प्रतीक्षा

प्रतीक्षा या इंतिज़ार किसी व्यक्ति अथवा घटित के आसरे में रहने की स्थिति है, जहाँ कई बार एक बेचैनी भी अंतर्निहित होती है। यहाँ प्रस्तुत है—प्रतीक्षा के भाव-प्रसंगों का उपयोग करती कविताओं से एक अलग चयन।

तिय पिय सेज बिछाइयों, रही बाट पिय हेरि।

खेत बुवाई किसान ज्यों, रहै मेघ अवसेरि॥

रसलीन

अंषड़ियाँ झाँई पड़ी, पंथ निहारि-निहारि।

जीभड़ियाँ छाला पड्या, राम पुकारि-पुकारि॥

प्रियतम का रास्ता देखते-देखते आत्मा रूपी विरहिणी की आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा है। उसकी दृष्टि मंद पड़ गई है। प्रिय राम की पुकार लगाते-लगाते उसकी जीभ में छाले पड़ गए हैं।

कबीर

कहति ललन आए क्यौं, ज्यौं-ज्यौं राति सिराति।

त्यौं-त्यौं वदन सरोज पैं, परी पियरई जाति॥

रामसहाय दास

अजौं अली आयौ पिउ, कहा हेत सु कहै न।

अध विकास नैननि रही, आधे कहि मुख बैन॥

दौलत कवि

पीउ आयौ क्यौं यह, कहो हेत अब सोय।

नैन बेग चाहत मिल्यौ, सखी ध्यान मग होय॥

दौलत कवि

पीउ आयौ सो वनहिं, रह्यौ कहूँ रस पागि।

कहत काहू लाज सों, रही सोच मग लागि॥

दौलत कवि

जमुना तीर, समीर तहँ, बहै त्रिबिधि सुख होय।

अजौं आयौ क्यौं पिय, करैं दोर द्रग दोय॥

दौलत कवि

पिउ हउं थक्किय सयलु दिणु तुह विरहरग्गि किलंत।

थोडइ जलि जिम मच्छलिय तल्लोविल्लि करंत॥

सोमप्रभ सूरि