साहित्य और संस्कृति की घड़ी
27 मार्च 2026
चश्म’त बियाफ़रीद ब: हर दम हज़ार चश्म, ज़ीरा ख़ुदा ज़ क़ुदरत-ए-ख़ुद कुदरत’श ब-दाद [तुम्हारी आँखों ने हर साँस के साथ हज़ारों आँखें पैदा कर दीं, क्योंकि ख़ुदा ने अपनी क़ुदरत (शक्ति) से तुम्हारी नज़र
इतिहास की कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें लोग उसी समय पहचान लेते हैं। वे स्पष्ट होती हैं और उनका असर तुरत दिखाई देने लगता है। लेकिन कला और संस्कृति की दुनिया में बदलाव अक्सर इस तरह सामने नहीं आते। कई
संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के अंतर्गत संचालित इंटरनेशनल थिएटर इंस्टीट्यूट (International Theatre Institute – ITI), पेरिस की कार्यकारी परिषद् प्रत्येक वर्ष किसी
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस ने साइबर अपराधों के लिए कई नए रास्ते खोल दिए हैं। ज़रा कल्पना कीजिए कि किसी पिता से उसकी बेटी की आवाज़ में कोई व्यक्ति पैसे माँगने लगे। आज की तकनीक की मदद से यह संभव हो गया है
मेरे बारे में मेरे साथियों की राय बहुत हास्यास्पद है। यात्राओं की योजना पर तो और भी ज़्यादा। मैं जब भी आगे बढ़कर योजना बनाता हूँ तो वे इसे गंभीरता से नहीं लेते, इसके बावजूद मैंने पंजाब यात्रा की योजन
गूगल के आने से दुनिया आसान हुई और तथ्यों की एक्सेसिबिलिटी बढ़ी। इस दौर में विजुअल नैरेटिव और पैडागॉजिकल टूल्स बहुत तेज़ी से बदल रहे हैं। दुनिया भर में कई सारी लाइब्रेरी और कॉलेजेस डिस्फ़ंक्शनल हो रहे
दुख आदमी के जिस्म में दाख़िल होता है और फिर कभी नहीं निकलता। कोई मौलवी बताए, कोई हकीम समझाए, कोई फ़लसफ़ेबाज़ अपनी मोटी किताब खोलकर साबित करे—मगर दुख जाता नहीं। वो बदलता है। रीढ़ की हड्डी के इर्द-गिर्
वह वरिष्ठ कवि हैं। कवि होने के बाद, वरिष्ठ होने के लिए कुछ ख़ास नहीं करना पड़ता। सिर्फ़ जीते रहना ही काफ़ी होता है। वैसे भी राजनीति की तरह ही साहित्य का उम्र बोध अलग है, जैसे साहित्य का सच अलग होता है
• “बताइए न बाबा कि साहित्य अकादेमी कैसा पुरस्कार है?” बाबा उस उम्र में थे कि किसी भी दिन साहित्य अकादेमी अवार्डी हो सकते थे। बशर्ते उस दिन साहित्य अकादेमी अवार्ड की घोषणा करने वाली प्रेस-कॉन्फ़्रे
मैंने साहित्य की किसी भी विधा में जब भी लिखा तब यह सोचकर नहीं लिखा कि मैं उक्त विधा की शर्तों को पूरा करने के लिए लिख रहा हूँ। …मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं कभी गद्य भी लिखना चाहूँगा और आज ऐसा