चीज़ें

कविता के भाव में कहें तो चीज़ें वे हैं जिनसे हमारी दुनिया बनती है और बर्बाद भी होती है। यहाँ प्रस्तुत है चीज़ों की उपस्थिति-अनुपस्थिति को दर्ज करती कविताओं का यह व्यापक चयन।

जो चीज़ कम होती है, उसकी याद लंबे समय तक आती रहती है।

सिद्धेश्वर सिंह

कपड़े पहनने ही के लिए नहीं हैं—उतार कर रखना भी होता है कि धुल सकें।

अज्ञेय

तुम चीज़ों से अलग होते हो जब उन्हें देखते हो!

नवीन सागर

अच्छाई का पेड़ छाया प्रदान नहीं कर सकता, आश्रय प्रदान नहीं कर सकता।

गजानन माधव मुक्तिबोध

आजकल बाज़ार में ऐसे पपीते भी मिलते हैं, जिन्हें काटो तो उनके भीतर से कोई बीज नहीं निकलता।

सिद्धेश्वर सिंह

आटे को जितनी बार छाना जाए थोड़ा-बहुत चोकर तो निकल ही आता है।

सिद्धेश्वर सिंह

चलते थ्रेशर को मुग्ध भाव से देखते किसान ने कहा, ‘‘अच्छा हुआ जो भूसा दूर जाकर गिरा और अनाज पास में।’’

सिद्धेश्वर सिंह

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