विलास पर दोहे

विलास सुखभोग या आनंदमय

क्रीड़ा है। संयोग के समय प्रकट हाव-भाव अथवा प्रेमसूचक क्रियाएँ भी विलास मानी जाती हैं। किसी अंग की मनोहर चेष्टा को उस अंग से संबद्ध विलास के रूप में प्रकट किया जाता है। प्रस्तुत है विलास के विषय पर विभिन्न काव्यरूपों से एक चयन।

धन संचय दुख देत है, धन त्यागे सुख होय।

रैदास सीख गुरु देव की, धन मति जोरे कोय॥

धन का सीमा से अधिक संचय दुख देता है। अधिक धन की कामना त्यागकर ही वास्तविक सुख की प्राप्ति होती है। अतः सभी गुरुओं की यही शिक्षा है कि कोई भी सीमा से अधिक धन का संचय करे।

रैदास

अद्भुत या धन को तिमिर, मो पै कह्यौ जाइ।

ज्यौं-ज्यौं मनिगन जगमगत, त्यौं-त्यौं अति अधिकाइ॥

इस धन का अंधकार बड़ा ही अद्भुत है, मैं इसका वर्णन नहीं कर सकता; क्योंकि ज्यों-ज्यों मणियों के समूह जगमगाते या चमकते हैं, त्यों-त्यों यह अंधकार बढ़ता ही जाता है। भाव यह है कि धन के आने पर मनुष्य की आँखों पर अँधेरा छा जाता है और अभिमान का अंधकार ज्यों-ज्यों संपत्ति बढ़ती है त्यों-त्यों बढ़ता ही जाता है। धन बढ़ने पर मनुष्य बड़ा अभिमानी हो जाता है।

मतिराम

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