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बेला

साहित्य और संस्कृति की घड़ी

07 जून 2026

‘रविवासरीय 4.0 : एक हिंदी लेखक की ज़िंदगी’

‘रविवासरीय 4.0 : एक हिंदी लेखक की ज़िंदगी’

• एक हिंदी लेखक के जीवन की सुबह सूचनाओं से और रात उपन्यास से होती है। वह दुपहर से शाम तक ख़राब सिनेमा के असर में रहता है। इस असर में बाहर धूल और भीतर पन्ने उड़ते रहते हैं। यह उड़ान ही है कि महानगर जीवन क

06 जून 2026

शनिवारेर चिट्ठी : अनुवाद का सप्ताह

शनिवारेर चिट्ठी : अनुवाद का सप्ताह

मं., यह सप्ताह अनुवाद का सप्ताह था। अभी यह बात जब तुम्हें लिख रहा हूँ तो लगता है कि मैंने इस सप्ताह के बारे में सबसे कम महत्त्वपूर्ण बात पहले ही वाक्य में कह दी है। यह श्लील नहीं है। यह ग्लानि, बे

01 जून 2026

नवोदित रचनाकारों के लिए सलाह

नवोदित रचनाकारों के लिए सलाह

1. आपको जिस विषय पर लिखने की अपनी इच्छा हो, उसी पर लिखें। यह देखकर न लिखें कि फ़लाँ पत्रिका आजकल किस विषय पर लेख छाप रही है। केवल इसलिए किसी विषय को न पकड़ें कि वह ‘चलन’ में है। 2. कहानी लिखनी है

31 मई 2026

रविवासरीय 4.0 : कृष्णबलदेववैदविषयक

रविवासरीय 4.0 : कृष्णबलदेववैदविषयक

• नये काम करना मुश्किल नहीं, मुश्किल है पुराने काम नये ढंग से करना। • काम करने के लिए, काम न कर सकने वाली परिस्थितियाँ चाहिए। • रोना अकेले की चीज़ है। • वे जिनकी रचनाएँ ‘राजनीतिक’ नहीं, ऐसे अ

30 मई 2026

शनिवारेर चिट्ठी : अजाने देशों में

शनिवारेर चिट्ठी : अजाने देशों में

यात्रा-कल्पना-स्मृति तीन घंटे की एक बस-यात्रा किसी मनुष्य को क्या दे सकती है? वह कवि है तो अधैर्य। वह प्रेम में है तो प्रत्याशा। वह पुरानी होती स्त्री है तो पीठ की पीड़ा और वह ऊब रहा आदमी है तो...

29 मई 2026

जगह-जगह 2.0 : न मैं हिंदी शहर नगौरी

जगह-जगह 2.0 : न मैं हिंदी शहर नगौरी

भाषा-विज्ञान में व्युत्पत्ति-भ्रांति का अर्थ है कि किसी शब्द के प्राचीनतम अर्थ को ही उसका ‘सही’ अर्थ मानने पर ज़ोर दिया जाए और उसके वर्तमान इस्तेमाल को रद्द करके उसे उसके मूल प्रयोग, प्राचीन अर्थ और स

28 मई 2026

रागदर्पण : उस जादुई शाम के नाम

रागदर्पण : उस जादुई शाम के नाम

अपने हालिया सफ़र के बाद, मैं पूरे यक़ीन के साथ कह सकती हूँ कि मैंने अपने अब तक के जीवन की सबसे करामाती शाम को देखा है। बुलंद बर्फ़-पोश पहाड़ियों के पीछे पश्चिम में दहककर बुझता हुआ लाल अलाव। वह दृश्य मेरे

27 मई 2026

शंखनाद : मूर्खताएँ प्रेम में होने की अनन्य कसौटी हैं

शंखनाद : मूर्खताएँ प्रेम में होने की अनन्य कसौटी हैं

कभी-कभी मैं विधाता की मनुष्य के रूप में कल्पना करता हूँ तो लगता है कि विधाता भी कोई परम मसख़रा ही होगा और यह भी कि विधाता ने यह दुनिया सिर्फ़ मसख़री और खेल-खेल में ही बना दी है। और प्रेम? प्रेम

24 मई 2026

रविवासरीय 4.0 : दस सवालों के जवाब

रविवासरीय 4.0 : दस सवालों के जवाब

• इस तारीख़ पर अभी सवेरा नहीं उतरा है। पक्षियों के स्वर अभी दूर हैं। कुछ देर में दूर बीतेगा और वे चहचहाएँगे—अपने-अपने साथियों के साथ। इस प्रकार समूह में समूह के साथ न रहकर भी समूह के साथ होने की सचाई

23 मई 2026

शनिवारेर चिट्ठी : घर की जगह

शनिवारेर चिट्ठी : घर की जगह

डेरा मनुष्य अपने घर के बारे में सबसे कम तब सोचता है, जब वह अपने घर का निवासी होता है। तब घर की उपस्थिति इतनी स्वाभाविक होती है कि वह लगभग अदृश्य हो जाता है। बचपन में “हमारा अपना दो-मंज़िला घर है”