साहित्य और संस्कृति की घड़ी
19 सितम्बर 2026
चीज़ें पीतल फ़्रेम का पुराना आईना। लकड़ी की चरमराती कुर्सी। स्ट्राइप्ड कुशंस। रंग उड़ा हुआ फ़ारसी रग। हाथ से बुना मैक्रमे। दीवार पर टँगा पुराना नक़्शा। कुछ मोनोक्रोम फ़ोटोग्राफ़। कवि तादेऊष रूज़ेविच
पेपर ख़त्म होने के बाद मैं और मेरा दोस्त अपने हॉस्टल की ओर बढ़ रहे थे। पेपर के लिए जाते वक़्त सब कुछ अपनी व्यवस्थित स्थिति में क्रम से चल रहा था। लेकिन यह क्या, इतनी अफ़रा-तफ़री क्यों? लोग भाग-दौड़ क
“फूल क्यों तोड़ रही हो?” पीछे से आई गार्डनर की कड़क आवाज़ पर हव्वा सकपका गई... “मालकिन रोज़ तुड़वाती है” कह ज़ब्ह के लिए तैयार मेमने सी तेज़-तेज पलकें झपकाने लगी। भ्रांति में पड़कर वह हमेशा ऐसा
विवादों, विनोदों, गर्वोक्तियों, सूक्तियों और सहकारिताओं से फ़ेसबुक ऊब चुका था। आम का टिकोरा वैशाख तक बीनने के बाद आलोचकों ने दीर्घ प्रवास ले लिया था और बक़ौल अष्टभुजा शुक्ल कविजन फिर से अमराई ढूँढ़ने म
उत्तराखंड के दूरस्थ पहाड़ों में रहने वाली महिलाओं के मौन संघर्ष, अकेलेपन और साहस की कहानी कहती स्वतंत्र फ़िल्म ‘डॉटर ऑफ़ द माउंटेन्स’ (Daughter of the Mountains) को ‘इंडियन इंडिपेंडेंट फ़िल्म फ़ेस्टि
दिनांक : 18 सितंबर 2026 प्रतिष्ठा में, ‘जेन-ज़ी का तोता’ के लेखक श्री आनंद हर्षुल, यह पत्र इस आग्रह के साथ शुरू कर रहा हूँ कि आप मेरे संबोधन को स्वयं को एक कहानी विशेष के लेखक में परिसीमित करने
अस्सी का दशक रस्सियों से बँधा हिलता हुआ एक पुल था। इसके एक छोर पर पीली टिमटिमाती हुई रोशनियाँ थीं और दूसरे छोर पर नीली डेनिम पहने हाथ में गिटार लिए कोई युवा। शुरुआत जर्जर और थकी हुई थी और अंत ओस की ब
मेरे देश का नाम है—घरघराहट! मेरा प्यारू देश है दुनिया का सबसे न्यारू देश और मेरे देश से बाहर जो भी हैं वे सब साले हैं झरझरालू देश। मेरा अपना पर्सनल नाम सुकुमार समस्या कुमार है। मेरे पैदा होने के ब
चाईं उर्फ निशू भाई के पास कमाल का गुण था—वह सड़क पर चलती, खड़ी, इठलाती, इतराती, मुस्काती लड़की को देखकर बता देता था, ‘यह गश्ती है, चल भाई लपक लिया जाए...’ अपने जादुई अनुमान पर वह कभी फ़ेल नहीं हुआ
सर पानी में डूबता है, गोली सिर के पीछे से माथे को चीरती हुई निकलती है, पूरा का पूरा पानी सुर्ख़ लाल हो जाता है और इसी कलात्मकता के साथ फ़िल्म सबसे पहले अपने नाम से आपको रूबरू करवाती है। एक पारंपरिक भ