साहित्य और संस्कृति की घड़ी
01 अप्रैल 2026
हिंदी साहित्य जगत में हाल ही में प्रकाशित हिंदी उपन्यास ‘फाँसी’ काफ़ी चर्चा में रहा है। इस उपन्यास की एक ख़ास बात यह है कि इसे दो उपन्यासकारों—उद्भ्रांत और शैलेश पंडित ने संयुक्त रूप से लिखा है। ऐसा न
31 मार्च 2026
जश्न के बाद का सन्नाटा बहुत खलता है... वाऽऽह! किसका है? आपका?... ‘अरे महाराज, आप भी!’ ‘कितना मशहूर है...!!!’ चढ़ते दिन के साथ पछुआ का बढ़ता आवेग, झड़ते पत्ते, झूमते पेड़, डोलती पत्तिया
31 मार्च 2026
हिन्दवी कैंपस कविता—‘हिन्दवी’ का एक विशेष आयोजन है। इस आयोजन के माध्यम से देश के विभिन्न शैक्षिक संस्थानों के साथ मिलकर वहाँ के छात्रों को साहित्य-सृजन के लिए प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जाता है।
यौवन भोगते वसंत के बीच जब बोगनवेलिया के फूलों का रंग गाढ़ा हो रहा था और अलसायी हवा धूप के तीखेपन को सरकाकर लास्य बिखराने की कोशिश में थी—जब 29 मार्च को दोपहर दो बजे से शुरू हुई ‘अर्थात्’ की चौथी गोष्
ये वे दिन थे जब अँधेरा आकर हमारे आँगन के बीचोबीच बैठ जाता था और हम पाँचों भाई-बहन काँपते हुए संध्या-तारे से धूप की कहानियाँ माँगने लगते थे। लाल बिंदी लगाए हुए दादी एक-एक कर हर कमरे में रोशनी दिखातीं
• ‘महर्षि’ पूर्व में अपने कार्यालय को महर्षि-आवास कहते थे। इधर वह कुछ रोज़ से उसे ‘सेवा तीर्थ’ कहने लगे हैं। महर्षि को नाम बदलने की व्याधि है। पर नाम अगर बदल दिया जाए तब भी युगों तक बदले हुए नाम क
हिंदी साहित्य की दुनिया में स्त्री-स्वर हमेशा से मौजूद रहा है, बस उसे पहचानने और सुनने की दृष्टि समय-समय पर बदलती रही है। इतिहास के लंबे गलियारों में स्त्रियों की रचनात्मकता अक्सर घर की चौखट, स्मृतिय
संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के अंतर्गत संचालित इंटरनेशनल थिएटर इंस्टीट्यूट (International Theatre Institute – ITI), पेरिस की कार्यकारी परिषद् प्रत्येक वर्ष किसी
इतिहास की कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें लोग उसी समय पहचान लेते हैं। वे स्पष्ट होती हैं और उनका असर तुरत दिखाई देने लगता है। लेकिन कला और संस्कृति की दुनिया में बदलाव अक्सर इस तरह सामने नहीं आते। कई
27 मार्च 2026
चश्म’त बियाफ़रीद ब: हर दम हज़ार चश्म, ज़ीरा ख़ुदा ज़ क़ुदरत-ए-ख़ुद कुदरत’श ब-दाद [तुम्हारी आँखों ने हर साँस के साथ हज़ारों आँखें पैदा कर दीं, क्योंकि ख़ुदा ने अपनी क़ुदरत (शक्ति) से तुम्हारी नज़