कहानी : बूढ़ा बच्चा
ख़दीजा ताहेरा
04 फरवरी 2026
जाड़े में हैंडिल जितना चलाओ, नलके से उतना गरम पानी आता है। सितली फुआ दुकान जाने से पहले लोटा भरकर ताज़ा पानी सूर्य देवता को चढ़ाकर, सुखशंकर की बहु लीला के पास आती है। रिश्ते में दोनों पड़ोसी और ननद-भावज लगती थीं, पर कोई देखता तो लगता सगी बहनें हैं।
“पूस की सर्दी पार करने वाले बड़े ही भागवान होते हैं भौजी”—आग के पास बैठे सितली फुआ बोलती है।
“ऐ शंकर भैया चले गए क्या काम पे”
“नहीं दीदी बंगाली डॉक्टर के यहाँ गए हैं। पूरी रात पेट में दर्द था।”—लीला गाल पर हाथ रखे जैसे किसी बड़े विपत के आने पर निराश गुमसुम-सी बैठी थी।
“कुछ उल्टा-सीधा खा लिए होंगे”—सितली का इतना कहना ही था कि बस लीलावती के मन में दबी हुई भड़ास फूट पड़ी।
“घर के खाने के अलावा क्या खा लेंगे दीदी। मेरे ही भाग फूटे थे जो उस डायन भगोड़ी को दुआरे से सटा घर दे दिया बाऊजी ने। दुई लड़कन बियाई न होती तो लात मार कर गाँव से बाहर करवा दिए होते अब तक। मरद भी दहिजार है—घर घुस्सू। नज़र टोटके क्या-क्या करती रहती है वो अंदर।” निशी और लीला के बीच का तनाव देखकर लगता कि यह कुछ साल से नहीं बल्कि प्राचीन या मध्यकाल से चली आ रही कोई अधूरी जंग बाक़ी रह गई थी, जिसे हर रोज़ लड़ा जाता था।
“हवा लग गई होगी भौजी! और इतनी ठंड में लदाई का काम कपड़ा पहिन कर तो नहीं करते होंगे। भला तुम भी क्या-क्या सोचती रहती हो। मुझे तो तिलक और हीरा की चिंता होती है देख-देख कर। बाप-महतारी अपने जवानी-जुआनी से बड़े ही नहीं हो रहे हैं।”
“सितली तू भी क्या देवी मैय्या बनी रहती है हाँ! पूरे गाँव की। तुझे कौन-सा बरत दिया है उस भंगिन की धीया ने। सुरूज भगवान यहाँ तक आ गए हैं जा... जा तू भी जा...”—पता नहीं किस बात पर लीला खीझ पड़ी थी, आग के पास से मचिया उठा कर भीतर को चल पड़ी।
सितली फुआ की उम्र आधी हो चुकी थी। महिलाएँ पैंतीस की न ढले कि पचास की हो जाती हैं। सितली फुआ की माँ पैदा होते ही चल बसी थी। एक बूढ़ा बाप था, जिसकी सेवा करते हुए वह अकेली रह गई थी। दुकान पर आते-जाते छोटे बच्चों को वह अक्सर टाफ़ियाँ या चूरन की छोटी पैकेट थमा दिया करती थी।
सुखशंकर का छोटा भाई मोनू लगभग आठ साल पहले पुलिस परीक्षा की तैयारी के लिए इलाहाबाद गया था। वहीं उसकी मुलाक़ात अपने पड़ोसी गाँव की निशी से होती है। अभी छह महीने ही घर छोड़े हुआ था और सातवें महीने में निशी और मोनू सारी दुनियादारी छोड़ कर गाँव लौट आए थे। उनके आने के बाद ही नीरू की सास ने अपनी समधन लीला को उसी दिन नाई से कहलवा भेजा था कि अब नीरू ऐसे घर में लौट कर नहीं जाएगी। जात-बिरादरी में उनका भी सम्मान है। तब से सात साल हो गए हैं, नीरू की माँ ने अपनी ही बेटी का मुँह नहीं देखा है। जात की गोलाई लाँघने वाला जमात की पंगत में नहीं बैठा करता है। कुएँ में मुंडी धँसाए और इस नरक से उस नरक सिधार ले या फिर घुप्प कालिमा को ओढ़ कर अपना बचाव करे।
तिलक, निशी और मोनू का बड़ा बेटा था। वह आज भी स्कूल नहीं गया था। पाँच रूपए लेकर सितली फुआ के पास बिस्कुट ख़रीदने आया था। सितली फुआ की अपनी कोई संतान नहीं थी, पर बच्चों से उन्हें अलग ही लगाव था। तिलक और हीरा को उनके बचपन से लाड करती आई थी। आज छठा दिन था, जब वह बिस्कुट लेने आया था। तिलक जब छोटा था, तब उसे सबसे अधिक लाड सितली फुआ ही करती थी। गाँव समाज से कट जाने के बाद एक सितली फुआ ही थी जो उधार घटा-बढ़ा मोनू को दिया करती थी।
पंडित जी व्यस्त न होते तो लीला अब तक अपना हँसुली कड़ा बेचकर महायज्ञ करवा चुकी होती। निशी साधारण नहीं, प्रेतों के समाज की मुखिया लगती थी लीला को। लीला कहती थी—पता नहीं क्यों वो चाक़ू से साबुन काटती रहती है। पैर हिलाती रहती है। लोगों को देख कर खुसफुस-खुसफुस करती रहती है। हफ़्ता भर हो गया है और कमरे से बाहर नहीं निकली है।
भूख के आगे घुटने टेक कर तिलक, लीला ताई का दिया हुआ लईया-चना कभी-कभी खा लिया करता था। पर हीरा, माँ के डर से कभी नहीं जाता था।
पूरे मोहल्ले के बच्चों में तिलक और हीरा ही एक-दूसरे के साथी थे। खेलते-खेलते आज गोसाईं बाबा के खेत से एक पन्नी आलू बीनकर लाए थे। लौटते हुए शाम हो गई थी और आते ही आग सुलगा कर आलू भूनने लगे। बाहर खुले आसमान के नीचे घना कोहरा बढ़ने लगा था। निशी बार-बार दुआरे से झाँक कर फिर अंदर चली जा रही थी। कुछ ही देर बाद हीरा भागता हुआ अंदर जाता है और माँ से पिता के लौटने की ख़बर देता है। सारे कांटे अब फैलने वाले थे। किसकी नर्म चमड़ी में आकर धँसेगा कौन जनता था। मोनू कुछ कहता उससे पहले निशी दरवाज़े पर आकर खड़ी हो जाती है—“किस दिन गए थे? रात में तुम किस चिमनी की आग सेकते हो मैं जान सकती हूँ? या घर का रास्ता भूल गए थे? घर में खाने को ज़हर की पुड़िया नहीं है और तुम्हारी नज़रें नहीं थम रही हैं।”
यह एक दिन का होता तो वह अपने बचाव में कुछ कहता भी। मृत शरीर-सा मूक वह सुन रहा था। दो-तीन गाँव दूर भट्ठे पर ईंट की लदाई करता और शाम को लौटता था। आस-पड़ोस के लोग कम से कम यही जानते थे, पर निशी... तो क्या निशी नहीं जानती थी ये सब? तिलक के पैदा होने से पहले निशी गाँव के पास वाले स्कूल में पढ़ाया करती थी। पड़ोस के मुंशी जी के बड़े बेटे ज्ञानेंद्र बाबू भी उसी स्कूल में पढ़ाते थे और कभी-कभार उनके घर का चक्कर लगा लिया करते थे काम पड़ने पर। सुखशंकर जी को यह बात थोड़ी खटक गई और एक दिन शाम में मोनू को बुलाकर समझा-बुझा दिया कि यह बहु के इज़्ज़त की बात है, तब से लेकर अभी तक उनकी आपसी समझ बनी हुई है।
आग से आलू निकाल कर तिलक, हीरा को दे रहा था। तिलक दो साल बड़ा था हीरा से, पर उसके लिए वह उसकी संतान जैसा था। अहा! ऐसे बुज़ुर्ग बच्चे समंदर की गहराइयों में कहीं छिप कर हँसते होंगे। मछलियों से खेलते होंगे और फिर आलू की तरह उन्हें पन्नी में भरकर उठा लाते होंगे। अंदर झन् पटक बर्तनों की आवाज़ आती है। इतने में हीरा चौंककर तिलक के पास दुबक जाता है।
दो दिन पहले इसी तरह दुआरे पर आग के पास बैठे तिलक-हीरा को देख कर सितली फुआ कटोरे में दूध भात लेकर देने जा ही रही थी कि लीला ने उनकी माँ के डर से रोक दिया। रीति और बंधनों का बहिष्कार कर चुकी महिलाएँ समाज में आकाश की ऊँचाई तक बहिष्कार की जाती हैं। समाज की सारी चिंता अपने आँगन में समेट लेती हैं, फिर हर आने-जाने वाला उनके हित के लिए उपदेश देता रहता है।
“हीरा आलू सँभाल कर रखो। जलते हुए आग से आलू नहीं निकालते हैं। देखो ऐसे, ऐसे आग कम हो गई इधर! इधर से निकालो!”
घर के बाहर बैठकर तिलक, हीरा से बातें कर रहा था। कोहरा बढ़ चुका था। गाँव में सन्नाटा पसरा हुआ था इस समय तक। हीरा भुना हुआ आलू माँ को देने गया था। छह दिन बाद आज भात और चोखे की तैयारी हो रही थी। शीत की ज़ोरदार लहर से बाहर की आग बुझ चुकी थी।
कुछ देर बाद हीरा बाहर आता है। “भैया माँ बुला रही है खाना खा लो”—हीरा, तिलक को गुहार लगाता है पर कोई आवाज़ नहीं आती है। कोहरे के धुधलके में बूढ़ा बच्चा लिपट रहा था। सब बेख़बर थे, पतली-पतली हड्डियों पर कुछ चीथड़े लपेटे वो कहाँ गया इतनी रात में? सर्द हवाएँ सांय-सांय कर रही थीं। दूर पगडंडियों पर छोटे-छोटे पैर शीत से भीग कर लाल सुन्न पड़ रहे थे। फिर धुँध की चादरें गर्म और सुकूनदेह क्यों थीं?
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बेला पॉपुलर
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