साहित्य और संस्कृति की घड़ी
23 सितम्बर 2026
मैं नाम्चे बाज़ार में हूँ... क्यों हूँ! यह बताने के मायने कुछ नहीं निकलेंगे। बस इतना ही कहना काफ़ी होगा कि मैं नाम्चे बाज़ार में हूँ... क्योंकि मुझे यहाँ होना होगा। ठीक वैसे ही जैसे ‘Yesterday’ फ़िल्म
22 सितम्बर 2026
केतकी कुशारी डायसन [26 जून 1940 –11 सितंबर 2026] चली गईं। प्रस्थान विधिनिर्धारित है। इसे स्वीकार करने के अतिरिक्त हमारे पास कोई दूसरा उपाय नहीं। लेकिन एक बंगाली के रूप में हमें केतकी कुशारी डायसन जैस
20 सितम्बर 2026
रील का क्या है! ‘हिन्दवी’ ने एक कॉलम घोषित किया था : ‘रीलमरील’। इसे जिन्हें लिखना था, वह लिख नहीं पाए। इसके बावजूद समय-समय पर इस कॉलम के अंतर्गत तीन लेख आए, जिनमें से एक मैंने भी लिखा। फिर यह कॉलम स्
19 सितम्बर 2026
चीज़ें पीतल फ़्रेम का पुराना आईना। लकड़ी की चरमराती कुर्सी। स्ट्राइप्ड कुशंस। रंग उड़ा हुआ फ़ारसी रग। हाथ से बुना मैक्रमे। दीवार पर टँगा पुराना नक़्शा। कुछ मोनोक्रोम फ़ोटोग्राफ़। कवि तादेऊष रूज़ेविच
विवादों, विनोदों, गर्वोक्तियों, सूक्तियों और सहकारिताओं से फ़ेसबुक ऊब चुका था। आम का टिकोरा वैशाख तक बीनने के बाद आलोचकों ने दीर्घ प्रवास ले लिया था और बक़ौल अष्टभुजा शुक्ल कविजन फिर से अमराई ढूँढ़ने म
अस्सी का दशक रस्सियों से बँधा हिलता हुआ एक पुल था। इसके एक छोर पर पीली टिमटिमाती हुई रोशनियाँ थीं और दूसरे छोर पर नीली डेनिम पहने हाथ में गिटार लिए कोई युवा। शुरुआत जर्जर और थकी हुई थी और अंत ओस की ब
“मेरी विद्या-बुद्धि कुछ भी नहीं थी। बहुत दरिद्रता में दिन कटे हैं। बीस रुपये के अभाव में मैं परीक्षा में बैठने तक से वंचित रह गया था। ऐसे दिन भी आए, जब भगवान् से प्रार्थना करता था—‘हे भगवान्, कुछ दिन
12 सितम्बर 2026
प्रस्थान कुछ बादल अधिक, कुछ धूल कम। सितंबर। कोई गली ठीक उसी छत पर नहीं रुकती। अकेली नमी कोई त्योहार नहीं है। घाणी है सुनहरी। बचने का संकेत कभी बताया नहीं जाता। सितंबर कोई ठहराव नहीं है। कीचड़ से
प्रस्थान-पूर्व नीचे लिखी बातों का उत्स यात्रा में है, लेकिन यह यात्रा-वृत्तांत नहीं है। यह न तो क्रमिक और तथ्यपूर्ण विवरण है, न शहर घूमने की कुंजी। इसे लेख की सीमा या मेरे द्वारा खींची हुयी सीमा स
• भादों-विहार भादों दूभर महीना माना गया है। सावन की झँकोर जवानी उसमें नहीं होती। भादों की बरखा से धरती के कोश भर जाते हैं। सावन में धरती गल जाती है; ताल भरने लगते हैं, धान जड़ पकड़ लेते हैं, उन