साहित्य और संस्कृति की घड़ी
07 नवम्बर 2026
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का परिसर है, नीले आसमान के कैनवास में ऊबे इम्प्रेशनिस्ट आर्टिस्ट द्वारा उल्टे स्ट्रोक में खींची कुछ लाल-पीली रेखाओं के तले हाथ पकड़ साथ चलते प्रेमी जोड़ियों के प्रेम से प्
इन दिनों रामलीलाएँ हो रही हैं। क्योंकि यह लीलाभूमि है, राष्ट्र के दो बड़े नायकों की लीलाभूमि। ब्रज और अवध जिनकी जन्मभूमि रही है। अतः बहुत स्वाभाविक है ‘रामलीला’ और ‘रास’ दोनों की, लोक और शास्त्र दोनो
यहाँ से आगे... पिछले दो दिनों के अनुभवों के बाद आज जागना कुछ अलग-सा था। दिमाग़ का एक हिस्सा काफ़ी ठोस महसूस हो रहा था, तो दूसरा कुछ पिघलता हुआ जान पड़ता था। सोचा, घर पर सबको बताकर जाऊँ कि क्या कर
तेरहवीं सदी में जब मंगोल हमलों ने मध्य एशिया के कई शहरों और सभ्यताओं को तबाही के कगार पर पहुँचा दिया था, जब बुख़ारा, समरकंद और बग़दाद जैसे शहरों पर क़हर बरपा था, तब दिल्ली उन चंद जगहों में से एक थी ज
वे कहते हैं कि लेखक के जीवन और उसकी रचनात्मकता को अलग-अलग करके देखो। वे कहते हैं कि लेखक भी मनुष्य है, उसे उसकी मानवीय कमज़ोरियों के लिए माफ़ कर दो। मस्तिष्क इसे स्वीकार करने को कहता है, मगर एक पाठक का
कभी-कभी अकारण ही कुछ लिखने के लिए मन बेचैन होने लगता है। मन में क्या चल रहा होता है, पता नहीं। बस लगता है कि उसे किसी तरह बाहर निकालना है। किसी न किसी रूप में लिखने की आदत रही है, इसलिए घर, परिवार, स
हादसा और हदस में अंतर है, लेकिन केवल ‘आ’ की मात्रा का। जब हम कोई हादसा होते हुए देखते हैं तो ‘हदस’ जाते हैं। हम भोजपुरिया लोगों के यहाँ इसी शब्द का इस्तेमाल होता है। लेकिन तब क्या हो, जब आपके साथ ही
कल्पना कीजिए कि आप 15वीं शताब्दी में जी रहे हों, साल हो 1453… वहाँ उस समय अभी कुस्तुन्तुनिया [Constantinople] में तुर्कों का क़ब्ज़ा हो गया हो, माने लगभग 1000 सालों बाद आज के इस्तांबुल में पूर्वी रोमन
काशी हर दिन एक अप्रत्याशित अनुभव है। जैसे गत 23 अक्टूबर को 12 बजे दिन में हिंदी भवन का अनुभव! तीन सेवानिवृत्त शिक्षक दिखे एक झुंड के बीच। तीनों की पोशाक किसी महफ़िल के चीफ़ गेस्ट की तरह। अहा! देखत ब