Humans In The Loop : ग़लतफ़हमी है कि CAPTCHA भरकर आप रोबोट होने से बच जा रहे हैं
शशांक मिश्र
25 जनवरी 2026
दुनियाभर में आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस का हल्ला है। जहाँ एआई (AI) शब्द जुड़ जाता है, वह चीज़ एलीट लगने लगती है। यूट्यूब वीडियोज़ के समंदर में अगर पत्थर उछालो तो वो कोई न कोई एआई टूल सिखाने वाले पर ही गिरेगा। बड़े-बड़े होटलों के बैंक्वेट में एआई को लेकर सेमिनार हो रहे हैं। विषय—‘आभासी वास्तविकता में जेनरेटिव एआई’, ‘एआई के क्या परिणाम होंगे या नफ़ा-नुक़सान’ आदि-आदि। एआई समिट्स में लोग सूट पहने दिखते हैं। हाई-टी निपटाते हैं। बिस्किट के साथ ज्ञान की बातें और फिर अपनी-अपनी गाड़ी में घर चले जाते।
सचाई यह है कि बहुत बड़े तबक़े के लिए एआई अभी भी बेसिक सर्च इंजन तक महदूद है। पहले गूगल पर पूछते थे, अब चैट-जीपीटी पर पूछ रहे हैं। नाना प्रकार के टूल हैं। हर दिन कोई नया टूल निकलकर आता है। ये पूरी एक खान है। पहले एक ऐप आएगा, फिर कोई एआई का ऐप आएगा जिस पर आप नया ऐप बना सकते हैं। Grok, Perplexity जैसे प्लैटफ़ॉर्म्स ने आदमी के दैनिक जीवन में ज़रूरी जगह बना ली है।
एआई जैसा आपको आज दिखता है, उसके पीछे एक पूरी फ़ौज़ है। ये एआई को बच्चों जैसे सिखा रहे हैं और इनके बारे में आपको जानकारी तक नहीं है। ‘ह्यूमंस इन द लूप’ ऐसी ही एक डेटा लेबलर की कहानी है। आदिवासी समुदाय की माँ (नेहमा) और बेटी (धानू) की कहानी। तलाक़ के बाद नेहमा कई स्तर पर जूझ रही है। बच्चों की कस्टडी के साथ-साथ जीवनयापन के लिए आर्थिक संघर्ष। यही कारण है जो उसे उस सेंटर में ले जाता है, जहाँ तमाम कंप्यूटर सिस्टम रखे हैं और लगातार की-बोर्ड पीटे जा रहे हैं। काम है एआई को ट्रेन करना।
इंटरनेट की दुनिया में हम सबने कभी न कभी एकदम से सामने आए पेज़ पर अलग-अलग तस्वीरों में ट्रैफ़िक लाइट्स को सेलेक्ट किया हुआ है। यह किसी ज़रूरी चीज़ तक आपकी पहुँच के बीच बड़े पर्दे जैसा लटककर आता है। साथ लाता है झुंझलाहट और आपके लिए एक ज़रूरी प्रमाण-पत्र। जो ट्रैफ़िक लाइट्स या गाड़ियाँ चुनकर आप वह पर्दा, डेटा लेबलर उन्हें पहले से पहचान के फ़ीड करते हैं, ताकि सही चुनाव पर आभासी गेट खोल सकें।
जिन्होंने आदिवासी समुदाय को विचारों में जल-जंगल-ज़मीन तक सीमित कर रखा है, उनके लिए यह फ़िल्म दृश्यात्मक विरोधाभास भी है। यह फ़िल्म एआई के फ़ंडामेंटल पर बात कर रही है, उसके बायस पर बात कर रही है। आपको भी लगता है कि हाइवे किनारे वाले सारे ‘फ़ौज़ी ढाबा’ कोई न कोई रिटायर्ड कर्नल या सूबेदार ही चलाते होंगे। बहुतों को लगता है कि हर सोसायटी का चौकीदारी नेपाली है और मिलने पर सबसे पहले ‘ओ साबजी’ ही बोलेंगे। ऐसे ही एआई को भी लगता है कि ‘ब्यूटीफ़ुल’ वही है जो रंग में गोरा है। हमारे पूर्वाग्रह जीवन अनुभव के साथ कटते-छंटते चलते हैं, लेकिन अगर मशीन के स्टीरियोटाइप न तोड़े जाएँ तो वह वैसे ही रिज़ल्ट्स दिखाता रहेगा। यही इस फ़िल्म का सबसे फ़ंडामेंटल आधार भी है।
एक सीन में नेहमा की बॉस उसके सामने एआई टूल पर सर्च करती है, Beautiful Tribal Woman. स्क्रीन पर ऐसी महिलाओं की तस्वीर उभर के आती जो निहायत गोरी हैं और भयानक से ट्रेडिशनल वस्त्र पहने हुए हैं।
यह फ़िल्म आपके ऐसी ही कई अतार्किक धारणाओं पर बहुत सलीक़े से चोट करती है।
फिल्म कहीं से भी ये कहती नहीं लगती कि एआई बुरा है या आने वाले समय में इसका ये नतीजा निकलेगा. बल्कि यह इस बात पर ज़ोर देती है कि एआई के एक बच्चा है, आप जैसा उसे सिखाएँगे, वो वैसा ही सीखेगा।
इसमें एक बहुत अपीलिंग सीन है : नेहमा की बॉस उससे एक Worm को Pest के तौर पर लेबल करने पर सवाल करती है। नेहमा अपने जंगल के अनुभवों के आधार पर बताती है कि ये Worm सिर्फ़ पत्तियों के सड़े भाग को खाते हैं ताकि पौधा सुरक्षित रहे। लेकिन बॉस उस पर ग़ुस्सा करती है और कहती है अगर क्लाइंट इसे Pest बोल रहा है तो तुम्हें भी Pest ही लेबल करना होगा।
ये दृश्य बड़े-बड़े अक्षरों में हमसे कहता है—ये ग़लतफ़हमी है कि कैप्चा भरकर आप रोबोट होने से बच जा रहे हैं। फ़िल्म कहती है कि माना आप अपने विचारों, संगतों, अनुभवों का जमाजोड़ हैं लेकिन सबसे ज़रूरी कि विवेक का इस्तेमाल कर नेहमा जैसा इंसान बने रहना।
शांत और धीरे-धीरे बहती ये फ़िल्म अपने ही एक किरदार साही की तरह ज़रूरी समय पर हमारी सोच पर कांटे निकालती चलती है। जब फ़िल्म ख़त्म हो जाती है, तब हमें पता चलता है कि हमारी रुढ़ियों, हमारे पूर्वाग्रहों, हमारे बायसेस की दीवार में कितने छिद्र हुए पड़े हैं।
‘साफी सिरप’ भी तो पीने में कड़वी लगी थी, ख़ून तो साफ़ किया ना। ये फ़िल्म भी कुछ-कुछ वैसा ही ज़रूरी काम करके जाएगी।
यह फ़िल्म स्ट्रीमिंग प्लैटफ़ॉर्म Netflix पर उपलब्ध है।
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