वियोग

लाल लली ललि लाल की, लै लागी लखि लोल।

त्याय दे री लय लायकर, दुहु कहि सुनि चित डोल॥

लाल को लली से और लली को लाल से मिलने की इच्छा है। दोनों मुझे कहते हैं, अरी तू उससे मुझे मिलाकर विरहाग्नि को शांत कर। इनकी बातें सुनते-सुनते मेरा भी चित्त विचलित हो गया है।

दयाराम

बिरह जिलानी मैं जलौं, जलती जलहर जाऊँ।

मो देख्याँ जलहर जलै, संतौ कहा बुझाऊँ॥

विरहिणी कहती है कि विरह में जलती हुई मैं सरोवर (या जल-स्थान)

के पास गई। वहाँ मैंने देखा कि मेरे विरह की आग से जलाशय भी जल रहा है। हे संतो! बताइए मैं अपनी विरह की आग को कहाँ बुझाऊँ?

कबीर

जौं रोऊँ तौ बल घटै, हँसौं तौ राम रिसाइ।

मनहीं माँहि बिसूरणां, ज्यूँ धुँण काठहिं खाइ॥

यदि आत्मारूपी विरहिणी प्रिय के वियोग में रोती है, तो उसकी शक्ति क्षीण होती है और यदि हँसती है, तो परमात्मा नाराज़ हो जाते हैं। वह मन ही मन दुःख से अभिभूत होकर चिंता करती है और इस तरह की स्थिति में उसका शरीर अंदर−अंदर वैसे ही खोखला होता जाता है, जैसे घुन लकड़ी को अंदर−अंदर खा जाता है।

कबीर

चकवी बिछुटी रैणि की, आइ मिली परभाति।

जे जन बिछूटे राम सूँ, ते दिन मिले राति॥

रात के समय में अपने प्रिय से बिछुड़ी हुई चकवी (एक प्रकार का पक्षी) प्रातः होने पर अपने प्रिय से मिल गई। किंतु जो लोग राम से विलग हुए हैं, वे तो दिन में मिल पाते हैं और रात में।

कबीर

पिय-सङ्गमि कउ निद्दडी पिअहो परोक्खहो केम्व।

मइँ विन्नि वि विन्नासिआ निद्द एम्व तेम्व॥

प्रिय के संगम में नींद कहाँ! प्रिय के वियोग में भी नींद कैसी! मैं दोनों ही प्रकार विनष्ट हुई; नींद यों त्यों।

हेमचंद्र

सुंदर बिरहनि अति दुखी, पीव मिलन की चाह।

निस दिन बैठी अनमनी, नैननि नीर प्रबाह॥

सुंदरदास

दादू इस संसार में, मुझ सा दुखी कोइ।

पीव मिलन के कारनैं, मैं जल भरिया रोइ॥

ना बहु मिलै मैं सुखी, कहु क्यूँ जीवनि होइ।

जिनि मुझ कौं घाइल किया, मेरी दारू सोइ॥

इस संसार में मेरे जैसा कोई दु:खी नहीं है। प्रियतम की विरह-वेदना के कारण, रोते-रोते मेरे नेत्र हमेशा अश्रुओं से भरे रहते हैं। वे (प्रियतम) मिलते हैं, मैं सुखी होती हूँ। फिर मेरा जीना कैसे संभव हो सकेगा? जिन्होंने अपने विरह-बाण से मुझे घायल किया है, वही ब्रह्म (उनका साक्षात्कार) मेरी औषधि हैं। अर्थात् वही मेरी वेदना को दूर करने वाले हैं।

दादू दयाल

अंषड़ियाँ झाँई पड़ी, पंथ निहारि-निहारि।

जीभड़ियाँ छाला पड्या, राम पुकारि-पुकारि॥

प्रियतम का रास्ता देखते-देखते आत्मा रूपी विरहिणी की आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा है। उसकी दृष्टि मंद पड़ गई है। प्रिय राम की पुकार लगाते-लगाते उसकी जीभ में छाले पड़ गए हैं।

कबीर

पीव पुकारै बिरहणीं निस दिन रहै उदास।

रांम रांम दादू कहै, तालाबेली प्यास॥

विरहिणी अत्यंत बेचैनी और दर्शनों की लालसा से अपने प्रियतम को पुकार रही है। दादू कहते हैं कि वह रात-दिन राम-राम रटती हुई दर्शन की प्यास में खिन्न बनी रहती है।

दादू दयाल

बिरहारति तें रति बढ़ै, पै रुचि बढन कोय।

प्यासो ज़ख्मी जिए तहूँ, लह्यो त्यागें तोय॥

विरह की पीड़ा से प्रेम बढ़ता है, पर इस तरह (विरह सहकर) प्रेम को बढ़ाने की रुचि किसी की भी नहीं होती। वैसे ही जैसे प्यासा घायल यह जानते हुए भी कि वह तभी जीवित रहेगा जब वह पानी पिए, पर प्राप्त जल को वह नहीं त्याग पाता।

दयाराम

वदन सीतल चंद्रमां, जल सीतल सब कोइ।

दादू बिरही रांम का, इन सूं कदे होइ॥

चंदन, चंद्रमा और जल की प्रकृति शीतल होती है। इनसे सर्प, चकोर और मीन को असीम तृप्ति (शांति) मिलती है। लेकिन जो ब्रह्म-वियोगी हैं, उन्हें इन पदार्थों से शांति (तृप्ति) नहीं मिल सकती है।

दादू दयाल

चंपा हनुमत रूप अलि, ला अक्षर लिखि बाम।

प्रेमी प्रति पतिया दियो, कह जमाल किहि काम॥

उस प्रेमिका ने अपने पति को पत्र में चंपा-पुष्प, हनुमान, भौंरा और ला अक्षर क्यों लिखकर दिया? गूढ़ार्थ यह है कि प्रेमिका अपना संदेश व्यक्त करना चाहती है कि उसकी और प्रेमी की दशा, चंपा और भ्रमर-सी हो रही है। दोनों मिल नहीं रहे हैं। इस हेतु वह स्त्री (चंपा) दूत (हनुमान) से कह रही है कि तू जाकर मेरे प्रेमी (भ्रमर) से कह कि मुझे मिलने की लालसा (ला) है। 'ला' का अर्थ यहाँ लाने का भी हो सकता है, मानो विरहिणी दूत से कहती हो कि तू जाकर प्रेमी को बुला ला।

जमाल

जे महु दिण्णा दिअहडा दइएँ पवसन्तेण।

ताण गणन्तिए अंगुलिउ जज्जरिआउ नहेण॥

जो दिन मुझे प्रवास पर जाते हुए प्रिय ने दिए थे, उन्हें गिनते हुए मेरी अंगुलियाँ नख से जर्जरित हो गईं।

हेमचंद्र

अम्बणु लाइवि जे गया पहिअ पराया के वि॥

अवस सुअहिँ सुहच्छिअहि जिवं अम्हइँ तिवं ते वि॥

प्रीत लगाकर जो कोई बटोही पराए की तरह चले गये वे भी अवश्य ही सुख की सेज पर सोते होंगे, जैसे हम हैं वैसे वे भी।

हेमचंद्र

कर कंपत लेखनि डुलत, रोम रोम दुख लाल।

प्रीतम कूँ पतिया लिखुं, लिखी जात जमाल॥

हे प्रियतम ! तुम्हें पत्र लिखते समय हाथ काँप रहा है और लेखनी भी हिल रही है। विरह के कारण रोम-रोम में पीड़ा हो रही है, पत्र लिखा ही नहीं जा रहा है।

जमाल

पइँ मेल्लन्तिहे महु मरणु मइँ मेल्लन्तहो तुज्झु।

सारस जसु जो वेग्गला सो वि कृदन्तहो सज्झु॥

तुझे छोड़ते हुए मेरा मरण है और मुझे छोड़ते हुए तेरा। सारस के समान जो दूर रहेगा वह यम का साध्य होगा।

हेमचंद्र

मुख ग्रीषम, पावस नयन, तन भीतर जड़काल।

पिय बिन तिय तीन ऋतु, कबहुँ मिट जमाल॥

साँसों की उष्णता से ग्रीष्म, निरंतर अश्रुपात से पावस और इच्छाओं पर तुषारापात होने के कारण शिशिर; इस प्रकार तीनों ऋतुओं ने उस विरहिणी के तन में अपना घर कर लिया है।

जमाल

जमला प्रीत कीजिये, काहू सों चित लाय।

अलप मिलण बिछुड़न बहुत, तड़फ तड़फ जिय जाय॥

अपना सर्वस्व गँवाकर किसी से प्रीति करनी चाहिए। क्योंकि, सुख तो क्षणिक होता है पर वियोग अधिक सहन करना पड़ता है और प्राण तड़प-तड़प कर तजने पड़ते हैं।

जमाल

बिरह तपन पिय बात तैं उठत चौगनी जागि।

जल के सींचे बढ़त है ज्यों सनेह की आगि॥

भावार्थ: कवि वृंद कहते हैं कि प्रिय की बात को स्मरण करने से विरह बढ़ जाता है अर्थात् चार गुना बढ़ जाता है। लेकिन प्रेम रूपी जल के सींचने पर प्रेम की चाह बढती ही जाती है।

वृंद

बप्पीहा पिउ पिउ भणवि कित्तउ रुअहि हयास।

तुह जलि महु पुणु वल्लहइ बिहुँ वि पूरिअ आस॥

हे पपीहा, पी-पी बोलकर निराश (हताश) कितना रोएगा? तुम्हारी जल से प्रीति और मेरी वल्लभ से प्रीति, (कभी फलीभूत नहीं होगी) —दोनों की आशा पूरी होगी।

हेमचंद्र

पिउ आइउ सुअ वत्तडी झुणि कन्नडइ पइट्ठि।

तहो विरहहो नासंतअहो धूलडिआवि दिट्ठ॥

प्रिय आने की बात सुनी; ध्वनि कान में पैठी। नष्ट होते उस विरह की धूल भी दीखी।

हेमचंद्र

जब लगि विरह उपजे, हिये उपजे प्रेम।

तब लगि हाथ आवहिं धरम किये व्रत नेम॥

दरिया (बिहार वाले)

कल परत पल एक हूँ, छाडे साँस उसाँस।

सुंदर जागी ख़्वाब सौं, देख तौ पिय पास॥

सुंदरदास

चकवा चकवी दो जणा, इन मत मारो कोय।

ये मारे करतार नै, रैन विछोहा होय॥

संत लालदास

कहूँ धरत पग परत कहुँ, डिगमिगात सब देह।

'दया' मगन हरि रूप में, दिन-दिन अधिक सनेह॥

दयाबाई

बिरह सतावै रैन दिन, तऊ रटै तव नाम।

चातकि ज्यों स्वाती चहै, पाती चहै सुबाम॥

कृपाराम

लाय लगी घर आपणै, घट भीतर होली।

शील समँद में न्हाइये, जाँ हंसा टोली॥

लालनाथ

ब्रह्म रूप सागर सुधा, गहिरो अति गंभीर।

आनंद लहर सदा उठै, नहीं धरत मन धीर॥

दयाबाई

मैं लखी ऐसी दसा, जैसी कीनी मैन।

तब तें लागे नैन नहिं, जब तें लागे नैन॥

रामसहाय दास

बिरह ज्वाल उपजी हिये, राम-सनेही आय।

मन मोहन सोहन सरस, तुम देखन जा चाय॥

दयाबाई

पिक कुहुकै चातक रटै, प्रगटै दामिनि जोत।

पिय बिन यह कारी घटा, प्यारी कैसे होत॥

जसवंत सिंह

मारग जोवै बिरहनी, चितवै पिय की वोर।

सुंदर जियरै जक नहीं, कल परत निस भौर॥

सुंदरदास

तलब करै बहु मिलन की, कब मिलसी मुझ आइ।

सुंदर ऐसे ख़्वाब मौं, तलफि-तलफि जिय जाइ॥

सुंदरदास

हेरत, टेरत डोलिहौं, कहि-कहि स्याम सुजान।

फिरत-गिरत बन सघन में, यौंही छुटिहैं प्रान॥

नागरीदास

कहति ललन आए क्यौं, ज्यौं-ज्यौं राति सिराति।

त्यौं-त्यौं वदन सरोज पैं, परी पियरई जाति॥

रामसहाय दास

सखि पिय सुरत, सुरत, सुरत, सुरत सुर तन पीर।

सुर तन हिन सुर तन नहीं, सुर तनया सरि नीर॥

जमुना के जल में चंद्र प्रतिबिंब के दर्शन से संभोग समय देखी हुई प्रिय की सूरत और सहवास का स्मरण हो आया। वह मधुर स्मृति शूल बन कर तन में चुभने लगी। काम जागृत हो उठा, जिससे गोपिका का शरीर शिथिल हो गया जैसे उसमें प्राण ही हों।

दयाराम

असन बसन भूषन भवन, पिय बिन कछु सुहाय।

भार रूप जीवन भयो, छिन छिन जिय अकुलाय॥

रत्नावली

पिय साँचो सिंगार तिय सब झूँठे सिंगार।

सब सिंगार रतनावाली, इक पिय बिनु निस्सार॥

रत्नावली

हँसि गावत रोवत उठत, गिरि-गिरि परत अधीर।

पै हरि रस चस को ‘दया’, सहै कठिन तन पीर॥

दयाबाई

विरह विथा सूँ हूँ विकल, दरसन कारन पीव।

‘दया’ दया की लहर कर, क्यों तलफावौ जीव॥

दयाबाई

प्रेम-पीर अतिही बिकल, कल परत दिन रैन।

सुंदर स्याम सरूप बिन, 'दया' लहत नहिं चैन॥

दयाबाई

मैं मोही मोहे नयन, खेह भई यह देह।

होत दुखै परिनाम करि, निरमोही सों नेह॥

रामसहाय दास

हँसि गावत रोवत उठत, गिरि-गिरि परत अधीर।

पै हरि रस चसको 'दया', सहै कठिन तन पीर॥

दयाबाई

हरि रस माते जे रहैं, तिनको मनो अगाध।

त्रिभुवन कू सम्पति दया, तृन सम जानत साध॥

दयाबाई

आयौ दुसह बसंत री, कंत आए वीर।

तन मन बेधत तंत री, मदन सुमन के तीर॥

रामसहाय दास

जा दिन तैं चरचा भई, तुमहि चलन की लाल।

बिसरि गई बोलनि हसनि, ता दिन तैं वह बाल॥

दौलत कवि

जहाँ तार की गति नहीं, अजन हूँ बेकाम।

तहाँ पियरवा रमि रहा, कौन मिलावै राम॥

सुधाकर द्विवेदी

को जाने रतनावली, पिय बियोग दुष बात।

पिय बिछुरन दुष जानतीं, सीय दमैंती मात॥

रत्नावली

चलत पियहि तन बाल के, भयो बिरह दरसान।

सीत पवन दुख सरस मुख, भई पियरई आन॥

दौलत कवि

चूडउ चुन्नी होइसइ मुद्धि कवोलि निहत्तु।

सासानलिण झलक्कियउं वाह-सलि-संसित्तु॥

सोमप्रभ सूरि