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द ओडिसी : हर मनुष्य अंततः घर लौटना चाहता है

जीवन में कुछ चीज़ें अकल्पनीय ही नहीं, अनिश्चित भी हैं। जैसे अंतरिक्ष में आकाशगंगाएँ लगातार एक-दूसरे से दूर जा रही हैं, फिर भी हम ब्रह्मांड के विस्तार के बारे में सब कुछ ठीक-ठीक नहीं बता सकते। हम ज्वार-भाटा के पीछे का विज्ञान कक्षाओं में पढ़ा सकते हैं, भूकंप मापने के लिए ऐप बना सकते हैं, लेकिन यह निश्चित रूप से नहीं बता सकते कि कोई प्राकृतिक आपदा कब, कहाँ और कितनी तबाही मचाएगी। हम यह भी ठीक-ठीक नहीं बता सकते कि महान् फ़िल्ममेकर क्रिस्टोफ़र नोलन की फ़िल्म उनकी पिछली फ़िल्म से कितनी भव्य, कितनी जटिल या कितनी बेहतर होगी।

यहाँ बात उनकी हालिया फ़िल्म The Odyssey की हो रही है। यह प्रसिद्ध यूनानी कवि होमर की इसी नाम की किताब पर आधारित है। इसे पश्चिम की सबसे पुरानी कथा कह लीजिए। इसके बाद ही सब कुछ अपने तरीक़े से कहना शुरू हुआ। इसका संसार बहुत बड़ा है। इतना बड़ा कि आप खो जाएँगे। एक लाइन में यह कहानी घर-वापसी की है। एक राजा है। वह युद्ध के लिए घर से जाता है। लड़ता है, जीतता है। लेकिन घर से दूर रहने के लिए अभिशप्त है। जब लौटता है तो ‘घर’ को नए सिरे से परिभाषित करता है। बहुत आसान शब्दों में समझें तो जैसे अपने यहाँ ‘महाभारत’, वैसे वहाँ ‘ओडिसी’।

एक रोचक तथ्य यह भी है कि यह दुनिया की पहली फ़िल्म है, जो पूरी IMAX के कैमरों से फ़िल्माई गई है। यह आपको सिर्फ़ एक वाक्य लग सकता है। लेकिन इसकी असली वैल्यू तब समझ आती है, जब सिनेमाघर में विज्ञापन ख़त्म होते हैं—यहाँ मुकेश वाली तंबाकू-विरोधी वैधानिक चेतावनी वाले विज्ञापन वीडियो को मत भूलिएगा—पर्दा जीवित हो उठता है और फ़िल्म का पहला दृश्य सामने आता है। शर्त बस इतनी है कि वह स्क्रीन IMAX होनी चाहिए।

नोलन जब कोई संसार रचते हैं तो उसमें वह संसार अपनी संपूर्णता में होता है। वह चाहते हैं कि आप समंदर देखें तो आपके अंदर सिहरन हो। बीच समुद्र में भँवर के बीच उछलती नौका देखें तो आपके शरीर में ख़ून भी तेज़ दौड़ जाए। जब वह इंसानी शरीर से पचास गुना आकार का किसी दूसरे लोक का प्राणी या दैत्य रिवील करें तो आपका रोआँ-रोआँ हिल जाए। यह आपको अतिशयोक्ति लग सकती है, लेकिन वह चाहते हैं कि आपकी सारी इंद्रियाँ वह महसूस करें, जो दृश्य, संगीत और भाव के छर्रों में आपके शरीर से टकरा रहा है।

इसका उदाहरण आप इससे समझिए—आपको नोलन की फ़िल्म Interstellar में अंत का वह सीन याद है : कूपर बुकशेल्फ़ के पीछे भविष्य से अपना अतीत देखता है। वह अतीत वाले स्वयं को मिशन पर जाने से रोकना चाहता है, इसलिए वह बुकशेल्फ़ से किताबें गिराकर अपनी बेटी को संकेत देता है कि वह ‘उसे रोक ले।’ फ़िल्म जब यहाँ पहुँचती है, तब तक आप एक लंबी यात्रा कर चुके होते हैं। समय का मोल समझ चुके होते हैं। फिर जब नोलन कूपर से यह बुलवाते हैं, तो वह झरते आँसुओं के बीच हमारी साझा पुकार बन जाती है।

जीवन 5 तत्वों से मिलकर बना है। पृथ्वी, जल, पावक, गगन, समीर। हर चीज़ एक-दूसरे के लिए बहुत ज़रूरी है। अगर इनमें से एक भी चीज़ को सदा के लिए हटा दिया जाए तो वह सारी व्यवस्था असंभव की श्रेणी में आ जाएगी। नोलन की फ़िल्म ओडिसी में कहानी, पटकथा, अभिनय, कास्ट्यूम के साथ पाँचवाँ सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व ‘बैकग्राउंड स्कोर’ है। ओडिसी में यह म्यूज़िक ऑस्कर विजेता लुडविग योरानसोन ने दिया है।

लुडविग ने अपने इंटरव्यू में बताया था कि नोलन की तरफ़ से उनके पास सिर्फ़ इतना ब्रीफ़ था—‘संगीत ऐसा होना चाहिए, जो पहले कभी सुना न गया हो।’ बक़ौल लुडविग, इस वाक्य में जितना खुलापन था, उससे ज़्यादा चुनौतियाँ थीं। फिर इसके लिए उन्होंने सारे जतन किए और जो पेश किया, वह ऐसा है कि फ़िल्म देखकर आने के बाद भी वह आपके दिमाग़ से कुछ घंटे, दिन, हफ़्ते तक निकलेगा नहीं। कम-से-कम मेरे साथ तो ऐसा ही है। ख़ासकर Siren Song. विरह से भीगी यह धुन ओडिसियस की तड़प महसूस करा देती है।

यहीं से मेरे मन में एक अप्रत्याशित तुलना जन्म लेती है। ओडिसी देखकर एक अलग-सा विचार मन में आया। लगा, क्या क्रिस्टोफ़र नोलन हमारे समय के तुलसीदास कहे जा सकते हैं? यह तुलना पहली नज़र में असहज लग सकती है, लेकिन उसका आधार माध्यम नहीं, उद्देश्य है। हो सकता है कि आपको यह ख़याल अजीब लगे, लेकिन एक बार मेरे साथ सोचिए। तुलसीदास ने रामकथा को चौपाईबद्ध किया, सरस और लोक-सुलभ बनाया। जन-जन तक पहुँचाया। अब घरों में ‘रामचरितमानस’ का पाठ होता है। क्रिस्टोफ़र नोलन ने क्या किया? उन्होंने होमर के साहित्य को शक्ल दी और दृश्यों में जीवित किया। उन्होंने साहित्य पर ‘आधारित’ फ़िल्म बनाई। दोनों अपने-अपने समय के सबसे प्रभावशाली माध्यम का उपयोग करके एक कालजयी कथा को नई पीढ़ियों तक पहुँचाते हैं। इसलिए यह समानता व्यक्तियों की नहीं, उस रचनात्मक भूमिका की है जो वे निभाते हैं। आज का ज़माना साधन-संपन्न है। यहाँ हर तरीक़े के अलग-अलग माध्यम हैं। अब ज़रूरी नहीं कि हर ज़माने में महाकाव्य लिखा ही जाए। वह परदे पर दिखाया भी तो जा सकता है।

अबकी अगर लौटा तो
मनुष्यतर लौटूँगा

—कुंवर नारायण

हर कोई लौटना चाहता है। लौटना कोई अधूरा वादा पूरा करने जैसा लगता है। और शायद यह कभी न किया गया वादा पूरा करना अंत में आते-आते सबसे मुश्किल हो जाता है। ‘ओडिसी’ का मुख्य किरदार ओडिसियस भी युद्ध के बाद वापस घर जाना चाहता है। लेकिन बीच में हैं मुश्किलात। ये परेशानियाँ वर्तमान की हों तो आदमी लड़े भी, लेकिन अतीत के अपराध के आगे आदमी निहत्था हो जाता है। वहाँ लड़ने का हथियार सिर्फ़ पश्चाताप है। यहाँ लड़ाई बाहर से ज़्यादा अंदर की हो जाती है। जब आप ‘ओडिसी’ देखेंगे, तब आप यह लड़ाई ख़ुद में भी महसूस करेंगे।

पूरी फ़िल्म ओडिसियस के इस संवाद में आकर सिमट जाती है—“जो हम सबसे ज़्यादा चाहते हैं, वही सबसे अधिक दुर्लभ हो जाता है; और जो सबसे अधिक दुर्लभ हो जाता है, वह वही होता है जो कभी अपना था, पर अब बिछुड़ चुका है।”

‘ओडिसी’ का हर क्षण भव्य है। जहाँ कुछ भी नहीं हो रहा, वहाँ भी बहुत बड़ा संसार बिखरा मिलेगा। इसे सिनेमाघरों में ज़रूर देखें।

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