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‘दिल चाहता है’ के पच्चीस साल

तीन दोस्त हैं। एक को हर दूसरी लड़की से प्यार हो जाता है, लेकिन अंततः शादी किसी और से कर रहा है। एक को अपने से बड़ी उम्र की औरत से प्यार हो जाता है और तीसरे के लिए प्यार एक बेकार की चीज़ है। तीनों का गीत है—हम हैं नए अंदाज़ क्यों हो पुराना... तीनों की इच्छा है—कभी ना बीतें चमकीले दिन... लेकिन ऐसा होता कहाँ है! यथार्थ की कठोर ज़मीन से टकराना ही होता है।

वर्ष 2006 में डीजे [‘रंग दे बसंती’ में आमिर ख़ान का किरदार, पूरा नाम : दलजीत सिंह] ने कहा था, “कैंपस के भीतर ज़िंदगी को हम नचाते थे, कैंपस के बाहर ज़िंदगी हमें नचाती है।” ये लड़के भी अब कैंपस के बाहर की ज़िंदगी की गिरफ़्त में आ चुके हैं। पच्चीस साल बाद पीछे मुड़कर देखें तो लगता है कि ‘दिल चाहता है’ की सबसे मार्मिक बात उसकी दोस्ती नहीं; बल्कि उसका वह मासूम विश्वास है कि दोस्ती, प्रेम और जवानी के ये दिन बहुत लंबे चलेंगे।

लेकिन जीवन किसी फ़िल्म की तरह संपादित नहीं होता।

साल 2001, महीना अगस्त, तारीख़ 10... दो महीने पहले रिलीज़ हुई दो फ़िल्मों ने इतिहास रचा था। सनी देओल पाकिस्तान जाकर हैंडपंप उखाड़ चुके थे और अपनी बीवी को हिंदुस्तान ले आए थे। आमिर ख़ान ने अँग्रेज़ों की क्रिकेट टीम को हराकर दुगुना लगान माफ़ करा लिया था। पटना का उमा सिनेमा हॉल किसी स्टेडियम में बदल गया था। पौने चार घंटे की फ़िल्म, सिनेमा और क्रिकेट का रोमांच—एक ऐसा कॉकटेल, जिसके लिए आईपीएल को अभी भविष्य में आना था।

वनडे मैचों के लाइव प्रसारण का अपना रोमांच था। बिजली की लुकाछिपी के बीच रेडियो और टीवी के बीच शिफ़्ट होती क्रिकेट की दीवानगी और फिर उसी दीवानगी को एक ज़बरदस्त क़िस्सागोई, बेहतरीन कास्टिंग और शानदार शिल्प के साथ फ़िल्म में बदल देना—‘लगान’ ने यह काम किया था। यह फ़िल्म ऑस्कर की दावेदार बनकर अंतिम दौर तक पहुँची और वहाँ ‘नो मैंस लैंड’ से पीछे रह गई।

‘लगान’ तो मैंने देख ली थी, लेकिन ‘गदर’ सिनेमा हॉल में देखने में कामयाबी नहीं मिली थी। तब सिनेमा देखने का मतलब सिनेमा हॉल में देखना था। टेलीविज़न के पर्दे पर फ़िल्म देखना उसे दुबारा देखना था, लेकिन उसे सिनेमा देखना नहीं माना जाता था। देखे हुए सिनेमा का पुनर्पाठ टीवी पर किया जा सकता था। सिनेमाघरों में भी हिट फ़िल्मों का पुनर्पाठ दर्शकों को कराया जाता था। एक फ़िल्म चलती थी, फिर चलती रहती थी और दर्शक उसे दुबारा देखने जाते थे।

रिलीज़ की रात ‘गदर’ का टिकट नहीं मिला। कुछ अंतराल के बाद किसी और दिन देखने गए तो फिर टिकट नहीं मिला। हमारे साथ जो व्यक्ति हमें फ़िल्म दिखाने ले गए थे, उनका प्रस्ताव था कि तीनों लोग रूपक टॉकीज़ में सिनेमा देख लेते हैं। मुझे ‘रूपक’ के रूपक की कोई हवा नहीं थी और तीसरा व्यक्ति नैतिकता की प्रत्यंचा पर चढ़ा हुआ तीर था। उसमें विचलन की कोई गुंजाइश नहीं थी। प्रस्ताव ख़ारिज हुआ और समोसा खाकर हम वापस हो लिए।

रूपक टॉकीज़ पटना का वह सिनेमा हॉल था जहाँ ए-सर्टिफ़िकेट वाली फ़िल्में लगती थीं। मैं अभी वयस्क होने से कुछ साल की दूरी पर था। देखने वाले बताते थे कि किसी फ़िल्म के बीच में एक अद्भुत रील डालकर दर्शकों को उनके पैसे वसूल हो जाने का एहसास करा देना सिनेमा-संचालकों का असली हुनर था। पाबंदियाँ तब इतनी हावी थीं कि ‘बैंडिट क्वीन’ जैसी ए-सर्टिफ़िकेट वाली फ़िल्म देखकर निकले एक दर्शक को भी सफ़ाई देनी पड़ी थी कि वह तो हॉल के पास किसी काम से आया था।

लोग तब समाज द्वारा निर्धारित मूल्यों का पालन करने में गौरव अनुभव करते थे, उन्हें तोड़ने में नहीं। इसका मतलब यह नहीं था कि मूल्य तोड़े नहीं जाते थे, बस उनका उल्लंघन सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने की हिम्मत कम थी।

‘गदर’ देखने का तीसरा प्रयास एक बरसाती दिन में हुआ। उम्मीद थी कि आज ‘गदर’ कौन ही देख रहा होगा! साइकिल से दो लोग तैयार हुए और चल पड़े। बीच में हल्की बारिश हुई, हम भीग गए। वीणा सिनेमा पहुँचने से ठीक पहले सड़क ने तय किया कि फ़िल्म से पहले एक और दृश्य दिखाया जाए।

वीणा सिनेमा पटना जंक्शन के बग़ल का हॉल था—यात्रियों के लिए मुफ़ीद। ट्रेन का इंतज़ार हो तो समय काटने के लिए सिनेमा देखिए और फिर बग़ल के स्टेशन जाकर ट्रेन पकड़ लीजिए।

डेढ़ साल के अपने पटना-प्रवास में मैंने एकाध फ़िल्म ही देखी थी, जिसमें एक की याद अब भी है—‘देवदास’। वह मैंने अपने एक शिक्षक के साथ देखी थी, जिनसे आठवीं से दसवीं तक कोचिंग ली थी। मैथ्स पढ़ाने और विद्यार्थियों को बिना मतलब पीटने के साथ उनका एक और शौक़ था—सिनेमा देखना। विद्यार्थियों को पीटने का उनका अपना दर्शन था। उनका मानना था कि क्लास के सबसे मेधावी विद्यार्थी को पीट दो, बाक़ी ख़ुद-ब-ख़ुद सीधे हो जाएँगे... कि जब पढ़ने वाला लड़का पिट रहा है तो हम लोग किस खेत की मूली हैं! पीटने में वह किसी तरह का भेदभाव नहीं करते थे। सबको समान भाव से पीटते थे। यह मनोरंजक भी था। कोई छूट जाए तो विद्यार्थी उसकी याद दिलाकर उसे पिटवा देते थे। ऐसे व्यक्ति के साथ सिनेमा देखना अपने आप में एक उपलब्धि थी।

सर का उसूल था कि क़स्बे में लगने वाली फ़िल्म पहले दिन और पहले शो में देखी जाए। उस दिन कोचिंग की फ़ीस वसूलते हुए घोषित भी कर देते कि आज फ़िल्म देखेंगे और ठंडा पिएँगे... जाड़ों में ठंडे की जगह समोसा आ जाता था।

मैंने उनके साथ फ़िल्म देखने का सौभाग्य पाया और एक बार फ़िल्म देखने के पैसे भी मिले, जिनका उपयोग सिनेमा हॉल में न होकर उदर की तृप्ति में हुआ। सावन में जिसका ज़िक्र भी मुनासिब नहीं है।

एक बार सर पटना आए थे, अपने छात्रों से मिल रहे थे। फ़िल्म भी देखना चाहते थे, लेकिन कोई उनके साथ जाने को तैयार नहीं था, क्योंकि उसके बाद उसे सुनना पड़ता, “तुम हमारे साथ फ़िल्म देखने चले गए!” [दरअस्ल, यहाँ भोजपुरी का इस्तेमाल हुआ था, जिसका मैंने सरलीकृत अनुवाद किया है।] लेकिन मैं एक अलग किस्म का ढीठ था, इसलिए चला गया। हमने ‘देवदास’ देखी। हमपे ये किसने हरा रंग डाला... ख़ुशी ने हमारी हमें मार डाला... ओ मार डाला... उस समय भी मुझे वह निहायत कोरी भावुकता वाली फ़िल्म लगी थी। बाद में जब दिलीप कुमार और सुचित्रा सेन वाली ‘देवदास’ देखी तो बिमल रॉय की महानता और भंसाली के छिछलेपन को एक साथ महसूस किया।

बहरहाल, वीणा सिनेमा पहुँचने से ठीक पहले बारिश हुई थी। सड़क लबालब भरी थी। हॉल से कोई दो सौ मीटर पहले साइकिल का अगला पहिया ग़च्चा खा गया। साइकिल-चालक साइकिल से उछलकर आगे जा गिरा और मैं साइकिल के साथ पानी में ग़र्क़ हो गया। ग़नीमत थी—गड्ढा था, गटर नहीं।

सड़क के पानी में डूबे शरीर को बदबू ने इस लायक़ नहीं छोड़ा कि हम इसके आगे कुछ सोच सकें। साइकिल वापस स्वीट हट लेन, मुसल्लहपुर हाट की तरफ़ मुड़ गई। इतने सालों के बाद भी शहरों की भीड़-भाड़ वाली सड़कों पर बरसात में हाल वही रहता है। आप कितने ही फ़्लाईओवर बना लें, बरसात में सड़क को नाला बनना ही होता है। उसके बाद हमने ‘गदर’ का रुख़ नहीं किया।

पटना में मैं अपने बड़े भाई के साथ रहता था। कुछ फ़िल्में ऐसी थीं जिन्हें हम दोनों भाई बिना शोर-शराबे के चुपचाप देख आते थे... मतलब उन पड़ोसियों और रिश्तेदारों के बिना, जिनके साथ सामान्यतः हम लोग फ़िल्म देखने झुंड में जाते थे। ऐसा ही एक हॉल था अशोक सिनेमा—उस समय का सबसे एलीट सिनेमा हॉल। वहाँ तहज़ीब के साथ सिनेमा देखा जाता था। शाहरुख़ ख़ान की फ़िल्में उसमें ही लगती थीं। ‘कभी ख़ुशी कभी ग़म’ में जब अमिताभ बच्चन ने हृतिक रोशन को थप्पड़ मारा तो हॉल के साउंड का प्रभाव हमारे ज़ेहन पर लंबे समय तक बना रहा।

हम दोनों भाई ठीक-ठाक सिनेमा देखवैया थे। यहाँ यह उल्लेख कर देना चाहिए कि जिस समय दुनिया हृतिक रोशन, अर्जुन रामपाल और अभिषेक बच्चन की फ़ैन हो रही थी; मेरा भाई तुषार कपूर के पीछे लगा था। ‘मुझे कुछ कहना है’ न जाने कितनी बार देखी गई और उसके बाद तुषार कपूर की कई फ़िल्में। यह सिलसिला तब तक चला जब तक दोनों को यक़ीन नहीं हो गया कि इस हीरो का कुछ नहीं हो सकता।

अगस्त का महीना था। उमस भरे दिन रहे ही होंगे। साइकिल उठाकर दोनों भाई अशोक सिनेमा के लिए निकल पड़े... फ़िल्म थी—‘दिल चाहता है’। बिना किसी शोर-शराबे के रिलीज़ हुई यह फ़िल्म उस समय की मुख्यधारा की हिंदी फ़िल्मों से अलग दिखती थी। कॉस्ट्यूम, हेयर-स्टाइल, गीत-संगीत, संवाद—इसमें कुछ भी वैसा नहीं था; जैसा हम उस समय की फ़िल्मों में देखते आए थे, लेकिन हमें अंदेशा हो गया था कि इस फ़िल्म में कुछ तो है और इसलिए इसे देखना ही चाहिए।

हॉल में हम देर से पहुँचे। सत्तर प्रतिशत फ़िल्मों में मैं देर से पहुँचता हूँ, आज भी। जब तक अपनी सीट पर पहुँचे, पर्दे पर गाना शुरू हो चुका था—हम हैं नए अंदाज़ क्यों हो पुराना...

आमिर ख़ान का आकाश चोट पहुँचाने की हद तक मज़ाक़ करने वाला लड़का था। सैफ़ अली ख़ान का समीर प्रेम में कन्फ़्यूज़ लड़का था और अक्षय खन्ना का सिद्धार्थ उम्र से बहुत आगे की गंभीर बातें करता हुआ संजीदा चित्रकार। दोस्ती, ग़लतफ़हमियाँ, अलगाव और फिर मिलन... फ़िल्म अपनी गिरफ़्त में लेती गई।

यह सिर्फ़ तीन दोस्तों की कहानी नहीं थी। यह पहली बार था जब हमारी उम्र के लड़के स्क्रीन पर अपनी तरह की दुनिया में दिखाई दे रहे थे। वे प्रेम करते थे, मज़ाक़ करते थे, झगड़ते थे, अपने दोस्तों से नाराज़ होते थे और फिर भी दोस्त बने रहते थे। वे किसी महान् आदर्श की ओर नहीं बढ़ रहे थे। वे बस अपनी ज़िंदगी जी रहे थे। इसी वजह से शायद यह फ़िल्म इतनी अपनी लगी।

प्यार से हम दूर ही अच्छे... कहने वाले नायक के जीवन में जब प्रेम अपनी शर्तों पर दाख़िल हुआ तो पृष्ठभूमि में तन्हाई बज रही थी—तुमको जो प्यार किया मैंने तो सज़ा में पाई... तन्हाई, तन्हाई, मीलों है फैली हुई तन्हाई... शंकर-एहसान-लॉय की तिकड़ी ने ऐसा संगीत रचा था, जिसकी ताज़गी उस समय अलग से महसूस होती थी। ‘तन्हाई...’ वियोगियों का एंथम बन गई और दार्शनिकता तथा अवसाद में रमने वालों के लिए—कैसी है ये रुत कि जिसमें फूल बनके दिल खिले... जैसे गीत सिर्फ़ गाने नहीं थे, वे कहानी के भीतर घटित हो रहे थे। यहाँ फ़िल्म के दृश्य और संगीत एक-दूसरे को पूरा कर रहे थे।

यह एक बहुत फ़्रेश सिनेमा था—दिल और दिमाग़ दोनों पर असर छोड़ने वाला। ख़ासकर उन पुरुषों पर जो शहरों में रहते थे या जिनकी आकांक्षाओं, परेशानियों और सपनों में एक नई शहरी आधुनिकता आकार ले रही थी। इस फ़िल्म की स्त्रियाँ केवल सजावटी नहीं थीं। वे अपने पूरे व्यक्तित्व के साथ उपस्थित थीं। फ़िल्म का ह्यूमर विदग्ध था और उसे समझने के लिए भी थोड़ी सलाहियत चाहिए थी। इस सबसे बड़ी बात; इस फ़िल्म में दोस्ती को कोई सहायक भाव नहीं, बल्कि कथा का केंद्र बनाया गया था।

एक नए निर्देशक की यह फ़िल्म थी—जावेद अख़्तर और हनी ईरानी के बेटे फ़रहान अख़्तर की। बाद में समझ में आया कि हिंदी सिनेमा में जिस बदलाव की शुरुआत हम ‘लगान’ या ‘गदर’ में नहीं देख पाए थे, उसका एक बड़ा मोड़ ‘दिल चाहता है’ था। उसने कहानी से अधिक जीने के ढंग को बदला था। महानगर को सिर्फ़ पृष्ठभूमि नहीं, जीवन-शैली बनाया था। पुरुषों को नायक होने के साथ-साथ उलझे हुए, भावुक, अपरिपक्व और असुरक्षित होने की भी जगह दी थी। दोस्ती को प्रेम जितना ही महत्त्वपूर्ण बनाया था।

...और फिर एक दिन बहुत साल बाद मैंने सोशल मीडिया पर फ़िल्म का एक छोटा-सा वीडियो देखा—फ़िल्म के सबसे मार्मिक दृश्यों में से एक—क्षितिज की तरफ़ बढ़ते जहाज़ को देखते हुए सिद्धार्थ कहता है, “जानते हो, हम तीनों उस जहाज़ की तरह हैं जो आज नहीं तो कल अपनी मंज़िलें ढूँढ़ते हुए निकलेंगे। हो सकता है हमारी मंज़िलें अलग-अलग हों। किसकी ज़िंदगी कहाँ ले जाती है, क्या पता!”

यह संवाद शायद तब हमें रोमांचक लगा होगा। यौवन में अलग-अलग दिशाओं में निकल जाना आज़ादी लगता है। हमें लगता है कि दोस्ती इतनी बड़ी चीज़ है कि दूरी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। हमें लगता है कि प्रेम की हमारी धारणाएँ स्थायी हैं। हमें लगता है कि जो लोग आज हमारे साथ हैं, वे किसी न किसी रूप में हमेशा हमारे साथ रहेंगे।

आज पच्चीस साल बाद फिर वही दृश्य देखा तो लगा कि यह फ़िल्म का संवाद नहीं, जीवन का बयान था।

तीनों लड़के सचमुच अलग-अलग दिशाओं में निकल गए हैं। किसी को हर दूसरी लड़की से प्यार करने के बाद अंततः किसी और से शादी करनी है। किसी के लिए प्रेम उम्र की सीमाएँ तोड़कर आता है। किसी के लिए अब भी प्रेम शायद उतनी ही गैरज़रूरी चीज़ है। लेकिन अब इन सबके बीच कैंपस की वह बेफ़िक्री नहीं है। अब नौकरी है, परिवार है, शहर हैं, ज़िम्मेदारियाँ हैं, अपने-अपने चुनाव हैं और उन चुनावों के परिणाम हैं।

डीजे का वह वाक्य अब और साफ़ समझ में आता है, “कैंपस के भीतर ज़िंदगी को हम नचाते थे, कैंपस के बाहर ज़िंदगी हमें नचाती है।”

‘दिल चाहता है’ देखते हुए हम तीन दोस्तों को देखते थे। पच्चीस साल बाद वही फ़िल्म देखते हुए हम अपने भीतर के तीन दोस्तों को देखते हैं... वे लड़के जो कभी सोचते थे कि उनकी ज़िंदगी उनके सामने खुली हुई है और वे अपनी-अपनी मंज़िल चुन लेंगे। उन्होंने मंज़िलें चुनीं या नहीं, यह कहना मुश्किल है। इतना ज़रूर हुआ कि रास्ते उन्हें अपनी-अपनी तरफ़ अपनी-अपनी तरह से ले गए। और शायद ‘दिल चाहता है’ का सबसे बड़ा दुख यही है कि उस समय हमें फ़िल्म का सबसे ख़ूबसूरत संवाद लगता था, “किसकी ज़िंदगी कहाँ ले जाती है, क्या पता!” आज वही जीवन की सबसे कठोर सचाई लगता है... 

काश! पर्दे पर कही यह बात सिर्फ़ एक संवाद होती!

दिल 
चाहता 
है!

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अमितेश कुमार को और पढ़िए : हम ‘लगान’ देख रहे थेकविता में नाटकीयता की खोज

 

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