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आँसू पर बेला

मानवीय मनोभाव के एक

प्रकट चिह्न के रूप में आँसू हमेशा से काव्य के विषय-वस्तु रहे हैं और वृहत रूप से इनके बहाने से कवियों ने विविध दृश्य और संवाद रचे हैं।

23 जून 2026

प्रतिउत्तर : ‘रोएँगे हम हज़ार बार...’

प्रतिउत्तर : ‘रोएँगे हम हज़ार बार...’

प्रिय रचित, मैंने आपकी इम्तियाज़ अली की फ़िल्म ‘मैं वापस आऊँगा’ पर लिखी दर्शक-समीक्षा पढ़ी। वह वीडियो भी देखा जिसमें एक लड़की रोते हुए अपना वीडियो रिकॉर्ड कर रही थी, जिसे बाद में उसने फ़ेसबुक पर सा

19 जून 2026

केवल इम्तियाज़ हँस रहा है और सब रो रहे हैं

केवल इम्तियाज़ हँस रहा है और सब रो रहे हैं

किसे चाहिए  मन का सोना  आँख का मोती  किसे पड़ी है  अंदर क्या है  होती रेत है  लगता पानी  [वर्ष 2015 में आई इम्तियाज़ अली निर्देशित फ़िल्म ‘तमाशा’ से।] मैं गए बुधवार इम्तियाज़ अली का इं

31 जुलाई 2025

सैयारा : दुनिया को उनसे ख़तरा है जो रो नहीं सकते

सैयारा : दुनिया को उनसे ख़तरा है जो रो नहीं सकते

इन दिनों जीवन कुछ यूँ हो चला है कि दुनिया-जहान में क्या चल रहा है, इसकी सूचना सर्वप्रथम मुझे फ़ेसबुक देता है (और इसके लिए मैं मार्क ज़ुकरबर्ग या सिलिकॉन वैली में बैठे तमाम तकनीकी कीड़ों का क़तई कृतज्