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बेला

साहित्य और संस्कृति की घड़ी

06 जनवरी 2026

‘कहानी : पिस्तौल’

‘कहानी : पिस्तौल’

और इस तरह पिस्तौल का मेरे जीवन में पदार्पण हुआ... लगा कि आँगन के उस सिरे से धड़ाम से कोई कूदा। देखा तो अपना नरेन था। यानी अपना नरेंद्र यानी नरेनिया। मेरा ‘जिगरी दोस्त’! उन दिनों जब भी कोई उसे मेरा ज

05 जनवरी 2026

शंखनाद : बुक फ़ेयर के लिए मुखौटे...

शंखनाद : बुक फ़ेयर के लिए मुखौटे...

जनवरी में होने वाली बुक फ़ेयर की आहट के बीच कई-कई यूनीसेक्स सैलूनों, ब्यूटीपार्लरों और स्पाओं में बुक फ़ेयर के लिए स्पेशल ऑफ़र देख, पढ़ और सुनकर चकित रह गया। साथ ही अपने मानसिक पिछड़ेपन पर रोना आया।

04 जनवरी 2026

स्त्री और माँ

स्त्री और माँ

प्रस्तुत लेख ‘हिन्दवी’ पर प्रकाशित ‘बेला’—‘सदी की आख़िरी माँएँ’, प्रणव मिश्र तेजस के लेख की प्रतिक्रिया में लिखा गया है। ‘सदी की आख़िरी माँएँ’ (मूल लेख) प्रथम—23 नवंबर को ‘हिन्दवी’ पर प्रकाशित हुआ। इसे

02 जनवरी 2026

सुधांशु फ़िरदौस से दस सवाल : जीवन एक घर है, जिसमें बेघर हूँ मैं

सुधांशु फ़िरदौस से दस सवाल : जीवन एक घर है, जिसमें बेघर हूँ मैं

सुधांशु फ़िरदौस (जन्म : 1985) इस सदी में सामने आई हिंदी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। वर्ष 2020 में उनकी कविताओं की पहली किताब ‘अधूरे स्वाँगों के दरमियान’ शीर्षक से प्रकाशित हुई। इस पुस्तक के लिए उन

31 दिसम्बर 2025

...फिर इस साल का आख़िरी ख़त

...फिर इस साल का आख़िरी ख़त

एमजे, परंपराएँ कवियों को कहीं का नहीं छोड़तीं। ऐसे ही दिनचर्या की आदत। यह चाहते हुए भी कि किसी तरह की आदत बुरी न बने, कई नशे आदमी ज़िंदगी में ओढ़ लेता है। एक बहुत भारी साल के तमाम होते-होते, जिस इ

23 दिसम्बर 2025

कहानी : दाहिना हाथ

कहानी : दाहिना हाथ

फ़रवरी का महीना बीते कुछ ही दिन हुए। अभी ठंड मौसम से गई नहीं। रात के अँधेरे में मोहल्ले के घरों की बत्तियाँ बूझा दी गईं। सभी अपने घरों में सोने जा चुके होंगे। ऐसे में भौ-भौ की आवाज़ होते ही शहबाज़ कम

22 दिसम्बर 2025

शहर नक़्शे से नहीं, यात्राओं से पहचाने जाते हैं

शहर नक़्शे से नहीं, यात्राओं से पहचाने जाते हैं

जाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा था। घर में ही एक कोना दे दिया गया, जैसे किसी मुट्ठीभर उम्मीद को दरकिनार कर दिया गया हो। सोफ़ा बिस्तर बन गया, जो कमरा कभी साझा हँसी और कहानियों से भरा होता था, वह अब

21 दिसम्बर 2025

कहानी : नदी का विद्रोह

कहानी : नदी का विद्रोह

चार पैंतालीस की पैसेंजर ट्रेन रवाना कर नदेरचाँद ने नए सहकारी को बुलाकर कहा—मैं चला जी!  नए सहकारी ने एक बार मेघ से ढँके आसमान की ओर देखा और बोला—हाँ-हाँ। नदेरचाँद बोले—अब और बारिश नहीं होगी, क्

20 दिसम्बर 2025

बालमुकुंद गुप्त के भूले-बिसरे साहित्यिक घराने की ओर

बालमुकुंद गुप्त के भूले-बिसरे साहित्यिक घराने की ओर

कल रात बारिश और आँधी आई थी तो मौसम ने भी प्रतिदिन की आदत को छोड़ते हुए हम पर रहम किया और सूर्य देवता काफ़ी देर तक ग़ायब ही रहे तथा बादलों ने ख़ुद को ढाल बनाकर हमें शीतलता प्रदान की। महेंद्रगढ़, ऐसी ज

19 दिसम्बर 2025

चार नाम, एक इंक़लाब

चार नाम, एक इंक़लाब

रेल की पटरियाँ दूर तक फैली थीं। प्लेटफ़ॉर्म की उखड़ी हुई खपरैल समय की मार झेलती हुई-सी लगती थीं। आज से ठीक सौ साल पहले लखनऊ के ऐसे ही स्टेशन पर आठ-डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन पर क्रांतिकारियों क