साहित्य और संस्कृति की घड़ी
01 नवम्बर 2026
प्रिय जामिया, कितनी पवित्र तारीख़ थी वह, जब हम पहली बार मिले थे। 6 जनवरी की शाम। उस शाम के एक-एक पल, एक-एक घटनाएँ मुझे याद हैं। तुम मुख़ातिब भी हो क़रीब भी हो तुम को देखें कि तुम से बात करें
गाँव-घर में कहा जाता है कि सपने में अपने किसी प्रियजन को मरा हुआ देखो, तो उसे यह बात मत बताओ। ऐसा करने से उसकी उम्र बढ़ती है और अगर बता दिया, तो उसकी उम्र घट जाती है। मैंने अपना वह सपना कभी आबै को नह
उन्वान एक छलावा है। छलावा इसलिए कि मुसन्निफ़ यदि शीर्षक की मुराद पूरी करके खिसक ले, तो लेखन मोनोटोनस जान पड़ता है। उस शेर की तरह, जो कहते-सुनते बखत तो सुंदर प्रतीत होता है, किंतु म'आनी-आफ़रीनी से अछू
प्रिय वियोगिनी ठाकुर जी, आपके लिखे ‘अश्लील स्थितियों में फँसना’ पढ़ते हुए कुछ बातें मन में आईं। लगा कि आपसे उन पर बात की जानी चाहिए। आपके लिखे प्रसंगों में अश्लीलता, स्त्री-देह, सामाजिक पूर्वाग्रह
30 अक्तूबर 2026
रात गहरी है, देर तक जगने वाली लड़कियाँ भी सो चुकी हैं। छात्रावास के गलियारों में निस्तब्धता है और ऊपर दिखते आकाश से निरभ्र शांति झर रही है, पर यह शांति मेरी सीनियर के अशांत मन को सहला नहीं पा रही है।
स्वस्ति श्री सर्वोपमायोग्य कल्पना शास्त्री जी, यहाँ से मनीष का राम-राम। चकित होऊ नका; मैं भी जानता हूँ कि चिट्ठी-पत्री की परंपरा तो अब बहुत पुरानी हो चुकी है। सो भी, मैं आपको चिट्ठी लिखने बैठ गया।
यहाँ से आगे... रात भर यही सोच कर नींद लगी कि कल नहीं जाऊँगी, जाना ठीक नहीं, क्या पता कल और ख़राब न बीते। सिर का दर्द अगर कल भी बना रहा तो अगले कई रोज़ तक यही डेरा लगा रहेगा इसका, ऑफ़िस अपना पढ़ना-
सरस, कैसी हो? आशा करता हूँ कि ठीक होगी। ये ख़त तुम्हारे जन्मदिन के लिए है। कुछ इच्छाएँ, यादें और हल्की-सी हिदायतें। हाँ, तुम्हें वो बिल्कुल भी पसंद नहीं, पर क्या करूँ? आदत से जो मजबूर ठहरा। हम भी
29 अक्तूबर 2026
आदरणीय कुलपति महोदय, सादर प्रणाम! आज जब आपकी झलक रील्स के माध्यम से देखने को मिली, तो बड़ा अचंभा हुआ। मुझे तो लग रहा था कि आप कहीं विदेश दौरे पर गए हैं! आज जब आप अपने हुजरे से निकले, तो लगा कि
जब कोई अपने अधिकारों के लिए लड़ता है, उसे बड़ी हिम्मत से काम लेना होता है; हो सकता है उसे बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़े, उस वक़्त जो हौसला बढ़ाता है और मंज़िल पाने में मदद करे, उस इंसान को कह