साहित्य और संस्कृति की घड़ी
हर महीने किसी न किसी उत्सव के रंग में रँगी हमारी इस संस्कृति में अनगिनत पर्व हैं, पर उन सबमें मुझे सबसे अधिक प्रिय है—दीपावली। कारण अत्यंत सहज है, यह प्रकाश का पर्व है। अमावस की घनी स्याह रात को धता ब
07 नवम्बर 2026
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का परिसर है, नीले आसमान के कैनवास में ऊबे इम्प्रेशनिस्ट आर्टिस्ट द्वारा उल्टे स्ट्रोक में खींची कुछ लाल-पीली रेखाओं के तले हाथ पकड़ साथ चलते प्रेमी जोड़ियों के प्रेम से प
यहाँ से आगे... पिछले दो दिनों के अनुभवों के बाद आज जागना कुछ अलग-सा था। दिमाग़ का एक हिस्सा काफ़ी ठोस महसूस हो रहा था, तो दूसरा कुछ पिघलता हुआ जान पड़ता था। सोचा, घर पर सबको बताकर जाऊँ कि क्या कर
तेरहवीं सदी में जब मंगोल हमलों ने मध्य एशिया के कई शहरों और सभ्यताओं को तबाही के कगार पर पहुँचा दिया था, जब बुख़ारा, समरकंद और बग़दाद जैसे शहरों पर क़हर बरपा था, तब दिल्ली उन चंद जगहों में से एक थी ज
इन दिनों रामलीलाएँ हो रही हैं। क्योंकि यह लीलाभूमि है, राष्ट्र के दो बड़े नायकों की लीलाभूमि। ब्रज और अवध जिनकी जन्मभूमि रही है। अतः बहुत स्वाभाविक है ‘रामलीला’ और ‘रास’ दोनों की, लोक और शास्त्र दोनो
कभी-कभी अकारण ही कुछ लिखने के लिए मन बेचैन होने लगता है। मन में क्या चल रहा होता है, पता नहीं। बस लगता है कि उसे किसी तरह बाहर निकालना है। किसी न किसी रूप में लिखने की आदत रही है, इसलिए घर, परिवार, स
हादसा और हदस में अंतर है, लेकिन केवल ‘आ’ की मात्रा का। जब हम कोई हादसा होते हुए देखते हैं तो ‘हदस’ जाते हैं। हम भोजपुरिया लोगों के यहाँ इसी शब्द का इस्तेमाल होता है। लेकिन तब क्या हो, जब आपके साथ ही
03 नवम्बर 2026
दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के नॉर्थ कैंपस की लाल ईंटों वाली इमारतें, कला संकाय (Arts Faculty) की सीढ़ियाँ और पटेल चेस्ट की नुक्कड़ वाली चाय की टपरियाँ—बाहर से देखने पर यह पूरी दुनिया प्रगतिशीलता, क्रा
जब ख़लील और मैरी मिले, तब ख़लील इक्कीस वर्ष के थे—एक संघर्षरत युवा कलाकार। मैरी उनसे दस वर्ष बड़ी थीं और बोस्टन के एक प्रतिष्ठित बालिका विद्यालय की प्रधानाध्यापिका थीं। ख़लील ने उनसे विवाह का प्रस्ता