साहित्य और संस्कृति की घड़ी
03 अप्रैल 2026
बरसों पहले मैंने एक लेख लिखा था, लगभग इसी मामले में कुछ सोचा था कि रचनाकार की अनुभूति और जो जीवन वह जीता है और जो कुछ भी वह लिखता है या लिख पाता है उसमें कितना अंतर्विरोध होता है। किसी भी रचनाकार के
दुनिया के नायक जितना मनोरंजन करते हैं, उतने बड़े होते हैं। बाक़ी सब जो अस्ल में दुनिया बनाते हैं और इसमें रहते हैं—वे मज़दूर हैं और मज़दूरों की ज़िंदगी को भुला दिया जाता है। उनकी मौत को हम याद करते ह
02 अप्रैल 2026
जिस दौरान नवंबर बीत रहा था, उसी दौरान घर में एक नया जीवन उतर रहा था। मेरा मन हर घड़ी लगभग बैठा जाता था। लगभग घंटे दो घंटे बाद लगता—अब निकले प्राण कि तब निकले, लेकिन निकले अभी तक नहीं। अब यह कहने की को
02 अप्रैल 2026
22 नवंबर 2025, मुंबई एयरपोर्ट पर हूँ। सुबह का समय है। सूर्योदय देख रहा हूँ। सुबह का शीतल सूर्य। जीवन की आपाधापी में रोज़ एक दृश्य ऐसा दिखता है जो सुंदर है। हर किसी को अपने हिस्से का सौंदर्य मिल
01 अप्रैल 2026
हिंदी साहित्य जगत में हाल ही में प्रकाशित हिंदी उपन्यास ‘फाँसी’ काफ़ी चर्चा में रहा है। इस उपन्यास की एक ख़ास बात यह है कि इसे दो उपन्यासकारों—उद्भ्रांत और शैलेश पंडित ने संयुक्त रूप से लिखा है। ऐसा
31 मार्च 2026
जश्न के बाद का सन्नाटा बहुत खलता है... वाऽऽह! किसका है? आपका?... ‘अरे महाराज, आप भी!’ ‘कितना मशहूर है...!!!’ चढ़ते दिन के साथ पछुआ का बढ़ता आवेग, झड़ते पत्ते, झूमते पेड़, डोलती पत्तिया
31 मार्च 2026
हिन्दवी कैंपस कविता—‘हिन्दवी’ का एक विशेष आयोजन है। इस आयोजन के माध्यम से देश के विभिन्न शैक्षिक संस्थानों के साथ मिलकर वहाँ के छात्रों को साहित्य-सृजन के लिए प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जाता है।
यौवन भोगते वसंत के बीच जब बोगनवेलिया के फूलों का रंग गाढ़ा हो रहा था और अलसायी हवा धूप के तीखेपन को सरकाकर लास्य बिखराने की कोशिश में थी—जब 29 मार्च को दोपहर दो बजे से शुरू हुई ‘अर्थात्’ की चौथी गोष्
ये वे दिन थे जब अँधेरा आकर हमारे आँगन के बीचोबीच बैठ जाता था और हम पाँचों भाई-बहन काँपते हुए संध्या-तारे से धूप की कहानियाँ माँगने लगते थे। लाल बिंदी लगाए हुए दादी एक-एक कर हर कमरे में रोशनी दिखातीं
• ‘महर्षि’ पूर्व में अपने कार्यालय को महर्षि-आवास कहते थे। इधर वह कुछ रोज़ से उसे ‘सेवा तीर्थ’ कहने लगे हैं। महर्षि को नाम बदलने की व्याधि है। पर नाम अगर बदल दिया जाए तब भी युगों तक बदले हुए नाम क