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शंखनाद : बुक फ़ेयर के लिए मुखौटे...

जनवरी में होने वाली बुक फ़ेयर की आहट के बीच कई-कई यूनीसेक्स सैलूनों, ब्यूटीपार्लरों और स्पाओं में बुक फ़ेयर के लिए स्पेशल ऑफ़र देख, पढ़ और सुनकर चकित रह गया। साथ ही अपने मानसिक पिछड़ेपन पर रोना आया। साहित्य का भावुक विद्यार्थी होने के चलते, मैं यह मानकर चल रहा था कि एक लेखक का विचार ही उसका शृंगार है। वह विचार जिसे वह अपने ख़ून-पसीने की भट्टी में गलाकर कमाता है। यह भी कि साहित्य और साहित्यकार को किसी मेकअप की दरकार नहीं है। आग को अपने तेज का विज्ञापन नहीं करना पड़ता।

यह सब देखकर मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि मैं ग़लत था। अब आँख खुल गई तो मुझे गत वर्षों में बुक फ़ेयर में चमकती-दमकती, चमकते-दमकते और अनगिन प्रशंसक-प्रशंसिकाओं से गिरे चमक और चिंतातुर के मणिकांचन संयोग से बने चेहरे याद आए। मित्र लेखक की दाढ़ी याद आई। सामान्य मुलाक़ातों में वह बिल्कुल बुझा और फीका बदरंग दिखता है। वहीं बुक फ़ेयर में! दाढ़ी में जैसे सौ-सौ वॉट के सौ बल्ब प्रदीप्त हो रहे हों। चेहरे से क्रांति का नूर टपक रहा है। मुझ नादान को लगता था कि हो न हो, यह सर्वहारा की, पूँजीवाद और सांप्रदायिकता के विरुद्ध लड़ाई से उपजे नैतिक तोष की चमक है। आचार्य जी जैसे जेनुइन और ज़मीनी लंठ आदमी अस्वाभाविक रूप से स्वाभाविक और पढ़े-लिखे दीखते हैं। मैं दोनों चेहरों में साम्य बिठाते हुए सोचता था कि कितना सही कहा गया है कि हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी। एक कवयित्री याद आईं। वह दो घंटे में ही इतनी उदासी का प्रदर्शन कर ले जाती थीं, जितना कई लोग मिलकर और कई जन्मों में नहीं दिखा सकते थे। उनकी आवाज़ अतिशय भावुकता में भर्रा जाती है और उसे देखकर मेरी आवाज़ बैठी जाती है। वह अपनी ही कविताओं का विस्तार लग रही हैं। सहज, सौम्य वॉर्म और नाज़ुक। उधर मैं ख़ुद को कोसता हूँ कि कैसा उजबक हूँ, लिखे और होने में कोई साम्य ही नहीं है। आदमी मिलते ही भाँप जाता है कि यह आदमी हलवाई, मुंशी या किरानी कुछ भी हो सकता है, लेखक-कवि नहीं हो सकता—हो ही नहीं सकता।

इस खुलासे से ठगा महसूस कर रहा था। कल छुट्टी भी थी। सो हम एक में धँस लिए, एक स्पा में। पैर धरने की जगह नहीं। बुक फ़ेयर के जमुनापारी नागरिक वहीं डटे थे। लगा बुक फ़ेयर के हिंदी वाले हॉल में घुस आए हैं। आचार जी मूँछों पर ख़िज़ाब लगवा रहे थे। साथ ही निर्देश दे रहे थे कि जड़ से थोड़ा मूँछें सफ़ेद छोड़ देना, गंभीर लुक आ जाता है। मैं आईने में चेहरे स्कैन कर ही रहा था कि छप से मेन्यू-कार्ड लिए एक काउंसलर प्रकट हुई। वह इतनी सुंदर थी कि मैं उसे आई लव यू कहने से ख़ुद को मुश्किल से रोक पाया। मन ही मन तय पाया कि मैं उसे अपनी कविताओं की प्रेरणा की देवी यानी म्यूज़ बनने का ऑफ़र दूँगा। पर उसकी आवाज़ बहुत प्रोफ़ेशनल और मैकेनिकल थी। वह कच्चापन न था, जिस पर मैं मर मिटना चाह रहा था।

“आप ख़ुद बताएँगे कि क्या दिखना चाह रहे हैं या मैं आपको आपके लेखन और पर्सनैलिटी के हिसाब से या इनसे विलग कुछ सजेस्ट करूँ? बाय द वे आप लिखते क्या हैं?” उसने स्टर्न वॉयस में कहा।

इतनी जल्दी में और इतनी डिटेल सुनकर मैं दबाव में आ गया और मेरे नाख़ून कटने के लिए ख़ुद दाँतों के नीचे आ गए। यह बात वह ताड़ गई और बोली तुम हिंदी वाले इतने भोले और अनाड़ी क्यों बने फिरते हो? जब तक जवाब सूझे तब तक कॉफ़ी आ गई। उसने मुझे सोचने का वक़्त दिया। और दूसरे लेखकों को बिना किसी लगाव या जुड़ाव के एंटरटेन करने लगी। उसका इतना बेमुरव्वत और पेशेवर होना मुझे अखर गया। लेकिन यह सुकून था कि एकतरफ़ा कार्रवाई करते हुए, उसे अपनी म्यूज़ बनाने से इनकार कर चुका था।

वह हवा में अपने महँगे परफ़्यूम की चित्ताकर्षक गंध और एक्सक्यूज़ मी का जाप करते और भीड़ को चीरते हुए फिर मेरे पास आई। अब तक वह शायद समझ गई थी कि मैं अभी लेखन और लेखन के धज के इतने बड़े बाज़ार से संप्रति अपरिचित हूँ। इस बार वह मेरे बग़ल इतने बग़ल बैठ गई कि म्यूज बनाने का विचार फिर से बग़ावती तेवर में सिर उठाने लगा। वह साहित्य के विचार, फ़ॉर्म और कंटेंट के आधार पर लुक और मैनरिज्म सुझा रही थी, साथ ही अपने शरारती बालों को कान के पीछे सेट करती जा रही थी। मैं ध्यान से सुन रहा था, पर सुन नहीं पा रहा था। वह अपनी रौ में बोले जा रही थी।

“आप सेंट्रिस्ट या जनवाद का कोई शेड ट्राई कर सकते हैं। आप का चेहरा गोल-मटोल और भरा हुआ है। लिबरल चल सकता है। लेफ़्ट का और कोई शेड आप पर उतना जँचेगा नहीं। उसने चेहरे को ढक कर कुछ कोण अदल-बदलकर देखा और राय दी कि यू नो, प्रतिबद्धता भी कम उभर कर आ रही है जो ठीक नहीं है। साथ ही कपड़ों पर ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान देना होगा। यह छोड़िए। या आप कहें तो राइट विंगर लुक भी फबेगा आप पर। लेकिन राइट में भी एक्टिविस्ट वाली छवि नहीं चलेगी।”

वह किसी को निर्देश देने लगी तो मैंने शीशे पर फ़ोकस किया। सामने शीशे में देखा एक सज्जन चेहरे की उभरी हड्डियों के प्रताप से ऐसे कट्टर कम्युनिस्ट दिख रहे थे, जैसे ‘दास कैपिटल’ के पन्ने से ही पैदा हुए हैं। मुझे उनकी तरफ़ देखता पाकर वह बोल पड़ीं—एक्चुअली, यह मेरा ही सुझाव था। वह अपने चेहरे से लेफ़्ट के अल्ट्रा शेड में फ़िट बैठे रहे थे, इसलिए यह सुझाव मैंने ही दिया था। वह बढ़िया मुहावरेदार अँग्रेज़ी बोलते हैं। एप्पल का फ़ोन कैरी करते हैं और ब्रांडेड जूते पहनते हैं। सबसे बढ़िया बात यह है कि वह एंटी- इस्टैब्लिशमेंट होने को अपने हाव-भाव से आसानी से कैरी कर ले जा रहे हैं। थोड़ी-सी असहजता है। पाँचवीं सीटिंग तक सब मक्खन।

एक जनवादी भी तैयारी में थे। उनकी तीन सीटिंग्स में से यह उनकी पहली ही सीटिंग थी। वह फ़ाउंडेशन पोतकर इलीट जन से कटे जनवादी जी यू-ट्यूब पर लोकगीत सुन रहे थे। ‘कोयल बिनु बगिया न सोहे राजा।’ अपनी जाँघ पर ताल दे रहे थे कि उनकी ट्यूटर ने ऐसी चीप हरकत करने से मना कर दिया। एक कवयित्री अपने व्यक्तित्व के इंटेलेक्चुअल पहलू को उभारने के लिए बालों में सफ़ेद हाईलाइटर लगवा रही थीं। वह हैंड-मेड साड़ी के साथ स्केचर का स्पोर्ट्स शू पहने थीं। ख़ाली हाथ में सोने के पतले कंगन। जो यह कहने में क़तई बाधक न थे कि आई हेट ज्वैलरी, यू नो!

वह फिर एक्सक्यूज़ मी कहकर चली गईं। मेरी नज़र मेन्यू कार्ड पर गई। बाप रे! न्यूनतम पैकेज 5100 रुपए का है। तीन सीटिंग। अधिकतम पैकेज एक लाख ग्यारह हज़ार का है। वह साहित्य और कला के कॉर्पोरेट कारोबारियों के लिए था। उसमें हर महीने चार सिटिंग होती है। वह साल भर के लिए वैलिड है। धज नाना प्रकार हैं! एक तरह से लुक्स और धज का बुफ़े सजा था। क्वियर, लेस्बियन, गे, बायसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर, नॉन बाइनरी, दलित, ब्लैक, असेक्सुअल... सिर चकरा गया। इतनी वैरायटी का साहित्य तो हमारे यहाँ साहित्य के प्रोफ़ेसर तक नहीं जानते। मैं घबरा गया।

वह फिर लौट आई थी। मैंने अपनी तरफ़ से घबराहट को छुपाते हुए बोल दिया कि मुझे सिंपल लुक वाला कुछ भी चलेगा। मुझे ज़्यादा ताम-झाम पसंद नहीं है। एक साँस में ही अपनी बात समाप्त करके मैं राहत की साँस लेने ही वाला था कि उसके चेहरे पर चुनौतीपूर्ण मुस्कान फैल गई। मैं उसका चेहरा क्लोज-अप में लिए रहा। उसने होंठों को सिकोड़ा, गोल-गोल घुमाया और फिर अपने ऊपरी होंठ को नीचे दबा लिया। फिर बोली देखते हैं सर! दरअस्ल, सिंपल वाला लुक लाना थोड़ा मुश्किल और टाइम-टेकिंग है। बिना मेकअप के दिखने में ज़्यादा मेकअप लगता है। सहज दिखना ही कठिन है। पैकेज थोड़ा महँगा है। आपको न्यूनतम पाँच सीटिंग देनी पड़ेगी। अपनी पतली और कलात्मक उँगलियों पर उसने बुक फ़ेयर डेट काउंट—अलबत्ता अँग्रेज़ी में—करके बताया कि समय कम है, इसलिए मुझे आज से ही से सिंपल लुक वाला पैकेज शुरू कराना होगा। मैं फँसा महसूस कर रहा था। माफ़ी माँगते हुए बाहर भागा। वह पीछे से चिल्ला कर कह रही थी। सर, आप बिना मुखौटे के, निहत्थे ही जाएँगे?

मैं सिहर गया। दुनिया कितनी कठिन हो गई है। साहित्य, संगीत, कला, राजनीति, धर्म किसी भी दुनिया में आप बेधड़क और निहत्थे प्रवेश नहीं कर सकते। जिसके पास सिर्फ़ अपना चेहरा है, उसका कोई चेहरा नहीं है। वह किसी गिनती या सूची में नहीं आता। वह भीड़ है, आदि है, इत्यादि हैं—वह रेल और सड़क दुर्घटनाओं में, लाभ की योजनाओं में, संख्याओं में आता है।

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