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बंदर : डोपामाइन की भूखी दुनिया में बेचैनी परोसती फ़िल्म

डायनासोर के जाने के बाद, इस नीले ग्रह पर लगभग सब कुछ नए सिरे से हुआ। स्तनधारियों के विकास का रास्ता साफ़ हुआ। क्रमिक विकास (evolution) चलता रहा। लाखों वर्ष पूर्व होमो-सेपियंस आए। दो सौ साल पहले उनमें एक इंसान हुए चार्ल्स डार्विन। उन्होंने विज्ञान की किताब में कुछ पन्ने लिए और हमें विकासवाद का सिद्धांत (Theory of Evolution) दिया। उन्होंने तर्क दिया कि हमारे और बंदरों के साझा पूर्वज थे। उन्होंने कभी नहीं कहा कि बंदर ही आगे चलकर इंसान बने। अनुराग कश्यप ने उनकी इसी बात का फ़ायदा उठा लिया और कहा कि इंसान ख़ुद अपने पिंजरे का बंदर है।

इसी नाम से अनुराग कश्यप की यह नई फ़िल्म ‘बंदर’ हाल में रिलीज़ हुई। अनुराग थिएटर एक्सपीरियंस को सिर्फ़ Entertaining और Fun रखने की बनी-बनाई अवधारणा को तोड़ने के लिए जाने जाते हैं। यहाँ भी वह अपनी पहचान को बरक़रार रखते हुए, ‘बंदर’ फ़िल्म में आपको असहज होने की चरम सीमा तक ले जाते हैं।

फ़िल्म में क्या है?

फ़िल्म एक बाइक सीन के साथ खुलती है और जेल की सलाख़ों के पीछे ख़त्म होती है। दो डॉट को कनेक्ट करती रेखा के बीच पूरी कहानी घटती है। कहानी में मुंबई है। एक अधेड़ उम्र का सेलेब्रेटी आर्टिस्ट है। इसकी पीठ और दाँत में दर्द है। ढलते स्टारडम और घर की लटकी ईएमआई के बीच, डेटिंग साइट पर मिली लड़की के साथ सेक्स होता है। फ़िल्म इसके बाद के उस हिस्से पर बात करती है, जिसपर जेल में बंद कई लड़के बात करना चाहते हैं—लेकिन तारीख़ ही नहीं आ रही।

उत्तर प्रदेश में अवध के हमारे इलाक़े में एक शब्द चलता है—‘मुतन्ना’। यह, वह जगह होती है जहाँ पुलिस के उठाने और ज़मानत मिलने से पहले आरोपी को रखा जाता है। शब्द है तो उससे जुड़ी कहावत भी है। ‘दुई दिन मुतन्ने मा बंद रहिएं तब पता चलिहै’—यानी : जब 2 दिन मुतन्ने में बंद किया जाएगा, तब आदमी की सारी हेकड़ी उतर जाएगी।

मुतन्ना उस जगह का पर्याय है, जहाँ आदमी बिल्कुल भी नहीं जाना चाहता। यह कोई काल कोठरी नहीं है। यह वह जगह है, जहाँ इंसान का वजूद बजबजाता है। बंदर फ़िल्म का सेकेंड हाफ़ देखने के बाद आपको यह मुतन्ना दिखाई देगा।

इंटरनेट क्रांति ने बहुत लोगों को आवाज़ दी। कुछ साल बीते जब #Metoo मूवमेंट चला था। जहाँ इस तरह के केस रोज़ सामने आ रहे थे। महिलाएँ अपने ऊपर हुए यौन उत्पीड़न और शोषण को लेकर आवाज़ उठा रही थीं। अभियान को मोमेंटम मिला और दुर्व्यवहार के ख़िलाफ़ वैश्विक-सामाजिक आंदोलन बना। सेलिब्रिटीज़ से लेकर राजनेताओं की नंगई बेपर्दा हुई। लेकिन जब बहुत तेज़ आँधी चलती है तो हवा में टीन भी उड़ जाती है और कई बार निर्दोष के गले पर गिरती है। यहाँ ‘कई बार’ शब्द का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि #Metoo के सारे मामले झूठे थे। लेकिन जो थे, उन्हें ‘100 में 1 निकल गया तो क्या फ़र्क़ पड़ जाता है’ जैसे नहीं लेना चाहिए। यह फ़िल्म #Metoo अभियान को लेकर निर्दोषों के साझा जवाब जैसी लगती है। ऐसा कुछ कि 100 सोनार की, 1 लोहार की।

किसी का जेल जाना—सज़ा है या नहीं, इससे ज़्यादा इस बात का प्रतिबिंब है कि वह समाज में रहने के लायक़ नहीं है। यही विचार इस फ़िल्म की धुरी में है। अगर आपको जेल की दुनिया नर्क लगती है तो यह फ़िल्म उसके बाहर घूम रहे लोगों के नरकीय व्यवहार की परतें खोलती है। यह दिखाती है कि अपराध और सज़ा का सिस्टम कैसे काम करता है, सुनवाई कैसे टाली जाती है। शिकार और पीड़ित के बीच कितना सतही विभाजन है—फ़िल्म में सब देखने को मिलता है।

जब फ़िल्म जेल के अंदर पहुँचती है, तब आपको असली अनुराग दिखाई देते हैं। यानी जो जैसा है, वो वैसा दिखाते हैं। जर्जर इमारत। 20 लोगों की बैरक में 50 से ज़्यादा लोग। रेंगते कॉकरोच। शौचालय में उथलाती टट्टी। पूँछ कटी छिपकलियों का नशा करते क़ैदी। खाने में कीड़े, गर्मी, सड़ांध और भी बहुत कुछ। मैं मान रहा हूँ कि आपको यहाँ पढ़कर घिन आ रही है। सोचिए अनुराग ने ये बड़े पर्दे पर दिखाया है।

एक चीज़ इसमें ग़ौर करने वाली लगी, वह है अंदर के क़ैदियों का रेप के आरोपी के लिए व्यवहार। कोई डकैती में आया है, कोई मर्डर में। लेकिन वो सब 376 (भारतीय दंड संहिता, आईपीसी की धारा 376) यानी बलात्कार के आरोपी को अलग नज़र से देखते हैं। उसके साथ बैठना पसंद नहीं करते। उसको अपने ग्रुप में शामिल नहीं करना चाहते। यह परिवर्तन उस बजबजाते दलदल के बारे में बिना कुछ बोले बहुत कुछ कहता है।

अधेड़ आर्टिस्ट का किरदार बॉबी देओल ने निभाया है। फ़िल्म में बॉबी का एक अलग अवतार देखने को मिलता। ‘एनिमल’ फ़िल्म में पीछे ख़ड़े हवाई जहाज़ के आगे अपने सौतेले भाई से लड़ते बॉबी को तो सबने देखा, अब सलाख़ों के पीछे तड़पते-बिलखते-रोते बॉबी दिखाई देंगे। अभिनय अपने सबसे उच्च स्तर पर तब पहुँचता है, जब उसे करना न पड़े। बॉबी ‘बंदर’ फ़िल्म में उसके क़रीब जाते दिखते हैं।

एक लंबा समय होता है, जब समाज को लगता है कि उनके करने से कुछ नहीं होगा। इस दौरान लोग ‘बोलने से क्या हो जाएगा’ पर ज़्यादा भरोसा करने लगते हैं। माध्यम चाहे जो भी हो कला कभी उदासीन नहीं रहती। वह बनती-ढलती रहती है। जब समाज किसी मुद्दे पर बांस जैसा खोखला हो जाए तो कला को उसमें बहने का रास्ता दिखता है। कभी-कभी यह बिल्कुल एब्स्ट्रैक्ट फ़ॉर्म में आती है। बिल्कुल सपाट तरीक़े से आपके सामने आती है। जिसे समझने के लिए आपको अपने अंदर उतरना है या ख़ुद को ज़ूम-आउट करके देखना है। ‘बंदर’ कुछ इस तरीक़े की ही फ़िल्म है। इसके लिए इस तरीक़े से भी कह सकते हैं कि अच्छे सिनेमा के लिए हर समय डोपामाइन बहना ज़रूरी नहीं है। जब दुनिया लगातार मनोरंजन और तुरंत ख़ुशी चाहती है, तब यह फ़िल्म आपको असहज सवालों और कड़वी सच्चाइयों से सामना कराती है।

‘धुरंधर’ देखते और उस पर बात करते उसका दूसरा पार्ट आ जाता है। लेकिन ऐसी फ़िल्में थिएटर में लगती है और बिना किसी को बताए जल्दी उतर जाती हैं। इसलिए इन फ़िल्मों का समय रहते देखा जाना ज़रूरी है।

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