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बेला

साहित्य और संस्कृति की घड़ी

13 सितम्बर 2026

‘ज्ञानेंद्रपति से बातचीत : कुछ कहा, कुछ रह गया’

‘ज्ञानेंद्रपति से बातचीत : कुछ कहा, कुछ रह गया’

‘हिन्दवी’ के वार्षिक आयोजन ‘हिन्दवी उत्सव’ [23 अगस्त 2026] के लिए ज्ञानेंद्रपति जी को बनारस से लेकर मेरा इलाहाबाद जाना तय हुआ था। मेरी एक कविता पर हिंदी समय-समाज आंदोलित था और मैं भीतर से बेतरह भरा हु

12 सितम्बर 2026

80 के दशक के रेट्रो लुक से स्मृति और नॉस्टेल्जिया तक

80 के दशक के रेट्रो लुक से स्मृति और नॉस्टेल्जिया तक

यह बात मान लेनी चाहिए कि हम अपने अतीत से कितना स्नेह रखते हैं। हम वहाँ सुखद अनुभूति करते हैं, सुरक्षित महसूस करते हैं। अतीत हमारे वर्तमान की ख़ाली जगहों को भरता है। वह बार-बार याद आता है, बावजूद इसके

12 सितम्बर 2026

शनिवारेर चिट्ठी : दोष लगे सितंबर को!

शनिवारेर चिट्ठी : दोष लगे सितंबर को!

प्रस्थान  कुछ बादल अधिक, कुछ धूल कम। सितंबर। कोई गली ठीक उसी छत पर नहीं रुकती। अकेली नमी कोई त्योहार नहीं है। घाणी है सुनहरी। बचने का संकेत कभी बताया नहीं जाता। सितंबर कोई ठहराव नहीं है। कीचड़ से

11 सितम्बर 2026

जगह-जगह 2.0 : उत्तर-पूर्व दिशा नहीं है!

जगह-जगह 2.0 : उत्तर-पूर्व दिशा नहीं है!

प्रस्थान-पूर्व नीचे लिखी बातों का उत्स यात्रा में है, लेकिन यह यात्रा-वृत्तांत नहीं है। यह न तो क्रमिक और तथ्यपूर्ण विवरण है, न शहर घूमने की कुंजी। इसे लेख की सीमा या मेरे द्वारा खींची हुयी सीमा स

11 सितम्बर 2026

ममता कालिया के नाम एक छात्र का खुला ख़त

ममता कालिया के नाम एक छात्र का खुला ख़त

आदरणीय ममता कालिया जी, नमस्कार! “रात-रात नींद नहीं आती। दिन ऐसे बीतते हैं, जैसे भूतों के सपनों की एक रील पर दूसरी रील चढ़ा दी गई हो और भूतों की आकृतियाँ और डरावनी हो गई हों।” विद्यानिवास मिश

10 सितम्बर 2026

घाटों पर बदलता बनारस

घाटों पर बदलता बनारस

चइत की एक शाम अस्सी घाट पर चइत [चैत] चल रहा है। गुलमोहर में लाल-लाल फूल आ गए हैं। महुए रस से भर गए हैं। दिन-रात टप-टप-टप चू रहे हैं। आम के मंज़र अब टिकोरे में बदल गए हैं। गेहूँ की बालियाँ पक गई है

10 सितम्बर 2026

न्यूयॉर्क : जहाँ पूरी दुनिया एक शहर में सिमट आई है

न्यूयॉर्क : जहाँ पूरी दुनिया एक शहर में सिमट आई है

कुछ शहर देखे नहीं जाते, जिए जाते हैं। कुछ शहर ऐसे होते हैं जिन्हें देखने के बाद भी आप उन्हें पूरी तरह देख नहीं पाते, क्योंकि वे अपने दृश्य से कहीं अधिक अपने स्वभाव में बसे होते हैं। न्यूयॉर्क मेरे लि

09 सितम्बर 2026

माँ होने से पहले एक स्त्री

माँ होने से पहले एक स्त्री

घर से निकलकर अगर पेड़-पौधों पर नज़र दौड़ाई जाए तो क्या इनके इतिहास का पता लगाया जा सकता है? ये अचानक यहाँ आकर तो खड़े नहीं हुए। इनके जन्म, वृद्धि और विकास की भी अपनी कहानी है, जिसे स्पष्टतः कोई नहीं

09 सितम्बर 2026

‘रेत की मछली’ : यथार्थ का विकृत चेहरा

‘रेत की मछली’ : यथार्थ का विकृत चेहरा

कुछ दिनों पहले मलिका अमर शेख की आत्मकथा ‘मैं बर्बाद होना चाहती हूँ’ पढ़ी थी। उसमें मलिका ने अपने विवाहित जीवन की पीड़ा को बिना किसी लाग-लपेट के उघाड़कर रख दिया था। हाल ही में ‘रेत की मछली’ उपन्यास पढ

08 सितम्बर 2026

खोटी सीख देने वाले, गोली मारने वालों से भी अधिक बुरे होते हैं

खोटी सीख देने वाले, गोली मारने वालों से भी अधिक बुरे होते हैं

यह पत्र विजयदान देथा का चंद्रप्रकाश देवल (सी.पी. देवल) को लिखे एक सीख-रूपी पत्र का अनुवाद है। संयोग से सी.पी. देवल विजयदान देथा के जँवाई हैं। सो, इस पत्र में उनका ‘ससुर’ रूप भी सीख के बहाने बीच-बीच म