अभिसार पर दोहे

भारतीय साहित्यशास्त्र

में ‘नायिका का नायक के पास जाना’ या ‘दूती या सखी द्वारा नायक को अपने पास बुलाना’ अभिसार कहा गया है। इस अर्थ में अभिसार में प्रवृत्त नायिका को ‘अभिसारिका’ कहा गया है। प्राचीन कवियों ने अभिसारिका को सभी नायिकाओं में सर्वाधिक मधुर, आकर्षक और प्रेमाभिव्यंजिका बताया है। काव्य के साथ ही चित्रकला में भी अभिसार का व्यापक अंकन हुआ है।

फूलति कली गुलाब की, सखि यहि रूप लखै न।

मनौ बुलावति मधुप कौं, दै चुटकी की सैन॥

एक सखी दूसरी सखी से चटचटा कर विकसित होती हुई कली का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि, इस खिलती हुई गुलाब की कली का रूप तो देखो न। यह ऐसी प्रतीत होती है, मानो अपने प्रियतम भौंरे को रस लेने के लिए चुटकी बजाकर इशारा करती हुई अपने पास बुला रही हो।

मतिराम

साव-सलोणी गोरडी नवखी वि विस-गंठि।

भडु पच्चलिओ सो मरइ जासु लग्गइ कंठि॥

सर्वांग सुंदर गोरी कोई नोखी विष की गाँठ है। योद्धा वास्तव में वह मरता है जिसके कंठ से वह नहीं लगती।

हेमचंद्र

अङ्गहिं अङ्ग मिलिउ हलि अहरेँ अहरु पत्तु।

पिअ जोअन्तिहे मुह-कमलु एम्वइ सुरउ समत्तु॥

हे सखि, अंगों से अंग नहीं मिला; अधर से अधरों का संयोग नहीं हुआ; प्रिय का मुख-कमल देखते-देखते यों ही सुरत समाप्त हो गई।

हेमचंद्र

जइ केवँइ पावीसु पिउ अकिआ कुड्डु करीसु।

पाणिउ नवइ सरावि जिवं सब्बंगें पइसीसु॥

यदि किसी प्रकार प्रिय को पा लूँगी तो अनोखे खेल करूँगी। पानी नए पुरवा में जैसे प्रविष्ट हो जाता है, मैं भी सर्वांग से प्रिय (के अंग-अंग) में प्रवेश कर जाऊँगी।

हेमचंद्र

अरुन नयन खंडित अधर, खुले केस अलसाति।

देखि परी पति पास तें, आवति बधू लजाति॥

कृपाराम

एहु जम्मु नग्गहं गियउ भड-सिरि खग्गु भग्गु।

तिक्खाँ तुरिय माणिया गोरी गलि लग्गु॥

वह जन्म व्यर्थ गया जिसने शत्रु के सिर पर खड्ग का वार नहीं किया, तीखे घोड़े पर सवारी की और गोरी को गले ही लगाया।

मुंज

ऐसी आजु कहा भई, मो गति पलटे हाल।

जंघ जुगल थहरत चलत, डरति बिसूरति बाल॥

कृपाराम

पिय-सङ्गमि कउ निद्दडी पिअहो परोक्खहो केम्व।

मइँ विन्नि वि विन्नासिआ निद्द एम्व तेम्व॥

प्रिय के संगम में नींद कहाँ! प्रिय के वियोग में भी नींद कैसी! मैं दोनों ही प्रकार विनष्ट हुई; नींद यों त्यों।

हेमचंद्र

सुरत करत पाइल बजै, लजै लजीली भूरि।

ननद जिठानी की सखी, हाँसी हिए बिसूरि॥

कृपाराम

एक ब्रह्ममय सब जगत, ऐसे कहत जु बेद।

कौन देत को लेत सखि, रति सुख समुझि अभेद॥

कृपाराम

प्रीतम नहिं कछु लखि सक्यो, आलि कही तिय कान।

नथ उतारि धरि नाक तं, कह जमाल का जान॥

सखी ने नायिका के कान में जो कहा, उसको प्रिय जान सका नायिका ने अपने नाक की नथ को क्यों खोल दिया ? अभिप्राय यह है कि नायिका के अधरों पर नथ को झूलते देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो अधर रस की रक्षा के लिए ताला लगा हो। नथ अधर रस के पान में बाधक है, ऐसा भ्रम नायक को होते देखकर सखी ने नायिका से नथ हटा देने को कहा।

जमाल

रात आवै नींदड़ी, थर-थर कांपे जीव।

जानू क्या करैगा, जालिम मेरा पीव॥

मलूकदास

सखि पिय सुरत, सुरत, सुरत, सुरत सुर तन पीर।

सुर तन हिन सुर तन नहीं, सुर तनया सरि नीर॥

जमुना के जल में चंद्र प्रतिबिंब के दर्शन से संभोग समय देखी हुई प्रिय की सूरत और सहवास का स्मरण हो आया। वह मधुर स्मृति शूल बन कर तन में चुभने लगी। काम जागृत हो उठा, जिससे गोपिका का शरीर शिथिल हो गया जैसे उसमें प्राण ही हों।

दयाराम

समय समुझि सुख-मिलन कौ, लहि मुख-चंद-उजास।

मंद-मंद मंदिर चली, लाज-सुखी पिय-पास॥

दुलारेलाल भार्गव

दंपति रति विपरित मैं, करत किंकिनी सोर दुवौ।

मनौ मदन महिपाल की, नौबत होत टंकोर॥

विक्रम