प्रेम के पाँच पत्र और प्रलोभन की एक कथा
हिन्दवी डेस्क
22 फरवरी 2026
मेरानो, 15 जून 1920
मंगलवार
इस अलस्सुबह मैंने फिर तुम्हें स्वप्न में देखा। हम साथ बैठे थे और तुम मुझे दूर कर रही थीं—ग़ुस्से से नहीं, सहज आत्मीयता से। मैं बेहद दुखी था। इसलिए नहीं कि तुम मुझे दूर कर रही थीं, इसलिए कि मैं तुम्हारे साथ जैसे किसी मूक स्त्री के समान व्यवहार कर रहा था, उस स्वर को अनसुना करता हुआ जो प्रत्यक्षतः तुम्हारे अंतर से मुझसे संवाद कर रहा था। या शायद मैं उसे अनसुना नहीं कर रहा था, बस मेरे पास कोई उत्तर न था। मैं उस पहले स्वप्न की अपेक्षा कहीं अधिक खिन्न होकर लौटा। उसी समय मुझे वह याद आया जो मैंने कभी किसी के घर पर पढ़ा था—कुछ ऐसा : “मेरा प्रियतम एक ज्योति-स्तंभ है जो धरती के ऊपर से प्रवाहमान है। इसने इस क्षण मुझे आवृत रखा है। लेकिन यह उन्हें मार्ग नहीं दिखाता जो आवृत हैं, बल्कि उन्हें जो उसे देख पाते हैं।”
—तुम्हारा
(अब तो मैं अपना नाम भी खोता जा रहा हूँ—यह लघु से लघुतर होता जा रहा है और यह है अब : तुम्हारा)
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6 अगस्त 1932
ओह हेनरी,
इस सुबह तुम्हारे पत्र ने मुझे उद्विग्न कर दिया। जैसे ही यह मुझे मिला, अब तक बनावटी रूप से दबाकर रखी गईं मेरी सब भावनाएँ मुझे अभिभूत कर गईं। उस पत्र को छूना भर ही ऐसा था जैसे तुमने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया हो। अब तुम जान गए हो कि उसे पढ़ते समय मेरे भीतर क्या घटित हुआ। तुमने वह सब कहा जो मुझे छू सकता था और मेरा मन जीत सकता था और मैं भीग उठी और इतनी अधीर हो गई हूँ कि ऐसा एक दिन जीने के लिए हरसंभव उपाय कर रही हूँ। साथ में भेजा जा रहा यह नोट, जिसे मैंने कल रात अपना पत्र भेजने के दो घंटे बाद लिखा, तुम्हें यह समझाने में सहायक होगी कि मेरे भीतर कैसी हलचल मची है। तुम्हें वह टेलीग्राम लगभग उसी समय मिल गया होगा। मैं तुम्हारी हूँ! हम साथ एक हफ़्ता ऐसा जीने जा रहे हैं, जिसकी हमने अब तक कल्पना भी नहीं की है। “थर्मोमीटर फट पड़ेगा।”
मैं फिर से अपने भीतर उस उग्र आवर्तित आघात को महसूस करना चाहती हूँ, वह दौड़ता-तपता हुआ रक्त, वह मंथर-संस्पर्शमयी लय और फिर अचानक का तीव्र रत्यावेग-प्रहार, वे उन्मत्त विराम जब वर्षा-बूंदों की ध्वनि मेरे भीतर गूँजती है… जिस तरह वह स्पंदन मेरे मुख में उच्छलित हो उठता है, हेनरी! ओह, हेनरी, तुम्हें पत्र लिखना भी असह्य हो रहा है—मैं तुम्हें इतनी आकुलता से अभी चाहती हूँ, अपनी देह पूरी तरह खोल लेना चाहती हूँ, मैं पिघल रही हूँ और उत्तेजना से काँप रही हूँ। मैं तुम्हारे साथ ऐसी उन्मुक्त और उग्र चीज़ें करना चाहती हूँ, जिन्हें शब्दों में अभिव्यक्त भी नहीं कर पा रही।
—अनाइस
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शरद, 1930
प्रियतम, मेरे प्राणप्रिय—
तुम्हारे बिना जीवन ऊष्माहीन और यांत्रिक हो गया है—अपनी ही जीवंतता का मृतक मुखौटा।
सात बजे मैंने स्नान किया, लेकिन तुम नहीं थे बग़ल के कमरे में कि इसे मेरे तमाम ख़यालों का बपतिस्मा बना देते।
आठ बजे मैं व्यायाम करने गई, लेकिन तुम नहीं थे वहाँ कि हर गति को बहती हवाओं की लहर में बदल देते।
नौ बजे मैं बुनाई के लिए गई और वहाँ सफ़ेद चोगे में एक वृद्ध मंत्र बुदबुदा रहा था, लेकिन तुम नहीं थे वहाँ कि उसकी याचनापूर्ण ध्वनि को सचमुच धार्मिक बना देते।
दुपहर को मैंने ब्रिज खेला और डॉ. फोरेल के पार्श्व-चित्र को आकाश को चीरते हुए देखा, पृष्ठभूमि की रोशनी में उभरा हुआ—
पूरे अपराह्न मैं वर्षा में भीगे हुए शब्द लिखती रही और अंदर एक सीलन-सी भरी रही और तुम्हारे बारे में सोचती रही—जब कोई तुम्हारे ऊँचे ललाट को पार कर तुम्हारे प्रिय मुख के आस-पास की मधुर घाटियों में उतरता है तो वह अनुभव वैसा ही है जैसे हैनिबल का एल्प्स पार करना—मैं तुमसे प्रेम करती हूँ, प्रिय। तुम ऐसे नहीं चलते जैसे कोई आँधी को चीरता हुआ आगे बढ़ रहा हो, बल्कि ऐसे मानो अपने ही चलने के ढंग पर विस्मित हो, धरती को छुए बिना, जैसे हर क़दम एक नया प्रयोग हो—
और तुम इतने प्रिय हो और यह निश्चय ही तुम्हें असहज करता होगा कि कोई लगातार तुम्हारे भीतर उतर पड़ने की चेष्टा करता रहे, जिस तरह मैं करती रहती हूँ—
शुभरात्रि, मेरे मधुर प्रेम।
—ज़ेल्डा
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डिएगो,
सत्य इतना विराट है कि मैं न बोलना चाहूँगी, न सोना, न सुनना, न प्रेम करना। ख़ुद को क़ैद महसूस करना, रक्त के भय से परे, समय और जादू से बाहर, तुम्हारे स्वयं के भय और तुम्हारी गहन व्यथा के भीतर और स्वयं तुम्हारे हृदय की धड़कन के बीच। यह सारा उन्माद, यदि मैं तुमसे इसकी माँग करूँ, तो जानती हूँ कि तुम्हारी चुप्पी में बस एक उलझन जन्म लेगी। मैं तुमसे असंगतता में भी तीव्रता माँगती हूँ और तुम मुझे अनुग्रह देते हो—रोशनी अपनी, अपनी ऊष्मा। मैं तुम्हें चित्रित करना चाहूँगी, लेकिन रंग ही नहीं हैं, क्योंकि वे इतने अधिक हैं कि मेरी उलझन में मेरे विराट प्रेम का कोई स्पर्शनीय रूप बन ही नहीं पाता।
—एफ.
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8 दिसंबर 1909
44 फ़ॉन्टनॉय स्ट्रीट, डबलिन
मेरी मधुर कामोन्मुखा प्रिय नोरा,
मैंने किया वह जो तुमने कहा—तुम्हारा पत्र पढ़ते हुए दो बार अपने रति-आवेग का विसर्जन। यह जानकर मुझे अपार हर्ष हुआ कि तुम्हें पृष्ठभाग से संगम प्रिय है। अभी मुझे वह रात याद रही है, जब मैंने तुम्हें दीर्घकाल तक उसी भाँति अपनाया था। वह अब तक का हमारा सर्वाधिक उद्दाम और उच्छृंखल मिलन था, प्रिय। मेरा अंग दीर्घ समय तक तुम्हारे भीतर स्थित रहा—तुम्हारे उत्तोलित नितंबों के अधोभाग में आवर्तित होता हुआ। मेरे उदर से सटे तुम्हारे भरे-पूरे स्वेद-सिक्त नितंब और तुम्हारा रक्ताभ मुख और उन्मीलित उन्मादपूर्ण नेत्र मेरे सम्मुख थे। प्रत्येक प्रबल आवेग पर तुम्हारी निर्लज्ज जिह्वा अधरों से बाहर आ जाती थी और जब मैं अधिक तीव्रता से प्रविष्ट होता तो तुम्हारे पृष्ठदेश से वायु-निर्गमन की ध्वनियाँ फूट पड़तीं। उस रात्रि तुम्हारा अधोभाग वायु से परिपूर्ण था प्रिय और मैं प्रत्येक अघात से उन्हें मुक्त करता रहा—कभी दीर्घ, कभी आकस्मिक, कभी चपल, कभी क्षीण। एक स्त्री के साथ ऐसा संगम, जिसमें प्रत्येक गति पर देह अपनी वायु-ध्वनियों से उत्तर दे—एक विलक्षण अनुभूति है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मैं नोरा के वातोत्सर्ग-निनाद को किसी भी स्थान पर पहचान सकूँगा। मेरा विश्वास है कि यदि अनेक स्त्रियाँ एक ही कक्ष में हों तब भी मैं उसकी विशिष्ट ध्वनि को पृथक कर लूँगा। उसका स्वर कुछ कुमारिका-सदृश है—वैसा आर्द्र एवं प्रबल नहीं जैसा मैं स्थूल गृहिणियों के विषय में कल्पना करता हूँ। वह आकस्मिक, शुष्क और किंचित् धृष्ट प्रतीत होता है, ऐसा जैसे कोई साहसी बालिका रात्रिकालीन छात्रावास में विनोदवश उसे मुक्त कर दे। मैं यह भी कामना करता हूँ कि नोरा अपने ऐसे वातोत्सर्गों का अवरोध न रखे, अपितु उन्हें मेरे समीप ही प्रकट करे, जिससे मैं उनके गंध-स्वरूप से भी परिचित हो सकूँ।
तुम कहती हो कि जब मैं लौटूँगा तो तुम मेरा मुखरति करोगी और चाहती हो कि मैं तुम्हारे ऊर्ध्व अधरों को चूमूँ—हे चपला, किंचित् उच्छृंखल प्रिये। मैं आशा करता हूँ कि किसी समय तुम मुझे चकित करोगी, जब मैं वस्त्र-आवृत निद्रामग्न रहूँ और तुम निद्रा-मदिर नेत्रों में विलासिनी-सी दीप्ति लिए मुझ पर मृदुलतापूर्वक झुकोगी। तुम धीरे-धीरे मेरे बटन को खोलोगी और अपने प्रिय के उस अंग को कोमलता से बाहर निकालोगी और फिर उसे अपने आर्द्र अधरों में लेकर स्नेहपूर्वक स्पर्श करोगी और उसे तब तक चूमती रहोगी जब तक वह अधिक पुष्ट, अधिक दृढ़ होकर तुम्हारे ही मुख में परितोष न पाए। और कभी ऐसा भी होगा कि मैं तुम्हें निद्रामग्न अवस्था में चकित करूँगा; तुम्हारी वसना को ऊपर उठाकर तुम्हारे उष्ण अंतर्वस्त्रों को कोमलता से खोलूँगा, फिर तुम्हारे समीप लेटकर आलस्य-भरे स्नेह से तुम्हारे रोमावली के आस-पास चुम्बन आरंभ करूँगा। तुम अस्फुट व्याकुलता से करवट लेने लगोगी, तब मैं अपनी प्रिया के उस अंतरंग स्थल का अधर-स्पर्श करूँगा। तुम निद्रा में ही करुण-स्वर निकालोगी—मंद सीत्कार, मर्मर, उच्छ्वास और कामोन्मत्त श्वासों से स्पंदित होती हुई। तत्पश्चात मैं अधिक तीव्रता से, अधिक उत्कंठा से, मानो किसी अतृप्त जीव की भाँति, तुम्हें चूमता रहूँगा, जब तक कि तुम्हारा अंग नदी न हो जाए और तुम पूर्ण कामावेश में लहराने न लगो।
शुभरात्रि, मेरी वात-चपल, मेरी रतिमयी नोरा। तुमने एक शब्द विशेष रेखांकित किया है जो मेरे भीतर तीव्र आवेग को और परिष्कृत करेगा। उसके विषय में और लिखो और अपने विषय में भी—और भी उन्मुक्त होकर।
—जिम
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प्रिय बोरीस,
यह प्रलोभन की एक कथा है। इसकी जड़ें दूर अतीत से जुड़ी हैं—मास्को से, जब मैं पंद्रह साल की थी। वह उन सब लड़कियों में सबसे सुंदर थी जो सेकंडरी स्कूल में पढ़ती थीं—इतनी सुंदर कि उसे देखना पीड़ा देता था। वह मुझसे एक वर्ष जूनियर थी और जब भी हम गलियारे में आमने-सामने पड़ते, मैं अपनी नज़रें उससे हटा नहीं पाती थी। पूरे एक साल रोज़ ही उसे देखती रही, लेकिन उससे एक शब्द भी न कह सकी। 1918-1919। प्रेम। आघात। (पर्दे से गुज़र जाते हैं बादल।) 1925, पेरिस। मुझे यहाँ आए तीन दिन हुए थे। ‘द लेटेस्ट न्यूज़’ को लिखा गया एक पत्र मेरे पास अग्रेषित किया गया। “मारीना! शायद तुम्हें मेरी याद न हो। मैं तुम्हारे साथ सेकंडरी स्कूल में थी। मैं तुम्हें चाहती थी, लेकिन तुमसे भय रखती थी…” ऐसी ही अन्य बातें। मैंने उत्तर दिया। और फिर पत्रों का सिलसिला शुरू हुआ और चलता रहा। वह बीमार थी और उपचार ले रही थी। दो वर्षों में हमारी नौ भेंटें हुईं। एक बार मैं उससे मिलने पोर्त द पासी के निकट उसके तंग अपार्टमेंट में गई—सस्ते फ़र्नीचर, किसी भी वस्तु के लिए कोई जगह नहीं और वहाँ उसकी माँ भी थी, एक प्रसन्नचित्त और भली स्त्री। इस ग्रीष्म मैंने उससे दो बार एक सेनेटोरियम में जाकर मिली। साहित्य के बारे में बातें हुईं—उन पत्रों की गहराई के मुक़ाबले कुछ अस्वाभाविक। इधर-उधर की बातें। 1927, एक माह पूर्व। दुपहर का एक बजा था। दरवाज़े पर दस्तक हुई। वह स्त्री। “अरे, तुम्हारा आना इतना सुखद! आओ, मेरे कमरे में चलें,”—मैंने कहा। “किधर है तुम्हारा कमरा?”—उसकी धीमी, दबी हुई-सी आवाज़। उसके गाल तप रहे थे, साँस उखड़ी हुई—स्टेशन से हमारे घर तक का मार्ग चढ़ान रखता है, फिर सीढ़ियाँ, और दो फेफड़ों में से अब उसके पास केवल आधे चाँद-सा एक क्षीण अंश ही शेष था। एकदम क्षीण। शतरंज, अतिथि-सत्कार, अल्पाहार। हमने साथ टहलने का निश्चय किया। हमारी गली अधिक चढ़ान नहीं रखती। मैं कल्पना करती रही कि उसके लिए यह कितना कठिन होगा—हम दोनों हाँफ रहे थे। लौटते समय सीढ़ियों का विचार मुझे व्यथित कर रहा था। और जैसे ही हम भीतर आए, उसने पूछा कि “क्या मैं अब लेट सकती हूँ?” वह मेरे जर्जर, चूहे-से छोटे सोफ़े पर लेट गई—सुंदर, युवा स्त्री (तुम कह नहीं सकते कि वह बत्तीस की है—अधिक से अधिक बाइस की लगती है)। वह चुप थी। चारों ओर देखती रही। मैं अपने मेज़ पर काम करना चाहती थी। उसने सिर के एक इशारे से, पलकों से और अपने अस्तित्व से मुझे रोक लिया। मैं उसके पास बैठ गई। कमरे में जो कुछ भी था, उसकी प्रेरणा से मैंने उसका हाथ थाम लिया। एक हाथ दूसरे हाथ की पुकार में (एक हाथ ने उसका हाथ थामा, दूसरा उसके बालों में फिरने लगा)। मैं झुक गई थी और मन में एक शब्द कौंधा था : “अनगिन।” और पूर्ण चेतना के साथ कि मैं एक अपराध कर रही हूँ—उसकी व्याधि के हृदय तक पहुँचते हुए। पूर्ण जागरूकता के साथ।
बोरीस! उस मुख का प्रतिरोध अन्य सब से भिन्न था। और किस लज्जा के साथ इसका समर्पण हुआ। मेरा पहला वास्तविक चुम्बन। और शायद उसकी भी आकांक्षा।
बोरीस, मैंने मृत्यु को चूमा। जीवन के नाम पर सब कुछ प्रतिपूरित कर देने की इच्छा में। स्वयं जीवन ने मृत्यु को चूमा। बोरीस, प्रत्येक चुम्बन ऐसा ही होना चाहिए—जीवन के लिए नहीं, मृत्यु के लिए—पूर्ण सजगता के साथ, उसके मूल्य और परिणाम के पूर्ण बोध के साथ।
—मारीना
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‘लेटर्स टू मिलेना’, ‘ए लिटरेट पैशन: लेटर्स ऑफ़ अनीस निन एंड हेनरी मिलर’, ‘डियर स्कॉट, डियरेस्ट ज़ेल्डा: द लव लेटर्स ऑफ़ एफ. स्कॉट एंड ज़ेल्डा फिट्ज़जेराल्ड’, ‘द डायरी ऑफ़ फ़्रीदा काह्लो : एन इंटिमेट सेल्फ़-पोर्ट्रेट’, ‘सेलेक्टेड लेटर्स ऑफ़ जेम्स जॉयस’, ‘पीएन रिव्यू’ (फ़रवरी 2018 अंक) से चयनित पत्र | अनुवाद : शायक आलोक
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