क्रिस्टोफ़र नोलन की ‘द ओडिसी’ : होमर के महाकाव्य की उदास सिनेमाई पुनर्रचना
एक राजा और महानायक होते हुए भी ओडिसस की ज़िंदगी कोई जश्न नहीं है, बल्कि एक लंबा इंतज़ार, एक बेबसी और ज़िंदगी के आख़िर में पसरा हुआ एक अंतहीन सन्नाटा है। यह एक ऐसे दुख की किरच के साथ घर लौटने की कहानी
सतलुज : बहता हुआ इतिहास
कुछ फ़िल्में शहीद होने के लिए ही बनती हैं। इस तरह देखें तो ‘सतलुज’ भी एक शहीद फ़िल्म है। यह फ़िल्म जब वर्ष 2023 में रिलीज़ के लिए तैयार हुई, तभी से विवादों में घिर गई। इस फ़िल्म का पहला शीर्षक ‘ग़ल्लू
जगह-जगह 2.0 : कूड़े के पहाड़, ट्रैफ़िक जाम, मेट्रो से आगे की देल्ही
दिल्ली की तारीफ़, पिछली तारीफ़ों की याद है। इसका रोमांस, रोमांस का दोहराव है। आगे चलो तो पीछे पहुँचते हो, पीछे चलो तो कहीं नहीं। दिल्ली को बहुतों ने याद किया है, जो यहाँ रहते हैं वे भी इसे याद करते ह
सतलुज : एक धारा को रोकने की कोशिश
तीन साल की लंबी क़ानूनी और सेंसर संबंधी लड़ाई के बाद रिलीज़ हुई फिल्म ‘सतलुज’ मात्र दो दिन के भीतर ही भारत में ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ZEE 5 से हटा दी गई। अब यह फ़िल्म भारत में उपलब्ध नहीं है। सरकार ने इसे स
सतलुज : ‘मैं हनेरे नूं चैलेंज करदां’
“हिंसा को केवल झूठ के द्वारा छिपाया जा सकता है और झूठ को केवल हिंसा के द्वारा ही क़ायम रखा जा सकता है।” — लेव तोल्स्तोय हनी त्रेहन निर्देशित फ़िल्म ‘सतलुज’ [पहले ‘पंजाब 95’] लंबे संघर्ष के बाद
03 जुलाई 2026
‘पिकोलो फ़ाइल्स’ : एक कुत्ते की नज़र से इंसानों की दुनिया
‘पिकोलो फ़ाइल्स : पॉ एंड ऑर्डर’ (प्रभात प्रकाशन, प्रथम संस्करण : 2026) में लेखिका इरा टाक ने अपनी ओर से नहीं, बल्कि अपने पालतू कुत्ते ‘पिकोलो’ की ओर से उसकी दुनिया और उसका नज़रिया सामने रखा है। यही इ
तपते सूरज और थियो की तलाश
विन्सेंट वॉन गॉग के प्रति सदा एक आकर्षक बना रहा। उनकी पेंटिंग के कारण नहीं विन्सेंट से जुड़ी कहानियों के कारण। शेष संसार की तरह उनकी पेंटिंग को तो मैंने भी बहुत बाद में जाना। सबसे पहले मिलना हुआ स्टा
बंदर : डोपामाइन की भूखी दुनिया में बेचैनी परोसती फ़िल्म
डायनासोर के जाने के बाद, इस नीले ग्रह पर लगभग सब कुछ नए सिरे से हुआ। स्तनधारियों के विकास का रास्ता साफ़ हुआ। क्रमिक विकास (evolution) चलता रहा। लाखों वर्ष पूर्व होमो-सेपियंस आए। दो सौ साल पहले उनमें
किम की-यंग : कोरियाई सिनेमा का एक असाधारण नाम
हम जब आज से लगभग एक दशक पूर्व कोरिया के बारे में सोचते थे, तो शायद अधिकांश लोगों के लिए उसका उत्तर अज्ञात ही रहता था। जिनकी समझ या रुचि थोड़ी अधिक विकसित थी, उनके मन में शायद किम जोंग उन का नाम आता र
मैं वापस आऊँगा : क्या कमाल है, न शिकायतें, न मलाल है!
दो गिलहरियाँ इमारत के कोने पर आकर मिलती हैं। एक कहीं से मूँगफली ले आई है, दूसरी हाथ बढ़ाकर उसे ले लेना चाहती है। अचानक बम का धमाका होता है और इमारत ढह जाती है। सब मलबे के हवाले। इस इतनी बड़ी दुनिया म
‘चींटी की अर्थी’ पर कुछ बातें
इस पुस्तक का शीर्षक उसकी अंतर्वस्तु का कोई सिरा हाथ नहीं लगने देता, लेकिन उसके प्रति जिज्ञासा को लाकर एक जगह संकेंद्रित ज़रूर कर देता है। इस कहानी में प्रेम है, बंद कमरों की सुराख़ों से नज़र रखने
‘बाघ का भाग्यफल और अन्य कहानियाँ’ : धर्म-सत्ता-प्रेम का त्रिकोण
लिखने की मोहलत के लिए मृत्यु को ही अपनी किताब सादर समर्पित करता लेखक मृत्यु से तो भिड़ ही रहा है, साथ ही उसकी वैचारिक मुठभेड़ अपने समय के अजीब, अप्रिय, भ्रामक, भ्रष्ट, कुव्यवस्था के सामाजिक, राजनीतिक,
प्रीति-प्रतीति की ध्यानावस्था में रची गई कविताएँ
रुस्तम के कविता-संग्रह ‘एक ख़ुशबू वहाँ फैली थी’ की कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि यह प्रीति-प्रतीति की ध्यानावस्था में रची गई रचनाएँ हैं। यहाँ आदि से अनंत तक प्रेम की ख़ुशबू बिखरी हुई है। जड़ हो या च
निर्मल वर्मा : चिंतन के स्वर
सुख्यात लेखक निर्मल वर्मा के लेखन को पढ़ना अक्सर किसी शांत, धुँधले पहाड़ी रास्ते पर चलने जैसा अनुभव देता है, जहाँ दृश्य जितना सामने होते हैं, उससे कहीं अधिक ओझल भी। उनके यहाँ कथ्य से अधिक महत्त्व
देह की देहरी पर परिवार और समाज का पहरा
जया जादवानी अत्यंत संवेदनशील कथाकार हैं। मानवीय रिश्तों की बारीकियों, जटिलताओं और गहराई को उन्होंने अपनी कहानियों में बहुत ख़ूबसूरती से अभिव्यक्त किया है। बाहरी संसार की विविध छवियों, घटनाओं, स्थितिय
01 अप्रैल 2026
फाँसी : दंड की कठोरता या सुधार का सोपान
हिंदी साहित्य जगत में हाल ही में प्रकाशित हिंदी उपन्यास ‘फाँसी’ काफ़ी चर्चा में रहा है। इस उपन्यास की एक ख़ास बात यह है कि इसे दो उपन्यासकारों—उद्भ्रांत और शैलेश पंडित ने संयुक्त रूप से लिखा है। ऐसा
06 मार्च 2026
जगह-जगह 2.0 : द मैजिक माउंटेन : मनुष्य-चेतना पर महामारी के चिह्न
एक …अगर वह फ़िलॉसॅफ़िकल है तो एक ऐसे अर्थ में जिसके लिए अक्सर हम ‘फ़िलॉसॅफ़ी’ जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं करते, पर जो अपनी अंत:प्रक्रिया में ही एक तरह का सोच, एक तरह का निश्चय, एक तरह की रिफ़्लेक्टिवने
27 फरवरी 2026
हत्यावादी जूनून के चक्रव्यूह में फँसा ‘कैनेडी’
वर्ष 2021 में देश के सबसे अमीर लोगों में से एक के घर के सामने एक गाड़ी पाई गई थी, जिसमें विस्फोटक सामग्री पाए जाने की ख़बर थी। उस घटना के बाद संबंधित राज्य के सत्ता समीकरणों में बहुतेरे बदलाव देखे गए
Humans In The Loop : ग़लतफ़हमी है कि CAPTCHA भरकर आप रोबोट होने से बच जा रहे हैं
दुनियाभर में आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस का हल्ला है। जहाँ एआई (AI) शब्द जुड़ जाता है, वह चीज़ एलीट लगने लगती है। यूट्यूब वीडियोज़ के समंदर में अगर पत्थर उछालो तो वो कोई न कोई एआई टूल सिखाने वाले पर ही ग
प्रेम की घर वापसी
आज, अभी, इस दिन, इस क्षण की लंबान कितनी हो सकती है? इसका एक वाजिब जवाब है—विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास, ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ जितनी! इस उपन्यास को पढ़ते हुए पहली ही बात जो ध्यान खींचती है, वह
‘आधी पंक्ति’ में पूरा प्रेम
क्या प्रेम अपने चरम पर पहुँचकर स्वयं की विफलता में ही अपने शाश्वत अर्थ को उद्घाटित करता है? आस्था, प्राप्ति और पराजय के बीच बने चक्रव्यूह को लांघने में असफल आत्म ही उस पात्रता को प्राप्त करता है, जिस
उद्भ्रांत की आत्मकथा : हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर
उद्भ्रांत हिंदी साहित्य की उस पीढ़ी के प्रतिनिधि कवि हैं, जिन्होंने ‘नई कविता’ के बाद सातवें दशक में छंद में हाथ आज़माते हुए, कविता के अन्य आंदोलनों के बीच अपनी जगह बनाई—यद्यपि बाद में उन्होंने अपने स
भूख का भूगोल : अखिलेश सिंह की पहली कहानी ‘विकल्प’ पर कुछ अवलोकन
हाल ही में नई पीढ़ी के कवि, गद्यकार और अनुवादक अखिलेश सिंह की पहली कहानी ‘विकल्प’—समालोचन पर प्रकाशित हुई है। बीते कुछ दिनों में इस कहानी के साथ लगातार रहने का अवसर मिला। अखिलेश सिंह के प्रभावशाली, ध
पोर्ट्रट ऑफ़ ए लेडी ऑन फ़ायर : एक मुकम्मल तस्वीर का सफ़र
साल 2019 की फ़्रांसीसी फ़िल्म ‘पोर्ट्रेट ऑफ़ ए लेडी ऑन फ़ायर’ इस सदी की उन चुनिंदा फ़िल्मों में से एक है, जिनका ज़िक्र ज़रूरी है। इस फ़िल्म की सबसे ख़ूबसूरत बात यह है कि आप कोई भी कोण, कोई भी दृश्य या कोई भी
शरणार्थी शिविरों में समाए तिब्बती जीवन का दुख
सेयरिंग यांगजोम लामा तिब्बती लेखक हैं। ‘वी मैज़र द अर्थ विथ ऑर बॉडिज़’ उनका पहला उपन्यास है। उनका जन्म और पालन-पोषण नेपाल के एक तिब्बती शरणार्थी समुदाय में हुआ। आपको कैसा महसूस होगा अगर आपको आपके
शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी और ‘फ़ानी बाक़ी’
आज का दिन मेरे महबूब शहर इलाहाबाद के महबूब साहित्यकार और आलोचक शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी की जन्मतिथि है। वह आसमां में चमकते हुए तारों में से एक हैं, जिसे मैं आज के दिन देखना चाहता हूँ। इलाहाबाद के साहित्
मृत्यु ही जीवन का सबसे विश्वसनीय वादा है
जिस क्षण हम जन्म लेते हैं, उसी क्षण मृत्यु हमारे साथ चल पड़ती है। हमारा हर क़दम अपनी मृत्यु की ओर उसकी छाया की तरह उठता है। हर बीता हुआ कल वर्तमान में समाकर आने वाले कल से मिलने की दिशा में बढ़ता है।
समीक्षा : मृत्यु अंत है, लेकिन आश्वस्ति भी
मृत्यु ऐसी स्थिति है, जिसका प्रामाणिक अनुभव कभी कोई लिख ही नहीं सकता; लेकिन इस कष्टदायी अमूर्तता के स्वरूप, दृश्य और प्रभाव को वरिष्ठ कवि अरुण देव ने पूरी सफलता के साथ काव्य शैली में ढाल दिया है। ‘मृ
समीक्षा : त'आरुफ़-ए-मंटो
पिछले हफ़्ते विभाजन पर आधारित एक नाटक देखने गया था। नाटक दिल्ली के एक प्रतिष्ठित सरकारी संस्थान में था। विभाजन भारतीय उपमहाद्वीप और उसके लोगों पर घटी एक त्रासदी है—उसे याद किया जा सकता है, उससे सीखा
समीक्षा : सूर्यबाला के पहले उपन्यास का पुनर्पाठ
हिंदी साहित्य में जिसे साठोत्तरी रचना पीढ़ी के नाम से जाना जाता है, सूर्यबाला उसकी एक प्रमुख हस्ताक्षर हैं। उनकी साहित्यिक पहचान की नींव उनके पहले ही उपन्यास ‘मेरे संधि-पत्र’ से जुड़ी है। मैं इस किता
धड़क 2 : ‘यह पुराना कंटेंट है... अब ऐसा कहाँ होता है?’
यह वाक्य महज़ धड़क 2 के बारे में नहीं कहा जा रहा है। यह ज्योतिबा फुले, भीमराव आम्बेडकर, प्रेमचंद और ज़िंदगी के बारे में भी कहा जा रहा है। कितनी ही बार स्कूलों में, युवाओं के बीच में या फिर कह लें कि तथा
अब बाज़ार स्त्री के क़दमों में है
समकालीन हिंदी स्त्री-कविता की परंपरा में अनीता वर्मा सघन संवेदना और ऐन्द्रियबोध की कवि हैं। भाषा, भाव और बिंब के साथ प्रतीकों की अलग आभा उनकी कविताओं को दुर्लभ अर्थ-छवियों से जोड़ती है। परिवार, समाज,
'आलोचना' सह पाएगी अपनी आलोचना!
राजकमल प्रकाशन समूह की त्रैमासिक पत्रिका ‘आलोचना’ [अंक-77] ने ‘इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविता’ शीर्षक से एक विशेषांक गए दिनों प्रकाशित किया। इस अंक पर साहित्य संसार में काफ़ी बातचीत हुई, जिसे फ़ेसबुकिया
भाषा, लोग और ‘बहुरूपिये’ वाया 2014
आज़ादी के बाद के, हमारे देश का इतिहास जब भी लिखा जाएगा तो उसमें दो खंड लाज़िमी होंगे। पहला—आज़ादी से लेकर 2014 तक और दूसरा—2014 से बाद का। ऐसा नहीं है कि 2014 के बाद से हमारे समाज में धर्म के नाम पर
निश्छल नारी की नोटबुक
ऊषा शर्मा की डायरी ‘रोज़नामचा एक कवि पत्नी का’ (संपादक : उद्भ्रांत, प्रकाशक : रश्मि प्रकाशन, संस्करण : 2024) एक ऐसी कृति है, जो एक गृहिणी की अनगढ़, निश्छल अभिव्यक्ति के माध्यम से कवि-पति उद्भ्रांत के
अतीत का अँधेरा और बचकानी ख़्वाहिशें
दिनेश श्रीनेत की कहानियों का संग्रह प्रकाशित होकर सामने आया है और मैं ख़ुशी के साथ एक अजीब से एहसास से भी सराबोर हूँ। मैं इस एहसास को कोई नाम देने में ख़ुद को लाचार समझता हूँ। मगर इस एहसास के केंद्र
21 अप्रैल 2025
‘अजब तोरी दुनिया हो मोरे रामा...’
बरस 1947 है, तारीख़ 14 अगस्त, दिन गुरुवार, रात का समय। जब जवाहरलाल नेहरू अपना चुस्त पजामा और शेरवानी पहन रहे थे, संसद में देने वाले थे अपना ऐतिहासिक वक्तव्य। उसी वक़्त मेरे परदादा खेत के मुँडेर
विभाजन-विस्थापन-पुनर्वासन की एक विस्मृत कथा
पहले पन्ने पर लेखक ने इस उपन्यास (‘मरिचझाँपि को छूकर बहती है जो नदी’) का मर्म लिख दिया है—“विभाजन, विस्थापन एवं पुनर्वासन की एक विस्मृत कथा”। यह पंक्ति पढ़ते ही आप सहज से थोड़े सजग पाठक में बदल जाते
रविवासरीय : 3.0 : एक समय की बात है और नहीं भी...
• गत ‘रविवासरीय’ पढ़कर मेरे बचपन के दोस्त अनूप सोनकर ने कानपुर से मुझे फ़ोन पर एक कहानी सुनाई। उसे भी नहीं पता कि यह कहानी उसने कहाँ से अपने ज़ेहन में उतारी और मुझे भी यह अनसुनी-अनपढ़ी लगी! आइए इसे पढ़ते
यह दुनिया पेट की दौड़ है
ख़ालिद जावेद के उपन्यास ‘नेमत ख़ाना’ से गुज़रते हुए गाहे-ब-गाहे यह महसूस होता है कि निःसंदेह तमाम दुनिया पेट की दौड़ है—इससे ज़्यादा कुछ नहीं, इससे कम कुछ नहीं। आपके अंतर् से पारदर्शी परिचय करवाते इस
जातियों में जकड़े भारतीय समाज का अनदेखा सच
प्रत्येक समाज और व्यक्ति के अपने सच होते हैं। ये सच किसी-न-किसी माध्यम से अभिव्यक्ति पाते हैं। किताबें किसी व्यक्ति या समाज के अनदेखे सच की अभिव्यक्ति का अनूठा माध्यम हैं। एक ऐसी ही पुस्तक है—महाब्रा
मेटा 2025 : प्रेम, दर्द, समय, समाज और लोक का रंगमंच
भारतीय रंगमंच की जीवंत परंपरा को प्रोत्साहित करने और देश भर के प्रतिभाशाली कलाकारों को एक मंच प्रदान करने के उद्देश्य से, महिंद्रा समूह और टीम वर्कआर्ट्स द्वारा आयोजित ‘महिंद्रा एक्सीलेंस इन थिएटर अव
12 मार्च 2025
विशाल अनुभव-सागर की एक झलक
हिंदी में लेखकों का अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा लिया गया साक्षात्कार संकलित होकर पुस्तक के रूप में प्रकाशित होता रहा है और ऐसी पुस्तकों की संख्या भी अच्छी-ख़ासी (एक प्रकाशक ने तो ऐसे ‘साक्षात्कार’ की प
हमारे समय का आर्तनाद है ‘शान्ति पर्व’ की कविताएँ
आशीष त्रिपाठी का अद्यतन काव्य संग्रह ‘शान्ति पर्व’ विवेकशील मानस की भाव-यात्रा है। भाव के साथ चेतना भी जागृत है। इस यात्रा में सब कुछ है, सब कुछ! फणीश्वरनाथ रेणु के शब्दों में कहें तो—“इसमें फूल भी ह
एक विस्मृत क्रांतिकारी : जननायक कर्पूरी ठाकुर
लेखक संतोष सिंह और आदित्य अनमोल द्वारा अँग्रेज़ी में लिखी गई ‘दी जननायक कर्पूरी ठाकुर : वॉइस ऑफ़ दी वॉइसलैस’ एक प्रेरक जीवनी है, जो कर्पूरी ठाकुर की साधारण शुरुआत से लेकर एक परिवर्तनकारी राष्ट्रीय नेत
अजातशत्रु : आस्था के आगे मौत क्या चीज़ है!
भारत रंग महोत्सव में के. के. रैना द्वारा निर्देशित और इला अरूण द्वारा अनूदित नाटक ‘अजातशत्रु’ की बेहतरीन प्रस्तुति हुई। यह नाटक का प्रभाव था या फिर के. के. रैना और इला अरूण के नाम का प्रभाव; प्रेक्षा
यथार्थ का जादू और जादुई यथार्थवाद
‘अम्बर परियाँ’ बलजिंदर नसराली का तीसरा उपन्यास है। इससे पहले पंजाबी में उनके दो उपन्यास आ चुके हैं। उन्होंने कहानियाँ भी लिखी हैं। उनके दो कहानी संग्रह ‘डाकखाना खास’ और ‘औरत की शरण में’ भी प्रकाशित ह
क़स्बाई ज़िंदगी की तिकड़मों का लुत्फ़
हिंदुस्तान क़स्बों और नगरों से भरा देश है। अगर हिंदुस्तान से क़स्बे निकाल दिए जाएँ, तो बस धूल-खाते, मिलों के शोर से भरे इलाक़े, बजबजाते हुए नाले, एक दूसरे से उलझने को तैयार गाड़ियाँ और आसमान की कोख म
जावेद आलम ख़ान की ‘स्याह वक़्त की इबारतें’ और अन्य कविताएँ पढ़ते हुए…
कविता की एक किताब में—एक ज़ख़्मी देश, एक आहत मन! एक कवि—जिसका नाम विमर्श में खो गया, जिसके चेहरे की ओर भी सबने नहीं देखा, लेकिन उसकी आवाज़ कुछ दिलों में, कुछ कविता की बातों के रास्ते पर, साहित्य के क
21 जनवरी 2025
भारतीय समाज का गुड गर्ल सिंड्रोम
भारतीय समाज में लड़कियों की परवरिश एक जटिल प्रक्रिया है—संरक्षण और स्वतंत्रता के बीच का एक सूक्ष्म संतुलन। वे शिक्षा और करियर के लिए प्रेरित की जाती हैं, लेकिन उनकी उड़ान पर अदृश्य धागों से खिंचाव डा