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पथेर पांचाली : हाशिए पर खड़े जीवन की कथा

मैंने हाल में ‘पथेर पांचाली’ उपन्यास पढ़ा। यह मेरा क़ुबूलनामा है कि इससे पहले बंगाली साहित्य के नाम पर मैंने केवल रवींद्रनाथ ठाकुर की ‘गीतांजलि’ का हिंदी अनुवाद पढ़ा था। यहाँ आपका अंदाज़ा सही है कि बंगाल का नाम लेने पर बहुत लोगों की तरह मेरे दिमाग़ में भी जो पहली छवियाँ उभरती हैं—वे पीली टैक्सी, प्रसिद्ध हावड़ा ब्रिज, संदेश मिठाई या ममता बनर्जी ही हैं। कुछ-कुछ ‘पीकू’ और ‘द नेमसेक’ फ़िल्म के सीन भी सामने आ जाते हैं, लेकिन जो दृश्य पथेर पांचाली पढ़कर जन्मते हैं, वे बिल्कुल अलहदा हैं, वे कल्पना तक में नहीं थे।

विज्ञान ने दुनिया को ढेर सारी काल्पनिक रेखाओं में बाँटा है। ये रेखाएँ विश्व के भूगोल और जलवायु को समझने में मदद करती हैं, और इन्हीं से समय भी निर्धारित होता है। अक्षांश और देशांतर रेखाएँ स्थान बताती हैं। देशों के बीच की सीमा रेखाएँ नक़्शों पर अलग-अलग रंग भरती हैं और इन्हें लाँघने पर कभी-कभी युद्ध तक हो जाते हैं। लेकिन एक रेखा ऐसी भी है जो न नक़्शों पर दिखाई देती है और न ज़मीन पर खींची जाती है। इस पर न तो कंटीली बाड़ लगी है और न ही कोई मील का पत्थर। बिभूतिभूषण बंदोपाध्याय का उपन्यास ‘पथेर पांचाली’ इसी ‘ग़रीबी रेखा’ के पार खड़े एक परिवार की कहानी है।

बिभूतिभूषण बंदोपाध्याय ने उपन्यास में जो दर्ज किया—वह शुरुआती 20वीं सदी का अविभाजित बंगाल है। उन्होंने इसमें ग्रामीण परिवेश का जो ख़ाका खींचा, उसमें सूक्ष्म से सूक्ष्म चीज़ें किरदार बनकर अपना स्थान ले लेती हैं। उपन्यास की धुरी में शख़्स हरिहर, उसकी पत्नी सर्बजया, बेटी दुर्गा, बेटा अपू और गाँव निश्चिंतपुर है। हरिहर घुमंतू पंडित है। काम की तलाश में गाँव और कहानी से महीनों का प्रवास रहता है। सर्बजया ‘पैदा हो गए हैं तो जीना ही है’ की कमोबेश अनिवार्य शर्त पूरी करते हुए बच्चों का पालन-पोषण करती है। भाई-बहन, दुर्गा और अपू बचपन के अल्हड़पन में गुम हैं, लेकिन रात-दिन चटखती मुश्किलों से अछूते नहीं हैं।

मेरे लिए इस उपन्यास से गुज़रने का एक अलग और दिलचस्प कारण भी बन गया था। कहीं पढ़ा था कि ‘दुर्गा’ के किरदार को कहानी में लाने के लिए बिभूति बाबू ने ‘पथेर पांचाली’ का 500 पेज का पूर्वलिखित ड्राफ़्ट फाड़ दिया था। क्या आपको यह तथ्य महीनों से शेल्फ़ में रखी किताब की धूल झाड़कर पन्ने पलटने के काफ़ी नहीं लगता?

उत्तर भारत में संपन्न परिवारों की एक कहावत सुनी है—“इनके यहाँ चावल इसलिए बने हैं क्योंकि आटा ख़त्म हो गया।” लेकिन बिभूति बाबू ने ‘पथेर पांचाली’ के ज़रिए वह दृश्य उकेरा जो दिखाता है कि चावल भी न होने पर आदमी कैसे भूख के आगे दंडवत होता है। यह वह अनिश्चितता है जिसमें दोनों वक़्त चूल्हा जलना भी चुनौतीपूर्ण लगने लगता है। और ऐसे दृश्य एक नहीं कई-कई बार सामने आते हैं। चिलचिलाती धूप से लेकर आंधियों के बीच मूसलाधार बारिश तक नीले आसमान के नीचे निश्चिंदपुर में हरिहर का परिवार ऐसे ही जीवन जीता चला जाता है।

भूख

आँख खुल गई मेरी
हो गया मैं फिर ज़िंदा
पेट के अँधेरों से
ज़ेहन के धुँदलकों तक
एक साँप के जैसा
रेंगता ख़याल आया
आज तीसरा दिन है। आज तीसरा दिन है

—जावेद अख़्तर

बिभूतिभूषण बंदोपाध्याय ने इस उपन्यास में तत्कालीन बंगाली प्रथाओं को भी ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया है। इससे पता चलता है कि इसकी जड़ें कितनी पुरानी हैं। दूर से देखें तो यह उपन्यास तीन पीढ़ी की महिलाओं की अनसुनी पीड़ा का सरगम है। इंदिरा पुरखिन (हरिहर की बुआ), सर्बजया (हरिहर की पत्नी) और दुर्गा (हरिहर की बेटी)। उपरोक्त पंक्ति के ज़रिए यह भी दिखाने का प्रयास है कि इन महिला किरदारों का परिचय एक पुरुष के नाम से ही नत्थी है। बिभूति दा ने शब्दों के ज़रिए क़रीब-क़रीब ऐसी ही पारंपरिक खोड़ को अपने उपन्यास में दिखाने का प्रयास किया है।

जब चहुँओर शोर भरा हो और गतिशीलता ही आदर्श बन जाए, तो साधारण-सी चीज़ ही सबसे अतिसाधारण लगने लगती है। ‘पथेर पांचाली’ का निश्चिंतपुर इसका उदाहरण है। इसे पढ़ने पर प्रकृति से सदेह जुड़ाव महसूस होता है, आप कोलाहल के बीच कलरव को पहचान पाते हैं, आप फ़ैंटेसाइज़्ड गाँव के बंधन को तोड़कर यथार्थ में औंधे मुँह दाख़िल होते हैं। अगर रील में दिखा गाँव का सूर्यास्त और लहलहाते खेतों का ड्रोन शॉट आपके लिए सुकून की परिभाषा है तो बिभूति बाबू के ज़रिए ऐसे ही एक गाँव निश्चिंतपुर में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में दुर्गा की मौत के लिए भी तैयार रहिए।

दुर्गा की मौत के बाद परिवार सामान और सारी मुश्किलात के साथ काशी कूच करता है। काशी के अलिखित संविधान के अनुसार यहाँ मृत्यु—जीवन का अंतिम पड़ाव नहीं है और क़रीब-क़रीब यही इस उपन्यास की भी सचाई है। पन्ने के इस पार भीषण तूफ़ान है, दुर्गा है, मृत्यु है, उस पार चुनौतियों का अथाह समंदर जिसकी लहरें आख़िर तक उठती ही रहती हैं। अंत आते-आते हरिहर को भी साथ लेकर जाती हैं।

उपन्यास ख़त्म करने के बाद सबसे पहले ‘ग़रीबी’ को शब्दकोश में ढूँढ़ा। पर्यायवाची में दरिद्रता, दीनता, मुहताजी आदि शब्द दिखे। ये शब्द उपन्यास के किरदारों की शक्ल लिए हुए थे। सवाल फिर भी उतराता रहा कि ग़रीबी क्या है? दुनिया के अलग-अलग मुल्कों ने अपनी-अपनी सीमा निर्धारित की है। कि फलाँ रूपए से कम कमाने वाला व्यक्ति ग़रीबी-रेखा के उस पार है। उस पार कितने लोग हैं, ये महामारी के दौरान सरकारी राशन की दुकान पर क़तारों में लगे लोगों को देखकर पता लगता है। ग़रीबी दीवार की दरारों में उग आए पीपल जैसी होती है। अगर समय पर उसे नहीं हटाया जाता है तो ज़िंदगी भर, कई बार पीढ़ियों तक उसकी जद में ही रहना पड़ता है।

1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद इंदिरा गांधी एक गुट की अध्यक्ष बनी थीं। तमाम उठा-पटक और राजनीति के बीच 1971 का आम चुनाव हुआ। विपक्षियों के नारों का शोर कह रहा था—‘इंदिरा हटाओ’। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इंदिरा शब्द को ग़रीबी से बदलकर अपना नारा बना लिया। यानी ‘ग़रीबी हटाओ, देश बचाओ’। बदले में मिली ऐतिहासिक जीत। आज और उस पंचवर्षीय के बीच क़रीब 50 वर्षों की खाई है।

अब सत्ता के लिए ग़रीब शब्द अछूत है। घोषणा-पत्रों में ‘ग़रीबी उन्मूलन’ की जगह ‘अंत्योदय’ है। उपन्यास ख़त्म करने के बाद कोई कहे कि इसके बारे में एक लाइन में बताओ तो सिर्फ़ इतना ही लिख पाता—सर, हाशिए पर खड़ा अंतिम व्यक्ति थककर मर गया है!

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