पेरिस फ़ैशन वीक में झुमका
मयंक जैन परिच्छा
12 मार्च 2026
हाल ही में राल्फ़ लॉरेन [Ralph Lauren] नाम के ब्रांड ने एक मॉडल को झुमके पहनाकर पेरिस फ़ैशन वीक में रैम्प पर चलवा दिया और झुमके के लिए कह दिया कि ये तो ‘विंटेज एक्सेसरीज़’ हैं। इंटरनेट की जनता इस पर क्रोधित होने लगी—बोली, “ऐसा कैसे कर सकते हैं? झुमका भारत में सदियों से पहना जा रहा है और इतना प्रचलित है कि अगर खो जाता है, तो गाना बन जाता है। प्रेम-समर्पण और प्रेम-निवेदन में झुमका अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने लगा है, जुनूनी आशिक़ों ने अपनी प्रेमिकाओं के झुमकों पर कविताएँ लिख-लिख कर गंध फैला दी है।”
लेकिन इसमें ब्रांड की भला क्या ग़लती?
डिजायनर्स ने अपनी सृजनात्मक स्वप्नदृष्टि से इतनी मेहनत करके झुमका ‘डिज़ाइन’ किया है। अब उसे महँगा क्यों नहीं बेच सकते? उनका हक़ नहीं है क्या? और फिर क्रेडिट देना भी किसे होता है! आख़िर क्रेडिट देता ही कौन है? यह तो फिर भी इतनी पुरानी चीज़ है कि ब्रांड आराम से कह सकता है, “अकाउंटेबिलिटी? आक् थू! कर लो जो करना है।” और फिर आराम से आगे बढ़ जाएगा।
सीधी-सिंपल बात है—ग़रीबों के सपनों में भगवान आ जाते हैं, आस-पड़ोसी आ जाते हैं। अमीर रचनात्मक लोगों के सपनों में कलाकृतियाँ आती हैं और सुबह उठकर वे उन्हें पेटेंट भी कर लेते हैं। अब क्या वो कलाकृतियाँ बेच भी नहीं सकते?
पिछले वर्ष प्राडा [Prada] नामक ब्रांड ने कोल्हापुरी चप्पल पहनाकर मॉडल को रैम्प पर चला दिया था। जो चप्पल यहाँ 400-500 रुपये में बिकती है, वही प्राडा लाखों में बेच रहा है। फिर से बात वही है, अगर कोई आदमी किसी चीज़ को महँगा बेच पा रहा है तो उसमें परेशान होने की क्या ज़रूरत है?
असली बात यह है कि अगर ब्रांड क्रेडिट दे देगा तो उसकी अपनी सृजनात्मकता पर सवाल उठ जाएगा। और जो फ़ैशन डिजायनर लाखों-करोड़ों-अरबों ख़र्च करके, रचनात्मकता की जटिलता ओढ़े बैठा है, उसके बनाए प्रोडक्ट की क़ीमत कुछ भी नहीं रह जाएगी और अगर क्रेडिट दिया तो कुछ पैसा भी देना पड़ सकता है। तो क्यूँ करें? ग़रीब है तो अपने कर्मों से है! हमारा क्या दोष। इसलिए टेंशन लेने की क्या ज़रूरत? खुल्ला चोरी करो और बाज़ार की सबसे बड़ी नैतिकता यही है कि वहाँ पैसा सिर्फ़ एक दिशा में ऊपर की तरफ़ बहता है।
इन जलनख़ोर ग़रीब भारतीयों को ग़ुलामी ने क्या यही सब सिखाया? लगभग 200 वर्षों के उपनिवेशवादी ब्रिटिश शासन ने इतनी मेहनत क्यों की? ताकि तुम, चोरी और इन सब फ़ालतू की बातों में एकाउंटेबिलिटी की बात न करो? कॉपीराइट क़ानून है तो, अब पुरानी चीज़ों में ये क़ानून कमज़ोर पड़ जाता है तो हम क्या करें? इतनी लंबी ट्रेनिंग के बाद भी अगर आप चोरी पर सवाल उठाने लगें तो साम्राज्यवाद का सारा निवेश बेकार चला जाएगा।
अरे थोड़ी तो इज़्ज़त करो, तुम गोरों पर बोझ थे कभी! अब तुम्हारी दो कौड़ी की चप्पल अगर लाखों में बिकवा दी जाए तो दिक़्क़त क्यों हो रही है? अरे तुम्हारी औक़ात बढ़ा रहे हैं, हम!
हम तो कहते हैं, हम चुरा रहे हैं तो तुम भी चुराओ। गाने तो चुराते ही हो न? चुराना बुरी बात थोड़े ही है। बाज़ार में चोरी अगर थोड़ी समझदारी से की जाए तो वह चोरी नहीं—‘सृजनात्मकता’ कहलाती है। मसलन कोई बड़े बजट की फ़िल्म है तो किसी ग़रीब को कुछ पैसे देकर लिखवा लो और उसको क्रेडिट न देकर कोई बड़ा निर्देशक कह दे कि मैंने लिखी और निर्देशित की है तो बिकेगी ज़्यादा न? तो क्यों वो फ़ालतू का परोपकार करे। उसने ग़रीब लेखक को पैसे दिए न अब रखे मुँह बंद अपना। बाज़ार में इसे ही प्रतिभा-प्रबंधन कहते हैं। फ़िल्म इंडस्ट्री में बहुत लोग करते हैं।
ज्ञान चतुर्वेदी, आप तो बेवजह बाज़ार को नापसंद करते रहते हैं। बाज़ार अच्छी चीज़ है। इस बाज़ार में कितने बड़े म्यूज़िक डायरेक्टर्स हैं—सैंकड़ों अच्छे म्यूजिक डायरेक्टर्स को रोज़गार दे रहे हैं और अपने नाम पर गाने निकालते हैं। क्या बुराई है इसमें। अरे कोई बड़ा आदमी अपना काम ख़ुद नहीं करता, तुम भी मत करो न। चोरी कर लो। बड़ा कवि बनना है तो किसी भी ग़रीब शाइर की ग़ज़लें-नज़्में मंच से अपनी बनाकर बोल दो। कोई कहानी पसंद है तो बेहिचक थोड़ा फेरबदल कर अपनी बनाकर बेच दो। क्या ही फ़र्क़ पड़ता है?
अब बताओ; हमने एआई बनाया। है ना! तो वह डेटा कहाँ से लाता है? सभी का डेटा चोरी करता है ना? तुम उससे कोई आर्ट बना लो, उसमें थोड़ा फेरबदल करके अपना बना लो। अपना बना लेना चाहिए, कोई बुराई नहीं है, सब कर रहे हैं। लोग तो ऐतिहासिक हस्तियों को बोल देते हैं कि ये हमने बनाई है, वो असलियत में अस्तित्व में नहीं थे – ये तो सिर्फ़ कलाकृतियाँ हैं।
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