ईर्ष्या पर दोहे

ईर्ष्या दूसरों की उन्नति,

सुख या वैभव से उभरने वाला मानसिक कष्ट है। इसका संबंध मानवीय मनोवृत्ति से है और काव्य में सहज रूप से इसकी प्रवृत्तियों और परिणामों की अभिव्यक्ति होती रही है।

बीति रैनि आए कहा, भोर भएँ धन देहु।

जओ जहाँ भावै तहाँ, यों बोली तजि नेहु॥

कृपाराम

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