुक्लजी की आलोचना की जन्मभूमि है। 1908 से 1930—लगातार 28 वर्षों तक वह ‘सभा’ की ऐतिहासिक प

02 अक्तूबर 2025

स्कूली निबंधों में महात्मा गांधी

स्कूली निबंधों में महात्मा गांधी

गांधी-जयंती आ रही है। बचपन में हमारे पाठ्यक्रम का बड़ा अहम हिस्सा रहे हैं बापू। स्कूल में गाय-भैंस, सहेला-सहेली, माता-पिता, नानी-दादी के घर पर बिताई छुट्टियाँ, रेलगाड़ी का सफ़र, बसंत-बरसात आदि की तरह

02 अक्तूबर 2025

रामलीला तेरी याद में नैन हुए बेचैन

रामलीला तेरी याद में नैन हुए बेचैन

नब्बे के दशक के उतरते साल थे। न केबल टीवी गाँव पहुँचा था, न फ़ोन। बिजली पहुँच तो गई थी, पर अक्सर ग़ायब ही रहती थी। न उसके आने का कोई नियम था, न जाने का। लोग भी बिजली पर पूरी तरह आश्रित नहीं थे और न ह

30 सितम्बर 2025

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी और ‘फ़ानी बाक़ी’

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी और ‘फ़ानी बाक़ी’

आज का दिन मेरे महबूब शहर इलाहाबाद के महबूब साहित्यकार और आलोचक शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी की जन्मतिथि है। वह आसमां में चमकते हुए तारों में से एक हैं, जिसे मैं आज के दिन देखना चाहता हूँ। इलाहाबाद के साहित्

29 सितम्बर 2025

इलाहाबाद मेरे लिए यूटोपिया में तब्दील होता जा रहा है

इलाहाबाद मेरे लिए यूटोपिया में तब्दील होता जा रहा है

14 सितंबर 2022 कल किसी ने व्हाट्सएप पर एक स्टेटस लगा रखा था। किसी की मृत्यु का। बहुत सुंदर चेहरा था। जवान था। मैंने पूछा : कौन हैं भाई? जवाब आया : शाइर थे! मैंने पूछा : आत्महत्या? जवाब आया : हाँ!

24 सितम्बर 2025

भूले-भटके दिन : कुछ रूमानी टुकड़े

भूले-भटके दिन : कुछ रूमानी टुकड़े

मैंने अपने सबसे असुरक्षित क्षणों में जब-जब तुम्हें याद किया है, तब-तब यह सवाल आया कि बीतते समय के साथ मैं तुम्हारे लिए महत्त्वपूर्ण रहूँगा कि नहीं! संभव है, यह प्रश्न तुम्हारे ज़ेहन में भी उठता होगा,

22 सितम्बर 2025

ज़ुबिन गार्ग : समय जब ठहर जाए...

ज़ुबिन गार्ग : समय जब ठहर जाए...

कोई मनुष्य कितना प्रिय हो सकता है, जीते जी इसका सही अंदाज़ा लगाना कठिन होता है। अपने जीवन काल में कई महानुभावों को इस संसार का मोह त्याग करते हुए हम सबने देखा होगा, उनकी अंतिम यात्रा में बड़ी भीड़ भी हम

18 सितम्बर 2025

इलाहाबाद तुम बहुत याद आते हो-4

इलाहाबाद तुम बहुत याद आते हो-4

तीसरी कड़ी से आगे... आगे डायोसिस चर्च ऑफ़ लखनऊ के प्रभारी का आवास है। मैं जब छात्रावास में रहता था। तब एक बार ऐसा हुआ कि छात्रावास ने व्यवस्थाओं से दूर-दूर तक अपना नाता तोड़ लिया। न साफ़-सफ़ाई, न

11 सितम्बर 2025

मुक्तिबोध का दुर्भाग्य

मुक्तिबोध का दुर्भाग्य

आज 11 सितंबर है—मुक्तिबोध के निधन की तारीख़। इस अर्थ में यह एक त्रासद दिवस है। यह दिन याद दिलाता है कि आधुनिक हिंदी कविता की सबसे प्रखर मेधा की मृत्यु कितनी आसामयिक और दुखद परिस्थिति में हुई। जैसा कि