हिंसा पर उद्धरण

हिंसा अनिष्ट या अपकार

करने की क्रिया या भाव है। यह मनसा, वाचा और कर्मणा—तीनों प्रकार से की जा सकती है। हिंसा को उद्घाटित करना और उसका प्रतिरोध कविता का धर्म रहा है। इस चयन में हिंसा विषयक कविताओं को शामिल किया गया है।

एक रंग होता है नीला और एक वह जो तेरी देह पर नीला होता है।

रघुवीर सहाय

हत्या की संस्कृति में प्रेम नहीं होता है।

रघुवीर सहाय

क्रूरताएँ और उजड्डताएँ किसी भी जन-समाज को बचा नहीं सकते।

दूधनाथ सिंह

हत्या का विचार होती हुई हत्या देखने की लालसा में छिपा है।

नवीन सागर

हत्यारों के क्या लेखक साझीदार हुए। जो कविता हम सबको लाचार बनाती है?

रघुवीर सहाय

अगर चेहरे गढ़ने हों तो अत्याचारी के चेहरे खोजो अत्याचार के नहीं।

रघुवीर सहाय

संसार में छल, प्रवंचना और हत्याओं को देखकर कभी-कभी मान ही लेना पड़ता है कि यह जगत ही नरक है।

जयशंकर प्रसाद