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जगह-जगह 2.0 : कूड़े के पहाड़, ट्रैफ़िक जाम, मेट्रो से आगे की देल्ही

दिल्ली की तारीफ़, पिछली तारीफ़ों की याद है। इसका रोमांस, रोमांस का दोहराव है। आगे चलो तो पीछे पहुँचते हो, पीछे चलो तो कहीं नहीं। दिल्ली को बहुतों ने याद किया है, जो यहाँ रहते हैं वे भी इसे याद करते हैं। वे एक पेड़, एक मोड़, एक क़िला और बिरयानी की देग़ को याद करते हैं। वे कूड़े के पहाड़ को देखते हैं और देखना नहीं चाहते। वे फ़क़ीरचंद किताबघर और IIC के बीच दौड़ते हैं। वे कुछ दिल्ली अपने पास रखते हैं, बहुत-सी छोड़ देते हैं। वे सावधानी से इसका इतिहास चुनते हैं और समग्रता से बहस करते हैं, इतिहास का भजन करते हैं, तवाज़ुन बैठाते हैं। उनके नगर-प्रेम और नगर-शोक का एक पैर पुरानी दिल्ली में है, दूसरा कनॉट प्लेस में, बीच में मेट्रो और फ़्लाईओवर हैं।

बीते दिनों दिल्ली पर दो किताबें पढ़ी गईं, विलियम डेलरिम्पल की ‘सिटी ऑफ़ जिन्न’ और अहमद अली की ‘ट्वाईलाइट इन देल्ही’। दोनों ही दिल्ली को अपनी तरह से खोजते हैं। कहीं तहें नमूदार होती हैं, कहीं पैबंद दिखाई देते हैं। यह आलेख इन्हीं दो पुस्तकों पर बात करता है :

सिटी ऑफ़ जिन्न

लेखक विलियम डेलरिम्पल ने किताब के शीर्षक का आशय पुस्तक में नहीं दिया है। शुरुआत में वह एक सूफ़ी संत के हवाले से जिन्न का अर्थ बताते हैं और फिर किताब दिल्ली के उन्हीं दृश्य, अदृश्य और नष्ट हो चुके पहलुओं पर बात करती है। यह आलेख उन्हीं पहलुओं में से तीन पर बात करता है।

‘सिटी ऑफ़ जिन्न’ पहली बार 1993 में प्रकाशित हुई और इसमें दिल्ली के बारे में, ख़ासकर ब्रिटिश राज की शुरुआत और मुग़लों के उत्तरार्ध के बारे में, 1993 के लिहाज़ से संभवतः बहुत-सी नई जानकारियाँ हैं जिनके टुकड़े उठाकर रील-इतिहासकार दिल्ली-दिल्ली दोहराते हैं।

डेलरिम्पल अपने अनुभव में वह सब लिखते हैं जिसे भारतीयों का quirk कहा जाता है। वह विभाजन के बाद दिल्ली में आकर बस गए पुरी परिवार के किराएदार हैं और यहीं से दिल्ली को खोजना शुरू करते हैं। इंदिरा गांधी की हत्या के समय की दिल्ली से शुरुआत करते हुए वह विभाजन, ब्रिटिश राज और ढलते हुए मुग़ल शासन तक जाते हैं। इस पूरे सफ़र में उन्होंने कई दिलचस्प प्रसंग जोड़े हैं।

दिल्ली की ठंड के सिरे से वह एलेक फ़्रेज़र और उसके बड़े भाई विलियम फ़्रेज़र का क़िस्सा छेड़ते हैं जो भारत में ब्रिटिश सिविल सर्वेंट की हैसियत से नियुक्त हुआ था। डेलरिम्पल, विलियम फ़्रेज़र को और दिल्ली को उनके पत्रों के ज़रिए खोजते हैं। फ़्रेज़र कश्मीरी गेट के पास यमुना किनारे एक बंगले में रहते थे, उस ज़मीन पर जो कभी शाहजहाँ के सेनापति अली मर्दान ख़ान का महल था। बंगला साधारण था, लेकिन उसके नीचे एक विशाल मुग़ल तहख़ाना था, मेहराबदार गलियारों और दीवारों पर उकेरी हुई मुग़ल चित्रकारी के धुँधले निशानों के साथ। तीन सुरंगें अलग-अलग दिशाओं में जाती थीं और एक शायद लाल क़िले तक। फ़्रेज़र ने ऊपर का महल ढहा दिया था, लेकिन नीचे की यह संरचना अब भी बची हुई थी। जब डेलरिम्पल वहाँ पहुँचे तो वह इमारत रेलवे इंजीनियरिंग का दफ़्तर बन चुकी थी।

22 मार्च 1835 को विलियम फ़्रेज़र की हत्या उनके कश्मीरी गेट स्थित बंगले के बाहर कर दी गई। जाँच में संदेह लोहारू के नवाब शम्सुद्दीन अहमद ख़ान पर गया। फ़्रेज़र ने लोहारू की उत्तराधिकार संबंधी लड़ाई में शम्सुद्दीन के प्रतिद्वंद्वी पक्ष का समर्थन किया था, जिससे दोनों के बीच गहरी दुश्मनी हो गई थी। मिर्ज़ा ग़ालिब और लोहारू के नवाब के बीच भी कुछ संपत्ति को लेकर वैमनस्य था। मुक़दमे में यह साबित हुआ कि फ़्रेज़र की हत्या शम्सुद्दीन के इशारे पर कराई गई थी। उन्हें गिरफ़्तार किया गया, मुक़दमा चला और 1835 में दिल्ली में फाँसी दे दी गई।

शम्सुद्दीन ख़ान, ‘कई चाँद थे सरे आसमान’ की केंद्रीय किरदार वज़ीर ख़ानम का पति था। विलियम फ़्रेज़र की हत्या के बाद ग़ालिब पर भी मुख़बिरी के आरोप लगे, जिसके चलते उन्हें अपमान और पेंशन की परेशानियों से भी गुज़रना पड़ा। शम्सुद्दीन और वज़ीर ख़ानम का बेटा ‘दाग़’ कालांतर में ग़ालिब का शागिर्द भी बना। विलियम डेलरिम्पल ने ग़ालिब का हवाला उड़ते-उड़ते दिया है, लेकिन फ़ारूक़ी के उपन्यास ने इस पूरे प्रसंग को कहीं अधिक विस्तार से लिखा है। वहीं से यह शे'र देखिए—

ग़ालिब सितम निगर कि चूँ विलियम फ़्रेज़रे
जीं सां ज़ चीरादस्ती-ए-‘आदा शवद हलाक

(ऐ ग़ालिब, ये अत्याचार तो देखो कि विलियम फ़्रेज़र जैसा शख़्स दुश्मनों की बर्बरियत के हाथों मारा जाए।)

अन्य दिलचस्प पहलुओं में से एक में डेलरिम्पल किन्नरों की सामाजिक स्थिति पर बात करते हैं जो हिंदू और मुस्लिम दोनों परंपराओं के मेल और टकराव से बनी है। हिंदू समाज में खोजा होना एक अभिशाप माना जाता था लेकिन उनके आशीर्वाद में एक विशेष शक्ति भी देखी जाती थी। इस्लामिक समाजों में उनकी भूमिका अलग थी। वे मज़ारों, दरगाहों और शाही हरम के पासबान बने, मुग़ल दरबार में ख़ास पदों तक पहुँचे और कई बार सत्ता के भीतर भी प्रभावशाली रहे। मुग़ल सत्ता के विघटन के साथ यह संरक्षण समाप्त हो गया और दोनों परंपराओं के बचे हुए तत्त्वों ने मिलकर किन्नरों की वह सामाजिक स्थिति गढ़ी जो आज दिखाई देती है, घरों से बेदख़ल, परिवारों से कटे हुए, सड़कों पर बधाइयाँ गाते, शुभ अवसरों पर नेग माँगते, दरगाहों और मंदिरों से जुड़े, एक साथ तिरस्कृत भी और अनेक सामाजिक अवसरों पर अपरिहार्य भी।

डेलरिम्पल दिल्ली को समझने के लिए एक और फ़ारसी किताब की ओर जाते हैं, दरगाह क़ुली ख़ाँ की मुरक़्क़ा-ए-दिल्ली। 1739 में नादिर शाह के आक्रमण के आस-पास लिखी गई यह किताब बादशाहों से कहीं अधिक शहर के सामाजिक जीवन को दर्ज करती है। इसमें सूफ़ियों, तवायफ़ों, किन्नरों, संगीतकारों, शायरों और महफ़िलों से बनी एक ऐसी दिल्ली मिलती है जो दरबार से बाहर भी साँस ले रही है। नूर बाई जैसी तवायफ़ों के कोठों से लेकर शा’इरी की महफ़िलों तक, दरगाह क़ुली ख़ाँ की निगाह शहर के उन हिस्सों पर है जिन्हें राजनीतिक इतिहास प्रायः दर्ज नहीं करता। इस पूरे प्रसंग का महत्त्व इसमें है कि डेलरिम्पल क़ुली ख़ाँ की किताब के बहाने बताते हैं कि नादिर शाह के रक्तपात के संदर्भ में दिल्ली को जिस क़दर तबाह शहर के रूप में याद किया जाता है, यह किताब उस विनाश पर बहुत कम ठहरती है। इसके बजाय वह उसी समय की दिल्ली के दूसरे सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं का दस्तावेज़ बन जाती है।

इसी क्रम में वह एक और दुर्लभ फ़ारसी पांडुलिपि मिर्ज़ा नामा का हवाला देते हैं। यह सत्रहवीं सदी के मुग़ल अभिजात वर्ग के शिष्टाचार की किताब थी जिसमें बताया गया है कि एक मिर्ज़ा (Gentleman) कैसे चले, किससे मिले, क्या पहने, कैसे बोले, क्या पढ़े और किन बातों से बचे। चरित्र से कहीं अधिक उसकी सार्वजनिक छवि, नफ़ासत, अदब और अख़लाक़ को महत्त्व दिया गया। पालकी में चलना, सा’दी की गुलिस्ताँ और बुस्ताँ कंठस्थ करना, शुद्ध भाषा का इस्तेमाल और महफ़िलों में पेश आने के सलीक़े इस किताब का हिस्सा थे।

डेलरिम्पल ने ब्रिटिश राज, मुग़लों और विभाजन पर किताब का अच्छा-ख़ासा हिस्सा ख़र्च किया है। इससे कम वह पृथ्वीराज चौहान की दिल्ली और आगे महाभारत (इंद्रप्रस्थ) की चर्चा करते हैं। इस प्रसंग में वह अधिकतर बी. बी. लाल के साथ हुए अनुभवों का ज़िक्र करते हैं। यह हिस्सा पुस्तक में सबसे कम जगह घेरता है। इसमें उनका रुझान और कुछ हद तक खीझ भी दिखाई देती है। दिल्ली के जिन्न (या कहें प्रेत) को ढूँढ़ते हुए प्राचीन भारत का इतिहास उनके हाथ सबसे कम आता है। पुस्तक की समाप्ति भी कुछ इसी ढंग से होती है कि वह कुछ जानते-जानते रह गए हैं। यह अंत हर लिहाज़ से आकर्षक है।

दिल्ली की कई साँझ का ज़िक्र करते हुए वह अहमद अली की ‘ट्वाईलाइट इन देल्ही’ का उल्लेख करते हैं। अहमद अली विभाजन के पहले ही भारत से बाहर नियुक्त थे। विभाजन के दौरान वह दिल्ली नहीं लौट सके और अंततः कराची चले गए। फिर कभी दिल्ली लौटकर नहीं आ सके। बदलती हुई दिल्ली में अतीत की हूक उनके उपन्यास में ज़ाहिर हुई, लेकिन दिल्ली उनके लिए नॉस्टैल्जिया से त्रासदी में बदल गई। डेलरिम्पल ने कराची में उनसे हुई मुलाक़ात और उनके अंतिम दिनों की कसक को भी इसी किताब में दर्ज किया है। अगला हिस्सा अहमद अली के उपन्यास ‘ट्वाईलाइट इन देल्ही’ की चर्चा करता है।

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ट्वाईलाइट इन देल्ही

वाजिद अली शाह की एक तस्वीर है जिसमें उनके अंगरखे का बायाँ हिस्सा खुला हुआ है और सीना झाँक रहा है। उनके इस पहनावे को अँग्रेज़ी परिधान के ख़िलाफ़ फ़ैशन स्टेटमेंट की तरह देखा जाता है। अहमद अली के उपन्यास ट्वाईलाइट इन देल्ही का किरदार मीर निहाल मलमल का अंगरखा पहने हुए है, जिससे छाती का एक हिस्सा बाहर निकला हुआ है, पैरों में लाल जूतियाँ हैं जिनके अगले हिस्से पर सफ़ेद फूलों की कढ़ाई है।

अहमद अली का यह उपन्यास 1940 में प्रकाशित हुआ। इसकी कथा-समय लगभग 1911 से 1918 के बीच की है। यह दिल्ली दरबार और प्रथम विश्वयुद्ध के बीच का दौर है।

उपन्यास का केंद्रीय पात्र मीर निहाल है जिसके भीतर दिल्ली अपनी तहज़ीब, अकड़, शाइरी और मातम के साथ जीवित है। मीर निहाल के बरअक्स उसका बेटा असग़र है। जिसका रुझान अँग्रेज़ी फ़ैशन, नए कपड़ों और नए तौर-तरीक़ों की ओर है। यही घर के भीतर सबसे स्पष्ट फाँक है। असग़र को जो नया संसार मिलता है, वह धीरे-धीरे अपनी चमक खो देता है। मीर निहाल अतीत से बाहर नहीं आ पाते और अगली पीढ़ी भविष्य में पाँव नहीं जमा पाती। दोनों के बीच दिल्ली धीरे-धीरे बदल रही है।

उपन्यास एक अच्छे गद्य का नमूना है। अँग्रेज़ी में लिखा गया है पर उसकी बुनत उर्दू की है। जगह-जगह ऐसे वाक्य मिलते हैं जहाँ लहजा उर्दू का है।

“…and if anyone interfered then tears began to flow, breasts were beaten, and heaven and earth made one.”

उपन्यास के किरदार लगातार शे’र कहते हैं। कुछेक को छोड़ दें तो अधिकांश शे’र प्रचलित हैं जो दिल्ली के संदर्भ में बहुधा उद्धृत किए जाते हैं। यह उपन्यास अपनी भरसक कोशिश में दिल्ली के उन सारे प्रतीकों को समेट लेना चाहता है जिनका अर्थ आज धुँधला पड़ चुका है। कबूतर, पतंगबाज़ी, चाँदनी चौक का बाज़ार, पहनावा, मुहर्रम, मुशायरे, हवेलियाँ आदि। आज़ादी से पहले लिखा गया होने के कारण इसके सामने दिल्ली को देखने की दो खिड़कियाँ नहीं हैं। यह केवल पीछे देखता है और खोई हुई चीज़ों का शोक पन्ना-पन्ना दर्ज करता है।

सड़कों पर गर्मागर्मी है। कुछ लोगों को लगता है कि मुग़ल सल्तनत के अंत के बाद अब दिल्ली को कोई स्थायित्व मिलेगा। दूसरे इसे अँग्रेज़ सरकार की बढ़ती ताक़त और दिल्ली के बदतर होते हालात की शुरुआत की तरह देखते हैं। ऐसे ही एक दृश्य में दिल्ली दरबार की ताजपोशी देखने आए हुए लोग एक दूसरे से पूछ रहे हैं : 

“Is that the King on the horse?” said one.
“Don't be mad,” another ridiculed him. “He is a mere soldier or officer. Kings wear fine and flowering robes.”

मीर निहाल के पाले हुए कबूतर एक-एक कर मरते जाते हैं। आख़िर में वह ख़ाली दड़बे को भरने के लिए कुछ और कबूतर लाते हैं जिन्हें बिल्ली नोंच डालती है। दूसरी ओर मुग़ल परिवार के अंतिम वंशज मारे-मारे फिर रहे हैं। किसी ने कहारों से शादी कर ली है, किसी ने रसोइयों से। बहादुर शाह ज़फ़र की चहेती पोती गुलबानो दर-ब-दर ज़फ़र की ग़ज़लें गाती फिरती है, जिन पर अँग्रेज़ सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था।

दिल्ली की हर चर्चा में अब मौसम का ज़िक्र आम बात है। दिल्ली दरबार के दौरान बढ़ती हुई गर्मी और चाँदनी चौक में कट चुके साएदार पेड़ों के काटने का हवाला देता हुआ एक पात्र कहता है : 

“A new Delhi was going to be built. The seventh Delhi had fallen along with its builder, Shah Jahan. Now the eighth was under construction.”

उपन्यास में समय की चाल को लेकर पाठकीय दृष्टि से कई तत्त्व हैं, लेकिन खजूर के पेड़ का ज़िक्र उपन्यास में लगभग 20 से 25 दफ़ा होता है। उसकी पत्तियों की सरसराहट से लेकर अंत में लगभग ठूँठ रह जाने तक। उसकी नंगी चोटी पर एक चील कुछ देर बैठकर चीखती है और उड़ जाती है। उसके नीचे सुबह मृतक के ग़ुस्ल के लिए पानी गर्म करने के लिए जो चूल्हा बनाया गया था, वह अब राख और धूल से भर चुका है, जिस पर धूप सीधे गिर रही है और ठूँठ रूखा खड़ा है।

अहमद अली की मृत्यु 1994 में डेलरिम्पल की ‘सिटी ऑफ़ जिन्न’ के प्रकाशित होने के एक साल बाद हुई। उनके उपन्यास की शुरुआत दिल्ली को अपने कोमल आग़ोश में ढाँपती रात से होती है, जहाँ अँधेरा और चमेली की ख़ुशबू है। उपन्यास का अंत दिल्ली को निगलती हुई रात से होता है, जिसका आसमान अब ब्रिटिश साम्राज्य के क़ब्ज़े में था।

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