‘पिकोलो फ़ाइल्स’ : एक कुत्ते की नज़र से इंसानों की दुनिया
शिल्पा शर्मा
03 जुलाई 2026
‘पिकोलो फ़ाइल्स : पॉ एंड ऑर्डर’ (प्रभात प्रकाशन, प्रथम संस्करण : 2026) में लेखिका इरा टाक ने अपनी ओर से नहीं, बल्कि अपने पालतू कुत्ते ‘पिकोलो’ की ओर से उसकी दुनिया और उसका नज़रिया सामने रखा है। यही इस किताब की सबसे बड़ी ख़ासियत है। पिकोलो की आवाज़ में कही गई यह पूरी किताब शुरू से अंत तक पाठक को बाँधे रखती है। हिंदी में किसी पालतू कुत्ते के दृष्टिकोण से लिखी गई यह अपने तरह की एक अनूठी, मनोरंजक और प्रस्तुति के स्तर पर बेहद आकर्षक किताब है।
किताब की शुरुआत में लेखिका लिखती हैं कि दुनिया में तीन तरह के लोग होते हैं—पहले वे, जो किसी भी जीव को अपनी औलाद की तरह पालते हैं; दूसरे वे, जो पूछते हैं, “इस वबाल को क्यों पाला?”; और तीसरे वे, जो पालतू जानवरों के प्रति न तो विशेष अनुराग रखते हैं और न ही विरोध, बल्कि सहज भाव से उनके साथ रहते हैं।
यह किताब पढ़ने के बाद मुझे लगता है कि पहली श्रेणी के पाठक तो इसे स्वाभाविक रूप से पढ़ेंगे ही, क्योंकि उन्हें जानवरों से प्रेम है। लेकिन दूसरी और तीसरी श्रेणी के लोगों को यह किताब और भी अधिक पढ़नी चाहिए। उन्हें पालतू जानवरों को देखने, समझने और उनके साथ मनुष्य के रिश्ते को नए, आत्मीय और विनोदी नज़रिए से समझने का अवसर मिलेगा।
इस किताब का नायक पिकोलो है—बिंदास, नटखट, शरारती और आत्मसम्मान से भरपूर। नहीं... ‘बंदा’ नहीं, कुत्ता… और शायद उससे भी बढ़कर परिवार का एक सदस्य। अपने घर-परिवार को देखने का उसका नज़रिया किसी जेन-ज़ी बच्चे जैसा है। वह ख़ुद को ख़ूँख़ार भी मानता है और दिल का हीरा भी। वह टेक्नो-सेवी है, पढ़ाकू है, सोशल मीडिया पर सक्रिय है और अपने विचारों को बेहद चुटीले अंदाज़ में रखने वाला घर का सबसे दुलारा सदस्य भी। बड़े भाई ‘गुरु भैया’ के साथ उसकी प्रतिस्पर्धा किताब को कई जगह और भी रोचक बना देती है।
पिकोलो अपने जीवन के अनेक प्रसंग पाठकों से साझा करता है। ‘बर्थ-डे पोस्ट’, ‘फ़िलॉसफ़ी’, ‘नाना और पिकोलो’, ‘दुनिया का सबसे ख़राब काम’ और ‘कोविड तथा लॉकडाउन’ जैसे अध्याय पाठक को लगातार मुस्कुराने पर मजबूर करते हैं। कई जगह तो हँसी अनायास ही छूट जाती है।
किताब का सबसे मार्मिक पक्ष वह है, जहाँ बिछड़ने का दुःख सामने आता है। अपने परिवार से दूर जाने की पीड़ा, अलविदा कहने का क्षण और उसके बाद ‘पिकोलो 2.0’ पर की गई टिप्पणी यह महसूस कराती है कि जितना प्रेम पिकोलो की मम्मा को पिकोलो से था, उतना ही गहरा लगाव पिकोलो को भी अपने परिवार से था। यही भावुकता किताब को केवल हास्य तक सीमित नहीं रहने देती, बल्कि उसे एक संवेदनशील दस्तावेज़ बना देती है। इस हिस्से तक पहुँचते-पहुँचते पाठक के चेहरे पर मुस्कान के साथ एक हल्की-सी नमी भी उतर आती है।
हिंदी में पालतू जानवरों पर लिखी गई रचनाएँ अवश्य मिलती हैं, लेकिन पूरी की पूरी किताब का इस विषय पर केंद्रित होना अभी भी दुर्लभ है। संस्मरण, आत्मकथात्मक लेख और कहानियाँ तो हैं। इस संदर्भ में मेरा परिवार का उल्लेख स्वाभाविक है, जिसमें महादेवी वर्मा ने गिल्लू गिलहरी, गौरा गाय, सोना हिरणी जैसे अपने प्रिय पशु-पक्षियों को परिवार के सदस्य की तरह चित्रित किया है। लेकिन ‘पिकोलो फ़ाइल्स’ इस अर्थ में अलग है कि यहाँ मनुष्य अपने पालतू को नहीं देख रहा, बल्कि पालतू अपने मानव परिवार को देख रहा है। यही दृष्टि-परिवर्तन इस किताब को विशिष्ट बनाता है।
किताब में अभिलाषा भारतीय के चित्रांकन इसकी सबसे बड़ी ताक़तों में से एक हैं। उनके इलस्ट्रेशन कथानक के साथ इस तरह घुल-मिल जाते हैं कि पुस्तक एक सुंदर कॉफ़ी-टेबल बुक का रूप ले लेती है। आकर्षक प्रस्तुति और विषय की नवीनता मिलकर इसे संग्रहणीय बना देते हैं।
हिंदी में इस तरह की प्रयोगधर्मी और सौंदर्यपूर्ण पुस्तक प्रकाशित करने के लिए प्रभात प्रकाशन भी बधाई का पात्र है।
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