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प्रतिरोध पर बेला

आधुनिक कविता ने प्रतिरोध

को बुनियादी कर्तव्य की तरह बरता है। यह प्रतिरोध उस प्रत्येक प्रवृत्ति और स्थिति के विरुद्ध मुखर रहा है, जो मानव-जीवन और गरिमा की आदर्श स्थितियों और मूल्यों पर आघात करती हो। यहाँ प्रस्तुत है—प्रतिरोध विषयक कविताओं का एक व्यापक और विशिष्ट चयन।

29 सितम्बर 2026

C/O बंगाल : नक्सल आंदोलन : बांग्ला-कविता जब सड़क पर उतर आई

C/O बंगाल : नक्सल आंदोलन : बांग्ला-कविता जब सड़क पर उतर आई

सन् 1971, 5 अगस्त... भोर की रोशनी अभी पूरी तरह फूटी नहीं थी। वह रात और सुबह के बीच का एक धुँधला समय था। इस आधे अँधेरे में ही बंगाल के महानायक उत्तम कुमार सुबह की सैर कर रहे थे। यह उनकी रोज़ की आदत

11 सितम्बर 2026

ममता कालिया के नाम एक छात्र का खुला ख़त

ममता कालिया के नाम एक छात्र का खुला ख़त

आदरणीय ममता कालिया जी, नमस्कार! “रात-रात नींद नहीं आती। दिन ऐसे बीतते हैं, जैसे भूतों के सपनों की एक रील पर दूसरी रील चढ़ा दी गई हो और भूतों की आकृतियाँ और डरावनी हो गई हों।” विद्यानिवास मिश

03 सितम्बर 2026

जौहर : कायरता नहीं, मध्यकालीन अस्मिता और स्वाधीनता-बोध का आख्यान

जौहर : कायरता नहीं, मध्यकालीन अस्मिता और स्वाधीनता-बोध का आख्यान

समकालीन नैतिक कसौटियों से मध्यकालीन जौहर को तौलकर उसे ‘कायरता’ की संज्ञा दे देना उस संपूर्ण सांस्कृतिक चेतना की उपेक्षा है, जिसमें अर्पण, तर्पण, समर्पण, पवित्रता, शुचिता, मर्यादा, आत्मसंयम, चरित्र, स

19 जुलाई 2026

बिंदुघाटी 2.0 : बहुत फूँक-फूँककर सिर्फ़ साँप चलते हैं

बिंदुघाटी 2.0 : बहुत फूँक-फूँककर सिर्फ़ साँप चलते हैं

• इन दिनों पॉपुलर स्पेस में कहीं-कहीं और बहुत सारी बातों के साथ-साथ लोग यह भी कह रहे हैं कि भूख-हड़ताल भारतीय संस्कृति नहीं है। ये कमाल के लोग हैं और कमाल की ही हैं इनकी सांस्कृतिक व्याख्याएँ! इनके इस

12 जुलाई 2026

बिंदुघाटी 2.0 : मुझे पता है कि इस पोस्ट में आपकी दिलचस्पी है

बिंदुघाटी 2.0 : मुझे पता है कि इस पोस्ट में आपकी दिलचस्पी है

• कोई भी आंदोलन हर क़ीमत पर एक सामजिक-सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी है। इसमें बहुत से प्रशिक्षित या अनुभवी जन भी होते हैं और बहुत से नए-नए उत्साही जन भी। आंदोलन ब्रिटिश राज़ की ग़ुलामी से निकले एक देश के लिए

09 जुलाई 2026

मार्जान सतरापी : एक स्त्री और पैग़म्बर बनने का ख़्वाब

मार्जान सतरापी : एक स्त्री और पैग़म्बर बनने का ख़्वाब

एक बात हमेशा से खटकती रही है और शायद आने वाले समय में और भी खटकने लगे, आख़िर क्यों किसी लेखक को सर्वविदित होने के लिए अपनी मौत का इंतिज़ार करना पड़ता है? एक उभरते और शायद गुज़रते हुए साहित्यकार बता र

22 जून 2026

सहन : चुप्पी की अंतिम सीमा

सहन : चुप्पी की अंतिम सीमा

घरेलू हिंसा पर केंद्रित फ़िल्मों की भीड़ में ‘सहन’ अपनी संयमित अभिव्यक्ति, सौंदर्यबोध और गहन संवेदनात्मक परतों के कारण, एक विशिष्ट स्थान अर्जित करती है। यह फ़िल्म अपने कथ्य को किसी ऊँचे स्वर में नहीं क

16 जून 2026

केवल ताली ही तो है : प्रयागराज के NCZCC में ‘ओथेलो’ और रवींद्रालय में ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ देखते दर्शकों का स्त्री-द्वेष

केवल ताली ही तो है : प्रयागराज के NCZCC में ‘ओथेलो’ और रवींद्रालय में ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ देखते दर्शकों का स्त्री-द्वेष

बीते दिनों इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में दो महत्त्वपूर्ण नाटकों का मंचन हुआ—19 मार्च 2026 को एनसीज़ेडसीसी (NCZCC) में शेक्सपीयर के ‘ओथेलो’ का, जिसका निर्देशन आलोक नैयर ने किया और 26 मार्च 2026 को रवींद

01 मई 2026

कार्ल मार्क्स की मृत्यु : एक गुप्त इश्तिहार

कार्ल मार्क्स की मृत्यु : एक गुप्त इश्तिहार

कितनी तीखी ठंड है, एंगेल्स! कैसी गहरी निस्तब्धता की ओर बढ़ती जा रही है यह पृथ्वी! फिर भी देखो, दिसंबर की मृत्यु को भुलाकर, जनवरी की जड़ता को पीछे छोड़कर, लंदन की सड़कों पर एक नई चेतना जन्म ले रही है।

30 अप्रैल 2026

अपने-अपने कबीर

अपने-अपने कबीर

कबीर आज इतने समय बाद भी प्रासंगिक हैं। उनकी मौजूदगी के माध्यम बदल गए हैं, लेकिन वह आज भी किसी न किसी रूप में अन्य कवियों की तुलना में अधिक प्रभावी और जीवंत महसूस होते हैं। स्कूल की किताबों में दोहों

17 अप्रैल 2026

मेरी रचनात्मकता, मेरे द्वंद्व

मेरी रचनात्मकता, मेरे द्वंद्व

कहते हैं कला आत्मा का फूल होती है। हाँ होती है, पर यह फूल किसी सरोवर में नहीं, किसी दलदल में, किसी कीचड़ में ही खिलता है। उसकी ख़ूबसूरती देखकर आप क़तई अंदाज़ा नहीं लगा सकते कि वह किन परिस्थितियों में

28 मार्च 2026

आज है ‘हिन्दवी’ का विशेष आयोजन ‘अनंता’

आज है ‘हिन्दवी’ का विशेष आयोजन ‘अनंता’

हिंदी साहित्य की दुनिया में स्त्री-स्वर हमेशा से मौजूद रहा है, बस उसे पहचानने और सुनने की दृष्टि समय-समय पर बदलती रही है। इतिहास के लंबे गलियारों में स्त्रियों की रचनात्मकता अक्सर घर की चौखट, स्मृतिय

09 जनवरी 2026

‘घंटा’ फ़र्क़ नहीं पड़ता किसी कहानीकार के रहने या जाने से!

‘घंटा’ फ़र्क़ नहीं पड़ता किसी कहानीकार के रहने या जाने से!

कल के दिन की शुरुआत हुई कथाकार एवं ‘पहल’ पत्रिका के संपादक के रूप में समादृत ज्ञानरंजन के जाने की ख़बर से। 7 जनवरी की रात, जबलपुर में उनका निधन हो गया था। फिर पता चला कि गुरु घासीदास विश्वविद्यालय और

30 नवम्बर 2025

गर्ल्स हॉस्टल, राजकुमारी और बालकांड!

गर्ल्स हॉस्टल, राजकुमारी और बालकांड!

मुझे ऐसा लगता है कि दुनिया में जितने भी... अजी! रुकिए अगर आप लड़के हैं तो यह पढ़ना स्किप कर सकते हैं, हो सकता है आपको इस लेख में कुछ भी ख़ास न लगे और आप इससे बिल्कुल भी जुड़ाव महसूस न करें। इसलिए आपक

19 अक्तूबर 2025

शरणार्थी शिविरों में समाए तिब्बती जीवन का दुख

शरणार्थी शिविरों में समाए तिब्बती जीवन का दुख

सेयरिंग यांगजोम लामा तिब्बती लेखक हैं। ‘वी मैज़र द अर्थ विथ ऑर बॉडिज़’ उनका पहला उपन्यास है। उनका जन्म और पालन-पोषण नेपाल के एक तिब्बती शरणार्थी समुदाय में हुआ। आपको कैसा महसूस होगा अगर आपको आपके

11 सितम्बर 2025

‘मुक्तिबोध’ की परम अभिव्यक्ति ‘विद्रोही’

‘मुक्तिबोध’ की परम अभिव्यक्ति ‘विद्रोही’

मुक्तिबोध का रहस्यमय व्यक्ति जो उनके परिपूर्ण का आविर्भाव है, वह रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ है। मुक्तिबोध के काव्य में बड़ी समस्या है—सेंसर की। वहाँ रचना-प्रक्रिया के तीसरे क्षण में ‘जड़ीभूत सौंदर्याभिरु

21 अगस्त 2025

काग़ज़ी है पैरहन : इस्मत चुग़ताई के बनने की दास्तान

काग़ज़ी है पैरहन : इस्मत चुग़ताई के बनने की दास्तान

उर्दू गद्य साहित्य की बेहतरीन और बहुचर्चित हस्ताक्षर इस्मत चुग़ताई की आत्मकथा है—‘काग़ज़ी है पैरहन’। यह किताब इस्मत चुग़ताई की शुरूआती ज़िंदगी और उनकी निर्मिति की कहानी को बहुत रोचक अंदाज़ में बयाँ करती है

08 जुलाई 2025

काँदनागीत : आँसुओं का गीत

काँदनागीत : आँसुओं का गीत

“स्त्रियों की बात सुनने का समय किसके पास है? स्त्रियाँ भी स्त्रियों की बात नहीं सुनना चाहतीं—ख़ासकर तब, जब वह उनके दुख-दर्द का बयान हो!” मैंने उनकी आँखों की ओर देखा। उनमें गहरा, काला अँधेरा जमा था,

01 मई 2025

यह ‘जल तू जलाल तू’ फ़िल्म की समीक्षा नहीं है

यह ‘जल तू जलाल तू’ फ़िल्म की समीक्षा नहीं है

‘‘एक ज़माने पहले की बात है’’, लेकिन वो कौन-सी बात है जिसके बदलने से ज़माना बदल जाता है? ज़माना, जब कॉटन के साथ पॉलिस्टर मिलाया जाना बहुत प्रचलित बात नहीं थी, जब ‘टाटा-बिरला’ शब्द-युग्म लोकप्रिय मुहावर

19 अप्रैल 2025

दो दीमकें लो, एक पंख दो

दो दीमकें लो, एक पंख दो

मैं आभार व्यक्त करना चाहता हूँ, इस कार्यक्रम के आयोजकों और नियामकों का जिन्होंने मुझे आपके रूबरू होने का, कुछ बातें कर पाने का मौक़ा दिया। मेरे लिए यह मौक़ा असाधारण तो नहीं, लेकिन कुछ दुर्लभ ज़रूर है। ल

24 जनवरी 2025

जावेद आलम ख़ान की ‘स्याह वक़्त की इबारतें’ और अन्य कविताएँ पढ़ते हुए…

जावेद आलम ख़ान की ‘स्याह वक़्त की इबारतें’ और अन्य कविताएँ पढ़ते हुए…

कविता की एक किताब में—एक ज़ख़्मी देश, एक आहत मन! एक कवि—जिसका नाम विमर्श में खो गया, जिसके चेहरे की ओर भी सबने नहीं देखा, लेकिन उसकी आवाज़ कुछ दिलों में, कुछ कविता की बातों के रास्ते पर, साहित्य के क

11 सितम्बर 2024

राजनीतिक संगठनकर्ताओं के बीच मुक्तिबोध

राजनीतिक संगठनकर्ताओं के बीच मुक्तिबोध

भारतीय आर्थिक ढाँचा एक बहुत बड़ी आबादी को ख़ाली समय की सुविधा ही नहीं देता कि वह साहित्य जैसे विषय को अपने जीवन से जोड़ सके।  चिंता : हिंदी के लेखक कई बार सामूहिक तौर पर तो कई बार व्यक्तिगत सीम

17 अगस्त 2024

जुमई ख़ाँ ‘आज़ाद’ : बिना काटे भिटवा गड़हिया न पटिहैं

जुमई ख़ाँ ‘आज़ाद’ : बिना काटे भिटवा गड़हिया न पटिहैं

कवि जुमई ख़ाँ ‘आज़ाद’ (1930-2013) अवधी भाषा के अत्यंत लोकप्रिय कवि हैं। उनकी जन्मतिथि के अवसर पर जन संस्कृति मंच, गिरिडीह और ‘परिवर्तन’ पत्रिका के साझे प्रयत्न से जुमई ख़ाँ ‘आज़ाद’ स्मृति संवाद कार्य

06 जुलाई 2024

'मैं एक सतत अलक्षित अवाँगार्द हूँ'

'मैं एक सतत अलक्षित अवाँगार्द हूँ'

सुख्यात कवि-कथाकार देवी प्रसाद मिश्र की किताब मनुष्य होने के संस्मरण हाल के दिनों में चर्चा में रही है। इस पुस्तक की अन्य कथाओं पर यहाँ उनसे एक बातचीत की है—सरबजीत गरचा ने जो अँग्रेज़ी भाषा के जाने-म

10 अप्रैल 2024

‘बिना शिकायत के सहना, एकमात्र सबक़ है जो हमें इस जीवन में सीखना है’

‘बिना शिकायत के सहना, एकमात्र सबक़ है जो हमें इस जीवन में सीखना है’

जैसलमेर 10 मई 2023  आज जैसलमेर आया हूँ। अपनी भुआ के यहाँ। बचपन में यहाँ कुछ अधिक आना होता था। अब उतना नहीं रहा। दुपहर में साथी के साथ हमीरा जाना हुआ। दिवंगत साकर ख़ान के घर। जीवन में लय का बहुत मह