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भूख का भूगोल : अखिलेश सिंह की पहली कहानी ‘विकल्प’ पर कुछ अवलोकन

हाल ही में नई पीढ़ी के कवि, गद्यकार और अनुवादक अखिलेश सिंह की पहली कहानी ‘विकल्प’—समालोचन पर प्रकाशित हुई है। बीते कुछ दिनों में इस कहानी के साथ लगातार रहने का अवसर मिला। अखिलेश सिंह के प्रभावशाली, धारदार और रचनात्मक ऊर्जा से भरे गद्य से हिंदी के पाठक पहले से परिचित हैं। इसलिए उनके द्वारा लिखी पहली कहानी पढ़ने का स्वाभाविक उत्साह था, परंतु इसे पढ़ने का एक बड़ा कारण यह भी रहा कि पिछले कुछ वर्षों से मेरी दिलचस्पी केवल साहित्य तक सीमित नहीं रही; मैं साहित्यिक विधाओं के विस्तार, उनकी बदलती संरचनाओं और नई प्रवृत्तियों पर भी लगातार विचार करता रहा हूँ।

उदाहरण के लिए, नब्बे के दशक से हिंदी कहानी में लंबी कहानियों का एक नया दौर शुरू हुआ, जो अब भी जारी है। कहानियाँ इतनी व्यापक और विस्तृत होने लगी हैं कि कई बार यह तय करना कठिन हो जाता है कि उन्हें कहानी कहा जाए या नॉवेला(novella)। हिंदी में इन लंबी कहानियों के लिए ‘लघु-उपन्यास’ जैसा शब्द भी प्रस्तावित हुआ। लेकिन इसी के बीच यह देखना दिलचस्प है कि हिंदी, गुजराती और मराठी जैसी भाषाओं के अलावा कई दूसरी भारतीय और युरोपियन भाषाओं में कई ऐसे कथाकार आज भी सक्रिय हैं—जो कहानी की मूल बनावट, उसकी संक्षिप्तता, तनाव और उसके केंद्रिय कथ्य को मजबूती से पकड़े हुए हैं।

अखिलेश सिंह की पहली कहानी ‘विकल्प’ इसी परंपरा की कहानी है—एक ऐसी कहानी जो कहानी को उसके मूल रूप में पुनः देखने का अवसर देती है। आप पूछ सकते हैं कि कहानी के ‘मूल रूप’ से मेरी क्या मुराद है? मेरा आशय यह है कि कहानी जिस रूप में विश्व साहित्य में जन्मी और विकसित हुई—संक्षिप्त, केंद्रित, तनावपूर्ण और एक बैठक में पढ़ी जाने योग्य—‘विकल्प’ उसी रूप की याद दिलाती है। इसमें न अनावश्यक विस्तार है, न किसी कथ्य का बोझ। कथाकार पूरी तरह एकाग्र होकर कहानी के केंद्र को साधे रहता है। यह कहानी पाठक को कहानी-विधा के मूल आकर्षण से जोड़ती है।

मैं अपने मूल बिंदु पर लौटूँ तो, हम ऐसे समय में हैं—जब भारतीय और यूरोपीय दोनों भाषाओं में एक ओर कहानियों का अतिविस्तार दिखाई देता है और दूसरी ओर संक्षिप्त, सघन कहानियों की भी एक महत्त्वपूर्ण उपस्थिति है। हमारे साहित्यिक समय में दोनों प्रवृत्तियाँ समानांतर चल रही हैं।

अब कहानी के कथ्य पर ध्यान दें। इस कहानी के केंद्र में भूख है—बल्कि यूँ कहें कि भूख का भूगोल है। यह भूख कोई साधारण मानवीय अनुभूति नहीं है; इसके पीछे एक विशिष्ट भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक संदर्भ मौजूद है। भूख और उसके दबाव में की गई एक छोटी-सी चोरी—ये दोनों इस कहानी की रीढ़ हैं। भीड़ से निकला हुआ वह थका, अनाम चेहरा न केवल उत्तर भारत के सामाजिक यथार्थ का प्रतीक है, बल्कि हमारे समय में व्यापक रूप से फैली उस भूख का संकेत भी है, जो मनुष्य को भीतर ही भीतर खा जाती है। हालाँकि कहानी सिर्फ़ उत्तर भारत की कहानी नहीं है, लेकिन कहानी में उपस्थित वातावरण, तनाव, भूगोल और व्यवस्था का क्षरण इसे उत्तर भारत के समूचे परिदृश्य से जोड़ते हैं—जहाँ ट्रेन में यात्रा से लेकर भोजन की व्यवस्था तक, सब कुछ मानो एक बीमार तंत्र का हिस्सा बन गया है। इस तंत्र में जीवित रहना ही सबसे बड़ा संघर्ष है। ऐसे ही संघर्षपूर्ण परिवेश में भूख मिटाने के लिए एक छोटी-सी चोरी घटित होती है। परंतु कहानी में यह चोरी सिर्फ़ घटना नहीं है, बल्कि एक गहन नैतिक-मानवीय संघर्ष का द्वार खोलती है।

यहीं से कहानी का सबसे महत्त्वपूर्ण बिंदु उभरता है—अनाम पात्र के भीतर शुरू होने वाला नैतिक द्वंद्व। यह द्वंद्व सिर्फ़ उस व्यक्ति का व्यक्तिगत संघर्ष नहीं, बल्कि उस आधुनिक मनुष्य का संघर्ष है—जिसकी अवधारणा बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में, विशेषकर प्रथम विश्वयुद्ध के बाद सामने आई, जहाँ ‘survival’ मनुष्य का सबसे बड़ा लक्ष्य बन गया था। ‘विकल्प’ 2025 के परिदृश्य में यह सवाल उठाती है कि आज के मनुष्य के पास क्या विकल्प बचा है? क्या वह आजीवन भूख के साथ जीता रहे? या वह कोई ऐसा रास्ता चुने, जो अमानवीय और अनैतिक हो?

यह प्रश्न केवल उत्तर भारत की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों की ओर संकेत नहीं करता, बल्कि हमारे वर्तमान समय के कई परतों को भी उघाड़ देता है। कथाकार कहानी में समय के प्रयोग को लेकर भी अत्यंत सजग है। कहानी में समय दो स्तरों पर चलता है—
• Time in the clock: यानी घड़ी का वास्तविक समय, जिसे कहानी में लगभग हूबहू दर्ज किया गया है।
• Time in the mind: यानी मानसिक समय—वह बेचैनी, प्रतीक्षा और भय जो उस क्षण पैदा होता है, जब पेंट्री का सामान बेचने वाला व्यक्ति पाँच सौ रुपये का छुट्टा लेने गया है और कहानी का नायक आशंकित है कि वह किसी भी पल लौट आएगा।

कहानी का पाठक भी इसी बेचैनी का हिस्सा बन जाता है। कथा इन दोनों समय-धाराओं पर एक साथ चलती है, और नायक दोनों स्तरों पर जूझता हुआ दिखाई देता है।

कहानी का अधिकांश हिस्सा रात में घटित होता है। कहानी की यह रात केवल भौतिक रात नहीं है; यह वह समय है जब मनुष्य स्वयं से मिल सकता है। मैं यहाँ रात को romanticize नहीं कर रहा, परंतु यह कहना चाहता हूँ कि रात की उपस्थिति ने कहानी को सघनता, ठहराव और आत्म-संवाद प्रदान किया है। हिंदी के वरिष्ठ गद्यकार सत्यनारायण की डायरी की एक पंक्ति यहाँ याद आती है—“अगर रात न हो तो शायद हम ख़ुद से मिल ही न पायें।” ‘विकल्प’ में भी रात नायक के लिए एक ऐसा ही क्षण बनकर आती है—जहाँ वह भीतर की आवाज़ से टकराता है, ख़ुद से सवाल करता है, और अपने ही अंतस से जूझता है।

अखिलेश सिंह ने अपनी पहली ही कहानी में कथा-संतुलन, वातावरण-निर्माण और तनाव-निर्माण की महीन कला को बहुत ख़ूबसूरती से साधा है। हाँ, एक पाठक के रूप में मुझे लगा कि कहानी का अंत थोड़ा और विस्तृत हो सकता था। अंत कुछ हद तक अचानक-सा प्रतीत होता है। लेकिन इसके बावजूद, अपनी संपूर्ण रचना-योजना और प्रभाव में ‘विकल्प’ एक यादगार पाठ अनुभव बनकर उभरती है।

यह कहानी अखिलेश सिंह की कथा-यात्रा का पहला क़दम है। वरिष्ठों और युवाओं—दोनों को इस कहानी पर खुलकर संवाद करना चाहिए। मेरा यह छोटा-सा अवलोकन उसी संवाद की दिशा में एक विनम्र प्रयास है।

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