साहित्य और संस्कृति की घड़ी
सुधांशु फ़िरदौस (जन्म : 1985) इस सदी में सामने आई हिंदी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। वर्ष 2020 में उनकी कविताओं की पहली किताब ‘अधूरे स्वाँगों के दरमियान’ शीर्षक से प्रकाशित हुई। इस पुस्तक के लिए उन्
एमजे, परंपराएँ कवियों को कहीं का नहीं छोड़तीं। ऐसे ही दिनचर्या की आदत। यह चाहते हुए भी कि किसी तरह की आदत बुरी न बने, कई नशे आदमी ज़िंदगी में ओढ़ लेता है। एक बहुत भारी साल के तमाम होते-होते, जिस इ
फ़रवरी का महीना बीते कुछ ही दिन हुए। अभी ठंड मौसम से गई नहीं। रात के अँधेरे में मोहल्ले के घरों की बत्तियाँ बूझा दी गईं। सभी अपने घरों में सोने जा चुके होंगे। ऐसे में भौ-भौ की आवाज़ होते ही शहबाज़ कम
जाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा था। घर में ही एक कोना दे दिया गया, जैसे किसी मुट्ठीभर उम्मीद को दरकिनार कर दिया गया हो। सोफ़ा बिस्तर बन गया, जो कमरा कभी साझा हँसी और कहानियों से भरा होता था, वह अब
चार पैंतालीस की पैसेंजर ट्रेन रवाना कर नदेरचाँद ने नए सहकारी को बुलाकर कहा—मैं चला जी! नए सहकारी ने एक बार मेघ से ढँके आसमान की ओर देखा और बोला—हाँ-हाँ। नदेरचाँद बोले—अब और बारिश नहीं होगी, क्
कल रात बारिश और आँधी आई थी तो मौसम ने भी प्रतिदिन की आदत को छोड़ते हुए हम पर रहम किया और सूर्य देवता काफ़ी देर तक ग़ायब ही रहे तथा बादलों ने ख़ुद को ढाल बनाकर हमें शीतलता प्रदान की। महेंद्रगढ़, ऐसी ज
रेल की पटरियाँ दूर तक फैली थीं। प्लेटफ़ॉर्म की उखड़ी हुई खपरैल समय की मार झेलती हुई-सी लगती थीं। आज से ठीक सौ साल पहले लखनऊ के ऐसे ही स्टेशन पर आठ-डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन पर क्रांतिकारियों क
बहुत याद करने पर भी और बहुत मूड़ मारने पर भी पिछले दिनों ठीक-ठीक यह याद नहीं आया कि उस दिन हमारे घर में कौन-सा आयोजन था। हाँ, यह ख़ूब याद है कि उसी बरस किसी महीने दादी मरी थीं; पर यह याद नहीं आता कि वह
हिंदी साहित्य में भाभी जिस रूप में उतरी है, उसमें सत्य से अधिक सुहावनापन है। आज भी पुरुष की बहुपत्नीक और स्त्री की बहुपति प्रवृत्तियाँ, जो तहज़ीब के नीचे से अब भी रिसती रहती हैं और साहित्यदानों में द
रात्रि की भयावहता में ही रात्रि का सौंदर्य है 25 मार्च 2020 पूर्व दिशा की ओर से खेरों की झाड़ियों में से उठती निशाचर उल्लुओं की किलबिलाहट से नींद खुल गई। यूँ तंद्रा का टूटना अनायास ही अकुलाहट क