साहित्य और संस्कृति की घड़ी
काफ़ी समय से कॉकरोच जनता पार्टी के हालिया आंदोलन की चर्चा है। इस आंदोलन के कारण शिक्षा मंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा। कई लोग इसका श्रेय जेन ज़ी को दे रहे हैं, क्योंकि इस आंदोलन में इस पीढ़ी की भागीदारी
01 अगस्त 2026
खिड़की के सीखचों पर फड़फड़ाते हुए कबूतर आकर बैठते हैं और फिर उड़ जाते हैं। यह जोधपुर में अप्रैल-2019 की एक दुपहर है—इतनी गर्म कि पीठ में काँटे चुभ रहे हों जैसे। मेरा एक दोस्त मुझे शहर की पतली गलिय
31 जुलाई 2026
जीवन मुश्किल चीज़ है—तिस पर हिंदी-लेखक की ज़िंदगी—जिसके माथे पर रचना की राह चलकर शहीद हुए पुरखे लेखक की चिता की राख लगी हुई है। यों, आने वाले लेखक का मस्तक राख से साँवला है। पानी, पसीने या ख़ून से धुलकर
31 जुलाई 2026
फिर इलाहाबाद। तारीख़ें 22, 23, 24 और 25 फ़रवरी। चुनी हुई जगह—हिंदुस्तानी अकादेमी का सभागार, सन् 1981 वे अपनी बलिष्ठ भुजाओं पर बल्ले उभारते, मूँछें मरोरते, ताल ठोंकते, शक्ति-प्रदर्शन के तमाशबीनों क
जब कभी ईद आती है या ईद का ज़िक्र छिड़ता है, एक कहानी और उसके किरदार अपने-आप ज़ेहन में उतर आते हैं—प्रेमचंद की ‘ईदगाह’, हामिद और दादी अमीना। हामिद का चिमटा, उसकी क़ुर्बानी और दादी के प्रति उसका बेपनाह
30 जुलाई 2026
जीवन में कुछ चीज़ें अकल्पनीय ही नहीं, अनिश्चित भी हैं। जैसे अंतरिक्ष में आकाशगंगाएँ लगातार एक-दूसरे से दूर जा रही हैं, फिर भी हम ब्रह्मांड के विस्तार के बारे में सब कुछ ठीक-ठीक नहीं बता सकते। हम ज्वा
क्रिस्टोफ़र नोलन की ‘द ओडिसी’ की सनसनीख़ेज़ समीक्षाओं की होड़ में कश्मकश करने से पहले सबसे ज़रूरी है कि इस होड़ के पीछे की सोच की समीक्षा करना। आख़िर क्यों और कैसे लोक-कथाओं और पुराणों की समृद्ध संस्क
इसे कोई सामान्य लेख नहीं, बल्कि एक माफ़ीनामा समझिए। यह माफ़ीनामा मेरी ही नहीं, मेरी पूरी पीढ़ी की ओर से उस पीढ़ी के नाम है, जिसे आज हम ‘जेन-ज़ी’ [Gen Z] कहते हैं। इधर कुछ दिनों में इस पीढ़ी ने अपन
उसका संग छूटते ही मेरे चौखूँट एक अजब निस्संगता आकर बैठ जाती थी कि फिर कई घंटों तक किसी की भी मौजूदगी मुझे उकताऊ और नागवार लगती। उसके साथ कोई आशनाई न थी; मगर हो सकने का भारी इमकान था, अगर मैं अपनी सन्
हिन्दवी उत्सव 2026
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