साहित्य और संस्कृति की घड़ी
यहाँ से आगे... पिछले दो दिनों के अनुभवों के बाद आज जागना कुछ अलग-सा था। दिमाग़ का एक हिस्सा काफ़ी ठोस महसूस हो रहा था, तो दूसरा कुछ पिघलता हुआ जान पड़ता था। सोचा, घर पर सबको बताकर जाऊँ कि क्या कर र
कभी-कभी अकारण ही कुछ लिखने के लिए मन बेचैन होने लगता है। मन में क्या चल रहा होता है, पता नहीं। बस लगता है कि उसे किसी तरह बाहर निकालना है। किसी न किसी रूप में लिखने की आदत रही है, इसलिए घर, परिवार, स
वे कहते हैं कि लेखक के जीवन और उसकी रचनात्मकता को अलग-अलग करके देखो। वे कहते हैं कि लेखक भी मनुष्य है, उसे उसकी मानवीय कमज़ोरियों के लिए माफ़ कर दो। मस्तिष्क इसे स्वीकार करने को कहता है, मगर एक पाठक का
कल्पना कीजिए कि आप 15वीं शताब्दी में जी रहे हों, साल हो 1453… वहाँ उस समय अभी कुस्तुन्तुनिया [Constantinople] में तुर्कों का क़ब्ज़ा हो गया हो, माने लगभग 1000 सालों बाद आज के इस्तांबुल में पूर्वी रोमन
हादसा और हदस में अंतर है, लेकिन केवल ‘आ’ की मात्रा का। जब हम कोई हादसा होते हुए देखते हैं तो ‘हदस’ जाते हैं। हम भोजपुरिया लोगों के यहाँ इसी शब्द का इस्तेमाल होता है। लेकिन तब क्या हो, जब आपके साथ ही
काशी हर दिन एक अप्रत्याशित अनुभव है। जैसे गत 23 अक्टूबर को 12 बजे दिन में हिंदी भवन का अनुभव! तीन सेवानिवृत्त शिक्षक दिखे एक झुंड के बीच। तीनों की पोशाक किसी महफ़िल के चीफ़ गेस्ट की तरह। अहा! देखत ब
03 नवम्बर 2026
दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के नॉर्थ कैंपस की लाल ईंटों वाली इमारतें, कला संकाय (Arts Faculty) की सीढ़ियाँ और पटेल चेस्ट की नुक्कड़ वाली चाय की टपरियाँ—बाहर से देखने पर यह पूरी दुनिया प्रगतिशीलता, क्रा
“तुम्हारा Review कर दिया है हाल ही में। इसके अलावा एक Manifesto भी खड़ा कर दिया है, Hungry Generation... बांग्ला में ‘क्षुत्कातर सम्प्रदाय’। हर तरह की भूख की बात कही गई है।” हंगरी जेनरेशन की शुरुआ
जब ख़लील और मैरी मिले, तब ख़लील इक्कीस वर्ष के थे—एक संघर्षरत युवा कलाकार। मैरी उनसे दस वर्ष बड़ी थीं और बोस्टन के एक प्रतिष्ठित बालिका विद्यालय की प्रधानाध्यापिका थीं। ख़लील ने उनसे विवाह का प्रस्ता