कविता

रूप, कथा, पद, चारु पट, कंचन, दोहा, लाल।

ज्यों ज्यों निरखत सूक्ष्मगति, मोल रहीम बिसाल॥

रहीम कहते हैं कि किसी की रूप-माधुरी, कथा का कथानक, कविता, चारु पट, सोना, छंद और मोती-माणिक्य का ज्यों-ज्यों सूक्ष्म अवलोकन करते हैं तो इनकी ख़ूबियाँ बढ़ती जाती है। यानी इन सब की परख के लिए पारखी नज़र चाहिए।

रहीम

सरस काव्य रचना रचौं, खलजन सुनिन हसंत।

जैसे सिंधुर देखि मग, स्वान सुभाव भुसंत॥

मैं महाकाव्य की रचना कर रहा हूँ। इस रचना को सुनकर दुष्ट लोग तो वैसे ही हँसेंगे जैसे हाथी को देखकर कुत्ते (मार्ग में) स्वभाव से ही भौंकने लगते हैं।

चंदबरदाई

बानी जू के बरन जुग सुबरनकन परमान।

सुकवि! सुमुख कुरुखेत परि हात सुमेर समान॥

केशव

तौ पुनि सुजन निमित्त गुन, रचिए तन मन फूल।

जूँ का भय जिय जानिकै, क्यों डारिए दुकूल॥

सज्जन पुरुष तो इसके गुणों के कारण इस रचना से प्रसन्न ही होंगे जैसे कोई इस भय से कि इसमें जूँएँ पड़ जाएँ, दुपट्टे को फेंक थोड़े ही देता है। जैसे जूँओं के भय से कोई दुपट्टा नहीं फेंक देता वैसे ही दुष्ट लोगों के परिहास के भय से कवि काव्य-रचना से विमुख नहीं हो सकता।

चंदबरदाई

चरण धरत चिंता करत, नींद भावत शोर।

सुबरण को सोधत फिरत, कवि व्यभिचारी चोर॥

केशव

राजत रंच दोष युत कविता बनिता मित्र।

बुंदक हाला परत ज्यों गंगाघट अपवित्र॥

केशव

अब कविता को समय नहिं, निरखहु आँख उघारि।

मिलि-मिलि कर सीखो कला, आपन भला विचारि॥

सुधाकर द्विवेदी