साहित्य और संस्कृति की घड़ी
• एक बार की बात है : ‘कथानक’ नामधारी एक पत्रिका ने अपना कविता-विशेषांक घोषित किया। कविता-विशेषांक निकालना संसार की सारी भाषाओं में एक दुष्कर कार्य है, क्योंकि इसके लिए कवियों से संपर्क करना पड़ता ह
16 मई 2026
समय वह किसी सीधी बहती हुई नदी की तरह नहीं। वह लौटता हुआ और मुड़ता हुआ। समय अपनी ही दिशा पर संदेह करता हुआ। समय बंद वृत्त है और ‘इन्वर्ज़न’ समय की स्मृति के विखंडन के रूप में। भविष्य और अतीत एक-दूसर
जगहें कैसे बनती हैं? तुम्हारे और मेरे बैठने से पहले, समंदर किनारे पड़े उन पत्थरों को क्या ‘जगह’ कहा जाए? फ़िल्म ‘रंगीला’ का समुद्र, ‘सदमा’ का समुद्र और ‘Life of Pi’ का समुद्र एक ही है? जगह एक दशा ह
कभी-कभी मैं यह भूल जाती हूँ कि यह इक्कीसवीं सदी है और हम ‘स्क्रीन’ में जी रहे हैं। हमारा पूरा जीवन एक ‘स्क्रीन’ के आस-पास ही बीत रहा है। वैसे जहाँ जीवन आता है, वहाँ तरह-तरह के लोग भी आते हैं और जहाँ
तुम्हारा मेरा साथ जैसे आँख में धँसा कोई काँटा एक मछली पकड़ने का काँटा एक खुली आँख कनाडियन कवि-लेखिका मारग्रेट एटवुड की ये कविता पढ़ते हुए एक लिखती हुई स्त्री और उसके परिवेश के बीच का संबंध बहु
वैशाख की इस अलस-दुपहरी में जहाँ मैं नहीं हूँ; सोचता हूँ, दाँवरि के बाद वहाँ अलसाने के दिन आ गए होंगे। परदेशियों की याद में ग्राम्यवधुएँ छत पर लत्ते-सी सूख रही होंगी और जम्हाई लेते हुए रसिक मनफेरवट से
वाक्य किसी भी समाज के साहित्य का अभिन्न अंग रहे हैं। इन वाक्यों के बिना कोई हुकूमत नहीं चल सकती थी और आज भी इन वाक्यों के बिना सरकार नहीं चल सकती। कैसे-कैसे कालजयी वाक्य इस देश में संभव हुए हैं :
इस तथ्य को बतौर ढाल के रूप में प्रयोग करते हुए, ताकि अपनी अंतरात्माओं के हमलों से हम स्वयं को बचा सकें कि इन शब्दों को लिखने वाला अब इस दुनिया में नहीं है, कि एक दशक पहले अगस्त महीने की एक बरसती शाम
• आज से लगभग सात बरस पहले जब 17वीं लोकसभा के लिए मतदान शुरू होने में कुछ ही दिन बाक़ी रह गए थे—1 अप्रैल 2019 को हिंदी-अँग्रेज़ी सहित भारतीय भाषाओं के 200 लेखकों ने भारतीय नागरिकों के नाम एक संयुक्त अपी
09 मई 2026
स्मृति के घर अँधेरा स्मृति के घर अँधेरा बहुत है। सिर्फ़ आँखें काम नहीं करतीं। नाक भी लगता है काज पर। शून्य को सुनना पड़ता है कानों को। हाथों को हवा को टटोलना पड़ता है। विस्मृति ने कोई शोर भी तो नहीं