साहित्य और संस्कृति की घड़ी
क्रिस्टोफ़र नोलन की ‘द ओडिसी’ की सनसनीख़ेज़ समीक्षाओं की होड़ में कश्मकश करने से पहले सबसे ज़रूरी है कि इस होड़ के पीछे की सोच की समीक्षा करना। आख़िर क्यों और कैसे लोक-कथाओं और पुराणों की समृद्ध संस्कृ
30 जुलाई 2026
जीवन में कुछ चीज़ें अकल्पनीय ही नहीं, अनिश्चित भी हैं। जैसे अंतरिक्ष में आकाशगंगाएँ लगातार एक-दूसरे से दूर जा रही हैं, फिर भी हम ब्रह्मांड के विस्तार के बारे में सब कुछ ठीक-ठीक नहीं बता सकते। हम ज्वा
एक राजा और महानायक होते हुए भी ओडिसस की ज़िंदगी कोई जश्न नहीं है, बल्कि एक लंबा इंतज़ार, एक बेबसी और ज़िंदगी के आख़िर में पसरा हुआ एक अंतहीन सन्नाटा है। यह एक ऐसे दुख की किरच के साथ घर लौटने की कहानी
कुछ फ़िल्में शहीद होने के लिए ही बनती हैं। इस तरह देखें तो ‘सतलुज’ भी एक शहीद फ़िल्म है। यह फ़िल्म जब वर्ष 2023 में रिलीज़ के लिए तैयार हुई, तभी से विवादों में घिर गई। इस फ़िल्म का पहला शीर्षक ‘ग़ल्लू
तीन साल की लंबी क़ानूनी और सेंसर संबंधी लड़ाई के बाद रिलीज़ हुई फिल्म ‘सतलुज’ मात्र दो दिन के भीतर ही भारत में ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ZEE 5 से हटा दी गई। अब यह फ़िल्म भारत में उपलब्ध नहीं है। सरकार ने इसे स
“हिंसा को केवल झूठ के द्वारा छिपाया जा सकता है और झूठ को केवल हिंसा के द्वारा ही क़ायम रखा जा सकता है।” — लेव तोल्स्तोय हनी त्रेहन निर्देशित फ़िल्म ‘सतलुज’ [पहले ‘पंजाब 95’] लंबे संघर्ष के बाद
मणि कौल की फ़िल्म ‘बादल द्वार’ उन क्लासिक अप्रतिम फ़िल्मों में से है, जिसे हिंदी सिनेमा के दायरे से बाहर भी अतीव प्रशंसा मिली। पश्चिम जगत में सराहा जाना कोई उत्कृष्ट कृति का पैमाना नहीं है। मगर ‘बादल
डायनासोर के जाने के बाद, इस नीले ग्रह पर लगभग सब कुछ नए सिरे से हुआ। स्तनधारियों के विकास का रास्ता साफ़ हुआ। क्रमिक विकास (evolution) चलता रहा। लाखों वर्ष पूर्व होमो-सेपियंस आए। दो सौ साल पहले उनमें
दो गिलहरियाँ इमारत के कोने पर आकर मिलती हैं। एक कहीं से मूँगफली ले आई है, दूसरी हाथ बढ़ाकर उसे ले लेना चाहती है। अचानक बम का धमाका होता है और इमारत ढह जाती है। सब मलबे के हवाले। इस इतनी बड़ी दुनिया म
हम जब आज से लगभग एक दशक पूर्व कोरिया के बारे में सोचते थे, तो शायद अधिकांश लोगों के लिए उसका उत्तर अज्ञात ही रहता था। जिनकी समझ या रुचि थोड़ी अधिक विकसित थी, उनके मन में शायद किम जोंग उन का नाम आता र