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‘अर्थात्’ की सातवीं कड़ी : कुँवर नारायण की कविता में भारतीय आधुनिकता का वैकल्पिक आख्यान

ध्यातव्य है कि यह वर्ष कुँवर नारायण की जन्मशताब्दी का वर्ष है। इसी उपलक्ष्य में ‘अर्थात्’ की सातवीं गोष्ठी आयोजित की गई, जिसके तहत कविता के बहाने मनुष्य को समझने का प्रयास शामिल था।

इस कड़ी में कुँवर नारायण के लेखन में उतरते हुए उसमें मौजूद भारतीय आधुनिकता के वैकल्पिक आख्यान के स्वरूप को समझने का प्रयास किया गया। काव्य के इन पहलुओं पर बातचीत करने के लिए हमारे बीच प्रसिद्ध कवि-आलोचक पंकज चतुर्वेदी, लेखक-अनुवादक अपूर्व नारायण, कवि-अनुवादक सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज, आलोचक पंकज बोस और कवि-लेखक अविनाश मिश्र मौजूद रहे। इन सबके बीच जो सबसे आश्वस्ति और संतोष देने वाली बात रही, वह विद्यार्थियों की अधिकाधिक संख्या में उपस्थिति थी। ख़राब मौसम के बावजूद मुखर्जी नगर में इतनी बड़ी संख्या में विद्यार्थियों की उपस्थिति ही ‘अर्थात्’ संगोष्ठी के आकर्षण और सार्थकता का प्रमाण है।

पंकज बोस ने अपने वक्तव्य की शुरुआत शिक्षक दिवस की शुभकामनाओं के साथ की। उन्होंने बताया कि कुँवर नारायण के यहाँ सब कुछ स्वीकार करने का भाव है। उन्होंने कविताओं में प्रारंभ से अंत तक उत्तरजीविता के मूल्य तथा आभ्यंतर चिंतन को चिह्नित किया। ‘आत्मजयी’ का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि कविता पीढ़ियों के बीच संवाद करती है तथा उनमें पूर्वापरता का भाव मौजूद है। उनकी समझ में कुँवर नारायण के लेखन का लहजा गर्वोक्ति का नहीं, बल्कि विनयोक्ति का है। कविता लघुत्तर के मूल्यों का सम्मान करते हुए उसकी महत्ता स्वीकार करती है।

उन्होंने कुँवर नारायण के लेखन के एक महत्वपूर्ण बिंदु—समय—को एक बड़े आयाम में देखने की बात की। कविता में समय की सत्ता को ईश्वर की सत्ता के समकक्ष बताते हुए उन्होंने समग्रता में अपनी बात रखी और कहा कि हमें कुँवर नारायण से अभिव्यक्ति-कला—लेखन, वाचन और श्रवण—सीखनी चाहिए।

सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज ने बताया कि कुँवर नारायण का काव्य-संसार एक समृद्ध मानवीय भाव-कोण से सृजित है, जो पाठकों को वृहत्तर नैतिक संभावनाओं और विकल्पों की दुनिया में आमंत्रित करता है। अपनी कविता में एक नैतिक अकेलेपन से घिरे हुए वह मनुष्य के लिए निरंतर प्रार्थनारत हैं। अपने आपको देख सकने में सक्षम करने वाली और स्वयं से अपने सच बोल पाने का साहस देने वाली मूल्य-समृद्ध आध्यात्मिकता उनकी कविताओं का अनिवार्य तत्त्व है।

उन्होंने कविताओं में समग्रताबोध के तत्त्व को पहचानने की बात की। उन्होंने बताया कि कविताओं में समय की अवधारणा रैखिक या कटी हुई न होकर वृत्तीय है; जिसमें समय, उपसमय और प्रतिसमय के रूप मौजूद हैं। उन्होंने कविता में निहित समेकित अनुगूँजों के स्वर को रेखांकित किया और बताया कि दुरूहता और अर्थ-संशय आधुनिक कविता की दो बड़ी चुनौतियाँ सामने दिखाई देती हैं, लेकिन कुँवर नारायण के यहाँ ये देखने को नहीं मिलतीं।

अविनाश मिश्र ने ‘कुमारजीव’—एक लंबी कथात्मक कविता—पर केंद्रित कुछ सूत्रात्मक टिप्पणियाँ कीं, जो लेख के रूप में विकसित होते-होते रह गईं। उन्होंने बताया कि कुँवर नारायण ‘कुमारजीव’ में एक समय में जाकर एक समय को दूसरे समय में लाते हैं। ‘कुमारजीव’ एक जीवनी-काव्य है। एक अनुवादक का कार्य रचनाशीलता को उसकी अधिकतम सीमा तक विस्तृत और विकसित करना है। कुमारजीव के पास कुँवर नारायण जाते हैं—सगर्व, सतर्क—और लौटते हैं विचारों से भरे एक जीवन के साथ, एक जीवन को व्यक्त करने के लिए।

इसके बाद पंकज चतुर्वेदी ने अपनी बात की शुरुआत उस लेबल—‘इंटेलेक्चुअल टफ़नेस’—से की, जो अक्सर कुँवर नारायण की कविताओं पर लगाया जाता रहा है। इस टिप्पणी का प्रतिवाद करते हुए उन्होंने उनकी तमाम कविताओं के उदाहरण दिए। रॉबर्ट फ्रॉस्ट की मशहूर कविता का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि कुँवर नारायण ने अपने लेखन के लिए वह मार्ग चुना, जो कठिन और नितांत अकेला था।

पंकज चतुर्वेदी कुँवर नारायण के काव्य-गुण की चर्चा करते हुए बीच-बीच में उनके जीवन से जुड़े संस्मरणों और उद्धरणों को भी सामने लाते रहे। ये संस्मरण कुँवर जी की कविता को समझने में महत्त्वपूर्ण तो हैं ही, साथ ही उनके काव्य-संसार को एक विशिष्ट गरिमा भी प्रदान करते हैं। उनकी कविताओं के केंद्र में जीवन में सार्थकता की तलाश की चेष्टा है। इसी क्रम में उन्होंने knowledge beyond knowledge की बात करते हुए कबीर की परंपरा में ही कुँवर नारायण की कविता को देखने का प्रयास किया।

पंकज चतुर्वेदी ने पंकज बोस के इस कथन से अपनी असहमति जताई कि कुँवर नारायण की कविता में विनयोक्ति है। उन्होंने कहा कि कुँवर नारायण अपनी कविताओं में बहुत संभ्रांत, सौम्य और शालीन थे—अंतर्वस्तु में और लहजे से भी—किंतु जितना मैंने पढ़ा है, उसके आलोक में वह ‘विनयोक्ति’ के कवि तो नहीं हैं, हालाँकि हो सकता है कि उनके दो काव्यों ‘वाजश्रवा के बहाने’ और ‘कुमारजीव’ में विनयोक्ति आई हो। पंकज चतुर्वेदी ने सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज के इस बयान से अपनी सहमति व्यक्त की कि कुँवर नारायण के यहाँ मिथकीय काल, इतिहास और वर्तमान अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही समय हैं और अविभाज्य हैं। उनके यहाँ काल एक ही, निरंतर और अखंड इकाई है।

अपूर्व नारायण ने इसी क्रम में आगे जोड़ते हुए कुँवर नारायण की कविताओं में निहित अज्ञात के तत्त्व, प्रकृति और अनासक्ति के भाव को नए सिरे से पढ़ने और समझने की ओर संकेत किया।

‘अर्थात्’ की गोष्ठी का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा प्रश्नोत्तर का रहा। सभी वक्ताओं के वक्तव्य समाप्त होने के पश्चात् विद्यार्थियों के कुछ अत्यंत ज़रूरी और महत्त्वपूर्ण सवाल सामने आए। ये सवाल कुँवर नारायण के जीवन, उनके लेखन, रचना-प्रक्रिया और कविताओं में मौजूद वैकल्पिक आख्यान के स्वरूप से जुड़े थे, जिनका वक्ताओं ने समुचित उत्तर देने का प्रयास किया। समय की कमी के कारण बहुत-से प्रश्न रह भी गए।

एक संगोष्ठी का हासिल यह भी है कि वह आपको जिज्ञासु बनाए और उस चिंतनधारा में ले जाए, जिसके लिए संगोष्ठी आयोजित की गई है। यह मात्र दो-तीन घंटे सुनने की एक औपचारिकता बनकर न रह जाए। इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो कुँवर नारायण की जन्मशताब्दी के अवसर पर आयोजित यह पहली गोष्ठी, जिसकी शुरुआत ढेर सारी प्रश्नानुकुल जिज्ञासा और मुकम्मल व्याख्यानों से हुई है, वर्ष भर कुँवर नारायण पर होने वाले व्याख्यानों-आयोजनों की एक सुंदर शुरुआत है।

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‘अर्थात्’ की गई गोष्ठियों की रपटें यहाँ पढ़िए : ‘अर्थात्’ की छठी कड़ी : प्रगतिवाद पर बातलंबी कविताओं पर खुलकर हुई बहस : ‘अर्थात्’ की पाँचवीं कड़ी रही ख़ास | ‘अर्थात्’ की चौथी कड़ी में जमकर हुई चेख़व-चर्चा | ‘अर्थात्’ की तीसरी गोष्ठी में खुले छायावाद के बंध | नई कविता और संवाद का दूसरा पड़ाव | ‘अर्थात्’ की शुरुआत

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