जगह-जगह 2.0 : द मैजिक माउंटेन : मनुष्य-चेतना पर महामारी के चिह्न
निशांत कौशिक
06 मार्च 2026
एक
…अगर वह फ़िलॉसॅफ़िकल है तो एक ऐसे अर्थ में जिसके लिए अक्सर हम ‘फ़िलॉसॅफ़ी’ जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं करते, पर जो अपनी अंत:प्रक्रिया में ही एक तरह का सोच, एक तरह का निश्चय, एक तरह की रिफ़्लेक्टिवनेस लिए होता है। यह चीज़ पिछले 20-30 वर्षों में हमारे उपन्यासों में, पता नहीं क्यों, कम होती गई है। जर्मन साहित्य में तो यह चीज़ उसकी शक्ति का सबसे बड़ा स्रोत है : टॉमस मान और हरमन हेस के उपन्यासों में, होल्डरलिन और रिल्के की कविताओं में। ख़ुद एलियट में भी, जो कभी-कभी उनकी कमज़ोरी बन जाती है, तो कभी-कभी उनकी उपलब्धि।
—निर्मल वर्मा, व्याख्यान से
सेनेटोरियम—तपेदिक [Tuberculosis] रोगियों के लिए 19वीं शताब्दी के मध्य में यूरोप में पहली बार व्यवस्थित ढंग से स्थापित किए गए उपचार-गृह थे। यह रोगियों को लंबी अवधि का विश्राम और एकांत उपलब्ध कराने का एक विशिष्ट यूरोपीय तरीक़ा था, एक प्रकार का चिकित्सकीय क्वारंटीन जहाँ उपचार दवाओं से अधिक समय, अनुशासन और एकांत पर आधारित था।
1943 में जब स्ट्रेप्टोमाइसिन [एंटीबायोटिक] की खोज हुई, तब ये सेनेटोरियम अप्रभावी होते गए और समय से बेदख़ल हो गए।
विश्व साहित्य में विषय के रूप में बीमारी और मृत्यु बार-बार आते रहे हैं। अल्बेयर कामू के उपन्यास ‘प्लेग’ में महामारी मनुष्य की नैतिक दृढ़ता और सामूहिक उत्तरदायित्व की परीक्षा बन जाती है। लियो टॉलस्टॉय की लंबी कहानी ‘इवान इल्यिच’ की मृत्यु में मृत्यु से सामना करने की उलझन और असहजता कथा का केंद्रीय अनुभव है।
‘द मैजिक माउंटेन’ का मुख्य किरदार आल्प्स पर्वत पर स्थित आरोग्य आश्रम या सेनेटोरियम में पहुँचता है। वहाँ के अनुभव और उसके व्यक्तित्व का क्रमिक विकास ही उपन्यास को उसका विशिष्ट रूप देते हैं और इसी अर्थ में यह एक यह एक Bildungsroman है। थॉमस मान ने उपन्यास में बीमारी को केवल व्यक्तिगत त्रासदी या महामारी के दौरान करुणा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे समय, सभ्यता और आधुनिक मनुष्य की चेतना पर एक व्यापक चिंतन में बदल दिया। इस चिंतन में ऊबड़खाबड़पन है, अतिवाद है, स्वीकार और प्रतिकार है। वह सेनेटोरियम के रुग्ण एकांत को एक दार्शनिक परिसर में बदल देते हैं।
यह बहस और प्रश्न नए नहीं थे। ‘द ब्रदर्स करमाज़ोव’ और ‘डेमन्स’ में पुनर्जागरण, ईसाइयत और आधुनिकता पर लंबी बहसें हैं और रूसी उपन्यासों का पेंडुलम पीड़ा और ईमान के बीच सदा ही रत रहता है।
किंतु मान के यहाँ एक अलग दुरूहता और रूखापन है। ‘द मैजिक माउंटेन’ में कई स्थानों पर कॉमिकल स्थितियाँ और संवाद हैं, परंतु नाटकीयता और प्रवाह नदारद है जो कि ‘डेमन्स’ तथा ‘द ब्रदर्स कारमाज़ोव’ में वस्तुतः इन विषयों पर लिखे गए शास्त्रीय ढंग के रूसी उपन्यासों में सहज मिलेंगे।
यही इस उपन्यास का ढाँचा है। यह दुरूहता और रूखापन निरुद्देश्य नहीं है। यह युद्ध की दहलीज़ पर खड़े यूरोप की गहमा-गहमी की उपज है, जो अगले सौ वर्षों तक यूरोप को उलझाए रखने वाली थी।
थॉमस मान के इस उपन्यास को 2024 में सौ वर्ष पूरे हुए। 102 वर्ष का यह उपन्यास उन्हीं सवालों से बावस्ता था, जिन्हें आज हम सबसे ताक़तवर रूप में उभरता हुआ देख रहे हैं।
दो
There on the mountain, characters were ideas and ideas were passions
—Susan Sontag, Pilgrimage
‘द मैजिक माउंटेन’ का कथानक सादा है। पहले अध्याय ‘एराइवल’ में हांस कास्टॉर्प अपने चचेरे भाई योआखिम से मिलने दावोस के एक सेनेटोरियम में आता है। योआखिम तपेदिक का मरीज़ है और लंबे समय से वहीं रह रहा है। हांस कास्टॉर्प आते समय तीन हफ़्तों में लौट जाने की योजना बनाकर आया है। योआखिम उसकी इस योजना पर कुछ हैरानी और कुछ उपहास के साथ प्रतिक्रिया देता है। वह कहता है, “Get acclimatized first, it isn't so easy, you will see and the climate is not the only queer thing about us.”
उपन्यास के विस्तार का यही नुक़्ता है कि तीन हफ़्तों के लिए अपने चचेरे भाई से मिलने आया हांस कास्टॉर्प वहाँ लगभग सात वर्ष रुकता है। निकलने के प्रसंग तक वह स्वयं भी तपेदिक का रोगी घोषित हो चुका होता है और इस परिसर का हिस्सा बन जाता है।
हांस जिस निचली दुनिया या फ़्लैटलैंड से आया है, उसके बरक्स इस सेनेटोरियम में समय और जीवन का बोध बहुत अलग है। नीचे की दुनिया में काम, उपयोगिता और प्रगति का दबाव है, जबकि यहाँ ठहराव, पुनरावृत्ति और विचार का फैलाव है।
इन वर्षों में कास्टॉर्प अनेक पात्रों से रोज़ाना मिलता-जुलता है। उनसे उसके भिन्न संबंध बनते हैं और कई बार नहीं भी बनते। उपन्यास के चाक के तौर पर तीन पात्र ऐसे हैं जो उसके अनुभव का सबसे बड़ा हिस्सा घेरते हैं और सेनेटोरियम में होने वाले बहस-मुबाहिसों को एक रुझान और तेवर देते हैं।
सेत्तेम्ब्रीनी उदार मानवतावाद, तर्क और प्रबोधन का प्रतिनिधि है। वह साहित्य, लोकतंत्र और प्रगति में विश्वास रखता है। उसके लिए बीमारी एक अवरोध है, जिससे बाहर निकलकर मनुष्य को सक्रिय जीवन में लौटना चाहिए। वह हांस को लगातार समझाने की कोशिश करता है कि वह इस रुग्ण वातावरण में स्वयं को न डुबो दे।
नाफ़्ता इसके विपरीत कट्टर धार्मिकता, रहस्यवाद और क्रांतिकारी उग्रता का मिश्रण है। वह सेत्तेम्ब्रीनी के तर्कवाद का तीखा प्रतिवाद करता है। उसकी भाषा में आकर्षण भी है और विनाश की छाया भी। उसके भीतर मध्ययुगीन आस्था और आधुनिक राजनीतिक अतिवाद का विचित्र संयोग दिखाई देता है।
क्लाउडिया शौशा आकर्षण, कामना और रोग की मिली-जुली उपस्थिति है। उसके माध्यम से हांस के भीतर की इच्छाएँ और अस्थिरताएँ उभरती हैं। क्लाउडिया के प्रति उसका आकर्षण केवल प्रेम नहीं, बल्कि एक प्रकार का आत्म-विसर्जन है।
क्लाउडिया शौशा मेरे पाठकीय अनुभव में सबसे अधिक दिलचस्प पात्र है, क्योंकि वह थॉमस मान, बतौर लेखक, के पूर्वाग्रहों के लिए भी एक खिड़की खोलती है। मान के निजी जीवन, उनके राजनीतिक रुझानों और अन्य जातीय अस्मिताओं के प्रति उनकी टिप्पणियों की परछाईं इस पात्र के निर्माण में देखी जा सकती है। इसका उद्देश्य लेखक की नैतिकता का कटघरा बनाना नहीं, बल्कि यह समझना है कि सभ्यता-समीक्षा जैसी महत्वाकांक्षी योजना में अस्मिताओं और जीवन-शैलियों के प्रति आग्रह और दुराग्रह किस तरह प्रवेश करते हैं।
उपन्यास का बाहरी कथानक इसी अर्थ में सीमित है। घटनाक्रम में रोज़मर्रा की गतिविधियाँ हैं, उनसे पैदा हुए कॉमिकल प्रसंग हैं, दुरूह वाक्य हैं और लंबी बहसें हैं। अंततः जब युद्ध आरंभ होता है, हांस कास्टॉर्प पर्वत से नीचे उतरता है और इतिहास की वास्तविक हिंसा में प्रवेश करता है। सेनेटोरियम का ठहरा हुआ समय अचानक टूट जाता है और प्रश्न उठता है कि इस लंबी वैचारिक तैयारी का मनुष्य के भाग्य में क्या स्थान है।
तीन
isn’t it true that we’re still dealing with the heroes of The Magic Mountain? With the exceptionally appealing Settembrini, who makes guest appearances on our television newscasts or runs a regular column in a popular newspaper where he defends democracy and humanistic values?
—A defence of Ardour, Adam Zagajewski
‘द मैजिक माउंटेन’ में हांस कास्टॉर्प के अनुभव को आकार देने वाले तीन केंद्रीय पात्र हैं।
लियो नाफ़्टा एक यहूदी पृष्ठभूमि से आया और बाद में जेसुइट बना किरदार है। वह शास्त्रीय भाषाओं का प्रोफ़ेसर है। वह एक ही समय में पीड़ा और दुख की धार्मिक-आध्यात्मिक प्रासंगिकता में विश्वास करता है और साथ ही एक क़िस्म के उग्र साम्यवाद का भी पक्षधर है। मृत्यु और कष्ट के प्रति उसका असाधारण मोह हांस कास्टॉर्प को प्रभावित करता है। हालाँकि एक अन्य किरदार, सेत्तेम्ब्रीनी, हांस को नाफ़्टा के विचारों की अतिशयता और उनके ख़तरनाक आकर्षण के प्रति लगातार सचेत करता रहता है।
सेत्तेम्ब्रीनी किसी अर्थ में थॉमस मान के वैचारिक प्रतिनिधि की तरह पूरे उपन्यास में उपस्थित है। उसके पास सभ्यता, संस्कृति और इतिहास पर विस्तृत टिप्पणियाँ हैं। वह पश्चिमी सभ्यता, विशेषकर प्रबोधन से उपजे दार्शनिक आदर्शों का प्रतिनिधि है। मानवता, तर्क और स्वतंत्रता पर उसका ज़ोर कई बार उपदेशात्मक हो जाता है। अन्य पात्रों के बरक्स उसका मानवतावाद अधिक व्यवस्थित और तार्किक दिखाई देता है, पर उसके अपने अंतर्विरोध भी स्पष्ट हैं। वह हांस से बार-बार आग्रह करता है कि वह सेनेटोरियम छोड़कर वास्तविक जीवन में लौट जाए, जबकि स्वयं लंबे समय तक उसी ठहरे हुए संसार का हिस्सा बना रहता है।
क्लाउडिया शौशा एक अलग तरह की उपस्थिति है। उसके चित्रण से यह आभास मिलता है कि मान या व्यापक यूरोपीय दृष्टि रूसी अस्मिता को एक ख़ास निगाह से देखती है। वह उपन्यास में एक ‘पूर्वी आकर्षण या पुकार’ की तरह उपस्थित है, जो पश्चिमी तर्क और अनुशासन से भिन्न है। उसके प्रति खिंचाव भी है और एक प्रकार की दूरी भी। क्लाउडिया कामना और आकर्षण का केंद्र बनती है।
‘वाल्पुर्गिस-नाइट’ अध्याय [पेज : 320-340] में हांस कास्टॉर्प क्लाउडिया के प्रति अपने प्रेम को स्वीकार करता है। इस अध्याय के अधिकांश संवाद फ़्रेंच में लिखे गए हैं, जिससे दृश्य को एक निजी और लगभग गुप्त लहजा मिलता है। वालपुर्गिस-नाइट का संदर्भ थॉमस मान ने फ़ाउस्ट [Walpurgisnacht] से लिया है। गोएथे के फ़ाउस्ट में यह वह उन्मत्त और पतनशील दृश्य है, जहाँ मेफ़िस्टोफ़ेल्स फ़ाउस्ट को 30 अप्रैल की रात हार्त्स पर्वत के ब्रोक्केन शिखर पर चुड़ैलों के एक उत्सव में ले जाता है। यह प्रसंग फ़ाउस्ट के नैतिक पतन, सुख में डूबने और विवेक से दूर भटकने का प्रतीक है।
क्लाउडिया के साथ यह अध्याय भी उसी तरह आकर्षण, अव्यवस्था और आत्म-विस्मृति की तरह प्रस्तुत किया गया है। हांस का सेनेटोरियम छोड़ने का इरादा टलता जाता है और इस स्थगन की वजह क्लाउडिया की मौजूदगी है।
इनके अलावा डॉ. क्रोकोव्स्की, पीपरकॉर्न और अनेक अन्य पात्र हैं, जो हांस के इर्द-गिर्द मौजूद रहते हैं। हांस उन्हें सुनता है, उनके प्रति रुचि और अरुचि महसूस करता है, पर अंततः वह ठहरा रहता है उसी सेनेटोरियम में। सुसान सोंटाग इसी वजह से उसे ‘ओवररनेस्ट’ और ‘गुडी टू-शूज़’ कहती हैं।
चार
Your tale is told. We have told it to the end, and it is neither short nor long, but hermetic
—The Magic Mountain, The thunderbolt, 716
समय ‘द मैजिक माउंटेन’ के शिल्प की ईंट है। तीन हफ़्तों के लिए आए हुए हांस कास्टॉर्प के शुरुआती दिन लगभग पाँच से छह अध्यायों तक फैले हुए हैं। सेनेटोरियम में स्थायी रूप से ठहरने के निर्णय के बाद यही समय दूसरी गति अख़्तियार करता है। कई पन्नों पर, ख़ासकर अध्याय ‘Research’ [पेज : 265] में, हांस कास्टॉर्प अनेक विषयों पर पढ़ता और सोचता है। वह इस पढ़ाई के होने और न होने, दोनों से ऊबता है। इसी दौरान वह समय पर व्यवस्थित चिंतन भी करता है। समय का यह अनुभव विवरण मात्र नहीं है, बल्कि हांस के अनुभव का हिस्सा है, जिसके फैलाव और सिकुड़न को ‘द मैजिक माउंटेन’ का पाठक महसूस करता है।
भाग्य पर बात की भी यही बुनियाद है। यह ईश्वर या धर्म-नियत भाग्य नहीं है। यह विचारों और मुबाहिसों की निष्फलता का भाग्य है। रोज़मर्रा की क्रूरता से अलग-थलग यह सेनेटोरियम की दुनिया विचारों पर बहस कर रही है। यह बीमारों का थियेटर है, जो आधुनिकता और प्रबोधन पर संवाद में रत है और जिसके दरवाज़े पर युद्ध खड़ा है। यह स्थान समय और इतिहास की सीधी मार से बाहर है, जब तक कि युद्ध स्वयं दस्तक नहीं देता।
युद्ध की आमद में हांस कास्टॉर्प अंततः सेनेटोरियम से बाहर निकलता है। पर उन सात वर्षों का क्या? कास्टॉर्प की नियति क्या हुई? उपन्यास आख़िर के दो पन्नों में उसका अंत इंगित करता है, लेकिन 700 पन्नों में पसरे किरदार की नियति पर मान आख़िर में अधिक नहीं लिखते, सिवाय इसके कि जितनी ज़रूरी थी उतनी कथा उसकी कही जा चुकी है।
यह उपन्यास 20वीं सदी के दूसरे दशक में खड़ा होकर यूरोप के आत्म का पाठ करता है। सेनेटोरियम अपने पुराने रूप में आज नहीं बचे, लेकिन सेत्तेम्ब्रीनी, क्लाउडिया शौशा और लियो नाफ़्टा का क्या हुआ? क्या वे लुप्त हो गए? महामारियाँ हमें किधर धकेल रही हैं, इतना शोर क्यों बरपा है और हमारी दहलीज़ पर कौन-सा युद्ध खड़ा है जो शुरू हो चुका है और कोई ख़बर नहीं?
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