हिंसा पर बेला
हिंसा अनिष्ट या अपकार
करने की क्रिया या भाव है। यह मनसा, वाचा और कर्मणा—तीनों प्रकार से की जा सकती है। हिंसा को उद्घाटित करना और उसका प्रतिरोध कविता का धर्म रहा है। इस चयन में हिंसा विषयक कविताओं को शामिल किया गया है।
पार्टनर तुम्हारा ज़ोन ऑफ़ इंटेरेस्ट क्या है?
अरे भाई, मुझे नहीं चाहिए शिखरों की यात्रा मुझे डर लगता है ऊँचाइयों से बजने दो साँकल उठने दो अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले, वह जन—वैसे ही आप चला जाएगा आया था जैसा। —मुक्तिबोध (अँधेरे में)
कहानी : पिस्तौल
और इस तरह पिस्तौल का मेरे जीवन में पदार्पण हुआ... लगा कि आँगन के उस सिरे से धड़ाम से कोई कूदा। देखा तो अपना नरेन था। यानी अपना नरेंद्र यानी नरेनिया। मेरा ‘जिगरी दोस्त’! उन दिनों जब भी कोई उसे मेरा
द वेजिटेरियन : हिंसा और अन्याय से मुक्ति का स्वप्न
“मुझे एक स्वप्न आया था” कोरियाई लेखिका हान कांग के उपन्यास ‘द वेजिटेरियन’ के मूल में यही वाक्य है, जो उपन्यास की पात्र योंग-हे निरंतर दुहराती रहती है। यह वाक्य साधारण ध्वनित कर सकता है लेकिन यह शो
सलमान रश्दी की नई किताब में चाक़ू की कुछ बातें
उन सुनसान निद्राविहीन रातों में मैंने एक विचार के रूप में चाक़ू के बारे में बहुत सोचा। चाक़ू एक औज़ार था, और उसके प्रयोग से निकलता हुआ एक अर्जित अर्थ भी। भाषा भी तो एक चाक़ू थी। यह दुनिया को चाक कर स