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लंबी कविताओं पर खुलकर हुई बहस : ‘अर्थात्’ की पाँचवीं कड़ी रही ख़ास

‘चेख़व के कथा-साहित्य का सौंदर्यशास्त्र’ पर केंद्रित रही ‘अर्थात्’ की चौथी कड़ी के बाद इस बार विवेचना का विषय रहा—‘हिंदी की लंबी कविताएँ और उनका पुनर्पाठ’। इस पाँचवें आयोजन में बतौर वक्ता कवि-द्वय—देवी प्रसाद मिश्र और महेश वर्मा आमंत्रित थे।

लंबी कविताओं पर चर्चा शुरू होने से पहले ‘लंबी कविता’ नामक विशेषणात्मक संज्ञा को मोहित ने अवधारणा के स्तर पर समझाया। उन्होंने ‘लंबी कविता’ को महाकाव्य और खंडकाव्य के बाद की पीढ़ी बताते हुए, मुक्तिबोध के हवाले से इसे भावना और विचार के मिश्रण से उपजे काव्यखंड के रूप में स्पष्ट किया।

इस दरमियान कुछ लंबी कविताओं के चुनिंदा अंशों का पाठ भी किया गया, जिसमें पाठ-क्रमानुसार देवी प्रसाद मिश्र की कविता ‘मुसलमान’ (पाठ : जितेंद्र), अदम गोंडवी की ‘चमारों की गली’ (पाठ : नरेश), भवानी प्रसाद मिश्र की ‘सतपुड़ा के जंगल’ (पाठ : अतुल प्रिया) और निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’ (पाठ : शुभम) प्रमुख रहीं।

इस पाठ के बाद समीक्षा की बारी आई। इस सिलसिले में तन्मय ने नागार्जुन की लंबी कविता ‘हरिजन-गाथा’ के अस्मितामूलक पक्ष की तरफ़ इशारा करते हुए इस कविता को बेलछी कांड से प्रभावित बताया। उन्होंने ‘सुपरमौज’ जैसे शब्दों की ओर श्रोताओं का ध्यान खींचा और काफ़ी कथनसघन (quoteful) तरीक़े से बात रखी जो कि उत्तरकुंजियों के लिए काफ़ी फ़ायदेमंद है।

इस अवसर पर इन पंक्तियों के लेखक ने सौमित्र मोहन की लंबी कविता ‘लुकमान अली’ पर अपने विचार रखते हुए नायक को फ़्रायडीय इड (Id) का भरा पतीला बताया और हर इच्छित, किंतु अशक्य लक्ष्य की पूर्ति के प्रयास में संलग्न बताया (स्वप्न में)। इस कविता में प्रशस्य प्रतीक, संदर्भ और वर्ण-योजना के माध्यम से कवि ने समय का अंग भंग कर उसके अंगों पर व्यंग्यपात भी किया है। एक समीक्षावचन के दौरान पैटर्न तलाशने की कवि की नाकाम कोशिश को भी यहाँ रेखांकित किया गया। अध्येताओं के साथ अक्सर यह समस्या हो जाती है कि वे कविता पढ़ते समय पैटर्न तलाशने लगते हैं और इस फेर में वे विसंगतिबोध के भावशिल्प को समझना ही भूल जाते हैं।

उज्ज्वल शुक्ल ने विष्णु खरे की लंबी कविता ‘अग्निरथोवाच’ पर बोलते हुए स्पष्ट किया कि कविता में अग्निरथ अपने श्रम के मूल्य की माँग करता है और अपने होने को दर्ज कराता है। इस क्रम में यदि उसे कृष्ण के विरोधाभास को लेकर उन्हें धिक्कारना पड़ा है तो उसमें उसने संकोच नहीं किया है। विष्णु खरे विवरण के माध्यम से विषय और टारगेट को घेरेबंद कर लेते हैं। वह अपनी विवरणात्मक काव्य-शैली में महाभारत के अग्निरथ की तरफ़ से छूट गए सवालों को मानव-अस्तित्व-भाव के साथ इस कविता में घोलकर पेश करते हैं।

शुभम ने राजकमल चौधरी की लंबी कविता ‘मुक्तिप्रसंग’ को ज़िंदगी से समय की माँग की एक वीभत्स कविता के रूप में पेश किया।

इस बीच लंबी कविता के शिल्प को लेकर किए गए सहभागियों के सवालों पर हस्तक्षेप महसूस करते हुए आमंत्रित वक्ता-कवि महेश वर्मा ने श्रोताओं को लंबी कविता की लेखन-शैली से अवगत कराया। ‘असाध्य वीणा’, ‘आत्मजयी’ और ‘वाजश्रवा के बहाने’ जैसी लंबी कविताएँ मिथकीय कथासूत्र का पथानुगमन करती हैं; जबकि ‘लुकमान अली’, ‘अँधेरे में’ और ‘मुक्तिप्रसंग’ जैसी लंबी कविताएँ स्वप्न, फ़ैंटेसी और एब्सर्ड-तत्त्वों को साथ लेकर चलती हैं। इन कविताओं में अतारतम्य मुख्य उपकरण रहता है।

इस क्रम में महेश वर्मा ने आगे कहा कि विसंगतता का साहित्य में प्रयोग एक नई विधा थी, जिसका आधुनिक उद्भव बीसवीं सदी की शुरुआत में ही हो गया था। इसके लिए फ़्रांस के कई शहरों में तो बाक़ायदा ऐसे होटल बनाए जाते थे, जिनमें अफ़ीम का सेवन करके लेखक विसंगतियों से भरी रचना करते थे, जिनमें एक वाक्य प्राय: दूसरे वाक्य से असंबद्ध रहता था। 

इन कवियों की सामाजिकता पर उठे सवाल का जवाब देते हुए महेश वर्मा ने कहा कि अपने विखंडन और निराशा पर लिखना भी अपने समय पर टिप्पणी करना है।

इसके बाद देवी प्रसाद मिश्र ने कहा कि एक कवि ही है जो ऑर्गेनिक है, जिसका कारण उसकी विक्षिप्ति (दीवानापन) है। उसने सच कहने के लिए प्रदत्त ज्ञान का चोग़ा उतार फेंका है। देवी प्रसाद युवाओं को मेटाकॉग्निशन (Metacognition) का सुझाव देते हैं, ताकि वे सर्वानुमतिवाद के संजाल में न फँस पड़ें। उन्होंने लंबी कविता को महाकाव्य का प्रत्याख्यान बताते कहा कि महाकाव्य का मक़सद आदर्श की स्थापना करना है, जिसमें नायक में प्रच्छन्न अधिनायकत्व पनप उठता है। इसी का विरोध करते हुए लंबी कविता प्रलाप जैसे अतिकथनों को प्रश्रय देती है। 

‘राम की शक्तिपूजा’ की शक्ति-साधना पर सवाल उठाते हुए देवी प्रसाद मिश्र ने कहा कि उत्पीड़क (रावण) की शक्ति उत्पीड़ित (राम) का आयुध कैसे बन सकती है! शायद इसका उत्तर कविता ही दे देती है : ‘शक्ति की करो मौलिक कल्पना!’ (शक्ति की प्रवृत्ति प्रयोक्ता की प्रवृत्ति पर बहुत अधिक निर्भर करती है।) उन्होंने ‘राम की शक्तिपूजा’ में सुझाए गए अनुष्ठानात्मक तप को तत्सममय और तत्कालीन परिस्थितियों के हिसाब से आउटडेटेड माना और समर्पण जैसे गुणों को सामंती गुण। अपने वक्तव्य में उन्होंने आगे अज्ञेय की लंबी कविता ‘असाध्य वीणा’ को भी प्रश्नांकित किया। उन्होंने कहा कि काव्यत्व का स्पेक्टेकल है, लेकिन उसे राजत्व का परिपार्श्व क्यों चाहिए?

इस वक्तव्य के बाद इन कविताओं में सामंतवाद और आध्यात्मिक रहस्यवाद कैसे अपनी उपस्थिति रखता है... ऐसे तमाम सवालों पर जमकर स्वस्थ तर्क-वितर्क हुआ।

देवी प्रसाद मिश्र ने अपने वक्तव्य में मुक्तिबोध की लंबी कविता ‘अँधेरे में’ को पॉलिक्राइसिस (polycrisis) के लिए एक पॉलिवॉकलिक (polyvocalic) कथा के रूप में प्रस्तावित करते हुए उसे आज के समय में अधिक प्रासंगिक बताया।

अंत में देवी प्रसाद मिश्र ने इस आयोजन से बहुत प्रसन्न होकर इस चर्चा-शृंखला को जारी रखने का उल्लसित सुझाव दिया और ‘अर्थात्’ के संयोजक कवि-लेखक दीपक जायसवाल को ‘प्रोफ़ेसर ऑफ़ प्रैक्टिस’ (Professor of Practice) कहा।

इस अवसर पर कहना न होगा कि विद्यार्थियों द्वारा पूछे गए निर्भीक प्रश्न ‘प्रार्थना के शिल्प में नहीं’ थे।

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‘अर्थात्’ की गई गोष्ठियों की रपटें यहाँ पढ़िए : ‘अर्थात्’ की चौथी कड़ी में जमकर हुई चेख़व-चर्चा‘अर्थात्’ की तीसरी गोष्ठी में खुले छायावाद के बंध | नई कविता और संवाद का दूसरा पड़ाव | ‘अर्थात्’ की शुरुआत

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