मृत्यु

जिस मरनै थै जग डरै, सो मेरे आनंद।

कब मरिहूँ कब देखिहूँ, पूरन परमानंद॥

जिस मरण से संसार डरता है, वह मेरे लिए आनंद है। कब मरूँगा और कब पूर्ण परमानंद स्वरूप ईश्वर का दर्शन करूँगा। देह त्याग के बाद ही ईश्वर का साक्षात्कार होगा। घट का अंतराल हट जाएगा तो अंशी में अंश मिल जाएगा।

कबीर
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सब जग सूता नींद भरि, संत आवै नींद।

काल खड़ा सिर ऊपरै, ज्यौं तौरणि आया बींद॥

सारा संसार नींद में सो रहा है किंतु संत लोग जागृत हैं। उन्हें काल का भय नहीं है, काल यद्यपि सिर के ऊपर खड़ा है किंतु संत को हर्ष है कि तोरण में दूल्हा खड़ा है। वह शीघ्र जीवात्मा रूपी दुल्हन को उसके असली घर लेकर जाएगा।

कबीर
  • संबंधित विषय : सुख

केस पक्या द्रस्टि गई, झर्या दंत और धुन्न।

सैना मिरतू पुगी, करले सुमरन पुन्न॥

सैन कहते हैं कि जब केश पक गए, दृष्टि चली गई, दाँत झड़ गए और ध्वनि मंद पड़ गई, तो जान लो-मृत्यु निकट है। स्मरण का पुण्य कर लो।

सैन भगत

गोरी सोवै सेज पर, मुख पर डारे केस।

चल ख़ुसरो घर आपने, रैन भई चहुँ देस॥

ख़ुसरो कहते हैं कि आत्मा रूपी गोरी सेज पर सो रही है, उसने अपने मुख पर केश डाल लिए हैं, अर्थात वह दिखाई नहीं दे रही है। तब ख़ुसरो ने मन में निश्चय किया कि अब चारों ओर अँधेरा हो गया है, रात्रि की व्याप्ति दिखाई दे रही है। अतः उसे भी अपने घर अर्थात परमात्मा के घर चलना चाहिए।

अमीर ख़ुसरो

काग आपनी चतुरई, तब तक लेहु चलाइ।

जब लग सिर पर दैइ नहिं, लगर सतूना आइ॥

हे कौए! तू अपनी चतुरता तब तक दिखा ले जब तक कि तेरे सिर पर बाज पक्षी आकर अपनी झपट नहीं मारता। भाव यह है कि जब तक मृत्यु मनुष्य को आकर नहीं पकड़ लेती, तभी तक मनुष्य का चंचल मन अपनी चतुरता दिखाता है।

रसनिधि

सदा नगारा कूच का, बाजत आठों जाम।

रहिमन या जग आइ कै, को करि रहा मुकाम॥

आठों पहर कूच करने का नगाड़ा बजता रहता है। यानी हर वक़्त मृत्यु सक्रिय है, कोई कोई मर ही रहा है। यही सत्य है। रहीम कहते हैं कि इस नश्वर संसार में आकर कौन अमर हुआ है!

रहीम

चाकी चलती देखि कै, दिया कबीरा रोइ।

दोइ पट भीतर आइकै, सालिम बचा कोई॥

काल की चक्की चलते देख कर कबीर को रुलाई जाती है। आकाश और धरती के दो पाटों के बीच कोई भी सुरक्षित नहीं बचा है।

कबीर

माली आवत देखि के, कलियाँ करैं पुकार।

फूली-फूली चुनि गई, कालि हमारी बार॥

मृत्यु रूपी माली को आता देखकर अल्पवय जीव कहता है कि जो पुष्पित थे अर्थात् पूर्ण विकसित हो चुके थे, उन्हें काल चुन ले गया। कल हमारी भी बारी जाएगी। अन्य पुष्पों की तरह मुझे भी काल कवलित होना पड़ेगा।

कबीर
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सैना रोऊँ किण सुमर, देख हूँसू किण अब्ब।

जो आए ते सब गये, हैं सो जैहें सब्ब॥

सैन कहते हैं—मैं किसे याद करके रोऊँ और किसे याद करके हँसूँ? जो आए थे, वे सब चले गए। जो हैं, वे सब चले जाएँगे।

सैन भगत

केस कनौती ऊजली, सपट सेनसो देय।

सैना समयो पुग्यो, राम नाम भज लेय॥

कनौटी (कनपटी) तथा सिर पर सफ़ेद बाल जाएँ तो उसे सीधा-स्पष्ट समझौता मानना चाहिए कि संसार से विदा का समय गया है, राम नाम में चित्त लगा लो।

सैन भगत
  • संबंधित विषय : समय

रैदास जन्मे कउ हरस का, मरने कउ का सोक।

बाजीगर के खेल कूं, समझत नाहीं लोक॥

रैदास कहते हैं कि जन्म के समय कैसा हर्ष और मृत्यु पर कैसा दुःख! यह तो ईश्वर की लीला है। संसार इसे नहीं समझ पाता। जिस प्रकार लोग बाज़ीगर के तमाशे को देखकर हर्षित और दुःखी होते हैं, उसी प्रकार ईश्वर भी संसार में जन्म−मृत्यु की लीला दिखाता है। अतः ईश्वर के इस विधान पर हर्षित अथवा दुःखी नहीं होना चाहिए।

रैदास

सुंदर देही पाय के, मत कोइ करैं गुमान।

काल दरेरा खाएगा, क्या बूढ़ा क्या ज्वान॥

मलूकदास

यौं मति जानै बावरे, काल लगावै बेर।

सुंदर सब ही देखतें, होइ राख की ढेर॥

सुंदरदास

सुंदर ग़ाफ़िल क्यौं फिरै, साबधान किन होय।

जम जौरा तकि मारि है, घरी पहरि मैं तोय॥

सुंदरदास

मेरै मंदिर माल धन, मेरौ सकल कुटुंब।

सुंदर ज्यौं को त्यौं रहै, काल दियौ जब बंब॥

सुंदरदास

असु गज अरु कंचन 'दया', जोरे लाख करोर।

हाथ झाड़ रीते गये, भयो काल को ज़ोर॥

दयाबाई

चमक-दमक सब मिटि गई, जीव गयौ जब आप।

सुंदर खाली कंचुकी, नीकसि भागौ सांप॥

सुंदरदास

मेरी मेरी करत है, तोकौं सुद्धि सार।

काल अचानक मारि है, सुंदर लगै बार॥

सुंदरदास

जागो रे अब जागो भैया, सिर पर जम की धार।

ना जानूँ कौने घरी, केहि ले जैहै मार॥

मलूकदास

कहे तुका जग भुला रे, कह्या मानत कोय।

हात परे जब काल के, मारत फोरत डोय॥

संत तुकाराम

ज्यौं कौ त्यौं ही देखिये, सकल देह कौ ठाट।

सुंदर को जांणै नहीं, जीव गयौ किहिं बाट॥

सुंदरदास

देह सुरंगी तब लगें, जब लगि प्राण समीप।

जीव जाति जाती रही, सुंदर बिदरंग दीप॥

सुंदरदास

एक-एक देख्यो सकल घट, जैसे चंद की छांह।

वैसे जानो काल जग, एक-एक सब मांह॥

संत शिवनारायण

तीन लोक नौ खंड के, लिये जीव सब हेर।

'दया' काल परचंड है मारै सब कूं घेर॥

दयाबाई

पीछै सूँ जम घेरसी, टेकरै काल किरोई।

कुण आरोगै घीव, जीमसी कूण रसोई॥

लालनाथ