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शंखनाद : जिसे फ़रवरी मयस्सर नहीं

हर आदमी को फ़रवरी मयस्सर नहीं होती। कितना भी झींख लो, रो लो, कलप लो—एहसास-ए-फ़रवरी नहीं बदा तो कहाँ से मिलेगा। टापते रहिए इधर से उधर, फ़रवरी नहीं आएगी, बदनामी ज़रूर हो जाएगी। फ़रवरी महीना नहीं, मनोदशा है। फूल बेमतलब फूल से फटे जा रहे हैं। आमों पर मंजरियाँ खिल उठी हैं। भौंरे ओवरटाइम कर रहे हैं। ठंड की लंबी सुरंग से निकलकर जीव-जंतु सब मगन हैं। सब पर बसंती रंग चढ़ा है। सब बसंत हो चले हैं। जिनका कोई नहीं, वे संत हो चले हैं। अपनी दाढ़ी खुजा रहे हैं, जीवन का अर्थ खोज रहे हैं।

सरकार इतने बड़े-बड़े काम कर रही है—जहाँ राह नहीं है वहाँ सड़क, पुल-पुलिया बना दे रही है। सरकार क्या यह नहीं कर सकती कि वह हम जैसे प्रेम के पीरों के कैलेंडर से फ़रवरी ही निकाल दे? लेकिन उसे ग़रीबों की कहाँ पड़ी है। उधर कुछ लोगों का पूरा जीवन ही फ़रवरी की तरह होता है—चिरस्थायी बसंत! अब फ़रवरी आने वाली है, दर्द उखड़ रहा है। यह महीना याद दिला जाता है कि ज़िंदगी अकारथ गई है। चाहे जाने की आवारा चाहत ऐसी बर्फ़ जमी पहाड़ी पर छोड़ देती है, जहाँ चारों तरफ़ तन्हाई के भेड़िए गुर्राते हैं और कोई रास्ता नहीं सूझता।

डब्ल्यू. बी. येट्स—जो ख़ुद सच्चे प्रेम की तलाश में लगे रहे और इस क्रम में कई-कई प्रेम करके फेंक दिए—के अनुसार जीव-जंतु, चिरई-चुरुंगुन, मछलियाँ भी स्पेस पा रही हैं, वहीं प्रेम कर रही हैं। उन्हें पता है कि मृत्यु आएगी, पर उससे पहले वे जीना चाहते हैं। उनसे कोई बीच में कहे, “भैया, थोड़ा थम जाओ तुम लोग,” तो वे शायद बिना मुँह फेरे ही रॉबर्ट फ़्रॉस्ट को कोट करते हुए कहेंगे—“माइल्स टू गो बिफ़ोर आइ स्लीप।” या अगर उन्हें लिपि का ज्ञान होता तो वे समय निकाल कर साइन बोर्ड लगा देते कि “मेन-विमेन आर एट वर्क।” या “डू नॉट डिस्टर्ब!” वे सृजन से मृत्यु को मात देने में लगे हैं।

येट्स आगे कहते हैं—यहाँ बूढ़े आदमियों के लिए कोई जगह नहीं है। इस अर्थ में हम बचपन से ही बूढ़े हो लिए थे। ऐसा लगता था कि यह ज़िंदगी बस हरिनाम का कीर्तन करने के लिए अलॉट हुई हो। बोर हुए, पढ़ते रहे। फिर साहित्य में घुसे, प्रेम-कहानियाँ पढ़ने लगे। चारों तरफ़ प्रेम पसरा पड़ा है—शेखर के लिए शशि है, चंदर के लिए सुधा है, देवीदत्त तिवारी के लिए बेबी है। देवदास के लिए दो-दो हैं। यह सब पढ़-सुन-गुनकर एहसास-ए-तन्हाई और गहरा जाती है। लगता रहा भीतर एक मरुस्थल बहता है। तब समझा यह प्राण कितना दर्द सहता है।

फिर किसी ने कहा—साहित्य में चले जाओ, पढ़ने से कुछ नहीं होता, लिखो, लिखना मोक्ष है। लिख कर देखना। चमत्कार होगा। प्रेम की मारा-मारी है, इफ़रात प्रेम पसरा हुआ है। तुम्हारे पैरों में प्रेम लिपट जाएगा। हम चले आए, लिखने भी लगें। यहाँ भी कुछ न हुआ। उल्टे हम कईयों के चरणों में लिपटे रहे। अब मैं वह काम कर रहा हूँ जो काम मुझे कभी पसंद ही न था—लिखना। लिखना आसान काम थोड़े है; अपनी ही खाल उधेड़ना और सीना है। पर मौज़-ए-तलातुम में बैठे हैं—कभी लहर आएगी। लहर की आवाज़ तो आती है, लहर नहीं आती। लहर भी सियासी चीज़ हो गई है। अच्छी चीज़ें सिर्फ़ सुनाई देती हैं।

यह मेरा ही दुख नहीं है, इसमें पर-दुख-कातरता भी शामिल है। मेरे पड़ोसी गाँव में एक लड़का था। उसके पास एक ही किडनी थी। साथ ही किसी असाध्य बीमारी के चलते सालों से नमक नहीं खाया था। बहुत दुखी रहता था—नहीं, बीमारी से नहीं; बसंत से दुखी था, फ़रवरी से दुखी था। जीवन में नमक नहीं था। खाना तो जैसे-तैसे निगल ले रहा था, जीवन ही अझेल हो गया था।

हालाँकि मेरे पास दोनों किडनियाँ थीं, पर लिटरली बहुत सारी चीज़ों का घातक रूप से अभाव था। पर कमी सिर्फ़ प्रेम की महसूस हुई। नादान जवानी में एक बार बीमार हुए और बड़े भाई साहब डॉक्टर के पास ले गए। डॉक्टर ने बताया कि बहुत कमज़ोरी है—“पंडित जी, कुछ पौष्टिक चीज़ें भी खाया-पिया कीजिए।” यह जानकर पंडित जी बड़े शर्मिंदा हुए। उन्हें लग रहा था—चार क़दम चलते ही थक जाना, हाथ-पाँव काँपना, हथेली-पंजे में पसीना आना—ये सब प्रेम-डिफ़िशिएंसी से उपजी बीमारियाँ होंगी। मगर ऐसा नहीं था।

मेरी ख़ुशी, मेरा अंधविश्वास विज्ञान ने छीन लिया। मैं प्रेम के अभाव में तिल-तिल मर रहा था, पर यह ख़ुशी भी विज्ञान से देखी न गई और मुझे बताया गया कि तुम कुपोषण से मर रहे हो। हमने इसका बदला विज्ञान में कई-कई बार फेल होकर लिया। विज्ञान बहुत ख़राब चीज़ है—हमारे भोले-भाले विश्वासों की चूलें हिला देता है। फिर हमें ख़ुद अपने विश्वास की रक्षा के लिए लाठी उठानी पड़ती है, पत्थर फेंकने पड़ते हैं।

प्रेम की चाहत आदमी को जोकर बना के छोड़ देती है, और मज़ा यह कि आदमी को पता भी नहीं चलता। बिल्कुल लोढ़े जैसे सेंस ऑफ़ ह्यूमर वाला व्यक्ति कपिल शर्मा हो जाता है। वह हास्य पैदा करने के चक्कर में हास्यास्पद होता जाता है। उसकी महीन बुद्धि सब समझती है, पर यह नहीं समझ पाती कि वह अपने हाथों अपनी ही लंबी काट रहा है—“ख़ुद को दिए-दिए फिरता” है।

वैसे देखा जाए तो विधाता ने स्त्री-पुरुष को बनाने में कोई भेदभाव नहीं किया। पुरुष को भी रीढ़ दी—वह सीधा तनकर चल सकता है। पर मज़ाक़ कर दिया—उसकी ख़ुशियों का इंचार्ज स्त्री को बना दिया। सारी उपलब्धियाँ अकारथ कर दीं।

अपने प्रेम की तलाश में मतुआए दिनों में हमने एक ऐसी हसीना को प्रपोज़ करने की जहमत उठाई जो कितनी भी उदारता से देखा जाए, किसी भी एंगल से हसीन न थी। मेरे प्रपोज़ल पर उसने एक अंगूठी दिखाई—जो नक़ली थी—पर जिसे उस इंसान ने दी थी जो एक स्थानीय स्कूल में अध्यापक थे, हम सबके आदरणीय थे। आस-पास के गाँवों में उनकी धाक थी। पंचायत में बुलाए जाते थे और सच कहने के लिए जाने जाते थे। उसके आशिक़ों में और भी गणमान्य लोग शामिल थे। यह सच जानकर अपना-सा मुँह लिए लौट आया और अनायास स्वगत में मुँह से निकला—“या विधाता, यह कैसा मज़ाक़ किया है हमारे साथ…”

इधर सोशल मीडिया के युग में आशिक़ी की दुनिया का अनंत विस्तार हुआ है। नैतिकताएँ अपनी टाइमलाइन पर स्त्री-अधिकारों की पैरोकारी में लगी हैं, वहीं अनैतिकताएँ मुड़-मुड़ाए इनबॉक्स में तांडव कर रही हैं। स्त्री-पुरुष सच्चे प्रेम की तलाश में निकल गए हैं—जैसे मज़दूर लेबर चौक पर रोज़ी-रोटी की तलाश में चौकन्ना बैठा रहता है। विडंबना है कि रोज़ शाम को घर लौटना पड़ता है। रंडवे दुखी हैं, विवाहित उनसे ज़्यादा दुखी हैं।

विधाता ने एक ख़ालीपन दिया है जो भरता ही नहीं। माह-ए-फ़रवरी जो न कराए… एहसास-ए-फ़रवरी जो न दिखाए!

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