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The Last Tenant : इरफ़ान की क़ब्र पर 25 साल पुराना फूल

अब शादियों के एल्बम नहीं दिखते। आजकल नीले-नीले लिंक होते हैं जो सीधे हम-आपको तस्वीरों के समंदर में पटक देते हैं। लगाइए गोता। दो-तीन स्क्रॉल में अपनी तस्वीर तक पहुँच जाइए। बेहतर क्वालिटी में डाउनलोड करिए और फिर सीधा सोशल मीडिया पर पोस्ट।

एल्बम के साथ जब तक ‘पुराना’ शब्द न जुड़े तो नॉस्टेल्जिया हिट नहीं होता है। क्या हो जब आप एक पुराना एल्बम देखें और आपको दिखे : एक पर एक धरी हुई, टेंट वाली लाल कुर्सियों पर बैठे आपकी तस्वीर; या फिर पिताजी की जवानी के फ़ुल एलीमेंट में सफ़ारी सूट पहने घर के मेन गेट पर हाथ रखे कोई तस्वीर; या मिले शादी के लिए आई हुई माँ की वह स्टूडियो वाली तस्वीर, जिसमें एस्थेटिक के नाम पर पीछे सिर्फ़ एक गमला रखा है!

ठीक कुछ-कुछ ऐसा ही अभी सिनेमा की दुनिया में हुआ है। अभिनेता इरफ़ान ख़ान की एक फ़िल्म 25 साल बाद रिलीज़ हुई है। नाम है—‘The Last Tenant’.

वह एक साधारण बुधवार हो सकता था, अगर वह 29 अप्रैल 2020 का बुधवार न होता। पता नहीं आपने देखा है या नहीं, ट्विटर (अब X) पर एनडीटीवी छोटे से स्टेटिक क्रिएटिव में ऊपर बोल्ड Breaking News लिखकर चलाता है। वह बाक़ी न्यूज़ चैनलों की तुलना में आपका ध्यान अधिक आकर्षित करता है। ख़बरों के सिलसिले में, उस दिन उस वक़्त मैं ट्विटर पर था। अचानक ऐसा ही एक क्रिएटिव दिखा, उस पर लिखा था : अभिनेता इरफ़ान का 53 वर्ष की आयु में निधन

बीती 29 अप्रैल को इस ब्रेकिंग को देखे और इरफ़ान को हमारे बीच से गए छह साल हो गए। ‘The Last Tenant’ फ़िल्म भी इसी दिन यूट्यूब पर हम सबके सामने आई। उनकी बरसी पर उनके चाहने वालों को उन्हें याद करने का एक और कारण मिला। यह तोहफ़ा फ़िल्म निर्माता सार्थक दासगुप्ता की तरफ़ से आया है। फ़िल्म से ज़्यादा इंटरेस्टिंग, उसके इतने लंबे समय बाद रिलीज़ होने की कहानी है जो आपके मन में आ रहे सवालों का जवाब देगी।

बीती सदी के अंतिम वर्षों में सार्थक दासगुप्ता के मन में यह कहानी कौंधी थी। वह बताते हैं कि साल 1999-2000 में यह फ़िल्म शूट हुई। तब डिजिटल बैकअप की व्यवस्था नहीं होती थी। बीटा टेप का ज़माना था। फ़िल्म की सूट हुई पूरी रॉ फ़ुटेज्स उसी में थीं। कहा गया कि एक टेप खो गई और दूसरी टेप में फ़ंगस लग गई। फ़िल्म का मामला बिल्कुल ख़त्म था।

इन घटनाओं के क़रीब 25 साल बाद, अभी कुछ समय पहले घर बदलते समय बिना लेबल वाला एक VHS टेप सार्थक दासगुप्ता के हाथ लगा। बक़ौल सार्थक, पहले-पहले उन्हें लगा कि यह उनकी शादी का वीडियो होगा। फिर जब उन्होंने चलाकर देखा, तब पता लगा कि यह वही फ़िल्म है। उनकी पहली फ़िल्म। यह वही ख़ुशी है जिसका ज़िक्र मैंने पुराना एल्बम हाथ लगने के तौर पर किया है।

फ़िल्म में क्या है?

आप समंदर की 25 साल पुरानी लहरे देख रहे हैं। 25 साल पुरानी धूप सेक रहे हैं। 25 साल पुरानी नमी महसूस कर रहे हैं और 25 साल पहले के इरफ़ान से मुख़ातिब हो रहे हैं। कहानी साधारण है। इरफ़ान ने एक संगीतकार का रोल निभाया है और विद्या बालन ने उस किरदार की प्रेमिका का रोल निभाया है। फ़िल्म में वह कुछ देर बाद पूर्व प्रेमिका हो जाती हैं। फिर पढ़ाई के लिए अमेरिका जाने का प्लान आता है। मकान मालिक घर ख़ाली करवा रहा है। वे एक महीने के लिए दूसरी कोठी में रुकते हैं। यहाँ फ़िल्म का ट्विस्ट आता है, यह नया घर भूतिया है।

अख़बारों का एक दौर हुआ करता था। सफलता वाली ख़बरों की हेडलाइन में दुष्यंत कुमार की पंक्तियाँ दिखती थीं : कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता… और सिनेमा का वह भी समय था, जब संवाद में ऐसी पंक्तियाँ बहुत भारी लगती थीं : रिश्ते धागों की तरह होते हैं… अगर टूटे तो जुड़ तो जाते हैं, पर गाँठ रह जाती है। यह वही बात है जो रहीम कहकर गए हैं :

 

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय।
टूटे से  फिर न मिले, मिले  गाँठ परिजाय॥

ऐसी कई पंक्तियाँ आपको फ़िल्म के संवाद में सुनने को मिल जाएगीं। कहानी आपको निराश करेगी, लेकिन बड़े-बूढ़ों ने कहा है कि टेक्स्ट को उसके काल के आधार पर जज करो। बाक़ी देखने के लिए इसमें इरफ़ान तो हैं ही।

25 साल में क्या-क्या नहीं हुआ। आप स्कूल से कॉलेज में आ पहुँचे, या कॉलेज से जॉब में। सरकारें बदल गईं। दुनियाभर में तमाम लड़ाइयाँ हो गईं। महामारी आई और बीत गई। कितनों की शादी की सिलवर जुबली मनाई गई। ‘राजा हिंदुस्तानी’ में आमिर ख़ान को ‘अरे उस्ताद’ कहने वाले कुणाल खेमू बड़े हो गए। लेकिन इरफ़ान? सिर्फ़ आँख की गहराई बढ़ी।

आप दिन के किसी भी समय अपना फ़ोन निकालिए। भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रहे महेंद्र सिंह धोनी के इंस्टाग्राम अकाउंट पर जाइए। थोड़ा स्क्रॉल करिए। आप उस वीडियो पर पहुँचेंगे जिसमें उन्होंने संन्यास की घोषणा की थी, तारीख़ होगी 15 अगस्त, 2020। अब आप कमेंट सेक्शन खोलिए। आपको लेटेस्ट कमेंट कुछ ही देर पहले का मिलेगा। 30 मिनट पहले का या ज़्यादा से ज़्यादा 1 घंटे पहले का। अगर आपने इरफ़ान का काम देखा है—‘हासिल’, ‘पान सिंह तोमर’, ‘मक़बूल’ देखी है, ‘The Namesake’ देखकर रोए हैं तो उनकी याद इतनी देर के लिए भी आपसे जुदा नहीं होती।

साहबज़ादे इरफ़ान अली ख़ान अब आराम से सो रहे हैं। ‘The Last Tenant’ फ़िल्म उनकी क़ब्र पर रखा गया फूल है—देर से, चुपचाप, स्मृति में।

आप यह फ़िल्म यहाँ देख सकते हैं : ‘The Last Tenant’

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