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‘घंटा’ फ़र्क़ नहीं पड़ता किसी कहानीकार के रहने या जाने से!

कल के दिन की शुरुआत हुई कथाकार एवं ‘पहल’ पत्रिका के संपादक के रूप में समादृत ज्ञानरंजन के जाने की ख़बर से। 7 जनवरी की रात, जबलपुर में उनका निधन हो गया था। फिर पता चला कि गुरु घासीदास विश्वविद्यालय और साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित कार्यक्रम में आमंत्रित-अतिथि कहानीकार को कुलपति ने सभा से निकाल दिया। पूरी ख़बर देखी, घटना का वीडियो देखा, लोगों के पोस्ट देखे। एक वक़्त किसी क्रांतिकारी पार्टी का सक्रिय सदस्य होने का नफ़ा-नुकसान यही है कि सुबह से लेकर शाम तक इसी तरह की ख़बरें मेरे सोशल मीडिया की ‘दीवार में खिड़की’ बनाती रहती हैं। 

खिड़की के उस पार कुलपति ने कहानीकार से पूछा—“आप बोर तो नहीं हो रहे हैं?”

कहानीकार ने कहा—“विषय पर बोलिए।” 

कुलपति को तुरंत एहसास हुआ कि वह किसी का ‘घंटा’ है [‘घंटा’ज्ञानरंजन की एक चर्चित कहानी है।] और कहानीकार का सत्य कहना, उस घंटे का अपमान है। उन्होंने आमंत्रित-अतिथि कहानीकार को सभा से निकाल दिया। मंचासीन ‘सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक्’ हो गए। कुछ लेखक के पीछे-पीछे ‘रीढ़ की हड्डी’ लिए चले गए, बाक़ियों ने अपनी रीढ़ कुर्सी पर टिका ली।

इस घटना के बाद रीढ़धारी साहित्यकार कुलपति को मूर्ख और तमाम तरह की उपाधियों से सम्मानित कर रहे हैं, पर मुझे लगता है कि कुलपति इतने भी मूर्ख नहीं जितना उन्हें समझा जा रहा है। वह बोर करने वाली बातें कह रहे हैं, इसका आभास उन्हें था और कुलपति बनने में शायद यही प्रतिभा काम आई हो!

साहित्यकार ज्ञानरंजन का दुनिया से जाना और कहानीकार मनोज रूप ‘ड़ा’ [वायरल वीडियो में कुलपति ने लेखक का नाम पूछकर, उसे कुछ इस तरह लिया है] को सभा से निकाले जाने में एक साम्यता है। विरोध, असहमति, मेटाफर, प्रतीक, बिंब, उपमा आदि की समाज में कोई ज़रूरत नहीं है तो इसका प्रयोग करने वालों की भी क्या ज़रूरत है? देश के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में एक नारा लगा, राजनीति में विरोध के लिए ऐसे प्रतीकात्मक नारे वर्षों से लग रहे हैं। साहित्यिक लोग कहेंगे, यह एक मेटाफर है—पर क्या मेटाफर की समझ समाज में रह गई है! किसी भी तरह के विरोध या असहमति को व्यक्त करने के लिए बनाए गए कार्टून यानी व्यंग्य-चित्र को ‘घंटा’ मीडिया देशद्रोह साबित करता है और सभी चुप रहते हैं। 

अब तो कक्षा में तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ को पढ़ाते हुए डर लगता है कि कहीं राम के लिए तुलसीदास ने जो ‘ग़रीबनवाज़’ शब्द का प्रयोग किया है, वह न आ जाए। यह कुपढ़ लोग कहीं यह न कह दें कि यह राम के लिए आपने उर्दू शब्द का प्रयोग क्यों किया! आप कहते रहेंगे कि मैंने नहीं तुलसीदास ने लिखा है, पर वे कहेंगे उन्होंने कहा तो कहा पर आपने क्यों कहा! जहाँ ऐसी मूढ़ता फैली हो वहाँ कहानीकार का क्या काम! अच्छा ही हुआ कि ज्ञानरंजन चले गए। मेटाफर के लिए तंग होती इस दुनिया में उनका क्या काम।

हमारे जैसे जो लोग इसे बचा सकते थे, वे अब बच्चों की फ़ीस, ईएमआई, किराया आदि में फँसे हैं। उस मंच पर भी शायद ऐसे ही लोग थे। मुझे डर है कि अब मनोज रूपड़ा को आमंत्रित करने वाले प्रोफ़ेसर का क्या होगा? अब उसे अपने बच्चों की फ़ीस, ईएमआई, किराया आदि की चिंता सता रही होगी; क्योंकि वह जान रहा होगा/रही होगी कि कभी भी उसे सस्पेंड किया जा सकता है। इस बहाने न सही, दूसरे बहाने से किसी ख़रगोश की तरह उसे हमेशा चौकन्ना रहना होगा और हर किसी का ‘घंटा’ बने रहने के लिए तैयार भी रहना होगा। अब वह ‘फ़ेंस के इधर और उधर’ नहीं जा सकता/सकती। कहानीकार ने भी उसकी मजबूरी समझी और अन्य लोगों को कार्यक्रम में बने रहने को कहा। पर जो बने रहे, वे बाद में विरोध तो कर ही सकते थे। पर वे फ़ेसबुक पर फ़ेसबुकिया उफान में नहीं बहे। वे किसी कहानीकार का ‘घंटा’ बनने की जगह, एक ‘निर्दोष और असहाय’ के ‘पिता’ बन गए। पिस्तौल वाले पिता को पाकर कौन ख़ुश नहीं होगा।

जहाँ से मैं पढ़ा हूँ, वहाँ किसी कुलपति को न तो देखा और न उनके बारे में सुना कि वह इतने ‘असहाय और निर्दोष’ थे। हालाँकि ‘अमृतकाल’ में अब वहाँ भी ‘निर्दोष और असहाय’ कुलगुरु बन रहे हैं और हिंदी के प्राध्यापक से अँग्रेज़ी में सवाल कर रहे हैं। एक समय यहाँ के कुलगुरु, प्रदर्शन कर रहे और ‘वीसी मुर्दाबाद’ के नारे लगा रहे विद्यार्थियों के झुंड के बीच से जाते थे। पुराने लोगों से सुना था कि वाई.के. अलघ तो प्रसिद्ध छात्रनेता शहीद चंद्रशेखर के समानांतर धरने पर बैठ गए थे। पर यह ‘निर्दोष और असहाय’ नहीं थे इसलिए किसी को निकालते नहीं थे। बात करने को बेअदबी नहीं मानते थे।

जब मैंने हिंदी-भाषा ली तो पाठ्यक्रम और प्रसिद्धि के कारण ज्ञानरंजन को पढ़ा। मनोज रूपड़ा के बारे में सुना था, पर ऑनलाइन वेबसाइट पर एक कहानी और इंटरव्यू को छोड़कर कुछ नहीं पढ़ा। पर अब उनका लिखा पढ़ने की उत्सुकता है। विद्यार्थियों को पढ़ाता हूँ कि कहानी की प्रथम शर्त उत्सुकता जागृति ही होती है, यहाँ एक कहानीकार के ‘साज़-नासाज़’ ने ही यह काम मेरे लिए कर दिया। जिन्हें इस बात की उत्सुकता है कि मनोज रूपड़ा ने कुलपति को कैसे टोक दिया तो ‘समालोचन’ में प्रकाशित उनके इंटरव्यू का यह अंश देखें :

‘‘मुझे याद है मैंने मोतीलाल जी वोरा, जो उस वक़्त मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और दुर्ग के सांसद और कैबिनेट मंत्री चंदुलाल चंद्राकर को भी उस मंच पर गालियों से नवाज़े जाते हुए देखा है। गाली से नवाज़े जाने के बाद भी वह विनम्रता से हाथ जोड़कर जनता जनार्दन का अभिवादन करते थे।

ऐसा शानदार वातावरण जिसको मिला हो, उसका मिजाज़ भी तो वैसा ही होगा। मुझे तो बड़ा गर्व होता है इस बात को कहने में कि मैं दुर्ग का हूँ। अगर मुझसे कोई पूछे कि तुम कौन हो? मैं अपने आपको पहले छत्तीसगढ़ी कहलाना पसंद करूँगा, क्योंकि संस्कार तो मुझे छत्तीसगढ़ ने दिए हैं। जन्म गुजरात में हुआ, पैदाइशी मैं गुजराती हूँ; लेकिन मेरे जो संस्कार हैं, वह पूरे छत्तीसगढ़ के हैं।’’

छत्तीसगढ़ के विश्वविद्यालय में मनोज रूपड़ा ने अपने इसी मिजाज़ का प्रदर्शन किया है। ऐसे कुलपतियों का सामना करने में अब लोग ‘असहमति का साहस’ कम ही दिखाते हैं और ‘सहमति का विवेक’ नौकरी-चाकरी के लिए हमेशा जागृत रखते हैं। ऐसे लोगों के लिए किसी कहानीकार की मृत्यु या अपमान का कोई महत्त्व नहीं। जिस देश के सबसे साफ़ शहर में लोग शौचालय का पानी पीकर मरने को मजबूर हो और उस पर ‘टॉवर ऑफ़ साइलेंस’ हो; उसी शहर में क्रिसमस ट्री का ‘दहन’ हो, उस देश में ‘रद्दोबदल’ के लिए ‘साज़-नासाज़’ से क्या ही होगा! यहाँ ‘घंटा’ फ़र्क़ नहीं पड़ता किसी कहानीकार के रहने या जाने से।

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