खोटी सीख देने वाले, गोली मारने वालों से भी अधिक बुरे होते हैं
विजयदान देथा
08 सितम्बर 2026
यह पत्र विजयदान देथा का चंद्रप्रकाश देवल (सी.पी. देवल) को लिखे एक सीख-रूपी पत्र का अनुवाद है। संयोग से सी.पी. देवल विजयदान देथा के जँवाई हैं। सो, इस पत्र में उनका ‘ससुर’ रूप भी सीख के बहाने बीच-बीच में प्रकट होता रहा है। विजयदान देथा का गद्य भी कथा से इतर नहीं है। उनकी भाषा लोक की मशहूर उस गुळगाँठ की तरह है, जिसे खोलना काफ़ी टाइम-टेकिंग है। यही यहाँ मेरे साथ हुआ है। गाँठ खोलने में लगभग चार-पाँच दिवस खप गए। विजयदान के भाषा-जगत में ऐसे शब्दों की भरमार है, जिन्हें अब कोई राजस्थानी लेखक न के बराबर बरतता है—मुळगो (मात्र), कपूरो (दोष देना), गनौ (रिश्ता), पालर (शुद्ध/बरसात का पानी) आदि ऐसे सैकड़ों शब्द हैं। उनके शब्द-बर्ताव, वाक्यों का विन्यास, सब कुछ काव्यात्मक-सा है। मौलिकता की बहस में घिरे विजयदान देथा ने कभी लोक के मौलिकपन से नाता नहीं तजा।
यहाँ प्रस्तुत पत्र चंद्रप्रकाश देवल के राजस्थानी कविता-संग्रह ‘कावड़’ की भूमिका से हिंदी में अनूदित है। इस पत्र के अनुवाद में कुछ शब्दों को भाषा की सुंदरता के लिए यथावत् रखा गया है। इस प्रसंग में मददगार रहे सर्वश्री चंद्रप्रकाश देवल, अर्जुनदेव चारण, सत्यनारायण सोनी और संतोष चौधरी के प्रति अनुवादक आभार व्यक्त करता है। इस प्रस्तुति की फ़ीचर्ड इमेज़ में विजयदान देथा (मध्य), शिवदत्त (बाएँ) और चंद्रप्रकाश देवल (दाएँ)।
—राजेंद्र देथा
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बोरूंदा, मंगलवार
5 अगस्त 1987
प्रिय सीपी बना,
पागी के पीछे दस बरस बाद ‘कावड़’ राज की दूसरी पोथी। ‘पागी’ में अट्ठाइस कविताएँ थीं और ‘कावड़’ में चालीस। बरसों के हिसाब से कविताएँ क़तई कम लिखीं। ‘कावड़’ के अलावा कुछ फुटकर कविताएँ भी होंगी—तीसेक। हिसाब स्पष्ट है—दूजे महीने मुश्किल से एक बात। साठ दिन बहुत होते हैं। एक ऋतु ढलती है और दूसरी आती है। असीम धूप और असीम चाँदनी। हर क्षण साँस—क्या जागते, क्या सोते! साँस में व्यवधान, जीवन का अंत। कितना कुछ खाया-पिया होगा। चले होंगे। हँसे-मुळके होंगे। सपने देखे होंगे। कितनी-कुछ काम-बेकाम की बंतळ की होगी। कितनी-कुछ चाय पी होगी। सिगरेटें फूँकी होंगी। पान चबाए होंगे। लेकिन कविता साठ दिन और साठ रात के बाद फगत (फ़क़त) एक। कैसे हिम्मत हुई, कैसे लगा मन? थोड़ी-बहुत अमूझणी या झुँझलाहट तो हुई होगी? कवि को कविता रचे बिना कैसे पोसाता है? बाक़ी किसी काम में परहेज़ नहीं, केवल कविता रचने में परहेज़। लगभग सभी राजस्थानी लेखकों का यही ढंग-रूप। कभी इससे भी बुरा। मेरी समझ में तो अजगर भी इतना आलस नहीं करता।
आप श्री के बहाने मैं राजस्थान के तमाम लेखकों को यह लेखा बता देना चाहता हूँ—जिसके जैसे लक्षण, जैसा हाज़मा—उसी गत राज़ी-बेराज़ी होगा। रानीजी रूठेंगी तो अपना सुहाग रखेगी। आपसे अधिक कौन जानेगा कि मैं गिनती की महत्ता नहीं दर्शाना चाहता। लेकिन गिनती, गिनती की जगह तो फबती ही है। बाक़ी सभी बातों में तो आदमी गिनती बग़ैर एक क़दम भी नहीं भरता, लेकिन साहित्य और कला बाबत गिनती का मापन बिल्कुल नहीं मानता। सभी को ज़मीं-जगह गिनती के मुताबिक अधिक चाहिए। वित्त-संपत अधिक चाहिए—अकूत। अधिक ठसक चाहिए। पैदावार अधिक चाहिए। आमद चाहिए अधिक। सत्ता अधिक चाहिए। जस भी अधिक चाहिए। सारा जनसमुदाय गिनती की बढ़ोतरी के लिए आठ पौर बत्तीस घड़ी हाथ-पैर मारता है। फगत कविता और साहित्य के निमित्त गिनती के माप के बखत माथा धुन लेता है। यही विकृत भेद मेरे हिये को कष्ट देता है। गुण बग़ैर गिनती अंधी-गूँगी और गिनती बग़ैर गुण विकलांग। सो तुरत, मेल बिना कोई प्रबंध नहीं होता। माप का मसाला हो तभी सब्ज़ी स्वादिष्ट लगती है। नमूने मात्र खरे और ठोस स्वर्ण-तुष रूपी गुप्त द्रव्य से संतुष्टि नहीं होती। सौ टंच सोना जितना अधिक होता है, उतना ही मन हर्षित होता है। मन को अच्छा लगता है। इसी तरह अच्छी कविताएँ जितनी अधिक हों, उतना ही अच्छा।
लेकिन यह सुधराई आवे कैसे? यही तो मोटा पेंच फँसता है। और इसी पेंच पर यह अवसर होता है कि पता लगाया जाए कि लेखक और साहित्य के बीच परस्पर रिश्ता-नाता या कि सनातन क्या है? सनातन गाढ़ा तो साहित्य भी। सनातन सौतेला तो साहित्य भी। अपनी कोख का होवे तो स्वतः स्तनों में दूध उतर आता है। जिनावर भी उनके होते हुए दूसरे बच्चों से प्रीत नहीं करते। नाड़-नाता नहीं तजते। लेकिन स्वार्थ के दलदल में फँसकर न ही रिश्तों की मर्यादा रखी जाती, न ही गोत की और न ही पूत की। स्वार्थ मनुष्य का बड़ा दोषी।
चुनाँचे न सनातन पलता न ही रिश्ता। स्वार्थ त्याग दें तो भाई से अधिक कोई प्रिय नहीं। और स्वार्थ रखे तो भाई से अधिक कोई बैरी नहीं। फिर स्वार्थ में लथपथ हुए कौन कविता या साहित्य की गरिमा रखेगा?
सुकरात की मिसाल दिए सभी मर्म स्वतः ही स्पष्ट हो जाएँगे। विष देने की पूरमपूर जानकारी होते हुए भी सुकरात के हिरदे में बिल्कुल ही हलचल नहीं हुई। वहाँ एथेंस राज की जनता सुकरात के लिए विष की तैयारी में रुकी हुई थी और यहाँ औघड़ सुकरात संगीत की नई धुनें सीखने में मग्न था। मृत्यु के अंतिम क्षण तक वह इस सार की जानकारी से टला। ज्ञान के कठिन मार्ग को छोड़कर वह दूसरी सरल पगडंडी जानता ही नहीं था। तभी तो विष पीने के बाद भी वह ज्ञान की एकाग्रता से नहीं हट सका। जितना बोल सका, उतना बताता गया कि उसकी देह में विष का कहाँ-कहाँ और क्या-क्या असर हुआ। वाणी बाधित होते हुए भी इशारे से तत्काल समझाइश जारी रखी कि उसके अंगों में विष का कहाँ-क्या चमत्कार हुआ है। सुकरात के गात, ज्ञान का यह सनातन था। वह कितना जिएगा, किस तरह जी रहा, कहाँ जी रहा, क्या खा-पी रहा, ओढ़-बिछा रहा—इन सवालों के निमित्त उसकी समझ में कोई प्रत्युतर नहीं था। इस एकछत्र सरीखे सवाल का उसके रोम-रोम में स्पष्ट प्रत्युतर था—फगत ज्ञान के लिए। गुज़ारे के लिए ज्ञान नहीं था, ज्ञान और केवल ज्ञान के लिए गुज़ारा था—खरा-खोटा, कठिन-सरल, टेढा-मेढा गुज़ारा। नंगे पैरों, घर में फटे कपड़े-लते। भले शीत में सर्दी पड़े कि गर्मियों में तपत। वे ही कपड़े, वे ही पूर। लेकिन ज्ञान का एकल अवधूत। ज्ञान और फगत ज्ञान ही उसके जीवन का अर्थ-सार था।
लगे हाथ पाणिनि की मिसाल देने की उमंग पर अंकुश रखना मेरे बस की बात नहीं है। जंगल में घने घुमावदार वृक्षों की छाया में पाणिनि अपने शिष्यों को शब्दों की व्युत्पत्ति समझा रहा था कि अचानक से शिष्यों की एक कोंपल को अज्ञेय बू आई। इधर-उधर देखा तो बाघ नज़र आया। सभी समवेत स्वर में बोले—व्याघ्र... व्याघ्र... व्याघ्र! पाणिनि ने सोचा कि यह बाघ की उत्पत्ति जानने के लिए इनकी जिज्ञासा है। उसे तो ज्ञान की महक के अलावा कोई और महक आती ही नहीं थी। ज्ञान बग़ैर प्रज्वलित सूरज भी नज़र नहीं आता। वह अभी भी व्याघ्र की उत्पति समझाए जा रहा था। शिष्य ने घबराते हुए फिर दोहराया—व्याघ्र... व्याघ्र... व्याघ्र! इस व्याधि से नावाक़िफ़ गुरु ने जब इस ओर ध्यान नहीं दिया तो, अंततः सभी शिष्य अपना जीवन बचाने ख़ातिर फटाफट बंदरों की मानिंद वृक्षों पर चढ़ गए।
और उधर नादान गुरु तो व्याघ्र की उत्पत्ति समझाने में ही मग्न था। शेष सभी बातें उसके लिए अदृश्य थी। लेकिन शिष्यों की तरह बाघ को तो स्पष्ट दिख ही रहा था। उसने पास आकर अपने आहार के लिए आगे पंजा मारा, तब भी पाणिनि व्याघ्र की उत्पति समझाता रहा। और व्याघ्र अपने शिकार को खा गया। जब तक जान थी, तब तक नादान गुरु ने व्याघ्र की उत्पति समझाने में कोई क़सर नहीं रखी और उधर बाघ ने भी उसे खाने में कोई कमी नहीं रखी। ज्ञान के लिए पाणिनि का जीवन तो सफल था जो था, लेकिन अंत समय उसकी मौत भी सार्थक हुई। ऐसी सौभाग्यशाली मौत किसके भाग्य में लिखी हुई? मरते तो एक दिन सभी है, लकिन सुकरात और पाणिनि की मौत जैसा अमर मुकुट तो करोड़ों में किसी एक के माथे ही बँधता है।
सी.पी. बना, आपसे क्या छिपा कि मेरे जीवन और साहित्य के रिश्ते के लिए मुझमें चाहे जितना भी दर्प था, लेकिन सुकरात और पाणिनि का ऐसा सौभाग्य जानकर मेरा सारा अभिमान झड़ गया। सारा गुमान शक्तिहीन हो, बैठ गया। सुकरात और पाणिनि जैसे अवतारी मानुष तो युगों-युगों तक कोई बिरला ही जन्मेगा। लेकिन शांत पोथी के आखरों का भुरट (एक मरुद्भिद वनस्पति का काँटा) पहली बेला कलेजे में लगा, सो हाल भी घड़ी-घड़ी चुभ रहा है। उस पल उचित जानकारी हुई कि फगत कपड़ों पर ही भुरट नहीं चिपकता, बल्कि आत्मा के किसी अदीठ कोने में भी भुरट ऐसे चिपकता है कि ताज़िंदगी दूर नहीं होता। आत्मा के कोने में ऐसे भुरटों की कठिन चुभन ही जीवन का सच्चा आनंद है। शरत बाबू, गुरुदेव अर चेख़व के हर्फ़-दर-हर्फ़ ऐसे अनगिनत भुरट मेरे अंतस में चिपके हुए हैं। सुकरात और पाणिनि की देखा-देखी करना तो मेरे जैसे हज़ार जन्म ही थोड़े होंगे, लेकिन वैसा सपना देखने में क्या दिक़्क़त? दिखे तब तक बुरे सपने क्यों देखने?
ये दो वृत्तांत बाँचने के बाद कौन लेखक क्या लिखता है, किस तरह लिखता है, कितना लिखता है—इन सवालों के लिए मेरी दृष्टि छिलके जितनी भी महत्त्व नहीं रखती। क्यों... क्यों! और फगत क्यों का सवाल मेरे कानों में दौड़ता है। वह जीने के लिए लिखता है कि लिखने ख़ातिर जीता है? यश, प्रसिद्धि, मूल्य और स्वार्थ की पूर्ति के लिए लिखता है कि फगत लिखने के लिए उतावला हो रहा है? उसके लिए साहित्य और फगत साहित्य ही धर्म, देस और भगवान् है। मेरे पास तो आज-कल अबोध सीख के यही शब्द है। माने तो रावळी मर्ज़ी, नहीं मानें तो रावळी मर्ज़ी। कदाचित् आपके बहाने मैं ख़ुद को ही मनाना चाह रहा होऊँ, समझाना चाह रहा होऊँ।
‘पागी’ के बाद ‘कावड़’ की कविताओं ख़ातिर शाबासी देने वाले ख़ूब मिलेंगे, क्योंकि उन्हें ख़ुद के लिए भी इसी तरह पीठ थपथपाने वालों की दरकार है। लेकिन अच्छी सीख देने वाला सपने में ही नहीं दिखेगा। खोटी सीख देने वाले, गोली मारने वालों से भी अधिक बुरे होते हैं। बखत अनुसार पट्टी पढ़ाते हुए, घड़ी-घड़ी चेताने से सर्कस का चतुर बंदर भी मोटरसाइकिल चला लेता है। प्रचंड हाथी भी तीन पैरों पर खड़ा हो जाता है। चौतरफ़ा घूम-घूमकर सूँड से सलाम कर लेता है; फिर मिनख के लिए कविता, नाटक, कथा, उपन्यास कि आलोचना लिखना क्या दूभर? ‘रावत मिष्ठान’ या ‘रावत होटल’ की ठौर लेखक के बहाने कोई ‘रावत पंसारी’ साहित्य का रोज़गार करे कैसा विस्मय?
सच मानिए सी.पी बना, मेरे बेशऊर अंतस में कई बार ऐसे डरावने सवाल खदबदाते हैं कि चोरी, व्याभिचार और हत्या की तरह साहित्य को अपराध मानने पर कितने’क लेखक क़लम थामने का संकल्प लेंगे लिखने का स्वभाव पोषित करते रहेंगे। उस वक़्त साहित्य का धंधा करने वाले पंसारी तो किसी गली-कूचे में ढूँढ़े नहीं मिलेंगे। यदि कोई अरबों-खरबों का मालिक अनपढ़ मायापत यह फ़रमान जारी करे कि देश के लेखक, पत्रकार याकि कलावंत लिखने, गाने और चित्रकारी का हुनर हमेशा के लिए छोड़ दें तो उन्हें अपनी-अपनी बुद्धि अनुसार पाँच, दस या बीस हज़ार रुपये महीने के हिसाब से मिलेंगे तो कितने’क अवधूत लिखना-गाना-कोरना कि अख़बार निकालना जारी रखेंगे। मेरी समझ में सात पीढ़ियों तक साहित्य या कला को लेकर ऐसा प्रण नहीं लें, तो अपने देश भारत का नाम बदल दूँ।
रूप और यौवन के रोज़गार के बनिस्बत आखर और कला का रोज़गार बहुत बुरा; क्योंकि मरे बाद किसी ‘सती-साध्वी’ स्त्री से अपनी देह के बहाने रूप का रोज़गार हरग़िज ही नहीं होता, लेकिन लेखक के सौ बरस पहुँचने पर उसके आखरों का रोज़गार तो अक्षुण्ण रहता है। आखरों का अमृत ही विरला होता है और आखरों का विष भी। अमृत के बनिस्पत विष का रोज़गार बहुत अच्छा चलता है। और चलता भी बहुत नि:शंक।
बचपन में, खेल की तरह कविता या कहानी लिखने के लिए मन बहुत तड़पता है, लेकिन बच्चों की वे रचनाएँ खेल के मानिंद ही निर्दोष और निर्मल होती है। अंततः समझ विकसित होने पर स्वार्थ के वशीभूत, आखर-शब्दों का यह धंधा जेब काटने से भी ज़्यादा हीन होता है। जेबकतरा तो फगत जेब ही काटता है, लेकिन शब्दों का पंसारी तो आत्मा को चीरा लगाता है। अंतस में सड़ाँध लाता है। भावी पीढ़ी के लिए कलंक पोतता है। मूल्य की जगह चरित्रहनन करता है, स्वभाव को रोशनदान में रख देता है। आत्मा के चिह्न मिटाता है। पूँजी की धाक पर जब साँच, धर्म, तीर्थ, देवी-देवता, परमेश्वर ही नाचने लग जाए तब बेचारे लेखक के पास क्या सामान? व्यापार करने वाले बंजारे ठान ले तो चाँद, सूरज और नवलख तारे को भी अपनी पोटली में भर दें। मेरी यह बात अखरेगी सी.पी बना कि जब तक पूँजी का क्षय नहीं होता, आखर-शब्दों का मलीन रोज़गार किसी तिरसिंघ जी के रोके नहीं रुकेगा।
कबीर, मीरा और गुरुदेव जैसे अवतारी तो दुर्लभ ही जन्मेंगे, अंतस जिनका पूँजी के जादू-टोने से विचलित नहीं होगा। लेकिन ऐसे विरले स्वप्नों की आस तजने पर तो मनुष्यता का अंश ही विलोप हो जाएगा। हरेक की कावड़ के सुरंगे चित्रों में कालिमा पुत जाएगी। पूँजी का चूर्ण ऐसा ही होता है—कबूतरों तक का मांस हिला देता है। सौ अपराधों का एक हिसाब कि नित बासी मुँह अपने आपको यह सवाल पूछो कि मैं क्यों लिखता हूँ? क्यों लिखता हूँ! जिसका जैसा सामर्थ्य होगा, इस सवाल के दर्पण में वैसा ही प्रतिबिंब स्वतः दिख जाएगा। भूमिका बाबत मेरी यह हिदायत नहीं भूले तो सच में आपकी क़लम से स्याही की जगह दूध रिसेगा। आपके अंतस में मुझे वैसे कण प्रत्यक्ष दिखते हैं। इन सवालों के आगे बाक़ी सभी सवालों की गुळगाँठें (एक प्रकार की गाँठ, जो आसानी से नहीं खुलती) स्वतः खुल जाएँगी कि क्या लिखूँ? कैसे लिखूँ? वेद, पुराण, उपनिषद, महाभारत, रामायण, सूर, कबीर, मीरा इत्यादि के अमृत-आखर इसी ‘क्यों’ का जवाब है। पीछे मुड़कर देखें तो गुरुदेव रविबाबू के हर्फ़-दर-हर्फ़ इस सवाल का निरंतर उदाहरण मिलता है—ढूँढ़ने वाली आँखों की ज्योति ज्यों। पैरों के नीचे की ज़मीन जिस तरह नज़र नहीं आती, उसी तरह ऊमरां-दर-ऊमरां (ऊमरां—खेत में बनी हल रेखा) हिलोरे खाता लोक-साहित्य आज के पढ़े-लिखे अनपढ़ लोगों को आँख को नज़र नहीं आएगा। बूँटे-बूँटे अमोलक मानक-मोती जड़े हैं, कंचों से उनका क्या विनिमय हो सकता है? किसके आगे रोएँ? फ़रियाद करें? आज जैसे अंधे-बहरे, अविश्वास से घर-आवारा संरक्षक तो कभी नहीं हुए। आगे की आगे के लोग जानें। इस आवारा और लफ़ंगे राज का अंत आए ही शोक मिटे तो मिटे। डाह ठंडी हो तो हो।
लोक साहित्य के अथाह दरिया में जो व्यक्ति ग़ोता लगाएगा, उसे हथेलियाँ भर अमोलक मोती प्राप्त होंगे। कितनी कहावतें, कितने गीत, कितनी पहेलियाँ, कितने आख्यान और कितनी कहानियाँ इस असीम समंदर की लहर-दर-लहर प्रदीप्त है। सी.पी. बना, आप युवा कवियों की आँखों में उजास हो, आप दोनों हाथों से इन अमोलक मोतियों को एकत्र करने में पीछे मत रहना। स्वतः कबीर और मीरा की कड़ियाँ आपके गले गुनगुनाने लगेंगी। आपका ‘पागी’ (पद चिह्नों को जानने वाला) अभी तक किसको ढूँढ़ रहा है? क्यों निर्जन घूम रहा? एक क्षण का भी विलंब मत करो और लोक साहित्य के इस अमूल्य ख़ज़ाने की शीघ्र अच्छे से टोह लीजिए। अविश्वसनीय नगीनों की परतें बिछी हैं। लेखक के जवान होने की अभिज्ञता तो पचास पार ही खिलती है। नित नई पढ़ाई के वहम में इन विश्वविद्यालयों का अज्ञान तो अपने देश का जैसे नाम ही उठा देंगे। आज इस आधुनिक विद्या का प्रताप है कि सबसे पहले पर-देशी और भारत के पढ़े-लिखे लोग ही हैं, जो बड़े नगरों में कुलबुलाते हैं। पूँजी के पनपते व्यापार के लिए ये अख़बार, ये कारख़ाने, ये दफ़्तर, ये आयोग, आयोजन, भाषण, भीड़, विश्वविद्यालय, प्रकाशक, पोथियाँ, फ़िल्में और दूरदर्शन का यह फूहड़पन हदभांत ज़रूरी। जैसे बकरे को हलाल करने के लिए छुरी खलती है, उसी तरह पूँजी की वृद्धि के सहारे परंपरा को नष्ट करने के लिए, कमाई निमित्त यह आधुनिक विद्या खलती है। अज्ञान के अँधेरे में ज्ञान का भरम ज़रूरी है।
सी.पी. बना! एम.एस.सी. के बाद आप भी अंततः डॉक्टर बन ही गए, लेकिन इस पढ़ाई को भूले बिना आप सचमुच ज्ञान की झलक ही क्या देख लो! आए बरस अनगिनत डॉक्टरों की यह बढ़ती भीड़ ने भी इस देश को हिमालय पहुँचा दिया, फिर किसको दर्प दिखाएँ? कविता, नाटक या कहानियों के सृजन के बाबत ज्ञान का यह वहम ही विचलित करता है। राम जानें, इस अज्ञान की पोटली कैसा व्यापार बँधेगा, कैसा विकास होगा! इस अंधी तकनीक के साँचे में कैसा-कुछ मनुष्य ढलेगा? मशीनों के बढ़ते उपयोग की खटपट में मनुष्य अपना ज़िक्र, अपनी मुस्कान और अपनी गुनगुनाहट ही भूलने लगा है। कबीर जैसे औघड़ गड़रिये बिना इस मजबूत एवड़ की लकड़बग्घों से रक्षा ख़ुद राम या रहीम के प्रताप से भी नहीं होगी।। बखत पर ही आपकी अच्छी पंक्तियाँ याद आ गई—
थारै तांणा नै पाछौ तांण कबीरा,
इण बेजा में पड़ गई गांठ कबीरा।
कबीर के बेजे में उलझी गाँठें खोलने के लिए आज के लेखक की ज़िम्मेवारी बहुत-बहुत बढ़ गई। आपकी क़लम के आखरों को अणु बम से टक्कर लेनी है, फगत टक्कर लेते ही उसे तैयार नागासाकी के कुरुक्षेत्र में उसे अंतिम महाभारत जीतना है। अन्यथा पूरी दुनिया, सर्वजन, सर्व जीव-जिनावरों और तमाम वनस्पति का क्षय—पल भर में। लेखक की क़लम और उसके आखरों का महत्त्व किसी युग ऐसा प्रकट नहीं हुआ और न ही होगा। लेकिन पूँजी की सीढ़ी पर धर्म, ज्ञान-विज्ञान आदि ईश्वर की तरह लेखक की क़लम उसकी भाषा, उसकी वाणी गिरवी रखी हुई है—बहुत मुश्किल से छूटेगी। क्योंकि बाज़ार, बनिया और बैरी सभी अदृश्य, प्रत्यक्ष हों वार करें। वे चौतरफ़ा चापल्योड़ा लेकिन कहीं नज़र नहीं आते। सर्वव्यापी लेकिन अप्रत्यक्ष। पूँजी के इसी परमेश्वर का संहार करना है—क़लम के वश और शब्दों-अक्षरों के प्रताप से। तब लेखक क्या लिखता है, कब और कहाँ लिखता है— इन सवालों से हटकर फगत एक सवाल के जवाब से हमेशा जूझना है कि वह क्यों लिखता है?
आज का कवि तुक और छंद का बंधन तोड़कर अनजाने ही अतुकांत और मुक्तछंद के रस्ते लग गया, इससे आसानी से छुटकारा नहीं संभव। लगा गया सो लग गया। समाजी और परंपरा से जुड़े हुए व्यक्ति के लिए रीत के बंधन के बिना काम ही नहीं चलेगा। वह पुरानी रीत तोड़ता है और नई रीत रचता है। रीत और कुरीत ही व्यक्ति के पंख और दामन दोनों है। तुक से मुक्त होने की कोशिश की तो आज का कवि मुक्तछंद के दामन की आफ़त में फँस गया। अतुकांत ही रीत बन गई। नायिका-भेद के नखशिख अलंकार से अपच हुए स्वच्छंद प्रेम और काम का जादू उसकी क़लम में उतर गया। बाज़ार की खपत के लिए ये बनावटी गुर स्वतः ही प्रकाशक और लेखक को रोक लेते हैं। तब लेखक को अपने साहस से चौकस होकर ख़ुद से घड़ी-घड़ी यह सवाल पूछना पड़ेगा कि वह क्यों लिखता है? फगत इस ‘क्यों’ सवाल के फुफकारते प्रत्युतर में ही उसे अपना मार्ग ढूँढ़ना पड़ेगा। टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडी के सहारे हरगिज़ संपूर्ण नहीं होगी।
पहले सजी-सँवरी, आभूषणों से आच्छादित नायिका के आस-पास कवि परिक्रमा देता था। अब नग्न, अर्धनग्न स्थिर स्त्री से पार पाए बिना लेखक को छुटकारा कहाँ? लेकिन आपकी बुद्धि को अवश्य सराहना पड़ेगा कि न ही आपके पागी (चंद्रप्रकाश देवल का पहला कविता-संग्रह) को स्त्री के इस नग्न रूप की खोज थी, न ही आपकी ‘कावड़’ में स्त्री के अर्धनग्न चित्र है। इस ख़ातिर जितना शुक्रिया कहूँ, उतना ही कम। पर क्या लिखते हैं, कैसे लिखते हैं—इस झंझट में वे ही विषय और वे ही अप्रिय वितान। रीत से पीछा ही नहीं छूटता। और यह पीछा तभी छूटेगा जब आप क़लम पकड़ने से पहले अपने आपसे बार-बार यह एक ही सवाल पूछेंगे—मैं क्यों लिखता हूँ? क्यों लिखता हूँ मैं?
और इस सवाल का जवाब फगत क़लम और अक्ल की युक्ति से बिल्कुल नहीं दिया जाएगा। इस सवाल का जवाब पूरे जीवन से दिया जाएगा, पूरी देह से दिया जाएगा। पूरे अंतस से इस सवाल का जवाब दिया जाएगा। तमाम आँतों की उलझनों और हृदय की हिलोरों से दिया जाएगा। रक्त-चर्म और हड्डियों से दिया जाएगा। दिल और दिमाग़ से दिया जाएगा। आँखों की ज्योति और वाणी के प्रताप से दिया जाएगा। जिस भाँत इस सवाल का उत्तर कबीर ने दिया, मीरा ने दिया—उसी तरह भावी जीवन के साहस के सहारे दिया जाएगा।
अभी आपके सृजन का श्रीगणेश ही हुआ है। शेष जीवन क़लम के आखरों की आरती उतारने के लिए बचा हुआ है। बिल्कुल विलंब न करें। समय से बोए मोती ही फलित होते हैं। प्रत्यक्ष मिलेंगे तो मैं घड़ी-घड़ी इस बात के लिए उकसाऊँगा कि ज्ञान-विज्ञान की नई-नई पोथियाँ बाँचना ही लिखने का दूसरा नाम है। आपने बाँचने का नित नया आनंद नहीं उठाया तो आपके पाठकों को कैसे अनांदित करेंगे? कवि-लेखक के लिए रोटी, कपड़े, मकान और हवा से भी अधिक प्रतिनिधि किताबों का ज्ञान ज़रूरी। यदि एक बखत की रोटी खाए बिना नहीं चलता तो, एक समय बिना पढ़े कैसे चल जाता? आप कवि हैं—मेरे अनुभवों की इतनी सीख ही बहुत। इससे अधिक बक-बक न मुझे फबती, न आपको। रूबरू मिलेंगे तो भी यही सीख और अनुपस्थिति में कागद के मार्फ़त भी यही सीख। हाँ-हूँ तो हमेशा करते हैं, मानते नहीं हैं। इसमें हानि मेरी नहीं, बल्कि आप ही की है। यदि यह पत्र और यह सीख भूमिका की गर्ज पाले, तो छाप दीजिए, अन्यथा ख़ैर-सलाह! मैं बिल्कुल बुरा नहीं मानूँगा—मेरे से अधिक यह बात आप जानते हैं। आपको इतनी हिदायत देकर विदा करता हूँ। हिये उतारने की कोशिश करना, फिर आप जैसे कवि आप ही होंगे।
आपका
बिज्जी
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