नींद की प्रतीक्षा : निर्मल वर्मा की याद में
शशांक मिश्र
11 फरवरी 2026
कई अनुपस्थितियों से अन्य हाज़िरियों का पंचांग मज़बूत हो जाता है, कई रविवासरीय दर्ज करने के सुयोग बनते हैं। यह हाज़िरी किताब पर लगी। पढ़ने के बाद आख़िरी पन्ने पर। ब-तर्ज़ ‘ब्रुक्स वॉज़ हेयर’ पेंसिल से आख़िरी सफ़े पर तारीख़ें लगभग उकेरी गईं।
पढ़ते समय लिखने का मन नहीं होता। ‘सबकुछ लिखा जा चुका है’ का आभास मन को घेर लेता है। फिर यूँ कि गोया एक जैसी भावनाओं को दूसरे शब्दों की चदरिया क्यों ही चढ़ाएँ। पर अतृप्तता का बोध प्रयोजन का बल वाहक बनता है।
परिवेश में कई स्वर हैं। दीवार पर खट-खट। इमारत के दूसरे तल्ले पर दो जनों की कर्कश बातचीत। कहीं दूर लकड़ी चीरती आरी की आवाज़ भी बह आ रही है। 3 नंबर पर चल रहा पंखा मौन की शांति से बस कुछ क़दम दूर भर है। मैं दिल्ली के सबसे पुराने और पहले गाँव महरौली में पहली मंज़िल के किराए के कमरे में बैठा हूँ।
ख़याल कौंधता है : दिल्ली के पास सबकुछ है। राजधानी है। इमारतें हैं। संसद है। बस समंदर नहीं है। दिल्ली हर रात एक कसक के साथ सोती है। वही कसक जो ग्राउंड फ़्लोर पर बने घर की होती है कि उसके हिस्से में बालकनी नहीं आई।
अभी-अभी निर्मल वर्मा का अंतिम उपन्यास ‘अंतिम अरण्य’ ख़त्म हुआ है। सोचता रहता हूँ कि यह भी कितना बड़ा संयोग है—अंतिम उपन्यास और नाम में भी अंतिम। किताबों पर निर्मल वर्मा का परिचय देखो तो पूरा पन्ना भरा पड़ा रहता है। ज़्यादती ही है कि हमारे हिस्से उनके कम उपन्यास आए, उनके हिस्से कुछ कम उम्र।
यह साल 2018 के दिन थे। ज्वलंत उम्र, लेकिन कुछ बनने-बदलने में व्यस्त। पुस्तकालय जाना शुरू हुआ था। कार्ड बना, किताबें इश्यू हुईं, पर्चियाँ कटीं। तारीख़ें नत्थी हुईं। आप किसी चीज़ तक ख़ुद पहुँचते हैं या पहुँचाए जाते हैं, यह प्रमेय अब तक हल नहीं हो पाई है।
‘Puzzle’ फ़िल्म में Irrfan ने कहा था—“Life's just random. Everything's random. There's nothing we can do to control anything. But when you complete a puzzle, when you finish it, you know that you have made all the right choices.”
उन्हीं दिनों में निर्मल को पढ़ना शुरू किया था। ‘एक चिथड़ा सुख’ घर ले आया था, 15 दिन के लिए। दुर्लभ संस्करण था, नाम की तरह किताब के भी चिथड़े हो चुके थे। मेरी एक दोस्त ने उसे टेप से जोड़ा था। किताब संग ऐसा दुलार जैसे कोई घर का सदस्य हो। किताबें और शब्द भी इतने अंतरंग हो सकते हैं, यह मेरा पहला अनुभव था।
ऊपर से जो आरी चलने की आवाज़ आ रही थी, वह अभी तक आ रही है। निर्मल वर्मा अपने साहित्य में प्रकृति को किरदार बनाकर चलते हैं। यहाँ चीड़ और देवदार सिर्फ़ पेड़ नहीं हैं। उनकी अपनी उपस्थिति है। दु:ख हैं, कहानियाँ हैं, अकेलापन है, और आवाज़ें भी हैं। यह भी नहीं पता वह आरी किस पेड़ की लकड़ी पर चल रही होगी।
निर्मल वर्मा को पढ़ना अपने जिए को परत दर परत उघाड़ना है। पुनर्पाठ विगत की पपड़ी नोच देता है—जहाँ से समय और उसके घाव साफ़-साफ़ दिखाई देने लगते हैं। यह विषाद असहनीय है, नतीजतन वह आँसू माँगता है। आप बच्चों की तरह रोते हैं। और अब ‘देखो, चींटी मर गई’, ‘देखो, चिड़िया उड़ गई’ जैसे मासूम झूठ भी आपका यह प्रपात रोक नहीं पाते।
दिल्ली में समंदर नहीं है, काठगोदाम में ट्रेन की पटरियाँ आगे नहीं जातीं। सोचते हुए शाम को अकारण उदासी घेर लेती है। यह थोड़ी लंबी खिंच जाए तो माथे पर दु:ख के लेप में बदल जाती है। फिर उसी से चेहरे के हाव-भाव, प्रत्युत्तर, हँसी का स्वर तय होता है।
पहले मुझे ख़र्राटों से बहुत दिक़्क़त होती थी। ट्रेन में यात्रा करता और उस केबिन में अगर कोई ख़र्राटा लेने वाला निकल जाता तो ख़ुद को ख़ूब कोसता। एक रात तो ईयरफ़ोन लगाकर तेज़ आवाज़ में भजन सुन काटी थी। यह भी कितना हास्यास्पद है कि ख़र्राटे की आवाज़ काटी भी तो दूसरी तेज़ आवाज़ से।
निर्मल वर्मा ने ख़ारिज किया था कि ‘अंतिम अरण्य’ का केंद्र बिंदु मृत्यु नहीं है। लेकिन मैं नहीं मान पाता। जामिया के इलाक़े में एक क़ब्रिस्तान है जो बहुत लंबा फैला है। मेट्रो से गुज़रता तो दूर से देखता था। निर्मल वर्मा ने कहा था कि इस दुनिया में ‘कई दुनिया ख़ाली पड़ी रहती हैं…’ उस क़ब्रिस्तान के आस-पास बड़े-बड़े घर बने हुए हैं। कई घरों की खिड़कियाँ क़ब्रिस्तान की ओर खुलती हैं। घर में लेटने और क़ब्र में लेटने के बीच ही तो एक दुनिया है जिसमें लोग जी रहे हैं।
‘अंतिम अरण्य’ में पहले पेज से ही अनिष्ट की आशंका रहती है, फिर भी हम पढ़ते चल जाते हैं। पुनर्पाठ में पन्ने पलटते हैं तो लगता है मौत के आगोश में जा रहे, मेहरा साब को हम ढील दे रहे हैं। क्या पन्ना न पलटकर हम मेहरा साब का मरना रोक सकते थे? अगर कोई कुछ रोक सकता तो मेहरासाब मिसेज़ मेहरा को ही मरने नहीं देते। बेटी तिया को वापस क्यों जाने देते।
विनीत गिल ने निर्मल वर्मा पर अपनी किताब ‘Here And Hereafter: Nirmal Verma's Life in Literature’ में लिखा है—एक यूरोपीय लेखक थे जो रोज़ाना का मौसम ब्योरा बिना फ़िल्टर, बिना लाग-लपेट के दर्ज करते थे। जैसे रविवार को आसमान साफ़ था। चिड़ियों का कलरव था। समय पर धूप निकली और समय पर सूर्यास्त हुआ। बाद में उनका काम बहुत बड़ा अर्काइव बना। एटलस जैसे। जहाँ आप जान सकते थे कि लंदन में 29 अप्रैल 1939 का दिन कैसा था।
लिखते-लिखते रात आ गई है। दूसरे तल्ले की आवाज़ बंद हो गई है। दीवार पर खट-खट वाला काम करके प्लंबर शायद लौट गया है। अब आरी की आवाज़ बड़ी महीन तरीक़े से आ रही है। इसकी वजह से नींद नहीं आ रही है। एक तीक्ष्ण विचार कौंधता है कि इतनी रात को आरी क्यों चल रही है? यह श्रम स्वैच्छिक है या ग्राहक की डेडलाइन की वजह से मजबूरी।
अब नींद की प्रतीक्षा पर ग़ौर कर रहा हूँ। मैं निर्मल वर्मा के बारे में सोच रहा हूँ। उनके लिखे के बारे में याद कर रहा हूँ। ‘परिंदे’ की लतिका याद आ जाती हैं। मालूम चलता है कि ‘एक चिथड़ा सुख’ की बिट्टी से कहीं मिल चुका हूँ। और लगता है लखनऊ में इमामबाड़े के बाहर जिस विदेशी महिला के साथ तस्वीर खिंचाई थी, वह ‘वे दिन’ की रायना थी।
निर्मल वर्मा ने अपने लिखे में ‘धुंधलके, निस्संग और चहबच्चे’ आदि शब्दों का ऐसे इस्तेमाल किया जैसे वही उनके सबसे पुराने साथी हैं। निर्मल वर्मा के जाने के बाद सिर्फ़ उनके किरदार अकेले नहीं हुए, ये शब्द भी अनाथ हो गए हैं।
नींद...
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