तपते सूरज और थियो की तलाश
निधि अग्रवाल
02 जुलाई 2026
विन्सेंट वॉन गॉग के प्रति सदा एक आकर्षक बना रहा। उनकी पेंटिंग के कारण नहीं विन्सेंट से जुड़ी कहानियों के कारण। शेष संसार की तरह उनकी पेंटिंग को तो मैंने भी बहुत बाद में जाना। सबसे पहले मिलना हुआ स्टारी नाइट्स से। स्तब्ध देखती रही, ज्यों किसी ने मेरी स्वप्निली रातों की विचलित मूर्छा को उकेर दिया हो। भले ही विन्सेंट स्वयं इसे गोगां के दबाव में एब्सट्रैक्शन को तलाशते अपनी आंतरिक चाह से विचलन और विफलता माने, मेरे जैसे अनेकों के लिए यह पेंटिंग अवचेतन में अनवरत हुँकार भरती आकाशगंगाओं से धुँधला साक्षात्कार है। पेंटिंग के निचले भाग में गाँव के रूप में सतह पर चलता नीरस जीवन, ऊपर के भाग में ब्रह्मांड और जीवन रहस्यों को समझने के भँवर और एक तारे से दूसरे तारे तक पहुँचने की उलझाव भरी यात्रा में थका हुआ साइप्रस का पेड़।
संभावना प्रकाशन से प्रकाशित, अशोक पांडे द्वारा ‘लस्ट फ़ॉर लाइफ़’ का यह बेहतरीन अनुवाद मैंने विन्सेंट के उन्मादी प्रेम में उठाया और थियो के विवेकी धैर्य में बंध ख़त्म किया। होता है अक्सर कहानी के अंत तक नायक बदल जाता है और कला की परिभाषाओं और परंपराओं को सहेजते अहमी, हिंसक, प्रतिबद्ध आलोचक—अपनी रचनात्मकता की जड़ें तलाशते आत्मसंशय में डूबे हताश-विक्षिप्त कलाकार, कला को नीलाम करता बाज़ार और पुरुषप्रधान इस संसार में हाशिए पर छूटती, पुरुष संसार के बिखराव सहेजती, स्त्रियोंवाली (मिशेले के शब्दों में पुरुषों के ऊपर बयार की तरह बहती स्त्रियाँ!) इस कहानी को बचाने का श्रेय तो नायिका को जाता है।
सधी हुई भाषा में पूरी जीवंतता के साथ 19वीं शताब्दी का पश्चिमी कला जगत हमारे समक्ष खुलता जाता है। नौ भागों में विभक्त इस किताब में उर्सुला, के, क्रिस्टीन, मारगॉट और रैचेल सहित पाँच स्त्रियों से विन्सेंट की नज़दीकियों सामने आती हैं। हर स्त्री के प्रति वह मान से भरा है, दयालु है और उसकी उपस्थिति से स्वयं को पूर्ण पाता है। जिन्हें चाहा, टूटकर चाहा; और जिसे न चाह सका, उसके लिए अपराधबोध से भर उठा। पूरी किताब पढ़ते हुए यह तलाश ही बनी रहती है कि वे स्त्रियाँ जो बयार नहीं बनीं, सूरज बनकर विन्सेंट-सी ही तपी वे किताब से नदारद क्यों हैं? क्या कभी विन्सेंट के तपते सूरजमुखी की भेंट ओल्गा बोज़्नांस्का के नाज़ुक गुलदाउदी या मैरी स्टीवेन्सन कैसैट की खिड़की पर महकते लिली या वात्सल्यपूर्ण सूरजमुखी से नहीं हो सकी? कैसैट के क़रीबी मित्र डेगास का ज़िक्र, विन्सेंट वॉन गॉग के कई पत्रों में मिलता है, ऐसा मैंने कहीं पढ़ा था। थियो को लिखे सब पत्रों को पढ़ने की जिज्ञासा अब इस दृष्टि से हो चली है। यूँ ही एक किताब दूसरी किताब का रास्ता खोलती है।
फ़िलहाल तो विन्सेंट पर लौटते हैं। एक शिशु-सा मन लिए वह अविवेकी और हठी है। आत्मविनाशी और अव्यवहारी है। खदानों में काम करते मज़दूरों के कष्ट देख भले ही वह कह उठे—‘ईश्वर कहीं नहीं था, केवल एक अस्तव्यस्तता थी—हताश, दर्दनाक, क्रूर, अत्याचारी, अंधी, ख़त्म न होने वाली अस्तव्यस्तता।’ लेकिन इंसानियत पर विश्वास वह कभी नहीं छोड़ता। उसके इस प्रेमिल उदार मन के कारण ही लोग उसे ईसा मसीहा पुकारते हैं। वह मसीहा ही था—एक सनकी मसीहा! जो मानता है कि कला का रास्ता साहित्य से गुज़रता है। रेखाएँ नहीं भावनाएँ सटीक होनी चाहिए।
रेवरेंड पीटरसन, हरमन गिसबर्ट, वाईसेनब्रुख जैसे कुछ परंपरावादी और कुछ नवोन्मेषी, कुछ उदार और कुछ निर्दयी तलवारों के बीच सेजा, हैंजी, मेने, मॉव जैसे कितने ही संघर्षरत कलाकार दृश्यों, चरित्रों, रंगों और माध्यमों से जूझते अपना अपना ‘तपता सूरज’ तलाश रहे हैं, जिसके तेज में वह उस ‘आत्मा’ को पकड़ सकेंगे जो उनका हस्ताक्षर बनेगी। हम उस संघर्ष से परिचित होते हैं, जो सेज़ां के लिए एक्स, मॉने के लिए एन्टीब्स, फादा के लिए मारसेल्स और विन्सेंट के लिए आर्ल को पवित्र बनाता है। हम उस बेताब पुकार से भी परिचित होते हैं जो पूछती है कोई मुझे बताएगा मुझे कहाँ जाना है! यह संयोग और सौभाग्य पर निर्भर है कि ‘लॉत्रेक’ से जवाब पाने का संघर्ष कितना कम या ज़्यादा होगा। कभी ‘कॉलिंग’ पिकासो की तरह जन्म से सुनाई देगी और कभी ग्रैंडमा मोसेस की तरह मृत्यु की दहलीज पर खड़े।
हम भौतिक दुनिया और आंतरिक आवेगों से जूझते हेनरी रूसो जैसे कस्टम अफ़सरों, सेजां जैसे रईसों को महान् कलाकार बनते देखते हैं और जॉर्जेस स्योरो को पूरे जुनून के साथ कला को विज्ञान में बदलते भी। हमारे पूर्वाग्रह कुछ मुलायम पड़ते हैं। हम इस शाश्वत सच के क़रीब आते हैं कि कला में कुछ सही-ग़लत नहीं होता। कलाकार की भीतरी दृष्टि, निरंतरता और जुनून अंततः उसे नूतन आयाम देता है। क्यूबिकल, पॉइंटिज़्म, वृत्त अंततः अँधेरों में रोशनी भरने का प्रयास हैं।
इन कलाकारों का अपनी कला के प्रति समर्पण, श्रद्धा और दीवानगी से हम जान पाते हैं कि मिथकीय स्त्री चरित्रों का सौंदर्यकरण करने वाला बूगेरो, आदिवासियों को चित्रित करता गोगां, गतिशील बेले डांसर बनाता देगा, मूलां रूज़ की नर्तकियों और वेश्याओं को चित्रित करता लॉत्रेक, विचित्रताओं की निरंतर स्मृतियाँ रंगता डाली, अवसाद के आभ से दमकती बूढ़ी औरतें बनाता रैम्ब्रां में से प्रत्येक अपनी पेंटिंग्स से दूर कर देने पर एक से ही दयनीय हो उठते हैं। अपनी दयनीयता में भी वह परस्पर भीषण पाशविक, क्रूर और असंवेदनशील हो सकते हैं। अपने मानसिक आवेगों और अपेक्षाओं से जूझते ये कलाकार विन्सेंट की तरह ख़ुद को पूरा झोंक कुछ समय में पूरी पेंटिंग बना उसी तिथि में पत्र भी लिख सकते हैं और सेजां की तरह आजीवन उसे सुधारते रह सकने के कारण पेंटिंग को बिना जन्म प्रमाणपत्र भी छोड़ सकते हैं (यहाँ कवि वॉल्ट व्हिटमैन भी याद आते हैं)। विन्सेंट और गोगां की तरह चित्रों पर अनवरत जिरह करते एक-दूसरे पर वार कर सकते हैं या मॉव की तरह चित्रों पर कुछ भी बात न कर बस चित्र बनाते रह सकते हैं और चित्रों के माध्यम से ही नहीं वाईसेनब्रूख की तरह हर चीज़ की नफ़रत करने के अपने गुण के कारण भी ख्याति पा सकते हैं। अंकल कॉर्नेलियस की असहमति के बावजूद अपार अनैतिक जीवन के बीच विशुद्ध नैतिक कला बना सकते हैं। कभी चित्र और कभी मात्र शीर्षक को अश्लील करार कर ठुकराए भी जा सकते हैं। (The bride stripped bare by her bachelors, Even by Marcel Duchamp)
सबकी अपनी-अपनी खदानें हैं, जन्म से मरने तक। रचनात्मकता आत्मा पर पुती राख है। इस राख को उकेरने का माध्यम हर कलाकार ताउम्र तलाशता है। आत्म और अनात्म के भेद को मिटाने के इस प्रयास में किया ‘ऐसा काम जिसे बनाने में किसी ने अपनी मेहनत, चरित्र और संवेदनाएँ लगाई हों, वह न बिकने लायक़ और बुरा हो ही नहीं सकता है।’
बस उस काम को सही जगह पहुँचाने की बात है। हर कलाकार को ‘केवल यह पता करना और महसूस करना है कि दुनिया में और भी चित्रकार हैं, उसी के जैसे, वैसी ही तकनीकी समस्याओं से जूझते हुए, उसी की तरह सोचते हुए; ऐसे लोग जो अपना सरोकार जताकर उसके काम को न्यायसंगत और उचित ठहराएँगे।’
इतना-सा दायित्व ही है समाज का कि कोई कलाकार इस दुख के साथ हमारे बीच से न चला जाए कि ‘उसका सही आकलन नहीं हुआ और वह हर जगह अयोग्य ठहराया गया।’ हम अपने दायित्व में चूक भी जाएँ, पर कलाकारों के सामने जीवन का बड़ा उद्देश्य है। जैसा वाईसेनब्रूख ने कहा था, “पैदाइशी चित्रकार होने पर इतराने की ज़रूरत नहीं। तुम भाग्यशाली होओगे अगर एक चित्रकार के तौर पर मर पाओ।” उन्हें चित्रकार होना बचाए रखना है। भीतर की ओर लौटते रहना है।
कला का बाज़ार, मानक और आलोचक बदलते जाएँगे। कभी चेतन कभी अवचेतन विषय बनेगा। कभी हेनरी मैटिस के निर्लज्ज शोख चटख रंग, कभी अपने रंगबोध से सकुचाए मॉने के फीके रंग जादू जगाएँगे। ब्रश स्ट्रोक का दिखना कभी अवगुण और कभी गुण बन जाएगा। कभी आकृतियाँ सराही जाएँगी कभी लैंडस्केप। कभी जनजीवन का सादा यथार्थ और कभी स्वप्न और कल्पनाओं में भीगा अतियथार्थवाद। कभी कला धर्म का पर्याय बन देवघरों तक सीमित होगी। कभी बीच बाज़ार नीलाम होगी। कभी यथार्थ का सटीक चित्रण नाम दिलाएगा, कभी भ्रम ऐसा ठोस होगा कि पिघलती घड़ियाँ पूरी सदी बदल डालेंगी।
तमाम unpredictability के बीच यह भी संभव है कि ‘द हेग’ को डच कला की राजधानी और डच जनता को प्रतिभा आंकने लायक़ बनाने के लिए संघर्षरत तेरस्टीग जैसे कुशल आलोचक किसी नई प्रतिभा को आँकने से चूक जाएँगे, वहीं यह सौभाग्य भी दुर्लभ नहीं कि आमजनों के बीच कोई पीयरे टैन्ज़ी जैसा पारखी भरपूर सम्मान दे, कलाकार को साधे रखेगा। कभी मॉव जैसा बड़ा संबल विषैला हो उठेगा, जलील करेगा। कभी मारगॉट धैर्य बँधाती कह उठेगी, ‘ज़्यादातर लोगों को रोशनी खोजने में अधिक समय लग जाता है’ और ‘Antomy of Artist’ जैसी महत्त्वपूर्ण किताब उपहार में दे देगी। तमाम उपेक्षाओं, उपहासों और यातनाओं के स्थाई दंश ढोते हुए कलाकार भले ही मरता जाए, लेकिन अंततः कला जीवित रहेगी और एक समय अपने जिस आदर्श जूल्स एडोल्फ़ ऐमे लुई ब्रेतों से मिलने का साहस विन्सेंट नहीं जुटा पाया था, कभी विन्सेंट की जीवनी के माध्यम से ही कोई पाठक ब्रेंतों की ‘सांग ऑफ़ द लार्क’ को जान पाएगा।
बदलते समय के साथ कलाकार यूँ ही ख़ारिज-दाख़िल होते जाएँगे। शाश्वत बस कला है। जो रंगों में छूटेगा वो स्याही में जगह पाएगा, जो स्याही में छूटेगा वो चलचित्र में निखर जाएगा, जो उपन्यास में नहीं समाएगा वह रंगों से बना एक पारदर्शी आँसू कह जाएगा। महत्त्वपूर्ण बाज़ार और आलोचक नहीं वह चमक है जो चित्र पूरा होने पर चित्रकार की आँखों में कौंध जाती है। उनके बस में बस इस चमक के लिए स्वयं को खपा देना है। कला को अपना अस्तित्व बना लेना है। विडंबना यह है कि इस चमक से पेट नहीं भरता, घर नहीं चलता और सहयोग करती क्रिस्टीन उलहाने देने लगती है। घर बाहर से आर्थिक सहयोग लेते रीढ़ झुकने लगती है और दुनिया की नज़रों में कलाकार की पहचान सनकी पागल की बचती है।
हर सनकी पागल जब हिम्मत हारने लगे उसे एक दस्तक चाहिए... थियो की दस्तक। जो तमाम अँधेरों के बीच रोशनी बन फुसफुसाता रहे—मुझे तुम पर यक़ीन है... तुम बनाओ। मैं ख़रीदूँगा... बेचूँगा... मुझे तुम पर यक़ीन है ओल्ड बॉय! और जब तमाम शोर, उलझाव और आदर्शों के मध्य वह अपनी पहचान खोने लगे तब थियो की एक आत्मीय फटकार—तुम्हारा नाम क्या है?
केवल अपने भाई के लिए ही नहीं इस क्षेत्र के नए चित्रकार—मैने, माने, पिसारो, सिसली, रेनुआ, बर्टमोरीसो, सेजां, देगा, गिलामिन बिल्कुल नए तुलूस-लॉत्रेक, गोगां, स्योरो और सिनैक उन सबके लिए जो अलग और कुछ नया कहना चाह रहे थे, जो बूगेरो और बाक़ी कलाविद निरंतर दोहराते आ रहे थे—के लिए भी थियो हर रोज़ ‘लेस मेस्यूर्स’ में अपने मालिकों से नए चित्र ख़रीदने और जनता को शिक्षित करने की सलाह देता है। ‘लेस मेस्यूर्स’ की निगाहों में नए कलाकार पागल, बचकाने और तकनीकी दृष्टि से अक्षम थे, जबकि थियो उन्हें भविष्य के उस्तादों की तरह देखता था। इन सबके बीच सामंजस्य बिठाता अपनी व्यवहारकुशलता से वह न केवल गूपिल्स में पदोन्नति पाता है, बल्कि माने, देगा, पिसारो और मैने जैसे इंप्रेशनिस्ट चित्रकारों का काम प्रवेश द्वार पर लगाने की इजाज़त भी पाता है। वह समझता है कि कला का व्यापार धीरे-धीरे पनपता है। वह छद्म दंभ की जगह सौम्यता और धैर्य में विश्वास रखता है। वह नए चित्रकारों के लिए वालाडॉन से मिन्नतें करने में गुरेज़ नहीं करता और एक स्थापित चित्रकार की पेंटिंग बेचने पर एक नए चित्रकार की पेंटिंग गैलरी में लगाने की अनुमति पा भी लेता है।
इन सबके बीच थियो विन्सेंट और अन्य चित्रकारों के असभ्य, उजड्ड तौर-तरीक़ों, बहसों, झगड़ों को झेलता हुआ अपना दिन-रात का सुकून खोने के साथ, जब—नौकरी छोड़ने के लिए उकसाया जाता है, तब पाठक का दिल बैठने लगता है। विन्सेंट द्वारा चित्रकारों की कॉलोनी का विचार अंतिम समय में रद्द करने पर भी वह रूष्ट न हो उसे पेरिस से बाहर प्रकृति के बीच अपनी जड़ें तलाशने के लिए प्रेरित करता है। अंकल द्वारा वसीयत में मिला धन भी वह गोगां को आर्ल बुलाने की विन्सेंट की इच्छा पूरी करने में ख़र्च कर देता है। अपने लिए कोई बचत न कर पाने पर भी विन्सेंट को हर संकट से उबारने दौड़ा जाता है। भले ही विन्सेंट मदद लेते हुए संकोच से भर उठे लेकिन थियो कभी नहीं उकताता।
जब स्योरो कह रहा होगा—“कला का काम रंग डिज़ाइन और टोन जैसे अमूर्त चीज़ों से है, इसका काम समाज का उत्थान या बदसूरती की खोज नहीं होना चाहिए। चित्रकला को संगीत की तरह होना चाहिए, समाज और दीन दुनिया से विरक्त।” जब लेखक ज़ोला कह रहा होगा—“हम हर सत्य को सुंदर मानते हैं चाहे वह कितना ही भद्दा नज़र आता हो। हम सारी प्रकृति को बग़ैर किसी दिखावे के स्वीकार करेंगे। हम यक़ीन करते हैं कि कड़वे सच में मीठे झूठ के मुक़ाबले ज़्यादा सौंदर्य होता है।”
ठीक उसी समय कोई थियो किसी विन्सेंट द्वारा बनाई न केवल सभी पेंटिंग्स को बल्कि लिखे सभी पत्रों को भी क्रमवार सहेज रहा होगा। कहानी की असली नायिका योहाना उन चित्रों को बेचने का प्रयास कर रही होगी, उन पत्रों को संकलित कर रही होगी। इस आस में नहीं कि उनसे कमा व्यापार कर सकें, इस स्वार्थ में भी नहीं कि कलाकारों को प्रमोट करने के बहाने उन्हीं से निरंतर पैसे उगाह सकें या जो पैसे दे उसी के गुण गाकर, कला सेवक की आड़ में भिखारी बने रहें, ऐसे खिलाड़ी बनना भी नहीं कि श्रेष्ठ पर बात करते अपना कच्चा-पका उनसे श्रेष्ठ कहलवा लें, बल्कि केवल इस पावन भावना संग कि संघर्षों में तपी हर मौलिक कलाकृति को उसका कद्रदान मिल जाए। धीरे ही सही, इस नेकनीयती की मेहनत रंग लाएगी। अनगिनत बहसों और अभावग्रस्त जीवन के बीच उठे किसी उन्मादी दौरे में ट्यूब से पोते गए रंग, पत्रों के कोमल मानवीय स्पर्श से बोल उठेंगे। एक शिशुवत जुझारू कलाकार की आंतरिक छटपटाहट दुनिया के लिए ओझल न रहेगी और अपना कान काट लेने वाले विन्सेंट के प्रेम में दुनिया बँध जाएगी। व्यभिचारियों, अधिकारियों, व्यवसायियों और भिखारियों से भरी कला की दुनिया में होना एक थियो का, कला और कलाकार दोनों को बचाए रखेगा।
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