साहित्य और संस्कृति की घड़ी
समदरसी है नाम तिहारो, चाहो तो पार करो ठुमरी सुनी। ख़याल भी। इंदौर और देवास में स्टेज के सामने दरी पर बैठकर घंटों सुना और जी भर के देखा भी उन्हें। लेकिन इन आयोजनों के दीगर कभी पकड़ में नहीं आए। बहुत
न थका न रुका न हटा न झुका किसी फक्कड़ बाबा का मैं चेला हुआ हजारीप्रसाद द्विवेदी की उपर्युक्त काव्य-पंक्ति के प्रेरणा पुंजों में कबीर, बनारसीदास चतुर्वेदी आदि का नाम आता है, पर ‘एक युग : एक प्रतीक’
प्राथमिकताएँ न तय कर पाने का संकट जीवन में निरंतर बना रहा है। इससे जूझना मानव की नियति ही रही है। यूँ कहें कि मनुष्य की विवशता ही उसकी नियति है। इधर बीच का जीवन, जो आधा पक चुका है—उसे किस शीतगृह में
कुछ-एक रोज़ पहले एक लौंडे को फ़ेसबुक पर ज़बान के हवाले से एक तहरीर लिखकर लोगों को लताड़ते हुए देखा। जी बेचैन हो गया देखकर। सोचने लगा कि ऐसी फ़िक्र तो ज़बान की शायद उन्हें भी न हुई होगी जो संस्कृत के
पता नहीं, यह बात कहना कितनी तर्कसंगत होगा और इसमें कितनी ही बौद्धिक या साहित्यिक संभावना होगी कि यूरोप का वर्चस्ववाद बार-बार इस्लामिक एवं अफ़्रीकी संप्रभुता को सीमित करने की कोशिश करता है और हर दफ़ा ख
उर्दू के मशहूर कहानीकार राजेंद्र सिंह बेदी ने अपनी एक कहानी ‘सिर्फ़ एक सिगरेट’ में लिखा है कि दुनिया के हर बेटे के दिल में कहीं न कहीं यह ख़्वाहिश छुपी होती है कि उसका बाप मर जाए। बेदी ने जिस बाप का ज़
14 जुलाई 2026
गताध्याय से आगे... तीन यह रात बहुत काली रात थी। फिर एक बहुत से बहुत काली रात। ऐसी रातें क्यों आती हैं, जीवन में, समाज में, साहित्य में और साहित्य और समाज में उजाले के लिए ख़ून-पसीना बहाते रहने
कुछ साल पहले सर्दियों में मैंने विंध्यदेश के खंडरों में भटकने का सिलसिला शुरू किया था—किया क्या था, बस हो गया था। यह भटकने का सिलसिला किसी अवसाद से मुक्त होने की कामना के अधीन या किसी शौक़ को संतुष्ट
बचपन से बड़े होने के स्कूली क्रम में कुछ नौ-दस साल की उम्र में बाजी (दादी) के घर में ऐसे अनुभवों से भरी गर्मियों की न जाने कितनी दुपहरें आती थीं। पुराना घर था। आगे के हिस्से में चार कमरे और एक बरामदे
• कोई भी आंदोलन हर क़ीमत पर एक सामजिक-सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी है। इसमें बहुत से प्रशिक्षित या अनुभवी जन भी होते हैं और बहुत से नए-नए उत्साही जन भी। आंदोलन ब्रिटिश राज़ की ग़ुलामी से निकले एक देश के लिए