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कथा : फ़ैंसी पैकेजिंग के युग में नैतिकता अक़्ल दाढ़ है

यह इमला और सुलेख लेखन का दौर था। इंद्रियों को चौकन्ना रखने और हिंदी को ख़ूबसूरत तरीक़े से बरतने पर ज़ोर रहता था। खुरदुरे काग़ज़ वाले कितने रफ़ रजिस्टर भरे गए, गिनती ही नहीं। ‘समझ ही नहीं आ रहा क्या बोला’ से लेकर ‘सर जी, एक बार दोहराएँगे क्या’ के बीच मासूम जद्दोजहद। बचपन अपनी पूरी शै में स्कूल में बैठा था।

कभी-कभी आप ठीक-ठीक अंदाज़ा नहीं लगा पाते कि कोई चीज़ आपके जीवन में कब प्रवेश हुई। जैसे : ऊपर ख़ुशबूदार रबर लगी पेंसिल, ‘सैनिक’ वाला जामिट्री बॉक्स और कछुआ-ख़रगोश की कालजयी कहानी है।

इसी कहानी की सुलेख से भरे रफ़ रजिस्टर दीवाली की सफ़ाई में रद्दी वाला ले गया। लेकिन जो पीछे छूट गया, जो साथ रह गया, उसमें है कछुए की जीत। बाद में यही जीत बड़ी होकर- ‘Slow & steady wins the race’ में तब्दील हो गई। सई परांजपे की साल 1982 में आई फ़िल्म ‘कथा’ इसी ‘मोरल ऑफ़ दी स्टोरी’ पर करारा तमाचा है।

सिनेमा की बदौलत नॉन-मुंबईकर के लिए यह शहर लंबी खिंची मरीन ड्राइव, आर्द्रता और सैकड़ों चॉल का समुच्चय है। ‘क्राइम पेट्रोल’ के कितने क़ातिल चॉल में रहते मिलते हैं। किसी सफल अभिनेता के पॉडकास्ट में चॉल का जीवन संघर्ष के दिनों का पर्यायवाची है। लेकिन जो चॉल ‘कथा’ में दिखती है, वह अलग है। वह ख़ुश है। वह एक संयुक्त परिवार है। फ़िल्म का एक किरदार भी है।

इसी चॉल में रहते हैं राजाराम (नसीरुद्दीन शाह)। राजाराम फ़िल्म का कछुआ है। आदर्श जीवन। जूता बनाने वाली कंपनी में ईमानदार नौकरी। किसी की किसी भी तरह की मदद के लिए पंक्ति में सबसे आगे। हँसमुख, भोले और सबके पसंदीदा। कछुआ अगर अकेला रहे तो ऊबता है, ऊँघता है, चलता रहता है। लेकिन कहानी में ख़रगोश की एंट्री होते ही उस पर एक अदृश्य प्रेशर हो जाता है। और इस कहानी का ख़रगोश है बाशू (फ़ारूक शेख)। बाशू यानी राजाराम का दोस्त। चॉल का मेहमान। लफ़्फ़ाज़। हवाबाज़। जिस चीज़ पर हाथ रखता है, वह उसकी हो जाती है। चाहे वह राजाराम की धुली और इस्त्री की हुई शर्ट हो, उसकी ही कंपनी में ऊँची पोस्ट पर नौकरी हो, अलमारी में रखे 300 रूपए हों या फिर पसंदीदा स्त्री संध्या (दीप्ति नवल)।

परांजपे ने 1982 में ही बता दिया था कि बदलावजीवियों की इस दुनिया में ‘फ़ैंसी पैकेजिंग’ कितनी ज़रूरी है। भरी गर्मी में आदमी अगर थ्री पीस सूट पहन के निकल जाए तो 3 बंदे क्यों नहीं जुड़ेंगे। रुकी हुई ‘कृपा’ को बहाल करने के लिए रिकॉर्डेड समागम में ‘निर्मल आदेशानुसार’ आदमी चटनी को समोसे के साथ क्यों नहीं खाएगा। ‘कथा’ चाँदी का वर्क चढ़ी सोन पापड़ी और शुद्ध खोए की एवरेज-लुकिंग बर्फ़ी के बीच अंतर का सिनेमैटिक पर्यायवाची है। जब तक मौक़ा खाने का नहीं आता, लोग धोखे में ही ख़ुश रहते हैं।

चॉल में बाशू का आगमन ‘माहौल हाइजैकिंग’ है। यह हक़दार से कुछ छीन लेने जैसी झुंझलाहट देकर जाता है। अंतिम पड़ाव पर आते-आते जीत, सांत्वना पुरस्कार लगने लगती है। परांजपे ने फ़िल्म देखने वाले हर दर्शक को यह प्रश्न उपहार में दिया है।

फ़िल्म का मेरा एक पसंदीदा सीक्वेंस है : चॉल का वार्षिक उत्सव होना। सबकी राय ली जाती है कि क्या सांस्कृतिक कार्यक्रम करने चाहिए। बड़े जतन के बाद राजाराम अपनी बात कह पाते हैं। ख़्वाहिश यही कि विजय तेंदुलकर का हिंदी में अनूदित ‘पंछी ऐसे आते हैं’ नाटक खेला जाए। राजाराम ख़ूब तैयारी करते हैं। गुड़हल के फूलों की सोहबत में संवादों का रियाज़ करते हैं। शब्दों को महसूस करते हैं। इंडायरेक्टली संध्या से मोहब्बत का इज़हार करते हैं। संध्या को ध्यान में रखकर जीवन का सपना देखते हैं… लेकिन नाटक खेला तो जाता है पर संध्या के साथ मुख्य भूमिका निभाता है बाशू। यह किसी की मैनिफ़ेस्टेशन को जड़ सहित उखाड़ फेंकने जैसा लगता है। मिट्टी ऐसे मसली जाती है कि इच्छा के दूब तक न उग पाएँ।

फ़िल्म में कई अतरंगी प्रयोग भी हैं, जहाँ आपको लगेगा कि क्या वाक़ई इनकी ज़रूरत थी। जैसे ‘राजाराम का दुःस्वप्न’। कई महिलाएँ उसके पीछे पड़ी हैं, ज़ेब्रा की धारियाँ वाले कपड़े पहने हैं और बुली और टीज़ करने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन परांजपे के अनुसार यह पार्ट पुरुषों के लिए वह आईना है जहाँ वे ये देख सकेंगे कि महिलाएँ आए-दिन कैसा महसूस करती हैं।

कथा की भाषा व्यंग्यात्मक है लेकिन वे केवल ठिठोलियाँ नहीं हैं। यह कछुआ-ख़रगोश दौड़ की तर्ज पर संवेदनशील कहानी है लेकिन संदेश बीते समय की नैतिकता नहीं है। बाशू ब्लफ़मास्टर है लेकिन वह अपनी नज़र में ग़लत नहीं है। संध्या झांसे का शिकार है, लेकिन वह अबला नारी नहीं है। राजाराम के लिए आदर्शवादी दृष्टिकोण ही जीवन जीने का सही तरीक़ा है, लेकिन समाज की नज़र में यह वाक्य सत्य नहीं।

पहले कछुआ-ख़रगोश की रेस हुई, ख़रगोश हार गया। फिर ड्यूरासेल बैटरी के विज्ञापन में ख़रगोश-ख़रगोश की दौड़ हुई तो फ़ैंसी पैकेजिंग वाला जीता, साधारण बैटरी वाला हार गया… तो मास्टरसाब के ‘बच्चों इस कहानी से क्या शिक्षा मिलती है?’ का जवाब है : अगर आपको लगता है कि आज के समय के हिसाब से मानव शरीर में अक़्ल दाढ़ सबसे यूज़लेस है तो आपने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर बिना किसी की ऑपरेटर की निगरानी में रखा एक्स-रे बैगेज स्कैनर नहीं देखा।

आप यह फ़िल्म यहाँ देख सकते हैं : कथा

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