साहित्य और संस्कृति की घड़ी
बचपन का चाँद, स्मृतियों का चाँद और मनुष्य का पहला आकाश आज चाँद कुछ अधिक सुंदर लग रहा है। मैं बहुत देर से उसे निहार रही हूँ। ऐसा नहीं कि आज पहली बार उसे देखा हो। बचपन से लेकर आज तक न जाने कितनी बार
01 अक्तूबर 2026
धूप, हवा, पानी, ज़िंदगी इत्यादि—यह सब कुछ है तो है, इनकी एहमियत क्या है, इसका एहसास किसे है? हाँ, ये अपनी क़ीमत तब मालूम होने देंगी, जब ये नहीं होंगी। यह प्रकृति है। प्रकृति के नियम-क़ानून को इंसान स
मुझे प्रतीक्षा की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति ‘रजनीगंधा’ फ़िल्म में दिखती है, बासु चटर्जी इंतज़ार और दूरियों के बीच सिमटे छोटे-छोटे पलों को सहेजते चलते हैं। “रजनीगंधा फूल तुम्हारे...” गीत देखते हुए स्क्रीन
आज के कुछ रोज़ पूर्व बिहार के जमुई में घटी घटना और ऐसी तमाम वारदातों के परिणाम केवल तात्कालिक नहीं होते, उनके असर बेहद दूरगामी होते हैं। हमारे समाज की संकीर्ण मानसिकता को बदलने में दशकों का संघर्ष लगा
शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी (30 सितंबर 1935–25 दिसंबर 2020) आधुनिक उर्दू साहित्य के उन समादृत रचनाकारों में हैं जिन्होंने एक साथ आलोचक, इतिहासकार, कवि, कथाकार, उपन्यासकार, संपादक, अनुवादक और दास्तान के मर्
आज से क़रीब-क़रीब आठ बरस पहले जब साहित्य और अन्य किसी कला से मेरा शायद ही कोई नाता रहा हो, तो ऐसे में आजकल से ही किसी आम से दिन में मेरे मामा ने यूट्यूब पर एक वीडियो लगाया और कहा इसे देखो। वह वीडियो
29 सितम्बर 2026
सन् 1971, 5 अगस्त... भोर की रोशनी अभी पूरी तरह फूटी नहीं थी। वह रात और सुबह के बीच का एक धुँधला समय था। इस आधे अँधेरे में ही बंगाल के महानायक उत्तम कुमार सुबह की सैर कर रहे थे। यह उनकी रोज़ की आदत
भगवत् कृपा से, कुछ अपने करम और कुछ दूसरों की मेहरबानी से, जीवन में किसी और चीज़ की भले ही कमी हो, बदनाम होने और बेइज़्ज़त होने के मौक़ों की कोई कमी नहीं रही। मज़े की बात यह है कि अभी भी इसमें कोई कमी
मैं लाइब्रेरी में बैठी सामने लगे नोटिस बोर्ड को देख रही हूँ। बोर्ड के किनारे नारंगी रंग में रँगे चिनार के पत्तों से सजे हुए हैं। बाईं तरफ़ से एक डाल निकल रही है, जिसने बोर्ड को ऊपर की ओर से ढक रखा है
27 सितम्बर 2026
एक दोस्त के साथ फ़िल्म देख रहा था। हर महत्त्वपूर्ण दृश्य से पहले; आगे क्या होने वाला है, उसे पहले से पता था। जब ऐसा दो बार हो गया तो मैंने कहा कि जब फ़िल्म पहले से ही देख रखी है तो क्या ज़रूरत थी दुब